मुज़फ्फ़र अली और उनका सिनेमा

राकेश कबीर

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अवध की भाषा और संस्कृति को बॉलीवुड सिनेमा तक ले जाकर सम्मान दिलाने का पहला ठोस प्रयास  मुज़फ्फ़र अली साहब ने ही किया। लखीमपुर खीरी जिले के कोटवारा रियासत में जन्मे  मुज़फ्फ़र साहब को उनके सिनेमा, फैशन और सूफियाना अंदाज के लिए जाना जाता है। सिनेमा के अतिशय व्यवसायीकरण को गलत मानने वाले अली साहब को मुंबई की दुनिया रास नहीं आई। उद्देश्यपरक और सार्थक सिनेमा के पैरोकार इस फिल्मकार ने बहुत कम फ़िल्में बनाई लेकिन जितनी भी बनाई बेमिसाल बनाई और पूरी दुनिया में उन फिल्मों के माध्यम से स्थापित और सम्मानित हुए।  मुज़फ्फ़र अली साहब की शख्सियत में लखनऊ की नजाकत, नफासत और तमीज देखने को मिलती है। अपने उसूलों के साथ ज़िन्दगी जीने वाले इस शख्स से बातचीत करने पर देश, दुनिया, राजनीति, पर्यावरण और सिनेमा पर एक अलहदा अनुभव होता है. उनसे रूबरू होने के दो अवसर मुझे भी मिले।

विद्यार्थी जीवन में जेएनयू कैम्पस, नई दिल्ली में सन 2007-08 में एक कवि सम्मेलन और मुशायरे की शाम में बशीर बद्र और  मुज़फ्फ़र अली साहब को देखने और सुनने का मौका मिला था। लखीमपुर खीरी जनपद में फरवरी 2014 में जब मेरी तैनाती हुई तो लोकसभा चुनाव की तैयारियां चल रही थीं। उनके जिले में पहुंचकर उनका कोटवारा पैलेस देखने की प्रबल इच्छा थी। राजनीतिक रैलियों में ड्यूटी के दौरान मार्च महीने की किसी तारीख को गोला तहसील में स्थित मशहूर फिल्मकार जनाब  मुज़फ्फ़र अली से संयोगवश उनके कोटवारा पैलेस में मुलाकात हो गयी। महल के मुख्य द्वार के बाहर बड़े-बड़े जनरेटर सेट लगे थे। गेट के अंदर बायीं तरफ कुछ बढ़ई विक्टोरिया रथ बनाने में जुटे थे। वैसी ही दो-तीन घोड़ बग्घियाँ पहले से खड़ी थीं। हम लोग गाड़ी बाहर खड़ी करके कोटवारा पैलेस के अंदर दाखिल हुए और मुजफ्फर अली साहब से मुलाक़ात करने के लिए अंदर खबर भिजवाई गयी। हम तो महल देखने ही गए थे लेकिन वे तो जांनिसार  (2015) फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में पूरी यूनिट के साथ वहां मौजूद थे। फिल्म की स्टारकास्ट भी महल में मौजूद थी। बातचीत में दौरान उन्होंने दिलीप ताहिल और बीना काक का नाम बताया और इस बात का विशेष रूप से ज़िक्र किया कि बीना काक को सलमान खान बहुत मानते हैं।

राकेश कबीर  मुज़फ्फ़र अली के साथ उनके निवास पर

उन्होंने फिल्म के संवाद लेखक से भी परिचय कराया जो फर्रुखाबाद जनपद के रहने वाले थे। वे दोनों किसी दृश्य पर चर्चा करके संवाद और दृश्य फाइनल कर रहे थे।  मुज़फ्फ़र अली साहब ने चाय मंगाई और हम दोनों चाय पीते हुए विभिन्न मुद्दों पर गुफ्तगू करते रहे। इस दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें बताई थी कि जब वे स्कॉटलैंड से पढ़ाई करके लौटे तो फिल्म निर्माण की बारीकियां सीखने के लिए सत्यजीत रे के पास कलकत्ता चले गए। रे साहब ने उन्हें सीख दी कि अपने क्षेत्र और कल्चर से जुड़ा सिनेमा बनाओ। यहाँ यह ज़िक्र करना लाजिमी है कि सत्यजीत रे ने प्रेमचन्द की कहानी शतरंज के खिलाड़ी की पटकथा पर फिल्म बनाई थी जो लखनऊ में चरमराते-ढहते नवाबी रूतबे और उसके अवशेषों पर केन्द्रित है।  मुज़फ्फ़र अली साहब ने यह भी बताया कि उनकी सभी फिल्मों की शूटिंग कोटवारा गाँव और उनके अपने महल में हुई है तथा गाँव के लोग ही फिल्मों में कलाकार भी होते हैं। अपने बचपन के गाँव को याद करते हुए वे कहते हैं कि उनके गाँव में एक लम्बी पानी की धारा और उसके किनारे मिट्टी के ऊँचे पहाड़ थे तो ऐसा लगता था कि यह मेरे जिले का स्कॉटलैंड हो। आज भी गोला तहसील में उनके परिवार के मालिकाने में जंगल हैं। गाँव का लम्बा ताल भी है। बस मिट्टी के पहाड़ नहीं बचे हैं। चारों तरफ समतल खेत हैं जिनमे फसलें खड़ी रहती हैं। अपनी फिल्म की शूटिंग में बारिश का दृश्य फिल्माने के लिए उन्हें पानी के टैंकर चाहिए थे। हमने उन्हें बताया था कि नगरपालिका गोला से आपको किराए पर पानी के टैंकर मिल जायेंगे मेरी जरूरत पड़े तो बता दीजियेगा।

खीरी को चीनी का कटोरा कहते हैं। तराई का यह जनपद जल जंगल और जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनो से भरपूर है। क्रेन ग्रोवर्स के नाम से वहां शिक्षण संस्थान हैं और आज भी 8 चीनी मिलें चलती हैं। मिल मालिकों द्वारा गन्ना किसानों के अंतहीन शोषण की समस्या को लेकर उन्होंने आगमन (1982) फ़िल्म बनाई। आज भी गन्ना किसान और मिल मालिकों के बीच और गन्ने के दाम, भुगतान और समय से पर्ची ने मिलने को लेकर आंदोलनों और संघर्ष होते मैंने खुद देखें है लखीमपुर खीरी में।

सत्यजीत रे की सीख और अवधी सिनेमा  

सत्यजीत रे साहब की प्रेरणा से मुज़फ्फ़र अली ने अपनी पहली फिल्म में अपने गाँव को ही केंद्र में रखकर गरीबी, बेरोजगारी और पलायन की समस्या पर आधारित फिल्म गमन (1978) बनायी। इस फिल्म में नाना पाटेकर, स्मिता पाटिल, गीता सिद्धार्थ, जलाल आगा, सतीश शाह जैसे कलाकारों ने काम किया. बेगम अख्तर की गायन कला की याद दिलाती हीरा देवी मिश्र ने ठुमरी और मर्सिया गाया है। छाया गांगुली का गाया गीत आपकी याद आती रही रात भर बार-बार सुनने को मन करता है। परदेस गए पति की बिरह में रात भर जागकर उसे याद करने वाली बिरहन की तन्हाई को इससे बेहतर भाव को देने वाले गीत बिरले ही होंगे। स्मिता पाटिल जैसी सौन्दर्य की मल्लिका ने गमन फिल्म में ग्रामीण महिला की एकदम नॉन-ग्लैमरस भूमिका करके अपनी अभिनय प्रतिभा के रेंज को साबित किया है। मुजफ्फरअली साहब ने विदेश जाने के पहले अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र रहकर विज्ञान की पढ़ाई की थी। अलीगढ़ में ही उनकी मुलाकात शहरयार साहब से हुई जिनकी रूहानी शायरी के वे कायल हो गए। मुज़फ्फ़र अली ने अपनी हर फिल्म में शहरयार के गीतों और ग़ज़लों के शामिल किया। गमन और उमराव जान के बेहतरीन गीत-ग़जल शहरयार साहब ने ही लिखे। इस गुरुमंत्र के साथ लौटे  मुज़फ्फ़र अली ने अपने गृह जनपद लखीमपुर खीरी में व्याप्त गरीबी बेरोजगारी और शहरों की तरफ युवाओं के पलायन की समस्या पर गमन फ़िल्म बनाई। पहली ही फ़िल्म में अवधी भाषा ठुमरी मर्सिया लखनऊ शहर और अवध क्षत्र में स्थित खीरी जनपद के गांवों के जनजीवन को चित्रित किया। खीरी को चीनी का कटोरा कहते हैं। तराई का यह जनपद जल जंगल और जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनो से भरपूर है। क्रेन ग्रोवर्स के नाम से वहां शिक्षण संस्थान हैं और आज भी 8 चीनी मिलें चलती हैं। मिल मालिकों द्वारा गन्ना किसानों के अंतहीन शोषण की समस्या को लेकर उन्होंने आगमन (1982) फ़िल्म बनाई। आज भी गन्ना किसान और मिल मालिकों के बीच और गन्ने के दाम, भुगतान और समय से पर्ची ने मिलने को लेकर आंदोलनों और संघर्ष होते मैंने खुद देखें है लखीमपुर खीरी में। हादी रुसवा के उपन्यास उमराव जान अदा का फिल्मी रूपांतरण करके अपनी इतिहास प्रसिद्ध फ़िल्म उमराव जान (1981) फ़िल्म का निर्माण किया। कोर्टसन डांसर के जीवन पर बनी यह फ़िल्म मील का पत्थर साबित हुई और फ़िल्म इतिहास में एक घटना के रूप में दर्ज हो गयी। मुज़फ्फर अली ने लखनऊ की नज़ाकत, नफ़ासत, नवाबी संस्कृति, गीत और संगीत को सहेजते हुए महिला अधिकारों के उल्लंघन को जिस तरह सिनेमा के पर्दे पर प्रस्तुत किया उसने दर्शकों को सम्मोहित और चमत्कृत करने का काम किया।

फिल्म उमराव जान में रेखा

पलायन आज भी जारी है

 मुज़फ्फ़र अली और सुभाषिनी अली सहगल के बेटे शाद अली ने सन 2005 में पलायन की समस्या और युवाओं के जीवन पर अपनी फिल्म बंटी और बबली को एक नए अंदाज में प्रस्तुत किया । इस पीढ़ी का युवा गरीबी में घुट-घुट कर जीने और घर-परिवार की चिंता में दुबले होने की जगह की जगह बंटी और बबली बन गया। लखनऊ, कानपुर और मुंबई शहर भी वही थे, ट्रेन और स्टेशन भी वही थे लेकिन उनकी रफ्तार बहुत तेज हो गयी थी। गांवों, कस्बों और छोटे शहरों से पलायन जिम्मेदारियों के बोझ तले दबा केवल शादीशुदा पुरुष नहीं कर रहा था बल्कि छोटे शहरों के किशोरवय के सिंगल लड़के-लड़कियां दोनों नई जीवन शैली की चाह में मुम्बई जैसे बड़े शहरों की तरफ पलायन कर रहे थे। इक्कीसवीं सदी के थोड़े पढ़े-लिखे कस्बाई युवा रिक्शा चालक, टैक्सी ड्राइवर और दिहाड़ी मजदूर बनने को तैयार न थे। ये युवा अपने शौक पूरा करने के लिए स्मार्ट तरीक़े से लोगों को बेवकूफ बनाकर लूटपाट करके माल कमाने में संकोच नही करते। सन 1978 में बनी फिल्म गमन का गुलाम हसन (फारुख शेख) मुंबई रेलवे स्टेशन पर खड़े होकर बेचारगी भरी निगाहों से आती-जाती लौटती ट्रेनों की राह देखते अपनी खाली जेब टटोल रहे थे लेकिन सन 2005 के बंटी और बबली (अभिषेक बच्चन और रानी मुखर्जी) रोज घर, गाड़ी, कपड़े बदलकर फटाफट एक जगह से दूसरी जगह भाग रहे थे। छोटे-छोटे शहरों के ये नटवरलाल इतने होशियार बन चुके थे कि इन्हें पुलिस भी नही पकड़ पा रही थी।

बेरोजगारी और प्रवास की समस्या को  मुज़फ्फ़र अली (गमन) और शाद अली (बंटी और बबली) दोनों ने उठाया लेकिन अपने समय के भिन्न यथार्थ को समेटकर रुपहले पर्दे पर चित्रित करने का काम किया। यह तथ्य है कि गाँव से शहर की तरफ प्रवास के फ़िल्मी प्रस्तुतिकरण में दो पीढ़ियों के सोच में अंतर दिखता है लेकिन मेरा तर्क है कि दोनों फ़िल्में ‘जनरेशन गैप’ की जगह एक ‘निरन्तरता’  को सामने रखती है।

गमन (1978), उमराव जान (1981), आगमन (1982), अंजुमन (1986), जानिसार (2015) जूनी (अप्रदर्शित) अवधी संस्कृति (लोकजीवन), उसकी उपलब्धियों और समस्यायों को फ़िल्मी परदे पर पहचान दिलाने का प्रशंसनीय काम किया। उन्होंने कम फ़िल्में बनाई लेकिन जब भी बनाया मन से सार्थक एवं उदेश्यपरक फ़िल्में निर्मित की जिसे दर्शकों और समीक्षकों ने सराहा। मुजफ्फर अली साहब की फिल्मों में अवध की संस्कृति है, ठुमरी है, मर्सिया है, हसीन शाम-ए-अवध की फिज़ा में ग़ज़ल पेश करती तवायफें हैं जिनकी नजाकत-नफासत और अदाओं के पीछे अपने दुःख-दर्द और तन्हाई है।

बाप-बेटे ( मुज़फ्फ़र अली-शाद अली) दोनो ने लखनऊ और कानपुर के आसपास के गांवों और छोटे शहरों से पलायन को सिनेमा के परदे पर दिखाया लेकिन पचास सालों में कितना बदल गया था सब कुछ। एक बेरोजगार नौजवान गुलाम हसन चौराहे पर खड़े होकर तेजी से भागती मुम्बई की सड़कों की रफ्तार को देख रहा है और बैकग्राउंड में एक गीत बज रहा है ‘सीने में जलन और आंखों में तूफान सा क्यूँ है? इस शहर का हर शख्स परेशान सा क्यूँ है? उस दौर की मुंबई में एक भीड़ भरा भागता-हांफता शहर है, ऊँचे-ऊँचे मकानात हैं, दूर तक फैला तन्हा समन्दर भी  है, ये सब मिलकर उदासी का माहौल रचते हैं। लेकिन बंटी और बबली फिल्म में प्रवासी नौजवान कजरारे कजरारे नैना…बर्बाद हो रहे हैं जी अपने शहर वाले गाने पर मस्ती में डांस कर रहा है। पलायन का सबसे दर्दनाक मंजर इस देश ने सन 2020 में कोरोना काल में देखा जब लोग भूख और भय से अपने घरों को (उत्तर प्रदेश और बिहार) पैदल ही चल पड़े। मुजफ्फर अली को मुंबई रास नहीं आती तो वे उसे पीछे छोड़ चुके हैं। डॉ. सागर ने भी एक सवाल कोरोना काल के पलायन के समय खड़ा किया बम्बई में का बा?

फिल्म गमन में स्मिता पाटिल और फारूख शेख़

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गुलाम हसन (गमन) टैक्सी चलाते हैं और अपने जेब से बार-बार पैसे निकालकर गिनते हैं, उधार लेते हैं ताकि खीरी के अपने गाँव जा सकें जहाँ जवान बीवी है जो हर खत में उसके लौट आने की बात लिखती, बीमार माँ है जिसकी कमर की हड्डी टूट गयी है। मनीआर्डर और चिट्ठी तो वह भेज देता है लेकिन लौटने के टिकट खरीदने भर के पैसे नही जोड़ पाता। रेलवे स्टेशन पर खड़े होकर लखनऊ को लौटती ट्रेन को जिस आस से वह देखता है उसकी आँखें सारी बेचारगी को कह देती हैं। जेएनयू में (2006-2011) कई ऐसे घरों के लड़के पढ़ते थे जो 4-5 सालों तक घर नहीं जाते थे क्योंकि उनके पास टिकट के पैसे नहीं होते थे। गरीबी की मार और एक अदद घर का जुगाड़ न हो पाने से गुलाम हसन के बचपन के दोस्त लल्लूलाल तिवारी और यशोधरा शादी नहीं कर पाते और उनकी हत्या भी हो जाती है। तीस साल तक टैक्सी चलाने वाले ड्राइवर रामप्रसाद जब एक दुर्घटना में मर जाते हैं तो गुलाम अपना भविष्य सोचकर डर जाता है, कल रात अपने साए से मै डर गया यारों।पलायन कर मुंबई में बसे मजदूरों ग़रीबों की ज़िन्दगी में ऐसी ही मुश्किलें भरी पड़ी हैं। गमन उन सबकी दास्तान है।

फिल्म निर्देशक मुज़फ्फर अली

मुज़फ्फ़र अली उद्देश्यपूर्ण और भरोसे के सिनेमा के पैरोकार हैं 

सिनेमा बनाने का एक उद्देश्य होना चाहिए वे बार-बार इस बात पर जोर देते हैं. लखनऊ शहर, ठुमरी, और अवधी भाषा सब मौजूद रहती है। लोकल यथार्थ से ही विश्वस्तरीय ग्लोबल सिनेमा बन सकता है सत्यजीत रे ने पाथेर पांचाली जैसी फिल्मों से ऐसा साबित करके दिखाया और उनके नक़्शे कदम पर चलकर  मुज़फ्फ़र अली साहब ने भी लोकप्रियता हासिल की। उनकी फ़िल्में गमन (1978), उमराव जान (1981), आगमन (1982), अंजुमन (1986), जानिसार (2015) जूनी (अप्रदर्शित) अवधी संस्कृति (लोकजीवन), उसकी उपलब्धियों और समस्यायों को फ़िल्मी परदे पर पहचान दिलाने का प्रशंसनीय काम किया। उन्होंने कम फ़िल्में बनाई लेकिन जब भी बनाया मन से सार्थक एवं उदेश्यपरक फ़िल्में निर्मित की जिसे दर्शकों और समीक्षकों ने सराहा।  मुज़फ्फ़र अली साहब की फिल्मों में अवध की संस्कृति है, ठुमरी है, मर्सिया है, हसीन शाम-ए-अवध की फिज़ा में ग़ज़ल पेश करती तवायफें हैं जिनकी नजाकत-नफासत और अदाओं के पीछे अपने दुःख-दर्द और तन्हाई है।  मुज़फ्फ़र अली साहब को और फ़िल्में बनानी चाहिये थी क्योंकि उनके जैसी सोच और प्रतिभा विरले लोगों में होती है जो अपने क्षेत्र और संस्कृति और वहां लोगों के जीवन पर केन्द्रित सार्थक सिनेमा रच पाते हैं।

संदर्भ :
जैसल, मनीष कुमार (2013) फिल्मकार मुज़फ्फर अली से मनीष कुमार जैसल की बातचीत, प्रवक्ता.कॉम.
सिंह, जय (2013) भारतीय सिनेमा का सफरनामा, प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली.
रावत, सौरभ (2020) पोएट्री इज द एसेंस ऑफ़ माय वर्क: फिल्ममेकर मुजफ्फर अली, इन टाइम्सऑफ़इंडिया.कॉम ऑन 18 मार्च 2020.
पांडे, दयानंद (2012) पहले की बीवियों के साथ मैं सेकेंडरी होकर रह गया था: मुज़फ्फर अली, सरोकारनामा.

राकेश कबीर जाने-माने कवि, कथाकार और सिनेमा के गंभीर अध्येता हैं।

4 Comments
  1. Gulabchand Yadav says

    👌👏💐💐
    राकेश जी आपका उपर्युक्त ताजा आलेख पढ़ा।

    आपने मुजफ्फर अली की संवेदनशीलता, समाज सापेक्षता और उनके सिनेमाई विजन को बहुत करीने और संजीदगी से प्रस्तुत किया है। मुजफ्फर जी ने अद्वितीय भारतीय फिल्मकार स्व. सत्यजीत रे साहब से यथार्थवादी सिनेमा की बारीकियां सीखी थी और अपनी मिट्टी और अपने आसपास के समाज की समस्याओं को अपनी फिल्मों की कथावस्तु बनाने की जो नेक सलाह दी थी उसका वाकई में मुजफ्फर जी ने पूरा अनुकरण किया। उन्होंने जितनी भी फिल्में बनाईं उन्हें टिपिकल मुंबईया सिनेमा के लटकों – झटकों और कीमियागिरी से मुक्त ही रखा और अवध की संस्कृति, बोली और वहां की समस्याओं को अपनी फिल्मों के केंद्र में रखा। उनकी कुछ फिल्में (जैसे – उमराव जान) व्यवसायिक रूप से सफल रहीं किंतु कई असफल रहीं। किंतु उन्होंने अपना विजन और अपनी प्रतिबद्धता को बाजारू मानदंडों या मुनाफाखोरी से परे ही रखा। मैं आपके इस कथन/निष्कर्ष से सहमत हूं कि, *उन्होंने कम फ़िल्में बनाई लेकिन जब भी बनाया मन से सार्थक एवं उदेश्यपरक फ़िल्में निर्मित की जिसे दर्शकों और समीक्षकों ने सराहा। मुज़फ्फ़र अली साहब की फिल्मों में अवध की संस्कृति है, ठुमरी है, मर्सिया है, हसीन शाम-ए-अवध की फिज़ा में ग़ज़ल पेश करती तवायफें हैं जिनकी नजाकत-नफासत और अदाओं के पीछे अपने दुःख-दर्द और तन्हाई है। मुज़फ्फ़र अली साहब को और फ़िल्में बनानी चाहिये थी क्योंकि उनके जैसी सोच और प्रतिभा विरले लोगों में होती है जो अपने क्षेत्र और संस्कृति और वहां लोगों के जीवन पर केन्द्रित सार्थक सिनेमा रच पाते हैं।*

    आपने इस बार भी रोचक और पठनीय आलेख साझा किया है और हिंदी फिल्म जगत के एक प्रतिबद्ध और संजीदा फिल्मकार के व्यक्तित्व, कृतित्व और उनकी फिल्मों की बारीकियों से अवगत कराया है जिसके लिए आप बधाई और शुभेच्छा के हकदार हैं।

  2. Captain A.K.Singh says

    गुलाम हसन की विवशता की तुलना जेएनयू के छात्रों से करके लेखक राकेश कबीर जी ने अपनी संवेदनशीलता और आलोचनात्मक दृष्टि का बेबाक परिचय दिया है। यह आलेख साहित्य और समाज के अंतर संबंधों को बखूबी दर्शाता है। लेखक का समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण लेखक की प्रतिभा का कायल होने को विवश करती है। इसे पढ़ते हुए उपन्यास पढ़ने जैसी आनंद की अनुभूति होती है।

  3. DHARMENDRA VEERODAY says

    राकेश कबीर जी द्वारा प्रस्तुत इस आलेख में फिल्मनिर्माता मुजफ्फर अली की संवेदनशीलता, समाज सापेक्षता और उनके सिनेमाई विजन को सविस्तार रूप में प्रस्तुत किया गया है। मुजफ्फर अली सत्यजीत रे के शागिर्द रहे हैं, जिनसे उन्होंने यथार्थवादी सिनेमा की बारीकियां सीखी । उनकी फिल्मों में मिट्टी की खूबियों के साथ समाज की समस्याओं का यथार्थ चित्रण रहता है । अली साहब की फ़िल्में फ़िल्म जगत के परंपरागत ढर्रे का अतिक्रमण करते हुए जीवन की वास्तविकता से रूबरू कराती हैं ।
    ” मुज़फ्फ़र अली साहब की फिल्मों में अवध की संस्कृति है, ठुमरी है, मर्सिया है, हसीन शाम-ए-अवध की फिज़ा में ग़ज़ल पेश करती तवायफें हैं जिनकी नजाकत-नफासत और अदाओं के पीछे अपने दुःख-दर्द और तन्हाई है”। लेखक का सामाजिक दृष्टिकोण आलोचनात्मक और तटस्थ है । यह आलेख साहित्य और समाज के अंतर संबंधों को बखूबी दर्शाता है।

  4. Tarkeshwar Patel says

    व्याप्त गरीबी, बेरोजगारी शहरों की तरफ यूवाओ का पलायन की समस्या पर गमन, मिल मालिकों द्वारा गन्ना किसानों के अंतहीन शोषण की समस्या को लेकर आगमन बेरोजगारी और प्रवास की समस्या पर बनी दो फिल्मे गमन तथा बंटी और बबली ये जेनरेशन गैप की निरंतरता को प्रदर्शित करती है । मुजफ्फर अली द्वारा जमीनी स्तर पर बनाई गई फिल्मों को आपने इस आलेख के माध्यम से बहुत ही सराहनीय ढंग से प्रस्तुत किया है। आपने मुजफ्फर अली की संवेदनशीलता और उनके सिनेमाई विजन को बहुत संजीदगी से प्रस्तुत किया है।

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