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यूपी : आवारा पशुओं के आतंक से ‘दोगुनी’ आय छोड़िए लागत भी नहीं निकाल पा रहे किसान

उत्तर प्रदेश सरकार एक तरफ दलहन, तिलहन व मल्टीग्रेन के उत्पादन पर जोर दे रही है और किसानों की आय दोगुनी करने की बात कह रही है, वहीं दूसरी ओर, किसान आवारा पशुओं के प्रकोप के चलते दलहन-तिलहन की खेती से दूर होते जा रहे हैं। जिससे फसल चक्र में अधिक परिवर्तन देखने को मिल […]

उत्तर प्रदेश सरकार एक तरफ दलहन, तिलहन व मल्टीग्रेन के उत्पादन पर जोर दे रही है और किसानों की आय दोगुनी करने की बात कह रही है, वहीं दूसरी ओर, किसान आवारा पशुओं के प्रकोप के चलते दलहन-तिलहन की खेती से दूर होते जा रहे हैं। जिससे फसल चक्र में अधिक परिवर्तन देखने को मिल रहा है।

आवारा पशुओं के कारण उत्तर प्रदेश के किसान दलहन की अरहर, मटर, चना, मूंग, उड़द और मसूढ़ जैसी फसलों से इतर अन्य नगदी फसलों की तरफ रुख कर रहे हैं, क्योंकि दलहन-तिलहन की फसलों की अपेक्षा नगदी फसल जैसे गन्ना, आलू, पिपरमेंट की खेती को आवारा पशु या नीलगाय कम नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे में किसान दलहन की फसलों को पैदा करना पैसा फेंकने जैसा मान रहे हैं।

पिछले दशकों में भारत की आर्थिक संरचना में हुए परिवर्तन कृषि के निचले स्तर पर पहुँचने की गवाही देते हैं। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि की हिस्सेदारी 1947 के 60 फीसदी से घटकर पिछले वित्त वर्ष में 15 फीसदी पहुँच चुकी है। यह सिर्फ़ अर्थव्यवस्था में कृषि की घटती भूमिका ही नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों में कृषि को लेकर उदासीनता भी दिखाती है।

दलहनतिलहन की खेती घाटे का सौदा

उत्तर प्रदेश की खेती दलहन-तिलहन के लिए उपयुक्त मानी जाती रही है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में आवारा पशुओं और नीलगायों की बढ़ती संख्या के कारण किसान दलहन की खेती से दिन प्रति दिन दूर होते जा रहे हैं।

अनिल सिंह

सुल्तानपुर जनपद में लम्भुआ तहसील के प्रगतिशील किसान अनिल सिंह बताते हैं, ‘नीलगाय और आवारा पशुओं द्वारा फसल को खाने के अलावा खेतों में इनके दौड़ने से भी खड़ी फसल टूट जाते हैं। इससे फसलों की कटाई में भी हमें परेशानी का सामना करना पड़ता है। हम जब पशुओं को खेत से भगाते हैं तो मरकहे जानवर किसानों पर भी आक्रमण भी कर देते हैं। हमारे कई जानने वाले साड़ों के मारने से घायल हो चुके हैं।’

बाजार में पूछने पर पता चलता है कि उत्तर प्रदेश की मंडियों में मौजूद दाल मध्य प्रदेश व बुंदेलखंड के क्षेत्रों से आ रही है। परिवहन आदि पर अधिक खर्च होने से दाल की कीमत में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हो रही है। आज बाजार में अरहर के दाल की कीमत 150 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है। यही कारण है कि एक बड़ी आबादी की थाली से अरहर की दाल गायब है।

किसान के लिए खेती दिन-प्रतिदिन घाटे का सौदा होती जा रही है। नीलगाय और आवारा पशुओं से बचने के लिए किसान खेतों की बाड़ाबंदी कर रहे हैं। एक बीघा खेत की बाड़ाबंदी करने पर दस हजार से पंद्रह हजार की लागत आ रही है। जो कि मध्यम वर्ग किसानों की कमर तोड़ रही है।

कुछ समय पहले तक दलहन की खेती किसानों के लिए फायदे की होती थी। जिस खेत तक पानी आदि की उचित व्यवस्था नहीं होती थी, वहां पर किसान अरहर की बोआई कर देते थे और किसानों को साल भर के लिए दाल आदि की भरपूर व्यवस्था हो जाती थी, लेकिन आज तो मंजर कुछ दूसरा ही है। बिना बाड़ेबंदी के किसान कोई भी फसल नहीं उगा सकते।

किसानों द्वारा नीलगायों से अरहर को बचाने के लिए इनके पौधों पर जले हुए आग की राखी फेंकना व दुर्गंध युक्त दवाओं का छिड़काव भी किया जा रहा है, लेकिन यह सभी तरीके निष्प्रभावी साबित हो रहे हैं। इन सभी प्रक्रियाओं के कारण खेती की लागत बढ़ने से किसान पर कर्ज का बोझ बढ़ता ही जा रहा है।

पहले बारह बीघा अरहर की खेती करने वाले अवधेश पाठक आवारा पशुओं से परेशान होकर अन्य फसलों की तरफ रुख कर चुके हैं। अवधेश पाठक कहते हैं, ‘दस साल पहले हम दस बीघा में कुल चार से पाँच हजार की लागत में लगभग 80 से 90 हजार की अरहर बेचते थे। जबसे आवारा पशुओं का प्रकोप बढ़ा तब से हम एक बीघा भी अरहर नहीं पैदा कर पाए। घर में दाल बाज़ार से खरीद कर लाते हैं। अब तो हालत यह है कि धान-गेंहू की फसल भी नहीं बच रही है। किसानों की भूख से मरने की स्थिति पैदा हो गई है।’

सुल्तानपुर के बाधमंडी के बड़े आढ़तियों में शुमार राम जनम बताते हैं, ‘अरहर, चना, मूंग इन सभी दालों में घोर मिलावट ऊपर से ही आ रही है और दाम भी काफी ज्यादा है, इन सभी परिस्थितियों में मुनाफा तो कम है ही, लेकिन ग्राहकों को संतुष्ट करना बड़ा काम हो गया है। गुणवत्ता की तो बात ही ना करें।’

एक तरफ किसानों के सामने आवारा पशुओं की समस्या व्याप्त है तो वहीं दूसरी ओर किसान महंगी खाद, बीज, जुताई, सिंचाई का भी सामना कर रहे हैं। खाद की बोरी जो सहकारी समितियों से किसान प्राप्त कर रहे हैं उन बोरियों की तौल में भी दस किलो की कटौती कर दी गई है, जबकि प्रति बोरी खाद की कीमत में कटौती नहीं की गई है। वहीं, किसानों के लिए खाद के साथ 600 रुपये का एक लिक्विड यूरिया बोतल भी लेना  अनिवार्य कर दिया गया है, जो कि किसान की जेब को ढीला कर रहा है।

लखनऊ से सटे मलूकपुर के किसान रमेश पासी का कहना है कि ‘खेती अब छोड़ देनी पड़ेगी, क्योंकि इससे कुछ मिलना तो दूर अब घर से भी जो लगाया है वह भी नहीं निकल रहा है। इससे अच्छा है कि दिहाड़ी, मजदूरी करी जाए, खेती-किसानी बहुत महंगी हो गई है, यह अब हमारे लोगों के बस की नहीं रही। सरसों नीलगाय खाते तो नहीं, लेकिन उनके झुंड के दौड़ने से पूरी फसल मटियामेट हो जाती है। खेत में मचाना डालकर सोने पर भी खेत के बीच से इनका झुंड बिना किसी भय के जाता है।’

गौशाला की तस्वीर

रमेश आगे कहते हैं, ‘झटका मशीन से नीलगाय सबसे ज्यादा डरते थे, लेकिन प्रशासन का निर्देश है कि अब नई झटका मशीन नहीं लगाई जाएँगी। शिवशंकर बताते हैं कि इतनी सर्द रातों में खेत की रखवाली करना भी दूभर हो रहा है।’

गौशालाओं के नाम पर किसानों को धोखा

यदि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़ों एक्सीडेंटल डेथ्स और स्यूसाइड्स इन इंडिया 2022 को देखें तो देश में प्रतिदिन 150 किसान आत्महत्या कर रहे हैं। यदि हम इसके आंकड़ों के तहत वर्ष 2021 को देखें तो पता चलता है कि 10,881 किसानों एवं कृषि श्रमिकों ने आत्महत्या की, वहीं इसके मुकाबले वर्ष 2022 में यह आंकड़ा बढ़कर 11,290 पहुँच गया है। यदि बात उत्तर प्रदेश की करें तो वर्ष 2017 से 2021 तक 398 किसानों व 701 कृषि मजदूरों की आत्महत्या दर्ज की गई है।

सरकार द्वारा ब्लॉक स्तर पर बनवाए गए गौशालाओं का हाल बहुत खस्ता है। इन गौशालाओं से जानवर ही गायब हैं। लम्भुआ गौशाला में जाने पर यह पता चला कि यहां लगभग 50 पशु हैं, जो कि पूरे ब्लॉक की सीमा में घूम रहे छुट्टा जानवरों का कुछ ही प्रतिशत हैं। किसानों की मानें तो खेत में घूम रहे आवारा पशुओं का दो फीसदी जानवर भी गौशालाओं में नहीं हैं।

आवारा पशुओं के मुद्दे पर किसान नेताओं व विभिन्न संगठनों द्वारा पिछले कई वर्षों से धरने होते आ रहे हैं। किसान लगातार ज्ञापन सौंप रहे हैं। प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव आवारा पशुओं के सवाल पर लगातार सरकार को घेरने का काम कर रहे हैं लेकिन जमीन पर किसी तरह का बदलाव देखने को नहीं मिल रहा है।

भाजपा मण्डल उपाध्यक्ष सर्वेश आवारा पशुओं से व्याप्त समस्या को सिरे से नकारते हैं। सर्वेश कहते हैं, ‘सरकार बखूबी अपना कार्य कर रही है, नीलगाय व आवारा पशुओं पर सरकार द्वारा ब्लू-प्रिंट तैयार है, उचित कदम भी उठाए जा रहे हैं और यह सरकार किसानों के हितों के लिए हमेशा तत्पर है।’

समाजवादी पार्टी के नेता अजीत विधायक आवारा पशुओं से व्यापात समस्या के पीछे का कारण भाजपा को मानते हैं। अजीत कहते हैं, ‘किसानों का नीलगायों की वजह से नुकसान चरम पर है, इसके लिए सरकार को उचित कदम उठाना चाहिए, जिसका धरातल पर असर दिखे और नीलगायों के नुकसान पर किसानों को उचित मुआवजे की घोषणा करनी चाहिए, इससे किसानों को राहत मिल सकेगी।’

लंभुआ तहसील के कानून-गो बलिकरन, आवारा पशुओं के सवाल सबकुछ ठीक होने का हवाला देते हुए कहते हैं कि उनके हलके में आने वाले आवारा पशुओं को गौशालाओं में छुड़वाया जाता है।

ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार कृषि के क्षेत्र में बिना किसी प्रभावी नीति के किसानों की आय दो गुना करने की अपनी महत्वाकांक्षी योजना को कैसे साकार कर पाएगी?

गाँव के लोग
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