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आरएसएस के 100 साल : और खतरनाक हुए इरादे
आरएसएस के विचारक यह दावा करते हैं कि हिन्दू धर्म सहिष्णु और समावेशी है, लेकिन हकीकत इससे बहुत अलग है। भागवत दंभपूर्ण लहजे में कहते हैं, ‘हिन्दू वह है जो दूसरों की आस्थाओं को नीचा दिखाए बिना अपने मार्ग पर चलने में विश्वास रखता है और दूसरों की आस्था का अपमान नहीं करता, जो इस परंपरा और संस्कृति का पालन करते हैं, वे हिन्दू हैं।' संघ संचालक प्रमुख कोई भी दावा करें लेकिन लेकिन वातविकता क्या है,यह सबके सामने है।
राम के नाम पर हमें बस सत्ता चाहिए – एक ‘सावरकराइट’ की स्वीकारोक्ति!
डॉ नेने वडोदरा के एक प्रसिद्ध मनोचिकित्सक और कट्टर सावरकराइट थे। नब्बे के दशक में डॉ सुरेश खैरनार एक शाम उनके बुलावे पर खाना खाने गए। उस समय राम मंदिर कि गतिविधियाँ तेज हो रही थीं। ज़ाहिर है बातचीत के केंद्र में वही था। उस समय डॉ नेने ने कहा कि राम के नाम पर हमें केंद्र की सत्ता चाहिए। पढ़िये यह दिलचस्प बातचीत जिसको हिन्दी में रांची के वरिष्ठ पत्रकार और एक्टिविस्ट श्रीनिवास ने प्रस्तुत किया है।
महात्मा गाँधी की हत्या में ग्वालियर के लोगों की क्या भूमिका थी
महात्मा गांधी को लेकर आरएसएस लगातार दोहरा व्यवहार करता है। एक तरफ उनकी मूर्तियों का अपमान करता है, दूसरी तरफ जरूरत पड़ने पर उनकी पूजा करने से पीछे नहीं रहता। आरएसएस भले ही नाथूराम गोडसे से अपने संबंधों को नकारता रहे लेकिन महात्मा गांधी की हत्या से संबंधित बातों में उसकी भूमिका के नए-नए राज खुल रहे हैं। हाल ही में अंग्रेजी भाषा की पत्रिका 'ओपन' में रवि विश्वेश्वरैया शारदा प्रसाद के लेख और मनोहर मालगांवकर की पुस्तक 'द मैन हू किल्ड गांधी' में 30 जनवरी की घटना की पृष्ठभूमि और उसके अनेक पात्रों की कहानी बहुत विस्तार के साथ लिखी गई।आज महात्मा गांधी की हत्या को 77 साल हो गए हैं। इसके बावजूद महात्मा गांधी की हत्या की पहेलियाँ अभी भी उलझी हुई हैं, इस पर पढ़िए डॉ सुरेश खैरनार का लेख।
गाय के बहाने फिर से आस्था की दुकानदारी की तैयारी
गौ हत्या और बीफ खाने पर प्रतिबन्ध पर आरएसएस बरसों से राजनीति कर रही है लेकिन उस इतिहास को अनदेखा कर रही है जो लिखित में गाय मांस को सेवन को लेकर दर्ज है। वह ऐसा प्रतिबन्ध थोप रही है, जैसे गाय पर उसने बैनामा करवा लिया हो, इसके चलते अनेक मुस्लिमों के साथ मोबलिंचिंग कर उस समुदाय को भयभीत किया गया। गाय एक दुधारू पशु से ज्यादा कुछ नहीं है। महाराष्ट्र में आने वाले दिनों में यहाँ विधानसभा चुनाव के चलते धुवीकरण की राजनीति के चलते ही देशी गाय को ही राज्य माता का दर्जा दिया गया।
विघटनकारी नैरेटिव को मजबूती देते हुए, सच को तोड़-मरोड़ कर दिखाती फिल्म स्वातंत्र्यवीर सावरकर
वर्ष 2014 के बाद, जब से लोगों के दिमाग में राष्ट्रवादी विचारधारा ज्यादा मजबूती से हावी हुई है, तब से समाज के सांस्कृतिक परिदृश्य में इसका प्रभाव भी बढ़ा है। जिसमें एक माध्यम सिनेमा भी है, जिसके माध्यम से जनता सबसे ज्यादा अपने ज्ञान को समृद्ध करने पर विश्वास करती है। अभी हाल में ही रणदीप हुड्डा की फिल्म स्वातंत्र्यवीर सावरकर रिलीज हुई है, जिसमें सावरकर को झूठे तथ्यों के साथ महान बताया गया है।
आओ! सरकार सरकार खेलें
समय परिवर्तन के साथ-साथ बहुत कुछ बदल जाता है। यहाँ तक कि शब्द भी और शब्दों के अर्थ भी। इसे यूं समझ सकते हैं...
भारतीय राजनीति के विपरीत ध्रुव हैं अम्बेडकर और सावरकर
इंडियन एक्सप्रेस (3 दिसंबर, 2022) में प्रकाशित अपने लेख नो योर हिस्ट्री में आरएसएस नेता राम माधव लिखते हैं कि राहुल गांधी, अम्बेडकर और...
सत्ता और जनसत्ता (डायरी, 13 अक्टूबर 2021)
जीवन को लेकर मेरी एक मान्यता है। यह मान्यता विज्ञान पर आधारित है। मेरी मान्यता है कि ब्रह्मांड में कुछ भी स्वतंत्र नहीं है।...

