पीढ़ियों का अन्तराल जहाँ बाहरी बदलाव करता है वहीँ सोच और परिभाषाएँ भी बदल जाती हैं (चौथा और अंतिम भाग)

मन्नू भंडारी

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चौथा और अंतिम भाग

एम.ए. करते ही मुझे कलकत्ता में ही नौकरी मिल गई तो अब साल में कुल दो बार छुट्टियों के दौरान ही अजमेर आ पाती और राजेन्द्र से शादी करने के कारण पिता की नाराज़गी के बाद तो वह भी छूट गया। हाँ, उनके समाचार तो मिलते ही रहते थे। पिताजी को किस तरह अजमेर का घर छोड़कर भानपुरा जाना पड़ा और फिर बीमारी के कारण बड़े भाई के पास इन्दौर आना पड़ा, यह एक लम्बी कहानी है। बीमारी निकली – फूड पाइप में कैन्सर। सुना तो मुझे भी धक्का लगा। जानती थी कि मात्रा सौ डिग्री बुख़ार होने पर भी वे लेटकर जिस तरह माँ को सारे  वक़्त सिरहाने बिठाकर रखते थे… ज़रा सी तक़लीफ़ भी बर्दाश्त न कर पाने के कारण ख़ुद तो परेशान होते ही थे,  माँ को भी परेशान करते थे…वे कैन्सर की तक़लीफ़ कैसे बर्दाश्त करेंगे? इस बीमारी के नाम से ही क्या हाल हो रहा होगा उनका और क्या हाल कर रखा होगा उन्होंने माँ का ! तभी उनके हाथ का लिखा एक पोस्टकार्ड मिला, जिसमें उन्होंने ज़िन्दगी के आखि़री दिनों का हवाला देकर मिलने के लिए बुलाया था। मैं और सुशीला उन्हें देखने गए पर  जैसा हम लोग सोच रहे थे वैसा कुछ नहीं मिला…सिरहाने कैन्सर से सम्बन्धित कुछ किताबें और जर्नल्स रखे थे जिन्हें वे पढ़ते रहते और दो दिन रहकर ही इतना तो समझ में आ गया कि वे यहाँ रहकर ज़रा भी ख़ुश नहीं थे। जिसने  हमेशा दूसरों को अपने घर रखा हो, उसे जब मजबूरी में दूसरों के घर रहना पड़े तो उसकी तक़लीफ़ का अन्दाज़़ मैं लगा सकती हूँ। यों अपना ही बेटा दूसरा तो नहीं होता पर भाभी का व्यवहार ही कुछ ऐसा था कि…। भाई तो सारा दिन नई खोली अपनी फैक्ट्री में जुते रहते, उन्हें पता ही नहीं कि पीछे क्या होता है। बीमारी की तक़लीफ़, दूसरे के घर रहने की तक़लीफ़ — ग़ुस्सा बनकर निकलती थी माँ पर। सुशीला जब पाँच-छह दिन बाद कलकत्ते के लिए रवाना हुई तो मैंने ग्यारह महीने की टिंकू को उसके साथ ही भेज दिया, जिससे मैं पूरी तरह इन लोगों के साथ रह सकूँ …माँ की तक़लीफ़ में थोड़ी भागीदार बन सकूँ। उस समय माँ की असहायता …एक तरफ़ पिता की बीमारी और वहाँ रहने की तक़लीफ़ से उपजा ग़ुस्सा, दूसरी तरफ़ भाभी की परेशानी भरी खीज से उपजी कटुता और दोनों के बीच पिसती मेरी माँ। न पति से कुछ कह सकती थीं, न बहू से, बस दोनों के सामने रिरियाती रहती थीं। किसी चीज़़ की ज़रूरत होती तो वे बहू से साधिकार नहीं माँग सकती थीं। उनके माँगने में तो ऐसी याचना भरी रहती थी मानो वे कोई अपराध कर रही हों। मुझे आज भी उनका वह याचना भरा स्वर, उनके चेहरे का वह अपराध भाव  सब ज्यों-के-त्यों याद हैं।

पिता के छाती के ऊपरी हिस्से में और गर्दन के नीचे के हिस्से में पता नहीं जलन होती थी या दर्द कि वे सारा समय माँ से वहाँ बाम लगवाया करते थे। बाम का सिलसिला ख़तम होता तो वे पैर दबातीं। यह सिलसिला रात भर, दिन भर चलता रहता। न समय से उन्हें खाना मिलता, न सोना।  हाँ, जब लोग- बाग़ शाम को उनसे मिलने आते तो ज़रूर माँ को राहत मिलती। एक दिन मैंने माँ से कहा, आप जाकर खाना खाओ…मैं रगड़ती हूँ बाम। पर जैसे ही पिता के सिरहाने बैठी, उन्होंने मुझे मना कर दिया। माँ जैसे-तैसे दो रोटी निगल कर वापस उनकी हाज़िरी में आ बैठी। उन पन्द्रह दिनों में मैंने माँ को न जाने कितने बिन खाए दिन और अनसोई रातों से गुज़रते देखा। उम्र तो आखि़र उनकी भी थी ही पर उनके चेहरे पर मैंने न कभी थकान देखी, न परेशानी। हाँ, मिलनेवालों के लिए रसोई में चाय-नाश्ता लाते समय, ज़रूर मैंने कभी-कभी उनकी आँखों में तराइयाँ देखी पर बस, शब्दों में उनके मुँह से कभी कुछ नहीं सुना। उन्होंने ज़िन्दगी भर दूसरों का केवल सुना ही सुना …सुनाया तो कभी किसी को कुछ नहीं।

आखि़री दिन उन्होंने रात को अख़बार सुना। सन् 62 के चीनी आक्रमण और साधन-हीन सैनिकों की दिल दहला देनेवाली दुर्दशा और करारी शिकस्त को लेकर वे बहुत दुखी थे। उनके आखि़री शब्द थे -नेहरू का यह आदर्शवाद...राजनीति कैसे चलेगी इससे...नहीं...नहीं...ऐसे तो ये इस देश को रसातल में ले जाएगा...क्या होगा इस देश का...और भी बहुत कुछ ऐसे ही शब्द जो फिर सुनाई भी नहीं दिए और उसके बाद उनकी आवाज़ ही चली गई। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उन्होंने प्राण त्याग दिए।

कलकत्ता लौटने के कुछ दिन बाद ही मैंने सुना कि पिताजी नर्सिंग होम में शिफ्ट हो गए। उन्हें तो वहाँ जाकर बहुत राहत मिली पर माँ को ? नहीं, माँ को वहाँ भी राहत नहीं थी। विशेष अनुमति लेकर उन्होंने वहाँ भी माँ को रात-दिन अपने साथ ही रखा। बिना माँ के तो वे जैसे रह ही नहीं सकते थे। नर्स का जो काम होता वह कर देती पर रात-दिन की अनवरत सेवा-सुश्रूषा तो माँ के ही ज़िम्मे। तीन महीने नर्सिंग होम में रहकर नवम्बर के महीने में उन्होंने प्राण त्यागे। कलकत्ता में मेरे छोटे भाई उनकी बीमारी के दौरान बराबर इन्दौर के चक्कर लगाते रहे और आखि़री समय में भी वहीं थे। लौटने पर उन्होेंने बताया कि आखि़री दिन उन्होंने रात को अख़बार सुना। सन् 62 के चीनी  आक्रमण और साधन-हीन सैनिकों की दिल दहला देनेवाली दुर्दशा और करारी शिकस्त को लेकर वे बहुत दुखी थे। उनके आखि़री शब्द थे -नेहरू का यह आदर्शवाद…राजनीति कैसे चलेगी इससे…नहीं…नहीं…ऐसे तो ये इस देश को रसातल में ले जाएगा…क्या होगा इस देश का…और भी बहुत कुछ ऐसे ही शब्द जो फिर सुनाई भी नहीं दिए और उसके बाद उनकी आवाज़ ही चली गई। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उन्होंने प्राण त्याग दिए।

मैंने छूटते ही पूछा था- ‘आखि़री समय में उन्होंने माँ से कुछ कहा?’

‘नहीं, कहा न, उनकी आवाज़ ही चली गई थी।’

पता नहीं, उस समय ख़याल आया था या नहीं पर आज ज़रूर सोचती हूँ कि आवाज़ चली गई थी तो क्या मात्रा एक स्नेहिल स्पर्श से ही वे माँ की ज़िन्दगी भर की गई सेवा के लिए कम से कम अपनी कृतज्ञता तो जता ही सकते थे? पर नहीं, उन्होंने ऐसा भी कुछ नहीं किया। उनकी सोच, उनकी चिन्ता तो उस समय देश के साथ जुड़ी थी। ठीक ही तो है, जिन लोगों के सरोकार बड़े सन्दर्भों के साथ जुड़े रहते हैं, परिवार वाले तो हमेशा उपेक्षा का पात्रा  रहने के लिए अभिशप्त ही होते हैं।

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पिता की मृत्यु के बाद माँ क़रीब उन्नीस साल और ज़िन्दा रही और शुरू के दो साल बडे़ कष्ट में भी बीते। बड़े भाई ने कलकत्ता की नौकरी छोड़कर अपने एक मित्र (?) की पार्टनरशिप में इन्दौर आकर फैक्ट्री शुरू की थी। पैसा उस व्यक्ति ने लगाया और ख़ून-पसीना बहाकर श्रम भाई ने लगाया। फैक्ट्री तैयार होकर कुछ देने की स्थिति में आई ही थी कि उस पार्टनर ने भाई को निकाल बाहर किया और फैक्ट्री में ताला डाल दिया। यह घटना मेरे वहाँ रहते हुए घटी थी। उस समय भाई की तक़लीफ़, उनका दुख और सबसे बड़ा उनका संकट। पिताजी की बीमारी  की वजह से वे न इन्दौर का घर उठा सकते थे और न ही उनके लिए वहाँ रहना सम्भव हो रहा था, यह एक अलग कहानी है। पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने तुरन्त अपना घर समेटा और वापस कलकत्ता लौट गए, नौकरी की तलाश में। पर माँ उस समय नहीं जा सकती थी क्योंकि दो साल की उम्र से पाले अपने पोते ( यही बड़ी भाभीअपने दो साल के बेटे को माँ के पास अजमेर छोड़कर अपने दूसरे बच्चे को जन्म देने के लिए अपनी माँ के यहाँ चली गई थी) के फाइनल इम्तिहान के बिना वे इन्दौर नहीं छोड़ सकती थीं। समस्या आई कि वे रहें तो कहाँ? बड़ी बहन का घर था और वे लोग पूरी बीमारी के दौरान इतनी मदद भी करते रहे पर उस समय बेटी के घर रहना उन्हें स्वीकार नहीं था जबकि छोटी देवरानी का घर वहीं था। टटोलने पर छोटी देवरानी ने उन्हें रखने से एक तरह से मना ही कर दिया। पति ने जिस बेटे भाई को अपने साथ रखकर केवल पढ़ाया-लिखाया ही नहीं बल्न्कि उनकी शादी तक उन्होंने ही की, आज संकट के समय देवरानी उन्हें कुछ महीनों के लिए भी नहीं रख सकती? अपमान का यह दंश ताज़िन्दगी उन्हें सालता रहा।

छोटे भाई की इकलौती बेटी नीना ने जब एक बंगाली लड़के से शादी का निर्णय ले लिया तो समस्या आई कि माँ चाहे कहें कुछ नहीं पर सामने यह सब होने में उनका परम्परावादी मन आहत तो ज़रूर होगा और उन दिनों सब लोग यही कोशिश करते थे कि उन्हें किसी भी तरह की ठेस न पहुँचाई जाए। आखि़र सुशीला ने ही उनसे बात करने का ज़िम्मा लिया। सुना, तो चकित करनेवाली उनकी प्रतिक्रिया- ‘अरे तो क्या हो गया...बंगाली क्या आदमी नहीं होते ? नीना तो ख़ुश है न ! मेरे तो बस, मेरे बच्चे ख़ुश रहने चाहिए।’ माँ ने कभी समाज-सुधार की लम्बी-चौड़ी बातें नहीं कीं, उनका वैसा कोई सोच था भी नहीं। सोच तो उनका कभी किसी भी विषय पर कुछ नहीं था।

जिस माँ को मैंने लम्बे समय तक कभी किसी से नाराज़ रहते नहीं देखा था, इस प्रसंग पर वे रो पड़ती थीं। जब मेरे सिर पर छत तक भी नहीं रह गई थी तो ऐसे संकट के समय में भी वे मात्रा कुछ महीनों तक के लिए भी मुझे अपने यहाँ नहीं रख सकती थीं? उसके बाद बड़ी बहन जी ने किराए पर एक कमरे का इन्तज़ाम किया और वहाँ उन्होंने पिता की मृत्यृ के ग़म और देवरानी के दिए अपमान के दंश के साथ फिर से अपनी गृहस्थी जमाई। बाद में कलकत्ता आकर भी वे कहीं ठीक से जम नहीं पाईं। अन्ततः सुशीला ही उन्हें मनुहार करके अपने यहाँ ले आई और अन्तिम साँस तक वे फिर वहीं रहीं। यहाँ सब सुख थे — सुशीला की देखभाल, जीजाजी का प्यार भरा सम्मान और सबसे अधिक सन्तोष कि यहाँ उनके लिये काम करने का पूरा स्कोप था। बैठे-बैठे वे लड्डू-मठरी बनातीं…मिठाइयाँ बनातीं‑‑‑दाल पीसकर मँगौड़ी बनातीं…बीनना-चुनना…कूटना-पीसना जो चाहें करें, जैसे चाहें करें। घर के सारे बर्तनों और कपड़ों का हिसाब, दूसरी चीज़ों की देखभाल यानी कि सुशीला की सारी गृहस्थी सँभाल ली। सुशीला अपने मॉन्टेसरी कार्यक्रम में व्यस्त और वे उसकी गृहस्थी में व्यस्त। मदद के लिए काम करने वाले लड़के तो थे ही।

काम माँ की ज़िन्दगी का अभिन्न हिस्सा था। बिना काम के तो वे रह ही नहीं सकती थीं। आज भी मुझे याद है कि कलकत्ता से दिल्ली होते हुए वे एक बार अपनी छोटी बहन के यहाँ जोधपुर गई थीं। सुशीला ने मुझे फ़ोन पर आदेश दिया कि आते-जाते दोनों बार वे दिल्ली रुकेंगी तो उनके लिए कुछ काम तैयार रखना वरना वे बीमार पड़  जाएँगी। और सचमुच दोनों बार वे न जाने कितने काम कर गई थीं। घर के पिसे मसाले खाया कर और वे छः महीनेके लिए हल्दी, धनिया, अमचूर, गरम मसाला सब तैयार कर गईं। कोई बीस किलो चावल छानकर, बीनकर बोरिक पाउडर मिला कर डिब्बों में बन्द कर गईं — कीड़ा नहीं लगेगा। राजेन्द्र की फर्माइश पर उन्हें तुरन्त दाल का हलवा बनाकर खिलाया तो गोंद के लड्डू बना कर रख गईं।

साल में एक बार गर्मी की छुट्टियों में कलकत्ता जातीं तो ठहरतीं तो सुशीला के ही यहाँ…मेरा घर भी तो वहीं था और उन्हीं दिनों मेरा माँ के साथ रहना भी होता था। मैंने महसूस किया कि ये शायद उनकी ज़िन्दगी के सबसे सुखद दिन थे। सप्ताह में एक दिन भाई-भाभी मिलने ज़रूर आते। आते तो कभी उनके लिए कोई टॉनिक, हॉर्लिक्स या कुछ और ले आते। कभी-कभी उनका प्राणों से प्यारा पोता भी मिलने आता। भानपुरा वाले बड़े काकासाहब के बच्चे आते तो माँ का मन खिल उठता क्योंकि बहुत प्यार था उन बच्चों से। वे भी तो जैसे अपनी माँ से भी ज़्यादा मानते थे उन्हें। सुशीला की बेटी नीरा भी शादी के बाद अपने पति के साथ बहुत ही पास रहने लगी थी। जब तब  शाम को चक्कर लगा ही लेते थे। उस समय खाना बनाने में निहायत अनाड़ी नीरा अकसर माँ से फ़ोन पर खाना बनाने की विधियाँ पूछा करती — यानी सब तरफ़ माँ का महत्व। पर इन सारे सुखों के बावजूद जब मैं अकेली उनके पास बैठती तो एक ही प्रसंग – अजमेर का घर। शब्दों में तो उन्होंने कभी नहीं कहा पर मन में यही ख़याल रहता  था और जो बहुत स्वाभाविक भी था कि जो भी था, जैसा भी था अजमेर का घर उनका- ‘अपना’ घर। न जाने कितने साल गुज़ारे थे उन्होंने उस घर में। उस घर का कण-कण जैसे उनकी आत्मा में बसा हुआ था। वहाँ के दुकानदार, फेरीवाले, पास-पड़ोसवाले, सबकी बातें करती, पर सबसे ज़्यादा बातें करती पिताजी की। कटुता तो दूर की बात रही, पिताजी को लेकर कभी कोई शिकायत तक नहीं थी उनके मन में। मैं हैरान होकर सोचती कि जिस पिता ने  ताज़िन्दगी उन्हें एक सेविका की तरह ही रखा, उसके लिए भी ऐसी सद्भावना, ऐसा लगाव? पर नहीं, यह तो मेरा सोचना है, वे तो शायद यही सोचती थीं कि यह पिता का उनके प्रति अटूट प्रेम ही था जो वे अपना हर काम माँ से ही करवाना चाहते थे, माँ पर इतना निर्भर रहते थे कि उनके बिना जैसे रह ही नहीं सकते थे। इसलिए तो नर्सिंग होम में भी ज़िद करके वे माँ को अपने साथ ही ले गए। माँ के लिए पिता की यह निर्भरता उनके प्रेम का प्रतीक थी तो रात-दिन पति की सेवा में लगे रहने को माँ ने कभी अपनी मजबूरी नहीं समझा…यह शायद पति के लिए उनका गहरा प्रेम था।

पीढ़ियों का अन्तराल जहाँ बाहर बहुत कुछ बदलता है, वहीं सोच और परिभाषाएँ भी बदल ही देता है।

अब एक अन्तिम बात। कलकत्ते में मेरे छोटे भाई की इकलौती बेटी नीना ने जब एक बंगाली लड़के से शादी का निर्णय ले लिया तो समस्या आई कि माँ चाहे कहें कुछ नहीं पर सामने यह सब होने में उनका परम्परावादी मन आहत तो ज़रूर होगा और उन दिनों सब लोग यही कोशिश करते थे कि उन्हें किसी भी तरह की ठेस न पहुँचाई जाए। आखि़र सुशीला ने ही उनसे बात करने का ज़िम्मा लिया। सुना, तो चकित करनेवाली उनकी प्रतिक्रिया- ‘अरे तो क्या हो गया…बंगाली क्या आदमी नहीं होते ? नीना तो ख़ुश है न ! मेरे तो बस, मेरे बच्चे ख़ुश रहने चाहिए।’ माँ ने कभी समाज-सुधार की लम्बी-चौड़ी बातें नहीं कीं, उनका वैसा कोई सोच था भी नहीं। सोच तो उनका कभी किसी भी विषय पर कुछ नहीं था। उनकी सोच के केन्द्र में तो हमेशा पति और बच्चे ही रहे। उन सबका सुख ही रहा। एक ही तो था उनकी ज़िन्दगी का मूल-मंत्र देना और सहना। अब देने के लिए न तो उनके पास ज़मीन-जायदाद थी, न ही धन-दौलत। था तो बस, अपना परिश्रम, अपनी सहनशीलता और अपनी सद्भावना और इसके चलते वे जितना सुख, जितना सहयोग पति और बच्चों को दे सकती थीं, उन्होंने दिया। आज माँ पर लिखते हुए न जाने कितनी बातें, कितने प्रसंग एक के बाद एक खुलते चले जा रहे हैं और बस, एक ही बात उभर-उभर कर मेरे सामने आ रही है। कैसी थी मेरी माँ जिन्होंने ज़िन्दगी भर अपनेे लिए न कभी कुछ चाहा…न कभी कुछ माँगा।

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हाँ, एक बात ज़रूर चाही थी। प्रसंग तो याद नहीं पर जब मैं कलकत्ता गई थी तब की कही गई एक बात इस समय ज़रूर याद आ रही है- ‘मन्नू , रह तो रही हूँ बेटी के यहाँ पर भगवान करे ऐसा ज़रूर करना कि मेरी लाश यहाँ से न उठे।’

नहीं जानती, उन्होंने कभी किसी और के सामने भी अपनी चाहत प्रकट की थी या नहीं क्योंकि फिर कभी मैंने किसी के मुँह से इसका ज़िक्र तक नहीं सुना। दूसरों की क्या कहूँ, बिना किसी ख़ास बीमारी की सूचना के अचानक सीधे उनकी मृत्यु का समाचार ही मिला तो एक बार भी यह बात याद तक नहीं आई। पर आज माँ पर लिखते हुए अँसुवाई आँखों के सामने क्यों वही बात बार-बार कौंध रही है सो भी एक धिक्कार के साथ कि उनकी इस एक अकेली चाहत को भी क्यों नहीं पूरा किया जा सका !

मन्नू भंडारी हिंदी की शीर्षस्थ कहानीकार और उपन्यासकार हैं।

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