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इंदौर

पीढ़ियों का अन्तराल जहाँ बाहरी बदलाव करता है वहीँ सोच और परिभाषाएँ भी बदल जाती हैं (चौथा और अंतिम…

चौथा और अंतिम भाग एम.ए. करते ही मुझे कलकत्ता में ही नौकरी मिल गई तो अब साल में कुल दो बार छुट्टियों के दौरान ही अजमेर आ पाती और राजेन्द्र…
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 अविश्वसनीय थी मां की यातना और सहनशीलता (भाग – दो )

भाग - दो  हमें तो इस घटना के बारे में मालूम पड़ा गेंदी बाई से। छुट्टियों में हम जब कभी भानपुरा जाते तो मैं गेंदी बाई से कुरेद-कुरेद कर उनके…
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बहुवादी समाज में नफरत से जंग : मुसलमानों पर हमले

भारत का विविधवर्णी चरित्र सचमुच अद्भुत है। भारतीय उपमहाद्वीप में विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों और भाषायी व नस्लीय समूहों के लोग सदियों से एक…
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इंदौर की घटनाओं के पीछे सांप्रदायिकता फैलाने का सुनियोजित एजेंडा

फिल्म रईस का एक मशहूर डायलॉग है ‘अम्मी जान कहती थीं, कोई धंधा छोटा नहीं होता और धंधे से बड़ा कोई धर्म नहीं होता’ लेकिन पिछले दिनों मध्य…
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