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सिनेमा में ग्रीनलैंड : असाधारण जीवट की कहानियों पर ट्रम्प की लोलुपता की बढ़ती छाया

अमेरिका खुद को विश्व व्यवस्था में लोकतंत्र और शांति-व्यवस्था का संरक्षक मानता है जबकि वास्तविकता इसके उलट है। नब्बे के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया से दो ध्रुवीय व्यवस्था समाप्त हो गई और अमेरिका सबसे बड़ी शक्ति के रूप में उभरा और वहीं से उसकी दादागिरी और बढ़ गयी। अमेरिका और यूरोप के विकसित देशों ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं को अपनाकर एक खुली हुई विश्व व्यवस्था की वकालत की ताकि पूंजी और श्रम का बेरोकटोक प्रवाह हो सके। इस कार्य में विश्व व्यापार संगठन, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। खुली विश्व व्यवस्था का लाभ उठाकर चीन, अमेरिका और कई यूरोपीय देशों ने नव साम्राज्यवाद को बढ़ावा दिया। विकासशील और गरीब देशों के संसाधनों की लूट बढ़ गयी। जिन देशों ने इस लूट में सहयोग नहीं दिया उनके ऊपर वामपंथ, तानाशाही, परमाणु हथियार बनाने का आरोप मढ़कर, प्रायोजित विद्रोह कराकर वहां की शासन व्यवस्था को अस्थिर कर दिया गया। कमजोर और अमेरिकापरस्त लोगों के हाथ में सत्ता देकर अप्रत्यक्ष रूप से अपनी दादागिरी थोप दी गयी। अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, लेबनान, फिलिस्तीन, बांग्लादेश सभी इसके शिकार हो चुके हैं। फिल्म ‘अगेंस्ट द आइस’ दो बहादुर खोजी यात्रियों द्वारा अपने निजी अनुभवों पर लिखी गयी किताब पर आधारित फिल्म थी जिसने ग्रीनलैंड को अमेरका की विस्तारवादी नीति से बचाया था लेकिन एक शताब्दी बाद अमेरिका जैसे साम्राज्यवादी देश यह समझने को तैयार नहीं कि देश जमीन पर बना नक्शा नहीं होता। उसमें लोग भी रहते हैं जो अपने देश और लोगों से प्यार करते हैं और किसी बाहरी देश का कब्ज़ा या हस्तक्षेप नहीं चाहते। सबसे रार ठानकर अमेरिका अकेले नहीं रह सकता। उसके राष्ट्रपति को नहीं पता लेकिन वहां की जनता को पता है, इसलिए यूनाइटेड स्टेट के नागरिक अपने राष्ट्रपति के फैसलों के खिलाफ मुखर विरोध भी कर रहे हैं। पढ़िये ग्रीनलैंड के सिनेमा के बहाने साम्राज्यवाद के गहराते संकट पर राकेश कबीर का लेख।

मेरिका की दादागिरी और नवसाम्राज्यवाद ने तेल और जमीनों पर कब्जे को अपनी मुख्य नीति और रणनीति बना लिया है जिसके कारण परम्परागत दोस्त भी दुश्मन की तरह आमने-सामने खड़े होने को मजबूर हैं। दुनिया पर तृतीय विश्व युद्ध का खतरा मंडराने लगा है। ग्रीनलैंड पर अमेरिकी दावे से अमेरिका और यूरोप आमने-सामने हैं। जो यूरोप अमेरिका की दादागिरी में सहमति दिखाता रहा है और अपना दोस्त मानता रहा है, आज डोनाल्ड ट्रम्प की विस्तारवादी नीतियों ने उसके सामने ऐतिहासिक चुनौती खड़ी कर दी है। ‘अगेंस्ट द आइस’ फिल्म के माध्यम से ग्रीन लैंड पर अमेरिकी दावे को सौ साल पहले ही निस्तारित कर दिया गया था परन्तु ट्रम्प की महात्वकांक्षा इस विवाद को फिर जीवित कर रही है।

डेनमार्क का ग्रीनलैंड अभियान और सिनेमा

ग्रीनलैंड मानव रहवास की दृष्टि से एक दुरूह क्षेत्र है। सन 1956 तक वह डेनमार्क का उपनिवेश रहा है और अब भी डेनमार्क के अंतर्गत ही स्वायत्त क्षेत्र है। वहाँ की कुल आबादी लगभग 56 हजार है। वहां कुल दो महीने सूरज दिखाई देता है बाकी दिनों में वहां बहुत ठण्ड होती है और बर्फ जमी रहती है। वहां का औसत तापमान अधिकतम 8 डिग्री सेल्सियस से लेकर माइनस 7 डिग्री सेल्सियस तक होता है। ग्रीनलैंड को केंद्र में रखकर कई फ़िल्में बनी हैं जिनमें मुख्यतः सर्वाइवल फ़िल्में हैं:

जीरो केल्विन (1995), हार्ट ऑफ़ लाइट (1998), इनुक (2010), ग्रीनलैंड (2020), अगेंस्ट द आइस (2022), जर्नी टू ग्रीनलैंड (2025), एक्सपीडिशन : ग्रीनलैंड (2025), ग्रीनलैंड 2: माइग्रेशन (2026)।

डेनमार्क भौगोलिक रूप से उत्तरी अमेरिका महाद्वीप का हिस्सा है लेकिन राजनितिक रूप से यह डेनमार्क के अंतर्गत आता है। अमेरिका ने रूस से सन 1867 में अलास्का क्षेत्र खरीदा था। आज वह ग्रीनलैंड को खरीदने और जबरदस्ती कब्जा करने की बात कर रहा है। ग्रीनलैंड के नक़्शे और भौगोलिक स्थिति, समुद्री सीमा के बारे में डेनमार्क के नाविकों ने कई साहसिक अभियान किए और मुश्किल बर्फीले ध्रुवीय क्षेत्रों में जाकर पता लगाया कि ग्रीनलैंड के बीच में कोई भी पेरी चैनल नहीं है बल्कि ग्रीनलैंड एक अखंड द्वीप है। इस विषय पर सन 1902 से 1904 के बीच लुडविग मिल्स ने 2 साल का अभियान चलाया था जिसमें उन्होंने उत्तरी-पश्चिमी ग्रीनलैंड के समुद्री तट तक पहुंचने की कोशिश की थी। उस रूट का मैप और साइंटिफिक डाटा तैयार किया था जिसके आधार पर पुनः1909 ईस्वी में साहसिक यात्री मिचेल्सन ने ग्रीनलैंड के उन क्षेत्रों का पता लगाने के लिए एक समूह के साथ अभियान शुरू किया और अपने अनुभवों के आधार पर एक किताब लिखी ‘Two Against Ice’ जिसमें दो यात्रियों मिकलसन और इवर्सन के साहसिक यात्रा का विवरण दिया गया है। इस यात्रा वृत्तांत को आधार बनाकर ‘Against The Ice (2022)’ फिल्म बनाई गयी।

एजनर मिकल्शन और इवर्सन ने शन्नो दीप की यात्रा का प्लान किया और ईस्ट ग्रीनलैंड पहुंचकर वहां से ट्रैक बनाते हुए डेनमार्क के साहसिक अभियान के तहत बनाए गए मैप और रूट को फिर से तलाशने और स्थापित करने का प्रयास किया। उसका पहला प्रयास असफल हुआ लेकिन मिकेलसन को अपने ट्रैक पर रास्ते में डेनमार्क के एक मृतक यात्री की मृत देह मिली जिसके पास एक नक्शा और ट्रैक पडा हुआ था जो एक केयर्न जाने का पता देता है।

केयर्न वह संरचना होती है जिसको एक सांकेतिक लैंडमार्क के रूप में साहसिक यात्राएं करने वाले लोग पत्थर एकत्र करके बना देते हैं और उसके अंदर जरूरी सूचनाएं और वस्तुएं छुपा देते हैं ताकि बाद में आने वाले यात्रियों को उसे रूट के बारे में जरूरी जानकारियां मिल सकें। मिकलसन और इवर्सन दोनों यात्री स्लेज की गाड़ियों के माध्यम से आगे बढ़ते हैं लेकिन रास्ते में बर्फीले तूफानों और कठिन परिस्थितियों में स्लेज खींचने वाले दो कुत्ते मारे जाते हैं। शेष बचे कुत्ते मरे हुए कुत्तों का मांस खाकर किसी तरह से जीवित रहते हुए आगे बढ़ते हैं। तीन महीने की मुश्किल यात्रा के बाद वह मृतक यात्री के पास प्राप्त नक़्शे के माध्यम से उसके बनाए हुए केयर्न तक पहुंच जाते हैं। वहां जाकर उन्हें पता चलता है कि पेरी चैनल का कोई अस्तित्व नहीं है जिसके आधार पर अमेरिका ग्रीनलैंड पर अपना दावा करता रहता है। इसके उलट ग्रीनलैंड एक अखंड द्वीप है और अमेरिका का इस आर्कटिक क्षेत्र में कोई दावा नहीं बनता। अपने अभियान से लौटते वक्त जब निकालसन और इवर्सन को यह लगता है कि वह वापस डेनमार्क तक नहीं पहुंच सकेंगे तो पहले वाले केयर्न से 200 मील पहले एक और केयर्न बनाकर अपनी रिपोर्ट और नक़्शे को उसमें सुरक्षित रख देते हैं। दोनों यात्री बड़ी मुश्किल से अपने समूह के द्वारा बनाए गए बेस कैंप ‘अलाबामा’ तक लौट कर आते हैं।  बेसकैम्प में कोई नहीं होता क्योंकि उनकी टीम के बाकी लोग उन्हें छोड़कर वापस डेनमार्क जा चुके होते हैं।

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फिल्म ग्रीनलैंड का एक दृश्य

दोनों साहसिक और देशभक्त यात्री दो सर्दियों का मौसम (लगभग 800 दिन) बेस कैम्प में बने छोटे से केबिन में गुजारते हैं। बर्फीले तूफानों से मुकाबला करते हुए, जानवरों के हमले से किसी तरह बचते हुए मिकलसन और इवर्सन अपने द्वारा बनाए गए केयर्न तक जाकर वहां रखी सूचना और प्रपत्र वापस लाने की कोशिश करते हैं। दूर-दूर तक सफ़ेद बर्फ की चादर से ढंकी हुई जमीन, जीवन में कोई रंग नहीं, भावनात्मक अपनेपन की कमी में दोनों अपनी पत्नी और प्रेमिका को याद करते हैं। कभी-कभी उनकी हरकतें पागलों जैसी हो जाती हैं।  निराशा से भरे निरुद्देश्य समय में वे एक बार दुश्मनों की तरह एक-दूसरे से इस तरह लड़ पड़ते हैं कि हत्यारे बन जाएँ। टीम कैप्टन और प्रशिक्षित ट्रेकर मिकलसन के सपनों में उनकी पत्नी की भूमिका में हीडा रीड आती हैं जिनसे भौतिक दूरी उन्हें और परेशान कर जाती है। दोनों यात्री अपने देशहित में किये गए कार्य के महत्व को एक दूसरे से चर्चा करते हुए कहते हैं कि डेनमार्क के लिए जान भी चली जाये तो भी उनके योगदान को इतिहास याद रखेगा।  ऐसा सोचकर गौरवान्वित और प्रेरित होते हैं।

डेनमार्क सरकार अपने खोजी दल की चिंता करते हुए उन्हें रेस्क्यू करने के लिए एक टीम को बेस कैंप भेजती है तो अपने दोनों यात्रियों को न पाकर उन्हें ऐसा लगता है कि वे बेस कैंप तक वापस नहीं आ सके। ऐसा मान लिया जाता है कि या तो वे अभी भी अपनी यात्रा में है या मर गए होंगे। सन 1912 में निकलसन और इवर्सन को डेनमार्क सरकार द्वारा भेजा गया दूसरा बचाव दल ग्रीनलैंड से सुरक्षित निकालकर अपने देश वापस लाता है। देश में उनका महानायकों की तरह स्वागत और सम्मान होता है। मिकलसन और इवर्सन की खोज और प्रमाणों के बाद अमेरिका ने भी ग्रीनलैंड को एक अखंड द्वीप मानते हुए उसे डेनमार्क का क्षेत्र मान लिया।

ट्रम्प के समय में ग्रीनलैंड

मिकलसन और इवर्सन की मेहनत से डेनमार्क ने ग्रीनलैंड के झगड़े को निपटा लिया था लेकिन उसके 114 साल बाद डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए। ट्रम्प घोर अहंकारी व्यक्ति हैं और 20 जनवरी 2025 को दुबारा राष्ट्रपति बनने के बाद सबको सबक सिखाने के मूड में रहते हैं। वर्ल्ड इकनोमिक फोरम कि दावोस में हो रही बैठक में कनाडा के प्रधानमन्त्री मार्क कार्नी ने (21 जनवरी 2026) डोनाल्ड ट्रम्प की विस्तारवादी नीतियों की जमकर आलोचना की, ‘हमें याद दिलाया जाता है कि हम महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा के युग में जी रहे हैं। नियमों पर आधारित व्यवस्था कमजोर पड़ रही है। शक्तिशाली देश वही करते हैं और कमजोरों को सहना पड़ रहा है…हम जानते थे कि नियमों पर आधारित अन्तराष्ट्रीय व्यवस्था की कहानी आंशिक रूप से झूठी थी। सबसे शक्तिशाली देश सुविधा होने पर खुद को छूट दे लेते हैं। व्यापार नियम असमान रूप से लागू होते हैं और अंतर्राष्ट्रीय कानून की कठोरता अभियुक्त या पीड़ित की पहचान पर निर्भर करती है’ (21 जनवरी 2026 बीबीसी न्यूज़)।

डेनमार्क के आरहुस विश्वविद्यालय में प्रोफेसर डॉ विवेक कुमार शुक्ला ने मुझसे बातचीत में (21 जनवरी 2026) कहा कि, ‘ट्रम्प अपने पूंजीपति दोस्तों के व्यापार को बढ़ाने और अमेरिकी विस्तारवाद को बढ़ाने के लिए ऐसी बचकानी हरकते कर रहे हैं कि आगे आने वाले कई वर्षों तक दुनिया अमेरिका को गंभीरता से नहीं लेगी।’ नीदरलैंड के अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर कौशलेश लाल न्याय के प्रहरी चैनल को इंटरव्यू देते हुए 25 जनवरी 2026 को यही बात कहते हैं कि ‘ट्रम्प की रोज-रोज बदलती गैर ज़िम्मेदार बयानबाजी का असर यह होगा कि दुनिया के देश अब गंभीरता से लेना छोड़ देंगे।’

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पूरी दुनिया में नोबेल पुरस्कारों को बहुत ही सम्मान के साथ देखा जाता रहा है, परन्तु 2025-26 में ट्रम्प के ओछेपन की वजह से इस पुरस्कार का मान घटता-सा लग रहा है। कुछ देशों को लगता है कि अमेरिका उनके देश में लोकतंत्र स्थापित करने में मदद करेगा, वामपंथ और तानाशाही को खत्म कर लोकशाही की स्थापना करने में मदद करेगा जो कि सबसे बड़ा भ्रम और झूठ है। वर्ष 2025 में वेनेजुएला की जनतंत्र समर्थक नेता मारिया कोरिना मचाडो को शांति का नोबल पुरस्कार दिया गया था। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अमेरिकी सेना ने 3 जनवरी 2026 को गिरफ्तार कर लिया। तानाशाह मादुरो की गिरफ्तारी से खुश होकर 15 जनवरी 2026 को मरिया कोरिना मचाडो ने अपना नोबल पुरस्कार अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प को सौंप दिया। नोबल पुरस्कार अहस्तांतरणीय होता है इस कारण दोनों की विश्व भर में आलोचना हुई।

वेनेजुएला के तेल भंडारों पर कब्ज़ा और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी (3 जनवरी 2026) के बाद ट्रम्प ने ग्रीनलैंड पर अपना दावा ठोंक दिया। डेनमार्क और ग्रीनलैंड में उनके इस कृत्य का खूब विरोध हुआ। दिनांक 19 जनवरी 2026 को ह्वाइट हाउस ने ट्रम्प की तरफ से नार्वे के प्रधानमंत्री को एक पत्र जारी किया जिसका सारांश यह था कि उन्हें शांति प्रयासों के लिए नोबल नहीं दिया गया इसलिए यदि कहीं युद्ध होता है तो उसको रोकने की ज़िम्मेदारी अब उनकी नहीं होगी। पत्र का मज़मून निम्नलिखित है-

प्रिय जोनास,

यह देखते हुए कि आपके देश ने 8 से ज़्यादा युद्ध रोकने के लिए मुझे नोबेल शांति पुरस्कार नहीं दिया, अब मुझे सिर्फ़ शांति के बारे में सोचने की कोई ज़िम्मेदारी महसूस नहीं होती, हालाँकि यह हमेशा सबसे ज़रूरी रहेगा, लेकिन अब मैं यह सोच सकता हूँ कि यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका के लिए क्या अच्छा और सही है। डेनमार्क उस ज़मीन को रूस या चीन से नहीं बचा सकता और वैसे भी, उनके पास “मालिकाना हक” क्यों है? कोई लिखित दस्तावेज़ नहीं हैं, बस सैकड़ों साल पहले एक नाव वहाँ उतरी थी, लेकिन हमारी नावें भी वहाँ उतरी थीं। मैंने NATO के गठन के बाद से किसी भी दूसरे व्यक्ति से ज़्यादा NATO के लिए काम किया है, और अब, NATO को यूनाइटेड स्टेट्स के लिए कुछ करना चाहिए। जब ​​तक हमारे पास ग्रीनलैंड पर पूरा और कुल कंट्रोल नहीं होगा, तब तक दुनिया सुरक्षित नहीं है।

 ऐसा पहली बार हुआ है कि अमेरिका जैसे मजबूत और लोकतांत्रिक देश के अति उत्साही और अपनी तरह के अकेले जीव राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नॉर्वे के प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर नोबेल प्राइज न दिए जाने के कारण दुनिया में शांति का ठेका लेने से मना किया हो। ट्रम्प की ऐसी हरकतें लगातार चलती रहती हैं। अमेरिका यह कैसे सोच सकता है कि वह दुनिया में शांति का ठेकेदार है जबकि ज्यादातर देशों में विद्रोह करवाने से लेकर, चुनी हुई और स्थापित सरकारों को अस्थिर करके गृहयुद्ध में धकेलकर उन देशों में अशांति फैलाने, उथल-पुथल मचाने का काम अमेरिका द्वारा प्रायोजित होता है। यह अत्यंत दुखद है कि आज के दौर में संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के लगातार कमजोर होते जाने से एक देश की दादागिरी और मनमानी बढ़ती जा रही है जिसकी चर्चा कनाडा के प्रधानमन्त्री और फ्रांस के राष्ट्रपति ने दावोस में की है।

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प रोज नए दावे करके नए-नए देशों और द्वीपों के ऊपर अपना अधिकार जताते हैं और उन पर जबरदस्ती कब्जा कर लेने या उनकी जमीन को खरीद लेने की बात करते हैं। नव साम्राज्यवादी दौर में मजबूत देश कमजोर देशों की जमीन और संसाधनों पर कब्जा करने की नीयत से स्थापित सरकारों को उखाड़ फेंकने और डराने धमकाने का काम करते है। अमेरिका इस तरह की हरकतों में सबसे आगे है। 90 के दशक में सोवियत संघ के बिखरने के बाद अमेरिका दुनिया का सबसे मजबूत देश बन गया और पूरा विश्व एक ध्रुवीय विश्व व्यवस्था में माना जाने लगा। इधर पिछले चार वर्षों से रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने अपने पड़ोसी देश यूक्रेन से युद्ध छेड़ रखा है क्योंकि यूक्रेन रूस के खिलाफ जाकर नाटो में शामिल होकर रूस को चुनौती देना चाहता था। यह भी अमेरिका और यूरोपीय देशों की चाल थी। पूरी दुनिया जानती है कि अमेरिका मध्य एशिया, एशिया और अफ्रीकी महाद्वीप के विभिन्न देशों जैसे इराक, ईरान, फिलिस्तीन, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, सीरिया, लेबनान, बांग्लादेश पर तानाशाही और परमाणु हथियार विकसित करने का आरोप लगा करके वहां पर चलने वाली राज्य व्यवस्थाओं को युद्ध और आक्रमण के माध्यम से या विद्रोही संगठनों को भड़काकर अस्थिर कर चुका है। अमेरिका का इस तरह की गतिविधियों का लम्बा इतिहास रहा है।

जनवरी 2026 में सबसे खराब बात अमेरिका की इन अमानवीय हरकतों और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करने, दूसरे देशों की संप्रभुता में हस्तक्षेप करने वाली गतिविधियों को आंख मूंद कर देखने वाले और उसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन करने वाले यूरोपियन देश आज खुद ही अमेरिका के निशाने पर आ गए हैं।  यूरोप के ज्यादातर देश अमेरिका की अगुवाई वाले संगठन नाटो के सदस्य हैं जो इस सिद्धांत पर कार्य करते हैं कि यदि नाटो के सदस्य देशों पर कोई बाहरी देश आक्रमण करता है तो सभी सदस्य देश मिलकर इसका जवाब देंगे ताकि यूरोप और अमेरिका के देशों की संप्रभुता पर कोई आंच न आने पाए। वर्ष 2026 के आरम्भ में अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर जो अपना दावा किया है और उस पर जबरदस्ती या खरीद कर कब्जा कर लेने की जो बात कही है उसकी प्रतिक्रिया में फ्रांस, जर्मनी और डेनमार्क और ग्रीनलैंड जैसे यूरोपीय देशों ने विरोध जताते हुए अपनी सेनाएं भी ग्रीनलैंड भेजी हैं। अब देखना यह है कि नाटो संगठन किस तरह इस समस्या का सामना करते हैं। अमेरिका हमेशा से अपने सहयोगी रहे देशों से कैसे पेश आता है।

तो अंत में क्या लगता है?

अमेरिका और यूरोप के देशों ने सोवियत संघ के टूटने के बाद उदारीकरण निजीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं के माध्यम से पूरी दुनिया को एक ग्लोबल विलेज बनाने और सभी तरह की समस्याओं के समाधान का दावा किया था। उस दौर में अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं विश्व व्यापार संगठन, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक का महत्व बढ़ा। दुनिया भर में पूंजी और श्रम का निर्बाध प्रवाह हो सके इसके लिए यूरोप और अमेरिका ने जोर-शोर से इन प्रक्रियाओं का प्रचार प्रसार किया परंतु जैसा कि सैमुअल पी हंटिंगन ने अपने लेख क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन  में यह दावा किया था कि आने वाले समय में पश्चिम और पूर्व के देशों के बीच उनके धार्मिक और निजी पहचान के आधार पर युद्ध होंगे। लड़ाइयां होगी। आज दुनिया के देशों के बीच बहुत कुछ वैसा ही होता दिख रहा है। हालांकि यह सभ्यताओं का नहीं बल्कि साम्राज्यवाद द्वारा पैदा किया गया टकराव है।

डेनमार्क के पूर्व उपनिवेश और वर्तमान स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड द्वीप की बात की जाए तो उसकी रणनीतिक स्थिति और प्राकृतिक संसाधनों पर अमेरिका की गिद्ध दृष्टि पड़ गयी है। अमेरिकी राष्ट्रपति ग्रीनलैंड पर अपना मालिकाना हक चाहते हैं। खरीदना या पट्टे पर लेना चाहते हैं ताकि वहां के यूरेनियम और अन्य तत्वों का दोहन कर सकें। अमेरिका ने ग्रीनलैंड में अपने सैनिक भी भेज दिए हैं। ग्रीन लैंड और डेनमार्क के लोग अमेरिका के इस कदम का जमकर विरोध कर रहे हैं।

 कुछ पारिभाषिक शब्दावली

ग्रीनलैंड

डेनमार्क का एक स्वायत्त प्रदेश जो आर्कटिक और अटलांतिक महासागर के बीच उत्तरी अमेरिका महाद्वीप का भूभाग है जिसकी थोड़ी-सी सीमा कनाडा से लगती है। आजकल अमेरिका इस द्वीप पर अपना दावा ठोंककर नया विवाद खड़ा कर रहा है।

केयर्न

निर्जन प्रदेशों में मानव निर्मित पत्थर की संरचनाएं जिनमें जरूरी सूचनाओं को सुरक्षित करके रखा जाता था. संकेतक चिन्हों की तरह इन्हें प्रयोग किया जाता था।

पेरी चैनल

पेरी चैनल एक काल्पनिक समुद्री धारा थी जो पूरब से पश्चिम की तरफ बहते हुए ग्रीनलैंड के सुदूर उत्तर में स्थित पेरी लैंड को दो भागों में बांटती थी। रोबेर्ट पेरी ने अपने एक नक़्शे में इसे प्रदर्शित किया था।

संदर्भ 

Pearson, Michael () climate, culture and ice: What Arctic Cinema can Tell us about a Changing World, on https://iac.gatech.edu. 

Leclerc, Gabija (2025) Greenland: Caught in the Arctic geopolitical contest, on https//:europarl.europa.eu, on October 2025 

Lee, Benjamin (2022) Against the Ice Review-Simple but sturdy Netflix survival drama, on https://www.theguardian.com. 

 

 

डॉ. राकेश कबीर
डॉ. राकेश कबीर
राकेश कबीर जाने-माने कवि-कथाकार और सिनेमा के गंभीर अध्येता हैं।

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