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आदर्शवादिता और सभ्यता मानव की, सिर पे धरके पाँव नाचती होली में

होली के मौके पर तेजपाल सिंह तेज की दो गज़लें प्रस्तुत हैं। इनमें आज के दौर का कड़वा सच अभिव्यक्त हुआ है।

 

एक

वासंती ऋतु हुई शराबी होली में,

खाकर भाँग सुबह इठलायी होली में ।

 

बटन खोल तहज़ीब नाचती सड़कों पर,

हुआ आचरण धुआँ दीवानी होली में ।

 

सबके सिर पर राजनीति का रंग चढ़ा,

सियासत ने यूँ धाक जमायी होली में ।

 

धनवानों की होली बेशक होली है,

भूखों ने पर खाक उड़ायी होली में ।

 

प्रेमचन्द की धनिया बैठी सिसक रही,

जैसे-तैसे लाज बचायी होली में ।

दो

धनिया ने क्या रंग जमाया होली में,

रँगों का इक गाँव बसाया होली में ।

 

आँखों से हैं छूट रहे शराबी फव्वारे,

होठों ने उन्माद जगाया होली में ।

 

फँसती गई देह की मछली मतिमारी,

जुल्फों ने यूँ जाल बिछाया होली में ।

 

सिर पे रखके पाँव निगोड़ी नाच रही,

इस तौर लाज का ताज गिराया होली में ।

 

टेसू के रँगों का फागुन हुआ हवा,

कड़वाहट का रँग बरसाया होली में।

 

 

 

 

तेजपाल सिंह 'तेज'
तेजपाल सिंह 'तेज'
लेखक हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार तथा साहित्यकार सम्मान से सम्मानित हैं और 2009 में स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त हो स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।

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