TAG
tulsidas
क्या बजरंग बली का पर्याय हो सकता है बजरंग दल?
कर्नाटक विधानसभा चुनाव (मई 2023) के लिए अपने घोषणापत्र में कांग्रेस ने नफरत फैलाने वाले संगठनों पर प्रतिबंध लगाने का वादा किया है। अपने...
जब राष्ट्रपति को जगन्नाथ मंदिर में जाने से रोका तब कहाँ था सनातन धर्म?
प्रो.चंद्रशेखर पर अँगुली उठाने वाले सनातनियों से खुली बहस की चुनौती
लखनऊ में भारतीय ओबीसी महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौ.लौटनराम निषाद तुलसीदास की रामचरितमानस, मनुस्मृति,...
रामचरितमानस आलोचना से परे नहीं है और बहुजनों को उस पर सवाल उठाना चाहिए
आज-कल हमारे देश में सभी बुद्धिजीवी, समाज सुधारक एवं राजनीतिज्ञ हिंदू समाज में व्याप्त सामाजिक अन्याय और सामाजिक परिवर्तन की बात करते हैं, लेकिन...
मत करिए कबीर-रैदास की तुलना मार्क्स से (डायरी 17 फरवरी, 2022)
सवर्ण लेखकों और दलित-बहुजन लेखकों में फर्क करना मुश्किल काम नहीं है। सवर्ण लेखकों की खासियत यह होती है कि उनके लेखन के केंद्र...
रामचरितमानस में स्त्रियों की कलंकगाथा (आखिरी भाग )
तुलसीदास के लिये तो सभी स्त्रियाँ 'सभी धान बाइस पसेरी' की कहावत की तरह हैं लेकिन स्त्रियों द्वारा ही जब स्त्रियों का आकलन होता है तो जातिगत दंभ की भावना हावी हो जाती है। यही भारतीय समाज का स्थाई रोग है जो अपना असर दिखाये बिना नहीं चूकता और यही एक ब्राह्मण की सृजन प्रक्रिया है जो अपना वार चलाने में नहीं चूकता और तुलसीदास तो इस हुनर के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी हैं।
रामचरितमानस में स्त्रियों की कलंकगाथा (भाग –2)
दुनिया का कोई भी सभ्य समाज अपनी स्त्रियों को कलंकित करने के इतने कठोर प्रतिबन्ध की कल्पना मात्र से ही सिहर जायेगा। और मज़ा देखिये कि दो अतिकुलीन महिलाएँ ही महिलाओं के लिये इन वर्जनाओं की पैरोकारी कर रही हैं। यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि अनसूया अत्रि ऋषि की पत्नी हैं। यदि उनके द्वारा दिए गये उपदेश को ऋषि परम्परा की शिक्षा का प्रतिनिधि आधार कहा जाये तो निश्चित रूप से इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि इन आश्रमों में जिस प्रकार की शिक्षा व्यवस्था थी, उसमें स्त्रियाँ अपने कलंक को दैवीय वरदान मानकर गौरवान्वित होती थीं।
रामचरितमानस में स्त्रियों की कलंकगाथा (भाग – 1)
तुलसीदास कृत रामचरित मानस उत्तर भारत की पिछड़ी जातियों के लिए धर्मग्रंथ बना दिया गया। बहुत स्पष्ट रूप से बहुजन संतों और समाजों को अपमानित करने वाली इस किताब की यह स्वीकार्यता यूं ही नहीं है बल्कि बहुजन समाजों को भ्रमजाल में बनाए रखने का एक मजबूत सांस्कृतिक हथियार है। सवर्ण बुद्धिजीवी भले ही इसे बहुत महिमामंडित करते हैं लेकिन बहुजनों को लिए यह एक जहरीली किताब है। सुप्रसिद्ध दलित साहित्यकार मूलचंद सोनकर ने इसे स्त्रियॉं की गुलामी और अपमान के मद्देनजर देखा है।

