जो भी कन्ना-खुद्दी है उसे दे दो और नाक ऊंची रखो। लइकी हर न जोती ! (दूसरा हिस्सा)

3 249

लोगों की समस्याएं भी किसिम-किसिम की होती हैं l किसी का पेट पिरा रहा है, किसी को खोंचा पड़ गया, किसी का जी उचाट रहता है, किसी के हाथ-पांव काँपते हैं, किसी युवती को उन्माद (हिस्टीरिया) हो जाता है, किसी को गर्भ नहीं ठहरता या दो-चार महीने में ही गर्भपात हो जाता है, आदि आदि समस्याएं l सबका कारण वही ‘कारन’ यानी भूत-प्रेत l कुछ लोग इस भूत-प्रेत बाधा को ‘कारन’ कहते हैं l समस्या के भौतिक कारण को ‘कारन’ (प्रेत-बाधा) कहकर ये लोग दवा-दारू न कराकर ओझाई कराते हैं l भूत-प्रेत और चुड़ैलों के प्रकोप से बचाने के लिए ओझा-गुनी लोग होते हैं l वे बारहों महीने भूत-प्रेत और चुड़ैल से पीड़ित लोगों की झाड़-फूँक करते रहते हैं l गाँव-देहात और कहीं-कहीं शहरों में भी ओझा-गुनी लोगों का यह एक अच्छा धंधा है l कुछ ओझा-गुनी तो देखने में ही भूत-प्रेत जैसे लगते हैं l और बाबा टाइप के भूत-प्रेत गांजा और देसी दारू और नींबू-जायफल पाकर ही प्रसन्न हो जाते हैं और दुखिया लोगों की इच्छाएँ पूरी करते रहते हैं l मैंने इमरितिया भउजी को कई बार लंगड़ा बाबा से अपनी भैंस के गर्भवती हो जाने की प्रार्थना करते देखा है l किसी का चूज़ा बीमार है तो मन्नत, खस्सी गुम हो गया तो मन्नत, चोरों से अपनी फसल की रक्षा के लिए मन्नत, बैल के पैर में हल का फाल लग गया तो मन्नत! बस मन्नत ही मन्नत l और इच्छित परिणाम मिलने के बाद बाबा लोगों के चौतरे पर जाकर यथाशक्ति गाँजा-दारू से पूजा-अर्चा l

एक बार मेरी आँख में दर्द होने लगा l उस दर्द को ठीक करने के लिए मेरे खानदान के दुक्खी भाई ने ओझाई की थी l उनका दावा था कि उन्होंने उस भूत को बहुत जल्दी काबू में कर लिया था, वर्ना वह भूत आँख की रौशनी ही छीन लेता l गज़ब का भूत है वो l जल्दी किसी के काबू में आता ही नहीं है l दुक्खी भाई की नज़र में वह ‘चमार’ भूत था l यह भूत बहुत हठी होता है l वे बताते थे कि इनसे भी अधिक हठी ‘जिन्न’ होते हैं l चूँकि जिन्न मुसलमान होते हैं, इसलिए वे हिन्दू देवी-देवताओं से कंट्रोल में ही नहीं आते हैं l उनको साधने के लिए किसी मुस्लिम ‘देवता’ की शरण में जाना पड़ता है l

क्वार का महीना था l सर्दी-गर्मी की वजह से मेरी आँखों में दर्द होने लगा l इस तरह के दर्द को भोजपुरी में ‘गड़ना’ कहते हैं l उस समय मैं सातवीं में पढ़ रहा था और आँखों में हल्का-फुल्का दर्द होने के बावजूद मैं स्कूल गया हुआ था l किसी कक्षा में मन नहीं लग रहा था l एक-दो घंटा पढ़ते-पढ़ते जब दर्द तेज़ होने लगा तो मेरे एक अध्यापक ने मुझे घर भेज दिया l मेरे घर से मेरा स्कूल ‘जूनियर हाई स्कूल, उँचौरी’ चार किलोमीटर दूर था l मैं किसी तरह घर पहुंच पाया था l पिताजी ने मेरी आँखों पर जड़ी-बूटियों का लेप लगा दिया, लेकिन उससे दर्द कम होने की जगह बढ़ता ही जा रहा थाl उस समय डॉक्टर भी बहुत कम थे l और जो इक्का-दुक्का थे, वे भी दूर दराज़ के बाजारों में बैठते थे l तब गाँव के एक आदमी ने पिताजी को किसी गुनी ओझा को दिखाने की सलाह दी l उसकी सलाह पर गौर करने के बाद पिताजी फ़ौरन दुक्खी भाई के पास गए थे l

खैर, वृंदा बच गई थी l

उसे पौदर से बाहर निकाल कर मैंने उसका हल्का-फुल्का उपचार किया l दो-चार मिनट में ही वह ठीक हो गई l पौदर से बाहर निकलते ही मैंने लोगों को चिल्लाकर आवाज़ दी थी, जिससे कई लोग दौड़े-भागे वहां आ गए थे l वृंदा की माँ और मेरे बड़े दादा भी आ गए थे l वृंदा को सकुशल देखकर उसकी माँ ने राहत की सांस ली थी l उसने झपट कर उसे गोद में उठा लिया और उसे चूमने लगी l चूँकि यह घटना एक सामान्य घटना होकर रह गई थी, इसलिए उस समय किसी को बड़ी-बड़ी नसीहतें देने का मौक़ा नहीं मिला, फिर भी किसी बड़ी-बूढ़ी ने ताना जैसा देते हुए कह ही दिया—“बच्चे पैदा करे में बहादुरी थोड़े है, ओके पाले-पोसे पर जादा धियान दिया कर l दू साल के बच्चा के का पता कि कहाँ आग ह आउर कहाँ पानी!”

इस पर वृंदा की माँ ने कहा—“अरे ना हो अम्मा, ई बड़ी फुरगुद्दी ह, तनी-स बिसभोर पड़तै येहर-ओहर हो जाले l अब देखा न, परेह बनावे बदे मोंछी छानत रहली ह l एतनै में तनी-स खियाल का उतरल कि ई इहाँ आ गइल ह गंगा सागर नहाये l”

मशीनों के बिना किसान अपंग हो गए हैं l बीसवीं सदी के आखिरी दौर में कुछ महिलाओं ने हल-बैल से खेत की जुताई करके यह संकेत दे दिया था कि पुरुष किसी काम पर अपना विशेषाधिकार न समझें, लेकिन इसी दौर में किसानों ने बैलों से खेती-किसानी का काम छोड़ दिया और ट्रैक्टर आदि पर निर्भर हो गए

“अच्छा चल, तोरे भाग से बच गइल, ना त एके चुरइन बने में बेलम ना लागल होत l”

और सभी लोग अपने-अपने घर या काम पर चले गए l वृंदा सबको जाता हुआ देखकर बस मुलुर-मुलुर ताकती रही l

दो-एक दिन बाद मुझे बनारस जाना था l

घर से निकलते वक़्त मैंने वृंदा की माँ से पूछा—“का हो भउजी, भइया से कहे बदे कउनो सनेस ह? बनारस जात हई, कहि देब!”

मेरी बात सुनकर भउजी किसी नवोढ़ा की तरह लजा गईं l उन्होंने थोड़ा इतराकर कहा—“कहे के का ह, सब ठीके ह l बस बिंदवा के बता दिहा कि मर के जीयल ह l”

तभी बड़ी माँ ने कहा—“अरे ना रे बचवा, कहि दीहा कि तोहर पचास हजार खर्चा करावे बदे बच गइल ह l”

भउजी ने तुनक कर कहा—“अच्छा, मर गइल होत त तोहँऊ खुसिये मनउले होतू ?”

“आउर न त का! लइकी होके ई हमार हर जोती?” बड़ी माँ बोलीं l

सास का जवाब सुनकर भउजी ने बुरा-सा मुँह बना लिया और घर के भीतर चली गईं l

मैं गाड़ी पकड़ने के लिए पैदल ही औंड़िहार रेलवे स्टेशन की ओर चल पड़ा l

आज जब मैं उस घटना के बारे में सोचता हूँ तो मुझे बहुत अजीब-सा लगता है l हल चलाना तो दूर, लड़कियों ने कभी हल की मूठ भी नहीं पकड़ी l मशीनीकरण के चलते अब तो पुरुष भी हल चलाना भूलते जा रहे हैं l मशीनों के बिना किसान अपंग हो गए हैं l बीसवीं सदी के आखिरी दौर में कुछ महिलाओं ने हल-बैल से खेत की जुताई करके यह संकेत दे दिया था कि पुरुष किसी काम पर अपना विशेषाधिकार न समझें, लेकिन इसी दौर में किसानों ने बैलों से खेती-किसानी का काम छोड़ दिया और ट्रैक्टर आदि पर निर्भर हो गए l अभी कुछ साल पहले मैंने स्वयं गंगा-गोमती संगम पर अकेली महिला को नाव चलाते देखा था l नाव बीच धारा में थी और एक महिला उसे नियंत्रित किए जा रही थी l नाव में एक ही व्यक्ति सवार था; और वह भी महिला थी l मेरे लिए यह दृश्य विस्मयविमुग्ध करने वाला था l

उसी दिन शाम को मैं वाराणसी सिटी रेलवे स्टेशन के बगल में स्थित नक्खी घाट पहुँचा l वहीँ पर दादा के छोटे बेटे का गैराज था l गैराज में ट्रकों की मरम्मत का काम किया जाता था l वहाँ दूर-दूर तक गैराज ही गैराज थे, इसलिए वहाँ की ज़मीन तेलहुंस और काली हो गई थी l मैं वृंदा के मरते-मरते बच जाने की सूचना ताऊ के बेटे श्रीनाथ को अविलम्ब दे देना चाहता था l संयोग से वे गैराज में ही मिल गए l अभिवादन आदि औपचारिकताओं के बाद उन्होंने एक करिखहा-सा लोहे का स्टूल मेरी ओर बढ़ाया और पूछा—“घर पर सब ठीक है न?”

आठवें दशक का यह वह दौर था जब पढ़े-लिखे युवा नौकरी लगते ही अपनी अनपढ़ पत्नियों को छोड़ देते थे और किसी पढ़ी-लिखी लड़की से दूसरी शादी कर लेते थे l नौकरी मिल जाने के कारण मनचाही लड़की से उनकी शादी भी हो जाती थी और दहेज भी खूब मिलता था l पड़ोस के एक क्लर्क टाइप ब्राह्मण युवक ने अपनी अल्पशिक्षित पत्नी को छोडकर चोरी-चुपके दूसरी शादी कर ली थी l इसी वजह से लाली के पिता अपनी बेटी को लेकर बहुत चिंतित थे l

मैंने उन्हें बताया कि सब कुशल-मंगल है; बस एक दुर्घटना होते-होते बच गई l मुझे लगा कि उन्हें इस बात की सूचना थी, फिर भी उन्होंने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा—“क्या हुआ?”

मैंने कहा—“वृंदा डूबने से बच गई l वो तो मैं उसी समय वहाँ पहुँच गया नहीं तो उसका काम ही  तमाम था l”

“अच्छा होता मर जाती l इससे लाख-दो लाख तो बच जाते l”

“ओ, रुपया प्यारा है, लड़की की जान नहीं l” यह सुनकर मैं अन्दर ही अन्दर झल्ला गया l

श्रीनाथ ने मुस्कुराते हुए फिर कहा—“हमने सोचा कि कुछ अच्छी खबर सुनाएँगे l खैर, बच गई तो अपने भाग्य से…”

श्रीनाथ की इस बात को मैं आज तक नहीं समझ पाया कि वे कहना क्या चाहते थे l वे वृंदा के न मरने से दुखी थे या उसके जीवित बच जाने से खुश थे और अपने दुख को झूठमूठ के उल्लासपूर्ण शब्दाडम्बर से ओझल कर रहे थे !

लेकिन मैंने उनके उस व्यवहार को बेटी-विरोध के रूप में लिया और खिन्न मन से अपने रूम पर पहुँचा l थॉमस हार्डी के उपन्यास ‘फार फ्रॉम द मैडिंग क्राउड’ को पढ़ना शुरू किया, किन्तु पढ़ने में मन लगा नहीं; इसलिए निखर्री चारपाई पर लेट गया l थोड़ी देर में नींद आ गई l

जगा तो देखा, पड़ोस में रहने वाली लाली अपने छोटे भाई के साथ कॉपी-किताब लेकर पढ़ने के लिए मेरा इंतज़ार कर रही थी l बचपन में वह अक्षर-ज्ञान से आगे नहीं बढ़ पाई थी l उसकी शादी हो गई थी, मगर गौना नहीं हुआ था l लाली की ससुराल वालों ने उसके पिता से कह रखा था कि जब तक उनकी बेटी कम से कम आठवीं तक पढ़ नहीं लेगी, तब तक वेउसका गौना नहीं कराएंगे l

आठवें दशक का यह वह दौर था जब पढ़े-लिखे युवा नौकरी लगते ही अपनी अनपढ़ पत्नियों को छोड़ देते थे और किसी पढ़ी-लिखी लड़की से दूसरी शादी कर लेते थे l नौकरी मिल जाने के कारण मनचाही लड़की से उनकी शादी भी हो जाती थी और दहेज भी खूब मिलता था l पड़ोस के एक क्लर्क टाइप ब्राह्मण युवक ने अपनी अल्पशिक्षित पत्नी को छोडकर चोरी-चुपके दूसरी शादी कर ली थी l इसी वजह से लाली के पिता अपनी बेटी को लेकर बहुत चिंतित थे l इसके लिए उन्होंने प्राइमरी के एक शिक्षक से बात की l उस शिक्षक ने अपने एक परिचित के द्वारा उसके आठवीं की परीक्षा देने की व्यवस्था करवा दी l लेकिन लिखने का काम लाली को ही करना था l इसलिए उस शिक्षक को उसके पापा ने ट्यूटर रख लिया था l फुर्सत मिलने पर लाली मुझसे हिन्दी और अंग्रेजी पढ़ने के लिए आ जाती थी l

कईमहीने बाद वह अपनी माँ के साथ मिठाई लेकर आई l उसकी माँ ने बताया कि लाली ‘फस्  क्लास’ पास हो गई है l

“बहुत अच्छा!” मैंने उसे शाबासी दी, “हाई स्कूल न सही, तुमने आठवीं तो कर ही लिया l इसी तरह आगे हाई स्कूल भी कर लेना l” मेरी बात सुनकर उसकी माँ खुश हो गई, लेकिन लाली झेंप गई l

उसी झेंप में लाली ने कहा—“इसमें आपका भी योगदान है l”

उसके उत्तर को नज़रअंदाज करते हुए मैंने उसकी माँ से कहा—“तब तो इसके ससुराल जाने के दिन आ गए?”

मेरी बात सुनकर उसकी माँ का चेहरा ख़ुशी से दिपदिपा उठा l उस वक़्त लाली का मुखड़ा लज्जा एवं उल्लास के धूपछाहीं रंग में सराबोर हो गया l

क्रमशः …… 

चन्द्रदेव यादव जामिया मिलिया इस्लामिया में प्रोफेसर हैं l

3 Comments
  1. दीपक शर्मा says

    भूत प्रेत जैसी घटनायेऔ निम्न मध्यम घरानों में आज भी है। और इस आत्मकथा में घटनायें बहुत मार्मिक है। लेखक को बधाई।

  2. Yogesh Nath Yadav says

    बहुत ही शानदार।

Leave A Reply

Your email address will not be published.