Wednesday, May 29, 2024
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जो भी कन्ना-खुद्दी है उसे दे दो और नाक ऊंची रखो। लइकी हर न जोती !  

पहला हिस्सा  गाँव में स्त्री की स्थिति किसी गूँगे परिचारक जैसी रही है l गूँगे के पास ज़बान नहीं होती है, मगर स्त्री के पास ज़बान होकर भी नहीं होती थी l स्त्री की ज़बान तालू से चिपकी रहती थी l उसके होंठ सिले हुए होते थे, इसलिए चाहकर भी वह कुछ बोल नहीं पाती […]

पहला हिस्सा 

गाँव में स्त्री की स्थिति किसी गूँगे परिचारक जैसी रही है l गूँगे के पास ज़बान नहीं होती है, मगर स्त्री के पास ज़बान होकर भी नहीं होती थी l स्त्री की ज़बान तालू से चिपकी रहती थी l उसके होंठ सिले हुए होते थे, इसलिए चाहकर भी वह कुछ बोल नहीं पाती थी l उसके होंठ बस थरथरा कर रह जाते थे l उसके पास भी इच्छाएँ होती थीं, मगर सिर्फ मारने के लिए l लड़कियों को उपेक्षा-भरा बचपन नसीब होता था l पता नहीं वे कैसे जी जाती थीं l न ढंग का खाना, न पीना; काम का बोझ अलग l सारा ध्यान ‘कुलदीपक’ पर होता था l लड़कियाँ भला कुलदीपक कैसे हो सकती थीं ! सामान्य स्त्री की बात छोड़िये, रानियाँ-महारानियाँ तक पुरुष के आगे तुच्छ हुआ करती थीं l ‘रानी रुठिहैं सोहाग लीहैं’ कहावत से भी इसको समझा जा सकता है l

जन्म से लेकर मृत्युतक स्त्री के अनेक रूप और अनेक भूमिकाएं रही हैं l उनके लिए सुख सपना रहा है l

[bs-quote quote=”स्त्रियों ने अपने लिए निर्धारित दायित्वों का निर्वाह बख़ूबी किया है—चाहे हँस कर या रोकर l बचपन से ही झाड़ना-बुहारना,बर्तन धोना-माँजना, रोटी-पानी करना, सबको दाना-पानी देना—गोया सारे काम उन्हीं के ज़िम्मे होते थे l जिन समयों में लड़के मटरगश्ती करते थे उन समयों में लड़कियाँ और स्त्रियाँ जीवन की चक्की में पिसती रहती थीं l प्राय: सभी वर्गों और जातियों कीस्त्रियाँ घर-बाहर अपने-परायों के दुहरे-तिहरे शोषण का शिकार होती रही हैं l” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

 

समाज में पुरुषोचित व्यवहार करने वालों से भिन्न लोगों को मउगा कहा जाता है l जो व्यक्ति अपनी पत्नी के वश में रहता है, जिस व्यक्ति में स्त्रियों के करीब रहने की प्रवृत्ति अधिक होती है और जिसमें स्त्रियोचित गुण ज़्यादा होते हैं; उन सबको मउगा या मेहरबसुआ कहते हैं l मेहरबसुआ मउगा से भिन्न होते हैं l मेहर यानी पत्नी के वश में रहने वाले को मेहरबसुआ कहते हैं l मगर ऐसे पुरुष कम ही होते हैं जिनमें स्त्रैणता होती है l इन पुरुषों की चाल-ढाल और बोली-बानी स्त्रियों जैसी होती है l लोग इन्हें सम्मान की दृष्टि से नहीं देखते हैं l समाज (स्त्री-पुरुष दोनों) की दृष्टि में पुरुष में पौरुष होना ही चाहिए l इसी तरह स्त्री में स्त्रीत्व की अपेक्षा की जाती है l स्त्रैण स्वभाव वाले पुरुष की तरह मरदाना स्वभाव वाली स्त्री को भी प्राय: हेय दृष्टि से देखा जाता है l यही नहीं, समाज में मरदाना स्वभाव वाली औरत के पति के प्रति भी असम्मान का भाव पाया जाता है l लोक-समाज में मरदाना स्वभाव की स्त्रियाँ बहुत कम होती हैं l लेकिन पुरुष-दृष्टि से भिन्न कुछ स्त्रियाँ ऐसी औरतों को प्रशंसा के भाव से देखती हैं l पुरुषों को ठेंगा दिखाने वाली और उनको पग-पग पर चुनौती देने वाली स्त्रियाँ ताकतवर और साहसी होती हैं l लेकिन किसी स्त्री को ‘मरदानी’ कहना भी स्त्री को पुरुष के मानदंड पर तौलने जैसा है l यह कहीं थोड़े ही लिखा है कि स्त्री वीरोचित कार्य नहीं कर सकती है ! युद्धभूमि में वीरता दिखाने वाली और कठोर और निष्पक्ष शासन करने वाली स्त्री तो ठीक है, किन्तु घर-परिवार में पुरुषों के समकक्ष वीरोचित कार्य करने वाली स्त्री को पसंद नहीं किया जाता है l वीरता को लेकर पुरुष का यह द्वैत भाव रहा है l

हमारी तरफ़ ठाकुरों का वर्चस्व रहा है l ठाकुरों में इकन्नियाँ, दुअन्नियाँ और चवन्नियाँ से लेकर सोलहो आना के ज़मीदार थे l जो जमींदार नहीं थे, वे भी अपने को किसी राजा के नाती-पोते से कम नहीं समझते थे l निर्धन ठाकुरों का भी यही हाल था l उनका मुक़ाबला करने वाले यादव ही थे, हालांकि वे भी काफ़ी समय तक उनकी रिआया के रूप में गुज़र-बशर करते रहे l उस समय बहुत कम यादव थे जो उनसे सीधे टक्कर लेते थे l इसी तरह के एक यादव थे उमराव चौधरी l उनकी बहन मेरे गाँव के बगल में ब्याही थीं l वे बहुत दबंग महिला थीं l बड़े-बड़े ठाकुरों को भी वे पानी पिला देती थीं l इसलिए सभी उनसे बात करने से बचते थे l

इलाक़े में लड़ाका औरतें तो बहुत थीं, लेकिन लड़ने वाली न के बराबर थीं l मेरे पिताजी ने पहलवानी पर चर्चा के क्रम में एक घटना का ज़िक्र करते हुए बताया था कि एक बार कैथी के मार्कंडेय महादेव धाम में महाशिवरात्रि के दिन एक पहलवान अपनी हृष्ट-पुष्ट पत्नी के साथ आया l पत्नी की गोद में एक बच्चा था l

[bs-quote quote=”उन्होंने वहाँ जो मंज़र देखा उस पर उन्हें हँसी आ गई l दरअसल वहाँ एक कुएँ के पास पत्थर की एक भारी नाल रखी हुई थी, जिसे अपने को लगाने वाले कुछ पहलवान टाइप के लोग उठाने की कोशिश कर रहे थे l लेकिन उठाना तो दूर, वे नाल को टस से मस नहीं कर पा रहे थे l पहलवान की पत्नी ने अपने बच्चे को पति को देते हुए कहा—“तनी ल्या त बाबू के l हमहूँ अजमाय के आवत हईं l” और क्षण-भर में उसने बाएँ हाथ से उस नाल को उठाकर ऊपर तान दिया l उसे देखकर लोग दंग रह गए l” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

पिताजी ने कहा था कि उस ज़माने में औरतें पहलवानी नहीं करती थीं, लेकिन वह औरत किसी पहलवान से कम नहीं थी l इस घटना के बाद मेले में तहलका मच गया कि एक औरत ने इतने भारी नाल को एक ही हाथ से उठा लिया l जो काम आदमी नहीं कर पा रहे थे, उसे एक औरत ने कर दिखाया l पहलवान कहने वाले लोगों को लानत है l पिताजी ने कहा कि पुरुषों ने शर्मिंदा होकर उस नाल को उसी कुएँ में फेंक दिया l गाँव-गाँव के अखाड़ों में दूसरे को ‘लंगड़ी’ मारने वाले पुरुष एक स्त्री से पराजित क्या हुए, उन्होंने अपनी ही बहू-बेटियों को अखाड़े से दूर रखा l अघोषित रूप से कुश्ती पर पुरुषों का एकाधिकार रहा है l कुश्ती ही नहीं, लड़कियों को कबड्डी और गुल्ली-डंडा भी नहीं खेलने दिया जाता था l दरअसल किशोरावस्था में पहुँचते ही लड़कियों का खेलना-कूदना बंद कर दिया जाता था l चूल्हा-चक्की, घर के दूसरे काम और खेती-बारी या कि पारिवारिक पेशे वाले काम से जुड़कर कम उम्र में ही वे उत्पादन में हाथ बँटाने लगती थीं l ठीक से निकर पहनने का शऊर न होने पर भी उनके ऊपर अपने छोटे भाई-बहन का पोतड़ा साफ़ करने और उनकी देखभाल की ज़िम्मेदारी आ जाती थी l यह क्रम तब टूटा जब लडकियाँ स्कूल जाने लगीं l लेकिन स्कूल से बाहर उनके लिए ऐसा वातावरण नहीं है कि वे गाँव-घर में लड़कों की तरह लड़कों वाले खेल खेल सकें l मेरे गाँव से थोड़ी दूर के एक गाँव में एक दबंग आदमी का स्कूल और कॉलेज है l वहाँ लड़कों के अलावा लड़कियों के भी हाकी खेलने की सुविधा है l इससे इधर के ग्रामीण समाज में आए बदलाव को समझा जा सकता है l लेकिन कुश्ती लड़कियों से अभी भी दूर है l

मुझे एक घटना याद आ रही है l इस घटना का संबंध मेरे दादा के छोटे बेटे की बेटी वृंदा से है l

तब वह महज दो साल की थी l भोली-भाली-सी, किन्तु नटखट लड़की l अनजाने में ही वह धीरे-धीरे चलते हुए मेरे घर के पीछे स्थित ‘पौदर’ के पास चली गई l पौदर का मतलब है कुएँ के सामने की वह जगह जिसमें बैलों को हाँक कर पानी निकालते थे l यह कुएँ के पास कुएँ की जगत के बराबर ऊँची होती थी l कुएँ के विपरीत यह ढलवाँ और गहरी होती जाती थी l पानी से भरी मोट या चरस को समतल भूमि पर खींचने में अधिक बल लगता है, जबकि ढलवाँ ज़मीन पर कम ताक़त लगानी पड़ती है l किसी-किसी कुएँ की पौदर कुएँ के विपरीत दिशा में बिलकुल अन्त में जाकर पाँच-सात फुट गहरी हो जाती थी l उसमें छोटे-मोटे बच्चों के डूबने का खतरा बना रहता था l

[bs-quote quote=”भूत भी कई प्रकार के होते हैं, जैसे—बुड़ुआ, मूड़ीकटवा, दइत, बरम, भवानी आदि l कोई खुद डूब कर मरा हो तो बुड़ुआ बनता है, किसी की हत्या उसका सिर काट कर की गई हो तो वह मूड़ीकटवा कहलाता है, किसी ने अहीर को मार दिया हो तो वह ‘दइत’ बन जाता है और बाभन को मार दिया गया हो तो वह बरम हो जाता है l कुँवारी छोटी कन्या मरती है तो भवानी बन जाती है और श्मशान से संबंध रखने वाली मसानी कहलाती है l अकाल मृत्यु को प्राप्त मादा शिशु ‘मरी’ कहलाता है l” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

बरसात के दिन थे l पौदर लबालब भरी हुई थी l वृंदा उसी में गिर गई l उसी समय मैं किसी काम से घर के पीछे गया और संयोग से मैंने उसे उसमें गिरते हुए देख लिया l उसे बचाने के लिए मैं दौड़ते हुए पौदर में कूद पड़ा l पानी में वह ऊभ-चूभ कर रही थी l कुछ पानी भी पी लिया था उसने l खैर, वह बच गई l डूबकर मर जाती तो ‘चुड़ैल’ बन जाती और मुझे और मेरे घर वालों को न जाने कितनी पीढ़ियों तक सताती रहती l इस घटना के बारे में जिसने सुना, उन सबने यही कहा कि ‘जान जाती सो जाती ही, मुसीबत तुम्हारी बढ़ जाती l ओझा-सोखा आए दिन लौंग से लौंग सटाते रहते और मरी-मसान की पूजा के नाम पर अद्धा-पौवा खुद गटकते रहते l’

[bs-quote quote=”गाँव की हिन्दू-मुस्लिम औरतें मन्नत पूरी हो जाने पर उनको मुर्गा-मलीदा चढ़ाती हैं और प्रत्येक वृहस्पतिवार को दीया-बाती जलाकर पूजा करती हैं l दूर गाँव के ‘तकिया के बाबा’ से एक सीमांत किसान ने अपने चार साल से खोये हुए बेटे के वापस आने की फरियाद की और बाबा को मुर्गा-मलीदा चढ़ाया l और चमत्कार देखिए कि बीस-पच्चीस दिन में ही वह खोया हुआ बेटा घर वापस आ गया l वह भूल-भटक कर गुजरात चला गया था l” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

पूरब के प्राय: सभी गाँवों के अगल-बगल ऐसी चुड़ैलें पाई जाती हैं l वे औरतों, बच्चों और कमज़ोर आदमियों से लेकर दुधारू पशुओं तक को सताती हैं l चुड़ैलें भैसों का सारा दूध पी जाती हैं l चुड़ैलें अकेले भी होती हैं और भूतों के साथ जोड़े में भी l कुछ भूतों का तो परिवार होता है l उसमें बच्चे भी होते हैं l समय पर उपचार (ओझाई-सोखाई) न होने के कारण जिन लोगों की मौत हो जाती है, वे भी सताने वाले भूत के परिवार का अंग बन जाते हैं l इस तरह भूतों का कुनबा बढ़ता रहता है l मनुष्यों की तरह भूत भी जवान और बूढ़े होते हैं l मेरे देखते-देखते इलाके के अनेक लोग दुर्घटना में मारे जाने के बाद भूत बने और उनमें से कई जवान और बूढ़े हुए l

भूत भी कई प्रकार के होते हैं, जैसे—बुड़ुआ, मूड़ीकटवा, दइत, बरम, भवानी आदि l कोई खुद डूब कर मरा हो तो बुड़ुआ बनता है, किसी की हत्या उसका सिर काट कर की गई हो तो वह मूड़ीकटवा कहलाता है, किसी ने अहीर को मार दिया हो तो वह ‘दइत’ बन जाता है और बाभन को मार दिया गया हो तो वह बरम हो जाता है l कुँवारी छोटी कन्या मरती है तो भवानी बन जाती है और श्मशान से संबंध रखने वाली मसानी कहलाती है l अकाल मृत्यु को प्राप्त मादा शिशु ‘मरी’ कहलाता है l बरसों पहले बदमाशों ने मेरे घर से थोड़ी ही दूर स्थित चौरस्ते पर एक अनजान युवक को मार कर फेंक दिया था l उसका क़त्ल कहीं और किया गया था और पुलिस को गुमराह करने के लिए उसके शव को यहाँ फेंक दिया गया था l चूँकि उसके शव की काफी फजीहत हुई थी, इसलिए उस अनजान युवक के भूत को लोग ‘फजिहतवा’ कहने लगे l मेरे इलाक़े के ओझा-गुनी बीमार लोगों की भूत-बाधा का शमन करते हुए कहते थे कि इसे फजिहतवा परेशान कर रहा है l इन भूतों के अलावा बहुत सारे ऐसे मृत लोग हैं, जो किसी को परेशान नहीं करते, बल्कि उनका उपकार करते हैं l उनको लोग पूजते हैं l ये मृत प्राणी ‘बाबा’ कहे जाते हैं l नदी-नाले और खेत-सिवान के आसपास इनके चौतरे दिखाई दे जाते हैं l बघउत बाबा, लंगड़ा बाबा, बबुआ बाबा, दइतराबीर बाबा, बुढ़ऊ बाबा जैसे अनेक पिंडीधारी बाबा गाँवों में पाए जाते हैं l और तो और, कुछ गाँवों में एक ‘सैयत बाबा’ भी होते हैं l वे हिन्दू बहुल गाँव की रखवाली करते हैं l गाँव की हिन्दू-मुस्लिम औरतें मन्नत पूरी हो जाने पर उनको मुर्गा-मलीदा चढ़ाती हैं और प्रत्येक वृहस्पतिवार को दीया-बाती जलाकर पूजा करती हैं l दूर गाँव के ‘तकिया के बाबा’ से एक सीमांत किसान ने अपने चार साल से खोये हुए बेटे के वापस आने की फरियाद की और बाबा को मुर्गा-मलीदा चढ़ाया l और चमत्कार देखिए कि बीस-पच्चीस दिन में ही वह खोया हुआ बेटा घर वापस आ गया l वह भूल-भटक कर गुजरात चला गया था l

मेरे इलाक़े में एक ‘उँड़कहवा बाबा’ भी हैं l उनको लोग गाली के साथ याद करते हैं l जो व्यक्ति सम्मान के साथ उनका नाम लेता है, उसको पैर में ज़रूर ठोकर लगती है और उसका अंगूठा चोटिल हो जाता है, जबकि गाली देकर उन्हें याद करने वाला हर तरह के चोट-मोच से बचा रहता है l हर सिवान के भी अपने बाबा होते हैं, जो वहाँ की पहरेदारी करते हैं l

 

चंद्रदेव यादव जामिया मिलिया इस्लामिया,दिल्ली में प्रोफेसर हैं l

गाँव के लोग
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3 COMMENTS

  1. वाह! बहुत दिलचस्प! अगले हिस्से का इंतजार रहेगा।

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