मत करिए कबीर-रैदास की तुलना मार्क्स से (डायरी 17 फरवरी, 2022)

नवल किशोर कुमार

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सवर्ण लेखकों और दलित-बहुजन लेखकों में फर्क करना मुश्किल काम नहीं है। सवर्ण लेखकों की खासियत यह होती है कि उनके लेखन के केंद्र उनके अपने विषय होते हैं और वे अपने विषय के प्रति ईमानदार रहते हैं। जब उनके विषय में गैर-सवर्ण विषय शामिल होता है तब उनकी बेईमानी झलक जाती है। जबकि दलित-बहुजन लेखक अपने विषय से अधिक सवर्ण सवालों को लेकर ईमानदार रहते हैं। यह दलित-बहुजन लेखकों के बौद्धिक पिछड़ेपन का प्रमाण है। हालांकि इसमें अब कई तरह के प्रयोग दिखने लगे हैं। लेकिन सवर्ण लेखकों की ईमानदारी और बेईमानी दोनों में गुणोत्तर बदलाव आया है।

एक लेखक हैं। उन्होंने अपनी जाति को छिपाकर रखा है। कहिए कि छद्म वेश धारण कर रखा है और दलित-बहुजन विषयों को लेकर इन दिनों लगातार लेखन कर रहे हैं। उनकी खासियत यह है कि जब वे किसी दलित-बहुजन पुरोधाओं को केंद्र में रखकर लेखन करते हैं तब वे उनकी तुलना कुछ ऐसे करते हैं मानो उनके पास विदेशी विचारकों के अलावा कोई विकल्प ही नहीं। यह दोष उन सवर्ण लेखकों में अधिक है जो स्वयं को वामपंथी कहते फिरते हैं।

अब जिस लेखक की बात मैं कर रहा हूं उनका कमाल देखिए कि उन्होंने रैदास की तुलना कार्ल मार्क्स से कर दी। वे चाहते तो रैदास की तुलना तुलसीदास से कर सकते थे। यदि वे ऐसा करते तो दलित-बहुजनों के बीच इस समझ का विस्तार होता कि कैसे एक ने समतामूलक साहित्य का सृजन किया और दूसरे ने वर्चस्वादी साहित्य का। लेकिन सवर्ण बुद्धिजीवी ऐसा नहीं करना चाहते। हालांकि वे इसका ध्यान अवश्य रखते हैं कि दलित-पिछड़ों की भावनाएं आहत ना हों और उनकी सहानुभूति मिल सके। इसके लिए वे डॉ. आंबेडकर को एक उदाहरण के रूप में सामने रखते हैं। यह सामान्य तौर पर छद्म वामपंथी लेखकों का स्वभाव है।

 

खैर, हमें ऐसे लेखकों से क्या? जिस तरह भौतिक संपदाओं पर उनका वर्चस्व है, वे बौद्धिक वर्चस्व भी बनाए रखना चाहते हैं। हम तो अपने हिसाब से बात करेंगे। सवाल है कि रैदास और कबीर की तुलना किनसे की जानी चाहिए?

दरअसल, मैं यह मानता हूं कि दलित-बहुजनों की अपनी पृथक धारा रही है। आजीवकों से हम इसकी शुरुआत मान सकते हैं। एक उदाहरण के रूप में मक्खलि गोसाल को ले सकते हैं जिन्होंने सबसे पहले ब्राह्मणवाद को यह कहकर चुनौती दी कि कहीं कोई ईश्वर नहीं है। मक्खलि गोसाल के दर्शन ने एक तरह से गैर-ब्राह्मणवादी दर्शन की बुनियाद रखी। बुद्ध दूसरी पीढ़ी के आजीवक रहे। लेकिन बुद्ध के बाद रिक्तता भी आयी। इसकी वजह संभवत: यह कि वर्चस्ववाद के विरुद्ध जो विमर्श मक्खलि गोसाल के साथ शुरू हुआ, वह बुद्ध के समय तक चरम पर पहुंचा। बुद्ध इस मामले में चालाक भी थे। इसकी एक वजह और भी रही कि वह राज-परिवार से थे। यदि उन्होंने स्वयं को आजीवक नहीं बनाया होता तो निश्चित तौर पर राजा होते।

अब जिस लेखक की बात मैं कर रहा हूं उनका कमाल देखिए कि उन्होंने रैदास की तुलना कार्ल मार्क्स से कर दी। वे चाहते तो रैदास की तुलना तुलसीदास से कर सकते थे। यदि वे ऐसा करते तो दलित-बहुजनों के बीच इस समझ का विस्तार होता कि कैसे एक ने समतामूलक साहित्य का सृजन किया और दूसरे ने वर्चस्वादी साहित्य का। लेकिन सवर्ण बुद्धिजीवी ऐसा नहीं करना चाहते। हालांकि वे इसका ध्यान अवश्य रखते हैं कि दलित-पिछड़ों की भावनाएं आहत ना हों और उनकी सहानुभूति मिल सके।

दरअसल, कुर्बानी लोगों को बहुत पसंद आती है। लोग यह देखते हैं कि कौन किस तरह की कुर्बानी देता है। मुझे एक घटना की याद आ रही है। बात तब की है जब मैं पटना में पत्रकार था। उन दिनों पटना में गांधी मैदान उत्तरी-पूर्वी कोने पर अन्ना हजारे के आह्वान पर कुछ लोग अनशन पर बैठे थे। खबर की तलाश में मैं भी वहां गया हुआ था। वहां कुछ खबर तो नहीं मिली, लेकिन एक घटना अवश्य मिल गयी। दरअसल हुआ यह कि एक कार वाले ने एक रिक्शावाले को ठोकर मार दी। इसके पहले कि कोई कार वाले को कुछ कहता, वह कार वाला बाहर निकला और उसने रिक्शाचालक को मारने लगा। उसके मुताबिक, सारा कसूर रिक्शाचालक का था। मारपीट में रिक्शाचालक का सिर फूट गया और खून निकलने लगा।

मेरे एक जानकार जो सवर्ण हैं और पटना में एक विश्वविद्यालय में प्रोफेसर भी, उन्होंने अपनी जेब से कुछ रुपए (चार-पांच सौ रुपए रहे होंगे) निकाले और रिक्शाचालक को दिया। इसके पहले उन्होंने कार चालक को रवाना कर दिया था। सबकुछ मेरी आंखों के सामने हो रहा था। वहीं पुलिस भी थी। रिक्शाचालक मुरेठा से अपने माथे को बांधकर चलता बना और इसके पहले उसने प्रोफेसर साहब के प्रति आभार भी व्यक्त किया। प्रोफेसर साहब अनशन स्थल पर आए और फिर अपने संबोधन में उन्होंने अपनी दानवीरता का उल्लेख किया।

दरअसल, बुद्ध को सफलता राजा होने के कारण मिली। उन्होंने अपनी सफलता के लिए राजाओं का उपयोग किया। राजाओं के अलावा उन्होंने व्यापारी वर्ग का साथ भी लिया। लेकिन यह सभी जानते हैं कि कोई मुफ्त में चाय नहीं पिलाता, फिर धर्म की स्थापना में सहयोग तो बड़ी बात है। इसका असर भी हुआ। बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद कोई दूसरा बुद्ध आजतक नहीं पैदा हुआ। यह संभव भी नहीं है। वजह यह कि बुद्ध के लिए राजा का होना जरूरी है और यह भी कि उसके अंदर भौतिक वर्चस्व के बजाय बौद्धिक वर्चस्व की भूख हो। बुद्ध ने मक्खलि गोसाल के सिद्धांतों को अपना आधार बनाया और संघ की स्थापना की।

रैदास बुद्ध की तरह नहीं थे। एक वजह तो यह कि बुद्ध को जातिगत छुआछूत का सामना नहीं करना पड़ा था और दूसरी यह कि वह राजा थे। लेकिन रैदास छुआछूत के शिकार थे। वे श्रम करते थे और उन्हें करूणा और अहिंसा का ज्ञान हासिल करने के लिए किसी बोधि वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान लगाने की जरूरत नहीं थी।

इस बीच एक महत्वपूर्ण सवाल यह कि धम्मम्  शरणम् गच्छामि, संघम् शरणम् गच्छामि, बुद्धम् शरणम् गच्छामि का मंत्र किसने दिया? क्या ऐसा बुद्ध ने अपने जीवनकाल में कहा था?

बहरहाल, रैदास और कबीर की बात करते हैं। मैंने दोनों को जितना पढ़ा है, उन्हें बुद्ध के बाद का आजीवक पाया है। लेकिन एक बात बहुत साफ है। जैसे बौद्ध साहित्य में मक्खलि गोसाल व अन्य आजीवकों का उल्लेख नहीं मिलता है (यदि मिलता है तो यह मुमकिन है कि मेरी जानकारी बहुत कम है), वैसे ही कबीर और रैदास भी बुद्ध का उल्लेख नहीं करते हैं। लेकिन इससे उनके द्वारा रचित प्रतिक्रांति के साहित्य का महत्व कम नहीं हो जाता।

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मसलन, रैदास कहते हैं– रैदास बाभन मत पूजिए जो होवे गुन हीना, पूजिए चरन चंडाल के जो हो गुन परवीना।

अब इसी से समझिए कि रैदास तात्कालीन सामाजिक पृष्ठभूमि से जुड़े प्रतीकों व शब्दों का उपयोग किस तरह से करते हैं। वे श्रम को महत्व देते हैं और कहते हैं– धरम करम जाने नहीं, मन मह जाति अभिमान, ऐ सोउ ब्राह्मण सो भलो रैदास श्रमिकहु जान।

रैदास बुद्ध की तरह नहीं थे। एक वजह तो यह कि बुद्ध को जातिगत छुआछूत का सामना नहीं करना पड़ा था और दूसरी यह कि वह राजा थे। लेकिन रैदास छुआछूत के शिकार थे। वे श्रम करते थे और उन्हें करूणा और अहिंसा का ज्ञान हासिल करने के लिए किसी बोधि वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान लगाने की जरूरत नहीं थी। वह तो वही कहते थे जो उन्होंने जीवन में झेला था–

जन्म के कारने होत न कोई नीच,

नर कूं नीच कर डारि है, ओछे करम की नीच।

ऐसे ही– जात-पात के फेर मह उरझि रहे सब लोग,

मानुसता को खात है, रैदास जात का रोग।

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अब सोचिए कि यदि मैं बुद्ध के साथ यदि रैदास की तुलना नहीं करूं तो मैं कैसे समझ सकूंगा कि रैदास और बुद्ध के बीच में वैचारिक समानता के तत्व क्या हैं और दोनों के बीच ऐसा क्या है जो अलग है। यदि मैं यह नहीं समझूंगा तो यह कैसे समझ सकता हूं तो समतामूलक समाज की स्थापना के लिए विभिन्न कालखंडों में किस-किस तरह के प्रयास हुए हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह कि ऐसा करते समय हम किसी भी प्रयास को खारिज नहीं करते। लेकिन जब कोई किसी दूसरे जैसे कि मार्क्स का उद्धरण देता है तो वह दलित-बहुजन विचारधारा की कड़ियों को तोड़ देना चाहता है।

ऐसे लोगों को मेरी सलाह है कि वे अपने तुलसी व अन्य द्विज लेखकों की तुलना मार्क्स या अन्य किसी से करें। ऐसा कर वे बौद्धिक पूंजी का निर्माण भी कर सकेंगे जो सभी के लिए उपयोगी होगा। और यदि ऐसा नहीं करते हैं तो इसका मतलब साफ है कि वे अपने आदर्शों के आदर्श को अक्षुण्ण रखना चाहते हैं।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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