रामचरितमानस में स्त्रियों की कलंकगाथा (भाग –2)

मूलचन्द सोनकर

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                                        छन सुख लागि जनम सत कोटी। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी।।

                                          बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत  धर्म  छाड़ि  छल  गहई।।

अर्थात, क्षण भर के सुख के लिये जो सौ करोड़ (असंख्य) जन्मों के दुखों को नहीं समझती, उसके समान दुष्टा कौन होगी। जो स्त्री छल छोड़कर पातिव्रत धर्म को ग्रहण करती है, वह बिना ही परिश्रम परम गति को प्राप्त होती है।

                                              पति प्रतिकूल जनम जहँ जाई। बिधवा होइ पाइ तरुनाई।।

अर्थात, किंतु जो पति के प्रतिकूल चलती है, वह जहाँ भी जाकर जन्म लेती है, वहीं जवानी पाकर (भरी जवानी में) विधवा हो जाती है।

                                               सो.- सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।

                                                  जस गावत श्रुति चार अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय।।

अर्थात, स्त्री जन्म से ही अपवित्र है, किंतु पति की सेवा करके वह अनायास ही शुभ गति प्राप्त कर लेती है। (पातिव्रत धर्म के कारण ही) आज भी ‘तुलसीजी’ भगवान को प्रिय हैं और चारों वेद उनका यश गाते हैं।

                                                      सुनु सीता तव नाम सुमिरि नारि पतिब्रत करहिं।

                                                   तोहि प्रानप्रिय  राम  कहिउँ  कथा संसार हित।। 

अर्थात, हे सीता ! सुनो, तुम्हारा तो नाम ही ले-लेकर स्त्रियाँ पातिव्रत धर्म का पालन करेंगी। तुम्हें तो श्रीराम प्राणों के समान प्रिय हैं, यह (पातिव्रत धर्म की) कथा तो मैंने संसार के हित के लिए कही है।

दुनिया का कोई भी सभ्य समाज अपनी स्त्रियों को कलंकित करने के इतने कठोर प्रतिबन्ध की कल्पना मात्र से ही सिहर जायेगा। और मज़ा देखिये कि दो अतिकुलीन महिलाएँ ही महिलाओं के लिये इन वर्जनाओं की पैरोकारी कर रही हैं। यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि अनसूया अत्रि ऋषि की पत्नी हैं। यदि उनके द्वारा दिए गये उपदेश को ऋषि परम्परा की शिक्षा का प्रतिनिधि आधार कहा जाये तो निश्चित रूप से इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि इन आश्रमों में जिस प्रकार की शिक्षा व्यवस्था थी, उसमें स्त्रियाँ अपने कलंक को दैवीय वरदान मानकर गौरवान्वित होती थीं। जब स्त्री को जन्मजात अपवित्र मान ही लिया गया है तो उसकी पैदाइश का आधार चाहे प्राकृत हो, चाहे अप्राकृत, वह पवित्र हो ही नहीं सकती, और जब जगतजननियां भी उसी श्रेणी में स्थापित हैं तो सामान्य स्त्रियों की तो कोई औकात ही नहीं हैं। इसका सीधा सा अर्थ यह भी हो सकता है कि तुलसी ने अनसूया के मुँह से यही कहलवाया है कि वह और सीता दोनों ही जन्म से अपवित्र हैं।

सीता का हरण हो चुका है। लक्ष्मण सहित राम उनकी खोज पर हैं। सुग्रीव से मैत्री हो चुकी है। वर्षा ऋतु का आगमन हो चुका है। दोनों भाई प्रवर्षण पर्वत पर आराम कर रहे हैं। राम लक्ष्मण के साथ अनेकानेक प्रसंगों पर चर्चा कर रहे हैं। इन्हीं में एक प्रसंग यह भी है :

                                                 महाबृष्टि चल फूट किआरीं। जिमी सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं।।

                                 अर्थात, भारी वर्षा से खेतों की क्यारियाँ फूट चली हैं, जैसे स्वतन्त्र होने से स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं। 

 यद्यपि यह एक सामान्य कथन है जिसके केंद्र में पूरी स्त्री जाति है लेकिन यह निश्चित है कि सीता-प्रकरण के कारण ही राम के मन में यह विचार पैदा हुआ होगा। उनके मस्तिष्क में यह बात ज़रूर कचोट रही होगी कि सीता के कहने पर वह नाहक ही स्वर्णमृग का शिकार करने चले गये। इस प्रकार हम देखते हैं कि स्वयं राम की नज़रों में सीता की छवि को कितना कलंकित कर देते हैं तुलसीदास। एक बात और राम जंगल में किसी पर्वत पर विश्राम कर रहे हैं। वहाँ पर इस प्रकार के खेतों क वर्णन तुलसी की खेती-किसानी के बारे में अज्ञानता का प्रदर्शन है।

यद्यपि यह एक सामान्य कथन है जिसके केंद्र में पूरी स्त्री जाति है लेकिन यह निश्चित है कि सीता-प्रकरण के कारण ही राम के मन में यह विचार पैदा हुआ होगा। उनके मस्तिष्क में यह बात ज़रूर कचोट रही होगी कि सीता के कहने पर वह नाहक ही स्वर्णमृग का शिकार करने चले गये।

 

यह तो रहे सीता से सम्बंधित कुछ प्रसंग। तुलसीदास ने पार्वती को भी कहीं का नहीं छोड़ा है। सती से पार्वती के रूप में जन्म लेने तक की बड़ी रोचक कथा का वर्णन है रामचरितमानस में जो बालकाण्ड के अध्याय 20 से 34 तक विस्तारित है। इसमें अनेक दृष्टान्त ऐसे हैं जो विषय की कथावस्तु की माँग को पूरा करते हैं लेकिन सब को यहाँ उद्धृत करने पर यह लेख काफी विस्तृत हो जायेगा। जिज्ञासु पाठक स्वयं इसका अध्ययन कर सकते हैं। मैं यहाँ पर शिव के साथ पार्वती के विवाह के समय के कुछ दृष्टान्त ही यहाँ पर उद्धृत कर रहा हूँ। प्रसंग है पार्वती की विदाई के अवसर का। पार्वती की माँ मैना के उद्गार निम्नवत हैं :

                                                 छंद- पुनि गहे पद पाथोज मयनाँ प्रेम परिपूरन हियो ।।

अर्थात, फिर प्रेम से परिपूर्ण ह्रदय मैनाजी ने शिव के चरणकमल पकड़े(और कहा..)

                                       दो० —  -नाथ उमा  मम प्रान सम  गृहकिंकरी  करेहु ।

                                               छमेहु सकल अपराध अब होइ प्रसन्न बरु देहु ।।

अर्थात, हे नाथ ! यह उमा मुझे मेरे प्राणों के समान (प्यारी) है। आप इसे अपने घर की टहलनी बनाइयेगा और इसके सब अपराधों को क्षमा करते रहियेगा। अब प्रसन्न होकर मुझे यही वर दीजिये।

  बहु बिधि संभु सासु समझाई। गवनी भवन चरन सिरु नाई।।

                                                          जननीं उमा बोल तब  लीन्ही। लै उछंग सुंदर सिख दीन्ही।।

अर्थात, शिवजी ने बहुत तरह से अपनी सास को समझाया। तब वे शिवजी के चरणों में सिर नवा कर घर गयीं। फिर माता ने पार्वती को बुला लिया और गोद में बैठाकर यह सुंदर सीख दी।

             करेहु सदा संकर पद पूजा। नारिधरमु पति देउ न दूजा।।

                                                      बचन कहत भरे लोचन बारी। बहुरि लाइ उर लीन्हि कुमारी।।

अर्थात, हे पार्वती ! तू सदा शिवजी के चरणों की पूजा करना, नारियों का यही धर्म है। उनके लिए पति ही देवता है और कोई देवता नहीं है | इस प्रकार की बातें कहते-कहते उनकी आँखों में आँसू भर आये और उन्होंने कन्या को छाती से चिपटा लिया।

                                                  कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं।।

                                                       भै अति प्रेम बिकल महतारी | धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी।।

अर्थात,(फिर बोलीं कि) विधाता ने जगत में स्त्री जाति को क्यों पैदा किया? पराधीन को सपने में भी सुख नहीं मिलता। यों कहती हुई माता प्रेम में अत्यंत विकल हो गयी, परंतु कुसमय जानकर(दुख करने का अवसर न जानकर) उन्होंने धीरज धरा।

 यहाँ पर यह बताना ज़रूरी है कि इस चौपाई की प्रथम दो पंक्तियों को उद्धृत करके तुलसी के मर्मज्ञ उन्हें स्वतंत्रता का पक्षधर सिद्ध करके फूल कर कुप्पा हो जाते हैं | वे इस ओर कतई ध्यान नहीं देते कि यह एक दुखी माँ की सहज अभिव्यक्ति है जो निश्चित रूप से स्वयं भी इन परिस्थितियों से गुज़र रही होगी लेकिन उसने अपनी बेटी को इस परिस्थिति से विद्रोह करने की बजाय उसी परंपरा को ढोते रहने की नसीहत देती है। इसका अर्थ सीता विवाह के समय के इस दृष्टान्त से पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है :

                                                         सादर सकल कुअँरि समुझाईं। रानिन्ह बार बार उर लाईं।।

                                                           बहुरि बहुरि भेटहिं महतारीं। कहहिं बिरंचि रचीं कत नारीं।।

अर्थात, आदर के साथ सब पुत्रियों को (स्त्रियों के धर्म) समझाकर रानियों ने बार-बार उन्हें हृदय से लगाया। माताएँ फिर-फिर भेंटतीं और कहती हैं कि ब्रह्मा ने स्त्री जाति को क्यों रचा।

सीता की उत्पत्ति को लेकर मायाजाल रचने वाले तुलसीदास यहाँ स्वयं स्वीकार करते हैं कि सीता की रचना ब्रह्मा ने की थी। कितनी जल्दी उन्होंने स्वयं अपने झूठ पर से पर्दा उठा दिया?

आगे चल कर हम शिव- पार्वती का संवाद पाते हैं। इस संवाद में पार्वती ने स्वयं को जिस रूप में प्रस्तुत किया है, अब उसे देखें:

                                                        जौं मो पर प्रसन्न सुखरासी। जानिअ सत्य मोहि निज दासी।।

                                                       तौ प्रभु हरहु मोर अग्याना। कहि रघुनाथ कथा बिधि नाना।।

अर्थात, हे सुख की राशि ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और सचमुच मुझे अपनी दासी(या अपनी सच्ची दासी) जानते हैं, तो हे प्रभो ! आप श्रीरघुनाथजी की नाना प्रकार की कथा कहकर मेरा अज्ञान दूर कीजिये।

                    दोहा- बंदउँ पद धरि धरनि सिरु बिनय करउँ कर जोरि |

                                                          बरनहु रघुबर बिसद जसु श्रुति सिद्धान्त  निचोरि ||

अर्थात, मैं पृथ्वी पर सिर टेककर आपके चरणों की वंदना करती हूँ और हाथ जोड़कर विनती करती हूँ। अप वेदों के सिद्धान्त को निचोड़कर श्रीरघुनाथजी का निर्मल यश वर्णन कीजिये।

             जदपि जोषिता नहिं अधिकारी। दासी मन क्रम बचन तुम्हारी।।

                                                      गूढ़उ तत्व न  साधु  दुरावहिं। आरत  अधिकारी जहँ पावहिं।।

अर्थात, यद्यपि स्त्री होने के कारण मैं उसे सुनने की अधिकारिणी नहीं हूँ, तथापि मैं मन, वचन और कर्म से आपकी दासी हूँ। संत लोग जहाँ आर्त अधिकारी पाते हैं, वहां गूढ़ तत्व भी उससे नहीं छिपाते।

                                                   नाथ कृपाँ अब  गयउ  बिषादा। सुखी  भयउँ प्रभु चरन  प्रसादा।।

                                                  अब मोहिं आपन किंकरि जानी। जदपि सहज जड़ नारि अयानी।।

अर्थात, हे नाथ ! आपकी कृपा से अब मेरा विषाद जाता रहा और आपके चरणों के अनुग्रह से मैं सुखी हो गयी। यद्यपि मैं स्त्री होने के कारण स्वभाव से ही मूर्ख  और ज्ञानहीन हूँ, तो भी अब आप मुझे अपनी दासी जानकर।

यहाँ पर यह बताना ज़रूरी है कि इस चौपाई की प्रथम दो पंक्तियों को उद्धृत करके तुलसी के मर्मज्ञ उन्हें स्वतंत्रता का पक्षधर सिद्ध करके फूल कर कुप्पा हो जाते हैं | वे इस ओर कतई ध्यान नहीं देते कि यह एक दुखी माँ की सहज अभिव्यक्ति है जो निश्चित रूप से स्वयं भी इन परिस्थितियों से गुज़र रही होगी लेकिन उसने अपनी बेटी को इस परिस्थिति से विद्रोह करने की बजाय उसी परंपरा को ढोते रहने की नसीहत देती है।

 

यहाँ ऐसा लगता है, जैसे उद्धरण अधूरा है लेकिन आगे की चौपाई इसलिए छोड़ दी गयी है क्योंकि मैं जो कहना चाहता हूँ वह यहीं आकर पूरा हो जाता है अर्थात पार्वती द्वारा सीता की ही भाँति स्वयं को दासी होने की घोषणा की करना।

बालकाण्ड में ही अहल्या का प्रसंग पढ़ने को मिलता है। यह इस प्रकार है :

  आश्रम एक दीख मग माहीं।खग मृग जीव जंतु तहँ नाहीं।।

                                                      पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी।सकल कथा मुनि कहा विसेषी।।

अर्थात, मार्ग में एक आश्रम दिखाई पड़ा। वहाँ पशु-पक्षी, कोई भी जीव-जन्तु नहीं था। पत्थर की एक शिला को देखकर प्रभु ने पूछा, तब मुनि ने विस्तारपूर्वक सब कथा कही।

दोहा- गौतम  नारि  श्राप  बस उपल देह धर धीर।

                                                                   चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर।।

अर्थात, गौतम मुनि की स्त्री अहल्या शापवश पत्थर की देह धारण किये बड़े धीरज से आपके चरणकमलों की धूलि चाहती है। हे रघुवीर ! इस पर कृपा कीजिये।

छंद- परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही।

                                                        देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होइ कर जोरि रही।।

                                                         अति प्रेम अधीरा पुलक सरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही।

                                                           अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही।।

अर्थात, श्रीरामजी के पवित्र और शोक को नाश करने वाले चरणों का स्पर्श पाते ही सचमुच वह तपोमूर्ति अहल्या प्रकट हो गयी। भक्तों को सुख देने वाले श्रीरघुनाथजी को देखकर वह हाथ जोड़कर सामने खड़ी रह गयी। अत्यंत प्रेम के कारण वह अधीर हो गयी। उसका शरीर पुलकित हो उठा; मुख से वचन कहने में नहीं आते थे। वह अत्यंत बड़भागिनी अहल्या प्रभु के चरणों से लिपट गयी और उसके दोनों नेत्रों से जल (प्रेम और आनद के आँसुओं) की धारा बहने लगी।

                                                  धीरज मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई।

                                                  अति निर्मल बानी अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई ।।

                                                     मैं नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई।

                                                 राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई।।

अर्थात, फिर उसने मन में धीरज धरकर प्रभु को पहचाना और श्रीरघुनाथजी की कृपा से भक्ति प्राप्त की | तब अत्यंत निर्मल वाणी से उसने (इस प्रकार) स्तुति प्रारंभ की – हे ज्ञान से जानने योग्य रघुनाथजी ! आपकी जय हो ! मैं (सहज ही) अपवित्र स्त्री हूँ; और हे प्रभो ! आप जगत को पवित्र करनेवाले, भक्तों को सुख देनेवाले और रावण के शत्रु हैं। हे कमलनयन ! हे संसार ( जन्म-मृत्यु ) के भय से छुड़ानेवाले ! मैं आपकी शरण आयी हूँ, (मेरी) रक्षा कीजिये।

                                                मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना |

                                                 देखेउँ भरि लोचन हरि भव मोचन इहइ लाभ संकर जाना ||

                                                   बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना |

                                                  पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना ||

अर्थात, मुनि ने जो मुझे शाप दिया, सो बहुत ही अच्छा किया। मैं उसे अत्यंत अनुग्रह (करके) मानती हूँ, कि जिसके कारण मैंने संसार से छुड़ाने वाले श्रीहरि (आप) को नेत्र भरकर देखा। इसी (आपके दर्शन) को शंकरजी सबसे बड़ा लाभ समझते हैं। हे प्रभो ! मैं बुद्धि की बड़ी भोली हूँ, मेरी एक विनती है। हे नाथ ! मैं और कोई वर नहीं माँगती, केवल यही चाहती हूँ कि मेरा मनरूपी भौंरा आपके चरण-कमल की रज के प्रेमरूपी रस का सदा पान करता रहे।

 जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी |

                                                     सोई पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी ||

                                                        एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी ||

                                                         जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पतिलोक अनंद भरी ||

अर्थात, जिन चरणों से परम पवित्र देवनदी गंगाजी प्रकट हुईं, जिन्हें शिवजी ने सिर पर धारण किया और जिन च्ररणकमलों को ब्रह्माजी पूजते हैं, कृपालु हरि ( आप ) ने मेरे सिर पर रखा। इस प्रकार (स्तुति करती हुई) बार-बार भगवान के चरणों में गिरकर, जो मन को बहुत ही अच्छा लगा, उस वर को पाकर गौतम की स्त्री अहल्या आनंद में भरी हुई पतिलोक को चली गयी।

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रामचरितमानस में स्त्रियों की कलंकगाथा (भाग – 1 )

  दोहा – अस  प्रभु  दीनबंधु   हरि  कारन रहित दयाल |

                                                                तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल ||

अर्थात, प्रभु श्रीरामचंद्रजी ऐसे दीनबंधु और बिना ही कारण दया करने वाले  हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, हे शठ (मन) ! तू कपट-जंजाल छोड़कर उन्हीं का भजन कर।

स्वयं को जन्मजात अपवित्र मानने और पति द्वारा दण्डित होने को अपना सौभाग्य समझने की स्त्री सुलभ स्वीकार्यता यहाँ भी है लेकिन एक अतिरिक्त बात  यह है कि अहल्या ऋषि पत्नी है। इसका मतलब यह हुआ कि वह ब्राह्मणी है। नियमतः उसके लिये राम का चरण स्पर्श करना वर्जित है। पूरे रामचरितमानस में एक भी ऐसा स्थल नहीं है, जहाँ किसी ब्राह्मण ने राम के चरण स्पर्श किये हों बल्कि अनेक स्थलों पर राम को ही उनके सामने नतमस्तक दिखाया गया है। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि महिला केवल महिला है और सबकी एक ही नियति है। इसलिये किसी भी स्त्री को अपने तथाकथित जाति-कुल पर व्यर्थ का गुमान नहीं पालना चाहिए।

स्त्रियों को कलंकित करने की बात हो तो तुलसीदास रिश्तों की सारी मर्यादाएँ ताक पर रख देते हैं | प्रसंग है भरत का जो अपनी माँ से कुपित होकर उसे अपशब्दों से नवाजने में कोई संकोच नहीं करते | दृष्टान्त प्रस्तुत हैं :

                                           बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति। मनहुँ जरे पर लोनु लगावति।।

                                            तात  राउ  नहिं  सोचै  जोगू। बिढ़इ सुकृत जस कीन्हेउ भोगू।।

अर्थात, पुत्र को व्याकुल देखकर कैकेयी समझाने लगी। मानो जले  पर नमन लगा रही हो। (वह बोली) हे तात ! राजा सोच करने योग्य नहीं हैं। उन्होंने पुण्य और यश कमाकर उसका पर्याप्त भोग किया।

  जीवत सकल जनम फल पाए। अंत अमरपति सदन सिधाए।।

                                            अस अनुमान सोच परिहरहू। सहित समाज राज पुर करहू ।।

 अर्थात, जीवनकाल में ही उन्होंने जन्म लेने के सम्पूर्ण फल पा लिये और अन्त में वे इन्द्रलोक को चले गये। ऐसा विचारकर  सोच छोड़ दो और समाज सहित नगर का राज्य करो।                                          

स्वयं को जन्मजात अपवित्र मानने और पति द्वारा दण्डित होने को अपना सौभाग्य समझने की स्त्री सुलभ स्वीकार्यता यहाँ भी है लेकिन एक अतिरिक्त बात यह है कि अहल्या ऋषि पत्नी है। इसका मतलब यह हुआ कि वह ब्राह्मणी है। नियमतः उसके लिये राम का चरण स्पर्श करना वर्जित है। पूरे रामचरितमानस में एक भी ऐसा स्थल नहीं है, जहाँ किसी ब्राह्मण ने राम के चरण स्पर्श किये हों बल्कि अनेक स्थलों पर राम को ही उनके सामने नतमस्तक दिखाया गया है।


सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू। पाकें छत जनु लाग अँगारू।।

                                              धीरज धरि भरि लेंहि उसासा। पापिन सबहि भाँति कुल नासा।।

अर्थात, राजकुमार भरतजी यह सुनकर बहुत ही सहम गये। मानो पके घाव पर अँगार छू गया हो। उन्होंने धीरज धरकर बड़ी लम्बी साँस लेते हुए कहा- पापिनी ! तूने सभी तरह से कुल का नाश कर दिया।

जौं पै कुरुचि रही अति तोही। जनमत काहे न मारे मोहि।।

                                                      पेड़ काटि तैं पालउ सींचा। मीन जिअन निति बारि उलीचा।।

अर्थात, हाय ! यदि तेरी ऐसी ही अत्यंत बुरी रुचि (दुष्ट इच्छा) थी, तो तूने जन्मते ही मुझे मार क्यों नहीं डाला ? तूने पेड़ को काटकर पत्ते को सींचा है और मछली के जीने के लिये पानी को उलीच डाला! ( अर्थात मेरा हित करने जाकर उलटा तूने मेरा अहित कर डाला)।

दोहा- हंसबंसु  दशरथु  जनकु राम लखन से भाइ।

                                                             जननी तूँ जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ।।

अर्थात, मुझे सूर्यवंश (सा वंश), दशरथजी (सरीखे) पिता और राम-लक्ष्मण-से भाई मिले। पर हे जननी! मुझे जन्म देनेवाली माता तू हुई ! (क्या किया जाय!) विधाता से कुछ भी वश नहीं चलता।

      जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ। खंड खंड होइ हृदउ  न गयऊ।।

                                                      बर मागत मन भइ नहिं पीरा। गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा।।

अर्थात, अरी कुमति ! जब तूने हृदय में यह बुरा विचार ( निश्चय ) ठाना, उसी समय तेरे हृदय के टुकड़े-टुकड़े (क्यों) न हो गये ? वरदान माँगते समय तेरे मन में कुछ भी पीड़ा नहीं हुई? तेरी जीभ गल नहीं गयी? तेरे मुँह में कीड़े नहीं पड़ गये?45

    भूपँ प्रतीति तोरि  किमि कीन्ही। मरन काल बिधि मत हर लीन्ही।।

                                                        बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी। सकल कपट अघ अवगुन खानी।।

अर्थात, राजा ने तेरा विश्वास कैसे कर लिया? (जान पड़ता  है) विधाता ने मरने के समय उनकी बुद्धि हर ली थी। स्त्रियों के हृदय की गति (चाल) विधाता भी नहीं जान सके। वह सम्पूर्ण कपट, पाप और अवगुणों की खान है।

    सरल सुसील धरम रत राऊ। सो किमि जानै तीय सुभाऊ।।

                                                       अस को जीव जंतु जग माहीं। जेहि रघुनाथ  प्रानप्रिय नाहीं।।

अर्थात, फिर राजा तो सीधे, सुशील और धर्मपरायण थे। वे भला, स्त्री-स्वभाव को कैसे जानते? अरे, जगत के जीव-जंतुओं में ऐसा कौन है जिसे श्रीरघुनाथजी प्राणों के समान प्रिय नहीं हैं।

 भे अति अहित रामु तेउ तोही। को तू अहसि  सत्य कहु मोही।।

                                                          जो हसि सो हसि मुँह मसि लाई। आँखि ओट उठ बैठहि जाई।।

 अर्थात, वे श्रीराम भी तुझे अहित हो गये (वैरी लगे)! तू कौन है? मुझे सच-सच कह! तू जो है, सो है, अब मुँह में स्याही पोतकर (मुँह काला करके) उठकर मेरी आँखों की ओट में जा बैठ।

                                                      दोहा-  राम विरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि।

                                                                   मो समान को पातकी बादि कहउँ  कछु तोहि।।

अर्थात, विधाता ने मुझे श्रीरामजी से विरोध करनेवाले (तेरे) हृदय से उत्पन्न किया (अथवा विधाता ने मुझे हृदय से राम का विरोधी जाहिर कर दिया)। मेरे बराबर पापी दूसरा कौन है? मैं व्यर्थ ही तुझे कुछ कहता हूँ।

अब लगे हाथ शत्रुघ्न के भी शौर्य को देखते चलें :

सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई। जरहिं गात रिस कछु न बसाई।।

                                                      तेहि अवसर कुबरी तहँ आई। बसन बिभूषन बिबिध बनाई।।

अर्थात, माता की कुटिलता सुनकर शत्रुघ्नजी के सब अंग क्रोध से जल रहे थे, पर कुछ वश नहीं चलता। उसी समय भाँति-भाँति के कपड़ों और गहनों से सजकर कुबरी (मंथरा) वहाँ आयी।

लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई। बरत अनल घृत आहुति पाई।।

                                                        हुमगि लात तकि कूबर मारा। परि  मुह भर महि करत पुकारा।।

अर्थात, उसे (सजी) देखकर लक्ष्मण के छोटे भाई शत्रुघ्नजी क्रोध में भर गये। मानो जलती हुई आग को घी की आहुति मिल गयी हो। उन्होंने जोर से तककर कूबड़ पर एक लात जमा दी। वह चिल्लाती हुई मुँह के बल ज़मीन पर गिर पड़ी।

     कूबर टूटेउ फूट कपारू। दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू।।

                                                    आह दइअ मैं काह नसावा। करत नीक फलु अनइस पावा।।

अर्थात, उसका कूबड़ टूट गया, कपाल फूट गया, दाँत टूट गये और मुँह से खून बहने लगा। (वह कराहती हुई बोली) हाय दैव! मैंने क्या बिगाड़ा? जो भला करते बुरा फल पाया।

सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी। लगे घसीटन धरि धरि झोंटी।।

                                                     भरत  दयानिधि  दीन्ह  छड़ाई। कौसल्या  पहिं  गे दोउ भाई।।

अर्थात, उसकी यह बात सुनकर और उसे नख से शिखा तक दुष्ट जानकर शत्रुघ्नजी झोंटा पकड़-पकड़कर उसे घसीटने लगे। तब दयानिधि भरतजी ने उसको छुड़ा दिया और दोनों भाई (तुरंत) कौशल्याजी के पास गये।

संदर्भ:

  1. तुलसीकृत श्रीरामचरितमानस, गीता प्रेस गोरखपुर, एक सौ छठा संस्करण, सुन्दरकाण्ड 59/3
  2. —–       तदैव ——— बालकाण्ड 11/3

3.से 7.   ——      तदैव ———– बालकाण्ड 247/1 से 4 और 247

  1. ——     तदैव  ———- बालकाण्ड 336 से पूर्व
  2. —— तदैव  ——–   बालकाण्ड 326/3
  3. ——-  तदैव  ——– अयोध्याकाण्ड 61/2
  4. और 12. —— तदैव ———अयोध्याकाण्ड 67/2 और 3

13.से 22.   ——-     तदैव ——- अरण्यकाण्ड 5/3 से 10 और 5क व 5 ख

  1. ——- तदैव —— किष्किन्धाकाण्ड 15/4
  2. ——-  तदैव —— बालकाण्ड 101

25.से 27.  ——-     तदैव —— बालकाण्ड 102/ 1 से 3

  1. ——– तदैव —— बालकाण्ड 334/4
  2. ——– तदैव —–बालकाण्ड 108/1
  3. ——– तदैव —– बालकाण्ड 109
  4. ——- तदैव —– बालकाण्ड 112/2
  5. ——- तदैव —– बालकाण्ड 120/2
  6. ——- तदैव —— बालकाण्ड 210/4
  7. ——– तदैव —– बालकाण्ड 210

35.से 38. ——-      तदैव —– बालकाण्ड 211/1 से 4

  1. —— तदैव —-बालकाण्ड 211
  2. से 43 —— तदैव —- अयोध्याकाण्ड 161/1 से 4
  3. ——-     तदैव —– अयोध्याकाण्ड 161
  4. से 48. —— तदैव ——- अयोध्याकाण्ड 162/1 से 4
  5. ——- तदैव ——–  अयोध्याकाण्ड   162
  6. से 53. —— तदैव —— अयोध्याकाण्ड 163/1 से 4
  7. ——– तदैव ——   अयोध्याकाण्ड 75/1
  8. ——- तदैव ——-   अयोध्याकाण्ड 12
  9. ——— तदैव ——   अयोध्याकाण्ड 13/2
  10. ——– तदैव ——-  अयोध्याकाण्ड 14
  11. ——— तदैव ——- अयोध्याकाण्ड 47/4
  12. ——— तदैव ——- अरण्यकाण्ड 17/2
  13. ——– तदैव —— बालकाण्ड 230/1
  14. ——– तदैव ——  बालकाण्ड 251/1
  15. ——– तदैव ——  अरण्यकाण्ड 17/3

63 और 64. ——–  तदैव —— अरण्यकाण्ड 35/ 1 और 2

  1. ——- तदैव —— अरण्यकाण्ड 36

 क्रमश:

  मूलचन्द सोनकर हिन्दी के महत्वपूर्ण दलित कवि-गजलकार और आलोचक थे। विभिन्न विधाओं में उनकी तेरह प्रकाशित पुस्तकें हैं 19 मार्च 2019 को उन्होंने इस संसार को अलविदा कहा।

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  1. […] रामचरितमानस में स्त्रियों की कलंकगाथ… […]

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