Wednesday, May 29, 2024
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सत्ता और जनसत्ता (डायरी, 13 अक्टूबर 2021)

जीवन को लेकर मेरी एक मान्यता है। यह मान्यता विज्ञान पर आधारित है। मेरी मान्यता है कि ब्रह्मांड में कुछ भी स्वतंत्र  नहीं है। इसे दूसरे रूप में कहूं तो कुछ भी निरपेक्ष नहीं है। फिर चाहे वह आकाशंगगा के पिंड हों या धरती पर मौजूद हर निर्जीव व सजीव। यह हमारी मानसिकता पर भी […]

जीवन को लेकर मेरी एक मान्यता है। यह मान्यता विज्ञान पर आधारित है। मेरी मान्यता है कि ब्रह्मांड में कुछ भी स्वतंत्र  नहीं है। इसे दूसरे रूप में कहूं तो कुछ भी निरपेक्ष नहीं है। फिर चाहे वह आकाशंगगा के पिंड हों या धरती पर मौजूद हर निर्जीव व सजीव। यह हमारी मानसिकता पर भी लागू होता है और बात जब सत्ता और सियासत की होती है तो यह बेहिचक कहा जा सकता है कि सबका अपना-अपना पक्ष होता है। जो सत्ता में रहता है, उसका पक्ष अधिक सुना जाता है और जो विपक्ष में होता है, उसे महत्व कम दिया जाता है। मीडिया यानी अखबारों और न्यूज चैनलों से यह अपेक्षा की जाती है कि वह निरपेक्ष रहें। निरपेक्ष यानी संतुलन बनाकर रखें। सामान्य तौर पर यह माना जाता है कि गुलाम बनकर पत्रकारिता नहीं की जा सकती है। फिर गुलामी चाहे विचारों की हो या फिर सत्ता की।
दरअसल, मैंने दो दिनों पहले लिखा था कि, लखीमपुर खीरी नरसंहार के बाद दिल्ली से प्रकाशित जनसत्ता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़ी खबरों को पहले पन्ने पर जगह देना बंद कर दिया है और एक-दो दिनों में यह मुमकिन है कि वह प्रधानमंत्री की तथाकथित सुंदर छवि पहले पन्ने पर प्रकाशित करे। आज यही हुआ है। जनसत्ता ने प्रधानमंत्री का बयान प्रकाशित किया है कि मानवाधिकार हनन की घटनाओं को राजनैतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। यह बयान उन्होंने मानवाधिकार दिवस के मौके पर एक विशेष संबोधन में कही है।
दो दिनों पहले जब मैंने यह लिखा था कि एक-दो दिनों में जनसत्ता नरेंद्र मोदी की तस्वीर को पहले पन्ने पर प्रकाशित करेगी तो मेरा अपना अध्ययन है कि कोई भी अखबार सत्ता को बहुत अधिक समय तक लगातार चुनौती नहीं दे सकता। अब आज की ही बात देख लें। जनसत्ता के पहले पन्ने पर कल लखीमपुर नरसंहार में भाजपा नेता व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय कुमार मिश्रा के बेटे आशीष कुमार मिश्रा के द्वारा मारे गए किसानों के अंतिम अरदास की खबर को प्रकाशित करने से परहेज किया है। जबकि अंतिम अरदास में पचास हजार से अधिक लोगों ने भाग लिया।
जाहिर तौर पर अंतिम अरदास की खबर और प्रधानमंत्री के उपरोक्त बयान को एक साथ एक पन्ने पर जगह देने का मतलब होता केंद्रीय सत्ता को सीधे तौर पर ललकारना। यह साहस जनसत्ता ने नहीं दिखाया है।

[bs-quote quote=”मेरे लिए इस जेपी आंदोलनकारी नेता के सवाल का कोई मतलब नहीं था। मैंने केवल उनसे इतना कहा कि जेपी ओबीसी के आरक्षण के विरोधी थे और इस कारण उन्होंने मुंगेरीलाल कमीशन का विरोध किया था। जब कर्पूरी ठाकुर को बिहार के सवर्ण गालियां दे रहे थे – आरक्षण की नीति कहां से आयी, कर्पूरिया के …., तब जेपी ने अपने मुंह पर टेप लगा लिया था। मंडल कमीशन के गठन का विरोध भी जेपी ने किया था। चूंकि इस संबंध में मैं पहले भी कई बार लिख चुका हूं तो बार-बार लिखने का कोई मतलब नहीं रह जाता।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

खैर, यह जनसत्ता का अपना मामला है। मैं जनसत्ता को बेहद खास मानता हूं। दरअसल, भारत में प्रकाशित अन्य अखबारों की तुलना में इस अखबार की रीढ़ थोड़ी अधिक मजबूत है। अभी कल ही पटना के एक संपूर्ण क्रांति सेनानी ने मुझे फोन कर कहा कि आपने जेपी को याद नहीं किया। जिन्होंने मुझे फोन किया, वे इन दिनों भाजपा के बड़े नेता हैं और 1977 में जनसंघ में थे तथा पहली बार विधायक बने थे। उस समय बिहार में जो कर्पूरी ठाकुर की सरकार बनी थी, जिसमें जनसंघ भी शामिल था, में वह मंत्री बनने से चूक गए थे। चूक इसलिए गए थे क्योंकि उनकी जाति के ही एक दबंग ने उनका पत्ता साफ कर दिया था। यह इसके बावजूद कि वे जेपी के बहुत करीब थे।

मेरे लिए इस जेपी आंदोलनकारी नेता के सवाल का कोई मतलब नहीं था। मैंने केवल उनसे इतना कहा कि जेपी ओबीसी के आरक्षण के विरोधी थे और इस कारण उन्होंने मुंगेरीलाल कमीशन का विरोध किया था। जब कर्पूरी ठाकुर को बिहार के सवर्ण गालियां दे रहे थे – आरक्षण की नीति कहां से आयी, कर्पूरिया के …., तब जेपी ने अपने मुंह पर टेप लगा लिया था। मंडल कमीशन के गठन का विरोध भी जेपी ने किया था। चूंकि इस संबंध में मैं पहले भी कई बार लिख चुका हूं तो बार-बार लिखने का कोई मतलब नहीं रह जाता।
मेरे इस जवाब का उपरोक्त नेता ने अपनी अल्पज्ञता या फिर सीनाजोरी के आधार पर विरोध करना चाहा। लेकिन अंत में वे निरूत्तर हो गए तथा फोन काट दिया।
दरअसल, आपातकाल का दौर जनसत्ता के लिए बेहद खास था। लोग बताते हैं कि यह एकमात्र अखबार था, जिसने इंदिरा गांधी के तानाशाही दौर का मुखर होकर विरोध किया था। यहां तक कि बिना विज्ञापन के भी यह अखबार निकलता रहा।
मैं कई बार यह सोचता हूं कि बिना विज्ञापनों के अखबार कैसे निकाला जा सकता है और वह भी सरकार को सीधे तौर पर चुनौती देकर। निश्चित तौर पर आपको पैसे चाहिए। बिना पैसे के अखबार नहीं निकाला जा सकता है। वजह यह कि पैसे आवश्यक होते हैं कागज और स्याही के लिए। पैसे आवश्यक होते हैं उन लोगों के लिए जो प्रिंटिंग प्रेस में काम करते हैं। पैसे आवश्यक होते हैं उनके लिए जो खबरें लिखते हैं। उन दिनों तो अखबार निकालना बड़ा श्रमसाध्य काम था। प्रेस में मैटर सेट करने के लिए अचछी खासी संख्या में लोगों की आवश्यकता होती थी। आज तो यह काम कंप्यूटर के उपयोग की वजह से बेहद आसान है।
तो गोयनका जी के पास इतना पैसा कहां से आया होगा? थोड़ी देर के लिए मैं यह मान भी लेता हूं कि उन्होंने यह पैसा अपने घर से लगाया होगा, तो गलत साबित होऊंगा। क्योंकि बनिया वर्ग एक ऐसा समुदाय है, जो कभी घाटे का सौदा नहीं करता। निश्चित तौर पर उन्हें उस वक्त के वे राजे-रजवाड़े अपना सहयोग दे रहे होंगे, जो प्रिवी पर्स छीने जाने से नाराज रहे होंगे, संविधान की प्रस्तावना में समाजवाद जोड़े के खिलाफ रहे होंगे और निजी बैंकों के वे मालिक जो बैंकों के राष्ट्रीयकरण के शिकार हुए होंगे।

[bs-quote quote=”खैर, मेरा यह अनुमान मात्र है। गोयनका जी का अर्थशास्त्र तो वही जान सकते हैं जो उस समय उनके करीब रहे होंगे। मैं तो आज की बात करता हूं। आखिर क्या वजह रही कि जिस अखबार ने एक सप्ताह तक लखीमपुर खीरी नरसंहार से जुड़ी हर छोटी-बड़ी खबर को पहले पन्ने पर जगह दिया हो, उसने अंतिम अरदास में जुटी हजारों की भीड़ को अनदेखा किया तथा प्रधानमंत्री के बयान को प्रमुखता से प्रकाशित किया?” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

खैर, मेरा यह अनुमान मात्र है। गोयनका जी का अर्थशास्त्र तो वही जान सकते हैं जो उस समय उनके करीब रहे होंगे। मैं तो आज की बात करता हूं। आखिर क्या वजह रही कि जिस अखबार ने एक सप्ताह तक लखीमपुर खीरी नरसंहार से जुड़ी हर छोटी-बड़ी खबर को पहले पन्ने पर जगह दिया हो, उसने अंतिम अरदास में जुटी हजारों की भीड़ को अनदेखा किया तथा प्रधानमंत्री के बयान को प्रमुखता से प्रकाशित किया?

बहरहाल, कल केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी प्रवचन दिया है मानवाधिकार पर। उनका कहना है कि उनकी सरकार ने देश में मानवाधिकारों को स्थापित किया है। उनका तर्क है कि उनकी सरकार द्वारा बनवाए गए शौचालयों के निर्माण से महिलाओं को मानवाधिकार मिला है। तीन तलाक पर कानून बनाने से मुस्लिम महिलाओं को मानवाधिकार मिला है। जाहिर तौर पर अमित शाह नरेंद्र मोदी के गोयबेल्स हैं। उनके कहे का कोई खास महत्व नहीं है। मैं तो जनसत्ता के बारे में सोच रहा हूं जिसने उनके बयान को इतना महत्व दिया है।
सबसे दिलचस्प है आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का बयान। कल दिल्ली में वह सावरकर पर एक किताब का विमोचन कर रहे थे। किताब उदय माहूरकर व  चिरायु पंडित नामक दो संघियों ने लिखी है। किताब का नाम है– वीर सावरकर हूं कुड हैव प्रिवेंटेड पार्टिशन। विमोचन के मौके पर भागवत ने अपनी घिसी-पिटी बात कही है। उनका कहना है कि स्वतंत्रता के बाद से ही सावरकर को बदनाम करने की मुहिम चली। मुस्लिमों के संबंध में भागवत ने कल फिर कहा कि हिंदू और मुस्लिम दोनों के पूर्वज एक हैं। केवल पूजा करने का तरीका अलग-अलग है। कल एक नयी बात भागवत ने जो कही है, वह यह कि सावरकर के बाद अब विवेकानंद, दयानंद सरस्वती और महर्षि अरविंद निशाने पर होंगे।
अंतिम वाक्य महत्वपूर्ण है। भागवत यह जानते हैं कि ब्राह्मणों की सारी पोल-पट्टी खुलने लगी है। देश का बहुसंख्यक वर्ग यह जानने-समझने लगा है कि वर्चस्ववादी वर्णाश्रम को बनाए रखने के लिए ब्राह्मणों ने किस तरह का तिकड़म किया है।
कल एक कविता जेहन में आयी–
हम मिहनतकश
चाहें तो हर बार दुहरा सकते हैं भीमा-कोरेगांव
लेकिन हम तुम्हारी तरह नहीं कि
बात-बात पर लाठी-बंदूक और तोप निकाल लें
किसी निहत्थे को गोलियों से उड़ा दें
और खुद को देवताओं की संतान कहते फिरें
हम तो मिहनतकश हैं
मिहनत करते हैं तो खाते हैं
और सुकून से जीना पसंद करते हैं
लेकिन तुम हो कि
हमारी जमीनें हड़प लेना चाहते हो
जंगलों को नीलाम कर देना चाहते हो
पहाड़ों को ध्वस्त कर उसके पत्थरों से
अपने शहरों में बिछा लेना चाहते हो
और पठारों की कोख के खनिज हड़प
विश्व शक्ति का खिताब पाना चाहते हो।
हम मिहनतकश
चाहें तो हर बार दुहरा सकते हैं भीमा-कोरेगांव
लेकिन हम तुम्हारी तरह नहीं कि
हर साल मिट्टी का पुतला बनाकर
तुम्हारे पुरखों की लाश पर नाचें
जैसे तुम नाचते हो हर साल
हमारे पुरखों की लाश पर।

 

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

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