फुले दम्पति को सामाजिक क्रांति का नायक बनाने वाली पुरखिन

डॉ. सुरेश खैरनार

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आमतौर पर हम अपनी पुरखिनों के बारे में उतना ही जानते हैं जितना लोकप्रिय माध्यमों में बताया जाता है लेकिन हमारी असंख्य पुरखिनें अब भी विस्मृति के गर्भ में छिपी हैं। ऐसी ही एक पुरखिन सगुणाबाई क्षीरसागर हैं जिन पर स्वतंत्र चर्चा शायद ही कभी होती हो। लेकिन वे जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले की संरक्षिका थीं और भारतीय इतिहास में इस रूप में उनका बेमिसाल योगदान है।

ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले की मूल प्रेरणा सगुणाबाई क्षीरसागर ही थीं। स्री-मुक्ति के दिन उन्हें याद करने का तात्पर्य अपनी एक महान विरासत से रूबरू होने और उनके प्रति आदर व्यक्त करने जैसा महत्वपूर्ण कार्य है। आज से 175 साल पहले की सगुणाबाई क्षीरसागर का योगदान ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के जीवन को आकार देने में सबसे अधिक रहा है।

बचपन में ही ज्योतिबा फुले की मां की मृत्यु होने के कारण उनके पालन-पोषण की एक बड़ी समस्या खड़ी हो गई लेकिन ज्योतिबा के पिता गोविंदराव ने अपने बेटे के लिए दूसरी शादी नहीं की। बेटे की देखभाल के लिए सातारा जिले के नायगाँव के पास धनकवड़ी की रहने वाली अपनी करीबी रिश्ते की सगुणाबाई क्षीरसागर को उन्होंने अपने यहाँ बुला लिया। वे बाल-विधवा थीं इसलिए सगुणाबाई ने ज्योतिबा फुले के लिए अपनी ममता के सारे स्रोत खोल दिये। लालन-पालन करने वाली मां की भूमिका को उन्होंने सगी माँ की ही तरह निभाया। आज ज्योतिबा और सावित्रीबाई के नाम और काम को हम सभी जान रहे हैं लेकिन कल्पना कीजिये कि सगुणाबाई न होतीं तो वे लोग कहाँ होते!

सगुणाबाई क्षीरसागर पुणे के क्रिश्चियन मिशनरी मिस्टर जॉन के घर में घरेलू कामकाज में मदद करने का काम करती थीं। मिस्टर जॉन अपने घर में कई अनाथ बच्चों को पाल-पोष रहे थे इस कारण सगुणाबाई की मदद उनके लिए जरूरी थी। वहीं रहकर उन्होंने अंग्रेजी में बोलना सीख लिया था। गोविंदराव फुले ने सगुणाबाई से अपने बेटे ज्योति को सम्हालने की विनती की। सगुणाबाई ने मिस्टर जॉन से उसके लिए इजाजत मांगी जो उन्होंने खुशी-खुशी दे दी। सगुणाबाई ने ज्योति का लालन-पालन अपने बेटे की तरह की। एक मिशनरी के घर में रहने के कारण ज्योति को शुरू से ही अंग्रेजी बोलने का अभ्यास, समय पर काम करने का अनुशासन और सेवाभाव पैदा हुआ। विशेष रूप से उन्हें अंग्रेजी किताबों के अध्ययन का मौका मिला।

भारत के अतीत का कितना भी गौरवगान कर लीजिये लेकिन आधुनिक समाज और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में उनके योगदान को कोई भी नकार नहीं सकता। भाप की ताकत की खोज के बाद यूरोपीय देशों में जो औद्योगिक क्रांति हुई और विज्ञान के क्षेत्र में जिस तरह तेजी से नई-नई खोजें हुईं उन्हीं के कारण नवजागरण की भूमिका बननी शुरू हुई। जबकि हम अपने अतीत का पंवारा गाने में ही मगन रहे। वास्तविकता यह है कि हमारे देश में स्त्रियों और शूद्रों के साथ अमानवीय व्यवहार करना ही धर्मकार्य था। ऐसा व्यवहार सदियों तक होता रहा है। इसके बावजूद लोग गर्व से कहो कि हम हिंदू हैं के नारे लगा रहे हैं।

लेकिन गोविंदराव के ब्राह्मण क्लर्क ने उनके कान फूँककर कहा कि ‘ज्योति को पढ़ने के लिए भेजने का धर्मभ्रष्ट कार्य तुरंत रोकना चाहिए, अन्यथा आपकी सात पीढ़ियों को नर्क में जाना पड़ेगा।’ उसके प्रभाव में आकार गोविंदराव ने ज्योतिबा को स्कूल से निकाल लिया था, लेकिन सगुणाबाई ने एक प्रभावशाली अंग्रेज अफसर लेगिट और गफ्फार बेग से गोविंदराव फुले को समझाने के लिए कहा। समझाने-बुझाने से गोविंदराव मान गये। इस प्रकार ज्योतिबा फुले की पढ़ाई आगे जारी रही। सगुणाबाई की देखरेख में ही नायगाँव निवासी उन्हीं के परिचित परिवार की नौ साल की सावित्रीबाई के साथ 1840 में ज्योतिबा की शादी हुई। बहू को पढ़ाने के लिए विशेष रूप से घर में ही व्यवस्था हुई। ज्योतिबा और सगुणाबाई के विशेष सहयोग से उन्होंने तेजी से अभ्यास किया।

यह ज्योतिबा फुले की व्यक्तिगत जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी जिस कारण उन्हें तत्कालीन सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ काम करने की प्रेरणा और सामान्य से अधिक अध्ययन का मौका मिला। सगुणाबाई ने ज्योति को अच्छी शिक्षा-दीक्षा देने के लिए मिस्टर जॉन की भी मदद ली। सगुणाबाई ने ज्योति-सावित्रीबाई फुले के जीवन को आकार देने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। इसीलिए सावित्रीबाई ने अपने कविता संग्रह बावनकशी सुबोध रत्नाकर में मेरी प्यारी आऊँ के नाम से कविता लिखी और कहा कि हमारी-आपकी आऊँ अथक परिश्रम करने वाली और दया की मूरत हैं। समुद्र भी उसके सामने कुछ नहीं। वह इतनी विशाल हृदय की है! आकाश भी उसके सामने छोटा है। वह हमारे पढ़ने की देवता हैं, जिसका हमारे हृदय में हमेशा स्थान रहेगा। सावित्रीबाई लिखती हैं –

बेहद मेहनती और प्यारी हैं हमारी आई

मूर्ति हैं साक्षात करुणा की

हृदय उनका विशाल, इतना विशाल कि उसके आगे,

गहरा समंदर नजर आता है उथला

दूर तक फैला अनंत आसमान सिकुड़-सा जाता है

आई हमारे घर पधारीं, सहे

हमारे लिए अनेकानेक कष्ट, पीड़ाएं

वे हमारे शिक्षा मिशन की देवी हैं

हमने उन्हें अपने दिल में बसा रखा है।

इसी तरह ज्योतिबा फुले ने सर्जक की खोज नामक अपनी किताब के समर्पण पृष्ठ पर लिखा है कि आऊँ मां तुम सत्य की मूर्ति हो। तुमने मुझे मानवीय मूल्यों से परिचित कराया जिस कारण ही मैं आज अन्य लोगों को और बच्चों को प्रेम कर पा रहा हूँ, इसलिये यह किताब तुम्हें अर्पित कर रहा हूँ।  ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले की माँ जैसी आऊँ सगुणाबाई क्षीरसागर 6 जुलाई, 1854 को इस दुनिया से चल बसीं। वे फुले दम्पति को स्री-शूद्रों के लिए विशेष रूप से कार्य करने को प्रेरक थीं। उनका जाना ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के जीवन में बहुत बड़ा नुकसान था। सगुणाबाई क्षीरसागर को भूल पाना उनके लिए असंभव था इसलिए उन्होंने अपनी आऊँ को भाव-विह्वल होकर याद किया है और अपनी किताबों में सच्ची  श्रद्धांजलि अर्पित की है।

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पेशवाई भले खत्म हो गई थी, लेकिन सामाजिक भेदभाव की कुरीतियों को पूरी तरह धक्का नहीं लगा था। वह बदस्तूर जारी थी। शूद्रों को गले में मटका लगाकर तथा कमर के पीछे झाड़ू बांधकर चलने वाली प्रथा जारी थी। वैसे ही सार्वजनिक पानी के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता था, क्योंकि शूद्रों को कुआं या तालाब तक स्पर्श करने की मनाही थी। कोई सवर्ण पानी देगा तब शूद्रों को पानी मिलेगा। इसी को देखते हुए ज्योतिबा फुले ने खुद अपने घर के पानी के हौद को सभी के लिए खोलने का फैसला किया था। इसी तरह शिक्षा के क्षेत्र में स्री-शूद्रों को अक्षर देखने और उनके उच्चारण तक करने की मनाही थी। ज्योतिबा और सावित्री बाई, सगुणाबाई क्षीरसागर तथा फातिमा शेख के संयुक्त प्रयासों से 1848 को पहली पाठशाला की शुरुआत की गई थी।

हालांकि सगुणाबाई क्षीरसागर ने 1846 में खुद महारवाड़ा में सबसे पहली पाठशाला की शुरुआत की थी, लेकिन तथाकथित ऊंची जाति के लोगों के विरोध के कारण कुछ ही महीनों के बाद बंद कर दी गई। फिर दो साल के पश्चात 25 दिसंबर, 1848 के दिन ज्योतिबा ने ब्राह्मणों के षडयंत्र का पर्दाफाश करते हुए बहुत प्रभावी भाषण दिया, जिससे भिड़े नाम के एक ब्राह्मण ने प्रभावित होकर स्कूल चलाने के लिए खुद का घर देने की घोषणा की और इस तरह भारत के इतिहास में स्त्री-शूद्रों के लिए पहली पाठशाला की शुरुआत पुणे के भिड़ेवाड़ा में हुई थी। लेकिन यह पाठशाला चलाना आसान काम नहीं था। हर रोज पाठशाला जाने के रास्ते पर सवर्ण समाज के लोगों द्वारा गोबर-कीचड़ तथा पत्थरों के हमले सहते हुए सावित्रीबाई के साथ सगुणाबाई तथा फातिमा शेख चलती रहीं। इसके लिए इन तीनों महान महिलाओं के अदम्य साहस और लगन की दाद देनी होगी। वे अपने साथ थैले में अतिरिक्त साड़ी लेकर जाती थीं और पाठशाला में पढ़ाई शुरू करने के पहले गंदगी से भरी हुई साड़ी को बदलती थीं। यह सब सोचकर आज भी हमारे रोंगटे खड़े होते हैं। तीनों महिलाएं कैसे जीवट की रही होंगी कि घर से बाहर निकल कर रास्ते पर अपशब्दों से लेकर गोबर-कीचड़ के हमलों को झेलकर भी पाठशाला में पढ़ाती रहीं। रोज-रोज इस तरह की स्थितियों का सामना करने का नैतिक बल और साहसिक मानसिकता को तैयार करना कोई साधारण बात नहीं है। इसके लिए बहुत बड़े सरोकार की जरूरत होती है।

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आज वर्तमान राष्ट्रपति से लेकर चपरासी तक जीवन के हर क्षेत्र में महिलाओं की संख्या दिखाई देती है लेकिन इसके लिए 175 साल पहले सगुणाबाई क्षीरसागर, सावित्रीबाई फुले, फातिमा शेख और उनका साथ देने वाले ज्योतिबा फुले एवं उस्मान शेख  तथा पहले स्कूल के लिए खुद का घर देने वाले भिड़े जैसे लोगों के कारण ही स्री-शूद्रों के लिए शिक्षा की शुरुआत हो सकी थी। इसके बावजूद कुछ लोगों को आज भी मनुस्मृति का महिमामंडन करने की कोशिश करते हुए देखकर उनकी मानसिकता पर तरस आता है।

हिंदू धर्म में संवेदना की कोई परंपरा नहीं है, क्योंकि माना जाता है कि कोई आज तकलीफ़ में रह रहा है तो जरूर वह पूर्व जन्म के कर्मों का फल भोग रहा है। इसलिए उसे वैसे ही रहने देना है, क्योंकि कर्मविपाक सिद्धान्त के अनुसार इस जन्म में उसके इन सब प्रायश्चितों के बाद ही उसे अगले जन्म में मुक्ति मिल सकती है और अच्छे दिन आयेंगे। इसलिए हजारों वर्ष पुरानी हिंदू सभ्यता में सेवाकार्य करने का कोई उल्लेख नहीं है। हमारे सभी शंकराचार्य सिर्फ अपने सिंहासन और स्वर्णदंड लेकर घूमते रहते हैं, लेकिन उनके यहाँ किसी की सेवा करने की परंपरा दिखाई नहीं देती है। अमेरिका जाने के कारण ही स्वामी विवेकानंद ने वहां के क्रिश्चियन मिशनरियों के सेवाकार्य की तर्ज़ पर रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी। अगर वे बाहर न गए होते तो आज उनके विचार क्या होते यह समझना बहुत मुश्किल है, क्योंकि व्यक्तिगत आध्यात्मिक साधना के अलावा कोई सेवाकार्य करने के संदर्भ में सनातन हिंदू धर्म में कोई प्रावधान दिखाई नहीं देता है।

ज्योतिबा फुले और सगुणाबाई क्षीरसागर

ज्योतिबा के प्राथमिक जीवन में सगुणाबाई के कारण मिस्टर जॉन के सेवाकार्य और अंग्रेजी शिक्षा का मौका मिला और ज्योति के महात्मा ज्योतिबा फुले होने की शुरुआत हुई थी। ईश्वरचंद विद्यासागर से लेकर राजा राममोहन रॉय तक सभी समाजसुधारक, अंग्रेजी शिक्षा के पश्चात ही तैयार हुए थे। महाराष्ट्र के दो महत्वपूर्ण समाज सुधारक गोपाल कृष्ण आगरकर और विष्णु शास्त्री चिपळूणकर तो अंग्रेजी शिक्षा को बाघिन के दूध की उपमा देते थे।

भारत के अतीत का कितना भी गौरवगान कर लीजिये लेकिन आधुनिक समाज और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में उनके योगदान को कोई भी नकार नहीं सकता। भाप की ताकत की खोज के बाद यूरोपीय देशों में जो औद्योगिक क्रांति हुई और विज्ञान के क्षेत्र में जिस तरह तेजी से नई-नई खोजें हुईं उन्हीं के कारण नवजागरण की भूमिका बननी शुरू हुई। जबकि हम अपने अतीत का पंवारा गाने में ही मगन रहे। वास्तविकता यह है कि हमारे देश में स्त्रियों और शूद्रों के साथ अमानवीय व्यवहार करना ही धर्मकार्य था। ऐसा व्यवहार सदियों तक होता रहा है। इसके बावजूद लोग गर्व से कहो कि हम हिंदू हैं के नारे लगा रहे हैं।

सगुणाबाई के कारण ही सावित्रीबाई जैसी लड़की के साथ ज्योति की शादी हुई थी और उन दोनों की शिक्षा कार्य के पीछे भी उन्हीं की प्रेरणा रही। मुझे रह-रहकर आश्चर्य हो रहा है कि हमारे देश में ढंग से इतिहास लेखन नहीं होने के कारण सगुणाबाई क्षीरसागर जैसी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लोगों को अनदेखा किया जाता रहा है। यह कहाँ तक उचित है?

गौरतलब है कि 1818 में पेशवाओं के भीमा-कोरेगांव की लड़ाई में हारने के बाद नौ सालों के भीतर ज्योतिबा फुले का जन्म (1827) हुआ और उन दिनों भी पुणे का सामंती माहौल रस्सी जल गई लेकिन ऐंठ न गई की शैली वाला था। ऐसी सामाजिक परंपरा के रहते हुए किसी एक साधारण किसान परिवार में पैदा हुआ ज्योति नाम का लड़का इतना बड़ी सामाजिक क्रांति कैसे कर सका और इसमें इतिहास के किन तत्वों और व्यक्तियों ने बुनियादी भूमिका निभाई इसे जानने वाली वास्तविक तथ्यों पर आधारित किताबें अभी भी नगण्य हैं। मेरी इस उत्सुकता को पामेला सरदार और ब्रज रंजन मणि द्वारा संपादित अंग्रेजी किताब A FORGOTTEN LIBERATOR, THE LIFE AND STRUGGLE OF SAVITRIBAI PHULE में सगुणाबाई क्षीरसागर के बारे में पढ़कर बेशक सुखद आश्चर्य हुआ।

डॉ. सुरेश खैरनार चिन्तक और विचारक हैं।

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