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Smita patil
स्मिता पाटिल ने संजीदा सिनेमा को एक नया व्याकरण दिया था
हिंदी फिल्म जगत की आठवें और नवें दशक की अत्यंत प्रतिभाशाली अभिनेत्री स्मिता पाटील के अभिनय कला की विलक्षणताओं, आम भारतीय स्त्री की वास्तविक स्थिति और मनोदशा को रुपायित करती अविस्मरणीय भूमिकाओं, समाज के वंचित तबके, विशेष रूप से महिलाओं के प्रति उनकी गहरी संवेदना आदि को रेखांकित करता/समेटता शोधपरक आलेख पढ़ा। यह हिंदी सिनेमा का दुर्भाग्य रहा कि वे बहुत कम उम्र में इस दुनिया से विदा हो गईं अन्यथा वे और सैकड़ों फिल्मों में अपने सशक्त अभिनय से अविस्मरणीय भूमिकाओं को परदे पर साकार करतीं।
मुज़फ्फ़र अली और उनका सिनेमा
मुज़फ्फ़र अली ने गमन (1978), उमराव जान (1981), आगमन (1982), अंजुमन (1986), जाँनिसार (2015) जूनी (अप्रदर्शित) अवधी संस्कृति (लोकजीवन), उसकी उपलब्धियों और समस्यायों को फ़िल्मी परदे पर पहचान दिलाने का प्रशंसनीय काम किया। उन्होंने कम फ़िल्में बनाई लेकिन जब भी बनाया मन से सार्थक एवं उदेश्यपरक फ़िल्में निर्मित की जिसे दर्शकों और समीक्षकों ने सराहा। मुजफ्फर अली साहब की फिल्मों में अवध की संस्कृति है, ठुमरी है, मर्सिया है, हसीन शाम-ए-अवध की फिज़ा में ग़ज़ल पेश करती तवायफें हैं जिनकी नजाकत-नफासत और अदाओं के पीछे अपने दुःख-दर्द और तन्हाई है।
ये इश्क इश्क है इश्क इश्क (डायरी 19 अक्टूबर, 2021)
इश्क में कुछ हासिल करना ही अंतिम लक्ष्य नहीं होता। इश्क में आदमी को खोने के लिए तैयार रहना चाहिए। लेकिन इश्क का मतलब...

