Wednesday, February 25, 2026
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पूर्वांचल का चेहरा - पूर्वांचल की आवाज़

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सामाजिक न्याय

यूजीसी एक्ट के खिलाफ क्यों अपनी कुंठा और विद्वेष लहरा रहे हैं भारतीय सवर्ण?

यदि यह जानने का प्रयास हो कि मानव जाति के हजारों साल के इतिहास में इस धरती पर ऐसा कौन सा समाज मौजूद रहा है ,जिसमें अपने ही धर्म के बहुसंख्य लोगों को आथिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक शक्ति के सभी स्रोतों में रत्ती भर भी हिस्सेदार बनाने की मानसिकता नहीं रही है बल्कि इसके उलट जब-जब राज्य द्वारा बहुसंख्य वंचितों को कुछ अधिकार देने का प्रयास हुआ, तब-तब उस समाज ने देश को एक रणभूमि में तब्दील कर दिया हो तब इसका एकमात्र जवाब है कि वह ब्राह्मण-क्षत्रिय- वैश्यों से युक्त भारत का सवर्ण समाज होगा! लाख प्रयास के बावजूद ऐसे किसी अन्य समाज का नाम नहीं ढूँढा जा सकता, जिसकी सवर्णों जैसी अपने ही सहधर्मियों को अधिकार- शून्य देखने की तीव्र चाह हो। जाने-माने एक्टिविस्ट लेखक और बहुजन डायवर्सिटी मिशन के अध्यक्ष एच एल दुसाध इस लेख में कहते हैं कि ‘यह समाज शुद्रातिशूद्रों के रूप में विद्यमान देश की 85 प्रतिशत आबादी के अधिकारों के इतना खिलाफ रहा कि उसे बहुसंख्य आबादी को अच्छा नाम रखने, शिक्षा पाने एवं मोक्ष के लिए आध्यात्मानुशीलन का अधिकार देना भी कभी गंवारा नहीं रहा। दुनिया के इतिहास में सबसे क्रूर माने जाने वाले एटिला द हूण, चंगेज खां जैसे शासकों ने पराधीन बनाये गए लोगों को अच्छा नाम रखने, शिक्षा ग्रहण करने एवं दुःख मोचन के लिए देवालयों में जाकर अपने भगवानों से प्रार्थना करने से कभी नहीं रोका। ऐसी बर्बरता का परिचय समग्र इतिहास में सिर्फ सवर्णों ने दिया।’

नांदेड़ : राजनीति और शासन जाति की सड़ांध से प्रेमियों को नहीं बचा सकते

इस कहानी का सबसे बुरा हिस्सा यह है कि सक्षम और आंचल के रिश्ते के बारे में परिवार में सभी जानते थे और उन्होंने उनके रिश्ते को स्वीकार करने का नाटक किया, लेकिन यह परिवार की एक चाल थी और आखिरी दिन उन्होंने सक्षम की हत्या कर दी। बात यहीं खत्म नहीं हुई, आंचल ने अपना विरोध दिखाया और सक्षम की लाश से शादी कर ली। 'सिंदूर' लगाया और मांग की कि उसके माता-पिता और भाइयों को फांसी दी जाए।

आरएसएस के संविधान विरोध पर गूगल का नज़रिया

यह सच है कि 26 नवम्बर, 1949 को संविधान राष्ट्र को सौंपे जाने के दिन से ही आरएसएस इसका विरोधी रहा है। हालांकि तमाम लोगों की भांति मुझे भी मालूम था कि डॉ. आंबेडकर द्वारा तैयार भारतीय संविधान मनुस्मृति पर आधारित न होने के कारण ही संघ इसका विरोधी रहा है, लेकिन यह लेख शुरू करने से पहले यह जानने का कौतूहल हुआ कि गूगल इस पर क्या राय देता है? मैंने गूगल से सवाल किया कि संघ भारतीय संविधान का क्यों विरोधी रहा है, तो जो जवाब मिला, वह वही था जो हम जानते हैं। आइये जानते हैं गूगल का जवाब-

बहुजनों के लिए बहुत बुरा साबित हुआ है यह अक्तूबर

आज 2025 का अक्तूबर का आखिरी दिन है। यह माह कई कारणों से बहुजनों के लिए दु:स्वप्न बना रहा। इसी माह की दो तारीख को 1925 में स्थापित आरएसएस ने सौ साल पूरे होने का जश्न मनाया। इसी माह में छः तारीख को देश के राजनीति की दिशा तय करने वाले बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई। लेकिन संघ के सौ साल पूरे होने व बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा के अतिरिक्त जिस एक अन्य कारण से इस बार का अक्टूबर दु:स्वप्न बना, वह है संघ के सौ साल पूरा होने के बाद से उत्तर प्रदेश सहित भाजपा शासित मध्य प्रदेश, हरियाणा में  दलित–बहुजनों के खिलाफ शुरू हुआ अपमान, भेदभाव और उत्पीड़न से लेकर आत्महत्या की घटनाओं का सिलसिला, जो अब तक थमने का नाम नहीं ले रहा है। अक्तूबर 2025 के आकलन का यह मौलिक तरीका निस्संदेह एक महत्वपूर्ण पद्धति है।

जस्टिस गवई को ‘भीमटा’ की गाली सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक सरोकारों के सिमटते जाने का संकेत है

भारत की सड़ी हुई राजनीति और मनुवादी मानसिकता का असली चेहरा तब सामने आता है जब दलित समाज से आया व्यक्ति सत्ता, न्याय या प्रतिष्ठा की ऊँचाई पर पहुँच देश का मुख्य न्यायाधीश बनता हैऔर मनुवादी उसे सहज स्वीकार नहीं करते। इधर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई को सोशल मीडिया पर 'भीमटा' कहकर अपमानित किया गया। यह केवल एक गाली नहीं है। यह उस आंबेडकरवादी विचारधारा पर हमला है जिसने मनुवाद की नींव हिलाई थी। यह संविधान और लोकतंत्र को नीचा दिखाने की कोशिश है।

अंबेडकर जयंती पर महिलाओं के समता, समानता और सुरक्षा के लिए उपवास कार्यक्रम

अपराधियों को सीधे गोली मारकर  जहन्नुम भेजने का दावा करने वाले पुलिसस्टेट में तब्दील हो चुके राज्य में डबल इंजन की नाक के नीचे सेक्स और नशे का धंधा करने का आरोप है इन बदमाशों पर। ये इम्पॉसिबल है कि बिज़नेस मॉडल के ऐसे संगठित अपराध बिना पुलिस के जानकारी के फल फूल पाएं।

क्या बहुजनों में सापेक्षिक वंचना का अहसास होता तो मोदी-योगी और करणी सेना का अस्तित्व न होता?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दस सालों में संसद में मिले विपुल बहुमत का उपयोग सबसे अधिक सवर्ण वर्चस्व कायम करने में किया है। इस क्रम में वर्ग संघर्ष का ऐसा इकतरफा खेल खेला है जिसकी नई सदी में कोई मिसाल ही नहीं है। दुनिया में कहीं भी सुविधाभोगी वर्ग के हित में ऐसी नीतियां ही नहीं बनीं। सवर्ण हितों में इकतरफा नीतियां बनाते देख सवर्णों का हर तबका मोदी का आँख मूँदकर समर्थन कर रहा है। पढ़िये जाने-माने लेखक एच एल दुसाध का विचारोत्तेजक विश्लेषण ।

दलित दूल्हों का घोड़ी पर चढ़ना : उनका कहना है कि घोड़ी हमारे बाप की है, हमारी ज़िद है कि इंसान सब बराबर हैं

संविधान भले ही सभी को बराबरी का अधिकार देता है लेकिन समाज में मनुस्मृति के समर्थकों के गले यह बात नहीं उतरती। यही लोग हैं जो समाज की जातिवादी व्यवस्था को मजबूत किए हुए हैं। इसके साथ नेता मंत्री अपने भाषणों में सभी के बराबर होने की बात करते हैं लेकिन कहीं न कहीं उनके लोग इसे नकारते दिख जाते हैं। दलितों को समाज में उपेक्षित नज़रों से देखते हैं। दलित दुल्हों को घोड़ी पर देखकर सवर्ण बिदक जाते हैं। समाज के वंचित समुदाय के लोगों का आगे बढ़ना उन्हें नागवार गुजरता है और विरोधस्वरूप मारपीट पर उतारू हो जाते हैं। वैसे तो दलितों से भेदभाव हर प्रदेश में हो रहा है लेकिन इन पर हमले और हिंसा के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है।

ओड़िशा : बरगढ़ में संयुक्त कृषक संगठन की हुई महापंचायत

बरगढ़ में संयुक्त कृषक संगठन ने 17 मार्च को आयोजित महापंचायत में हजारों किसान और कृषि मजदूर शामिल हुए। वे उच्च बिजली शुल्क और टाटा पावर द्वारा लगाए गए स्मार्ट मीटर के खिलाफ अपने विरोध की सफलता के लिए एकत्रित हुए।

फुले दम्पति को सामाजिक क्रांति का नायक बनाने वाली पुरखिन सगुणाबाई

ज्योतिबा फुले की व्यक्तिगत जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी जिस कारण उन्हें तत्कालीन सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ काम करने की प्रेरणा और सामान्य से अधिक अध्ययन का मौका मिला। सगुणाबाई ने जोतीबा को अच्छी शिक्षा-दीक्षा देने के लिए मिस्टर जॉन की भी मदद ली। सगुणाबाई ने ज्योति-सावित्रीबाई फुले के जीवन को आकार देने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी।

संतों के नए अभियान का कैसे मुकाबला करेंगे सामाजिक न्यायवादी

आरएसएस हमेशा से भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहता था। सत्ता में आने के बाद वर्ष 2014 से एक हो लक्ष्य साधने का काम कार रहा है। इधर महाकुंभ का आयोजन के बाद धर्म सेना के जरिए संतों का संगठन देश को युद्ध क्षेत्र में तब्दील करने की तैयारियों में जुट चुका है! आखिर जिस देश की सत्ता पर हिंदुत्ववादियों की बहुत ही मज़बूत पकड़ है, उस देश में साधु-संतों को धर्म-सेना की कोई जरूरत हो सकती है! बहरहाल यहाँ सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है कि सामने न तो कोई चुनाव है और न ही तानाशाही हिंदुत्ववादी सत्ता को कोई खतरा, फिर साधु-संत गुलामी के प्रतीकों के खिलाफ अभूतपूर्व माहौल पैदा करने के साथ गाँव-गाँव हिन्दू राष्ट्र का संविधान पहुंचाने, हस्ताक्षर अभियान चलाने, धर्म-सेना खड़ा करने के साथ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लायक तरह-तरह की गतिविधियाँ चलाने में नए सिरे क्यों मुस्तैद हो गए हैं?
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