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जो भी कन्ना-खुद्दी है उसे दे दो और नाक ऊंची रखो । लइकी हर न जोती !

जो भी कन्ना-खुद्दी है उसे दे दो और नाक ऊंची रखो। लइकी हर न जोती ! (तीसरा हिस्सा)

मेरे अरियात-करियात की बहुत कम औरतें स्वतंत्र और आत्मचेतस रही हैं l मजबूरी में कोई-कोई विधवा स्त्री भले ही अपनी मर्ज़ी से अपना जीवन गुज़ारती…
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जो भी कन्ना-खुद्दी है उसे दे दो और नाक ऊंची रखो। लइकी हर न जोती ! (दूसरा हिस्सा)

लोगों की समस्याएं भी किसिम-किसिम की होती हैं l किसी का पेट पिरा रहा है, किसी को खोंचा पड़ गया, किसी का जी उचाट रहता है, किसी के हाथ-पांव…
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जो भी कन्ना-खुद्दी है उसे दे दो और नाक ऊंची रखो। लइकी हर न जोती !  

पहला हिस्सा  गाँव में स्त्री की स्थिति किसी गूँगे परिचारक जैसी रही है l गूँगे के पास ज़बान नहीं होती है, मगर स्त्री के पास ज़बान होकर भी…
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