अगर हम उच्च शिक्षण संस्थाओं-विश्वविद्यालयों, मेडिकल कालेजों, तकनीकी कालेजों और अन्य व्यावसायिक संस्थानों में, जहाँ की डिग्री से उच्च आय की नौकरियां और उच्च सामाजिक प्रस्थिति हासिल होती है और सामाजिक गतिशीलता बढ़ती है, के आंतरिक परिवेश का अध्ययन करें तो वहां कई स्तरों पर भेदभाव देखने को मिलता है। इस भेदभाव को समझने के लिए कैम्पस के प्रमुख स्टेकहोल्डर विद्यार्थी, अध्यापक और शिक्षणेत्तर कर्मचारियों और उनके संगठनों से बातचीत कर उनका मत लिया जाना बहुत ही आवश्यक है।
क्या है कैम्पस असमानता
हैदराबाद विश्विद्यालय के दलित छात्र रोहित वेमुला ने कैम्पस में उत्पीडन से तंग आकर सन 2016 में आत्महत्या कर ली थी। मेडिकल छात्रा डॉ पायल तड़वी ने भी 2019 में अपने सहपाठियों के उत्पीड़न से दुखी होकर आत्महत्या कर ली थी। रोहित और पायल की माताओं राधिका वेमुला और आबिदा सलीम तड़वी ने सन 2019 में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर किया था ताकि कैम्पस के भीतर जाति आधारित भेदभाव को समाप्त किया जा सके क्योंकि सन 2012 के यूजीसी के विनियम ऐसा करने के लिए अपर्याप्त थे। जनवरी 2026 में जब नए विनियम लागू करने की बात हुई तो पूरे देश में उच्च जाति-वर्ग के लोगों ने इसका विरोध आरम्भ कर दिया. साथ ही इस विनियम के समर्थन में देश भर के कैम्पसों में आन्दोलन अभी भी चल रहे हैं।

इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने नए रूल्स पर स्थगन लगा दिया है। वास्तव में उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता का संवर्धन विनियम 2026 कैम्पस के भीतर व्याप्त गहरे संस्थागत सामाजिक अन्याय के विरुद्ध एक सुदृढ़, दीर्घकालिक और
ऐतिहासिक असमानता को समाप्त करने की दिशा में एक ठोस प्रयास है। इस विनियम के माध्यम से भेदभाव आधारित व्यवहार को परिभाषित करते हुए संस्थानों की जवाबदेही को दंडनीय श्रेणी में लाने का प्रावधान करता है. इस विनियम के माध्यम से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की भूमिका को बढ़ाकर सामाजिक न्याय के संरक्षक के रूप में कर दिया है। कैम्पस का वातावरण मानवीय हो और सबके लिए बराबर हो यह अनिवार्य पहलू है। इसी वर्ष यूजीसी द्वारा जारी आंकड़ों में यह बताया गया था कि विश्विद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानो में जाति आधारित भेदभाव के मामलों में 118 प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई है। भारत जैसे विविधतापूर्ण लोकतांत्रिक देश में जातीय, साम्प्रदायिक या अन्य तरह की असमानता और उत्पीडन को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है. अतः नए विनियमों को तार्किक ढंग से लागू करना होगा ताकि किसी भी विद्यार्थी का न तो उत्पीड़न हो और न ही किसी को आत्महत्या करनी पड़े।

संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था यूनेस्को शिक्षण संस्थाओं में एसडीजी 4 के तहत बराबरी को लक्ष्य मानते हुए वर्ष 2030 तक सभी के लिए निःशुल्क, समावेशी और एक समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को प्रोत्साहित करती है। यूनेस्को लैंगिक भेदभाव को कम करते हुए, हाशिये के समूहों को मदद, मूलभूत संरचनाओं को उच्चीकृत करते हुए कैंपस के अंदर सुरक्षित, भेदभाव रहित शिक्षण का वातावरण तैयार करने पर केन्द्रित करता है। जॉन बेकर (John Becker) ने अपनी पुस्तक ‘Arguing for Equality’ (1987) में एक समतामूलक समाज बनाने के लिए एक बहुत ही विस्तार से लिखा है। वे एक ऐसे समाज और देश की परिकल्पना करते हैं जहाँ गरीबी न हो, कोई फुटपाथ पर और पुल के नीचे न सोता हो, कोई भी व्यक्ति कूड़े में अपना भोजन न खोजता हो, सबके पास अपना एक अच्छा घर हो, जीवन का एक स्तर हो, गरीब और अमीर के बीच भेदभाव न हो, लोगों को ऐसे काम जबरदस्ती न करने पड़ें जो उन्हें नापसंद हों, लोग सार्थक और संतुष्टिपूर्ण कार्य करते हों, किसी ख़ास वर्ग के होने के कारण किसी से घृणा या संरक्षण न मिले, किसी को जबरदस्ती झुकना न पड़े, महिला और पुरुष दोनों एक दूसरे को बराबरी से सम्मान करते हों, चमड़ी का रंग उनके जीवन में अप्रासंगिक हो, क्षेत्रीयता और
राष्ट्रीयता के कारण किसी के साथ भेदभाव न हो, दिव्यांग या भिन्न लैंगिक रुचि के कारण उनके साथ भेदभाव न हो तो उस समाज को समतामूलक समाज कहा जा सकता है। (बेकर 1987:3)।
जान बेकर शैक्षिक समानता के बारे में एक सवाल का जवाब देते हुए लिखते हैं, समतावादी शिक्षा का उद्देश्य न तो सभी को एक जैसा बनाना है, और न ही सभी को योग्यता के एक ही स्तर पर लाना है; बल्कि इसका उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमताओं का विकास ऐसे ढंग से करने के लिए प्रोत्साहित करना है जो उसके लिए संतोषजनक और परिपूर्ण हो। अतः सैद्धांतिक रूप से यह इस बात के प्रति प्रतिबद्ध है कि अलग-अलग क्षमताओं वाले लोगों के साथ अलग-अलग ढंग से व्यवहार किया जाए (Becker1987:86)।
समाजशास्त्री जॉन राल का न्याय का विभेदक सिद्धांत भी शिक्षा में असमानता और भेदभाव पर महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत करता है। अपनी पुस्तकअ थ्योरी ऑफ़ सोशल जस्टिस में वे हाशिये के वंचित लोगों के बारे में ‘justice as fairness’ के अंतर्गत अवसर की समानता, एवं विभेदक सिद्धांत (difference principle) की वकालत करते हैं। राल का यह तर्क है कि एक न्यायप्रिय समाज को यह सुनश्चित करना चाहिए कि एक व्यक्ति के शिक्षा प्राप्त करने के अवसर इस बात से तय नहीं होने चाहिए कि वह किस वर्ग या पृष्ठभूमि से है।
थामस पिकेटि (Thomas Piketty) ने अपनी पुस्तक ‘A Brief History of Equality’ (2021) में विस्तार से विभिन्न प्रकार की असमानता और समानता के लिए किये जान वाले उपायों पर पर लिखा है। शैक्षिक न्याय (educational justice) के बारे में उनका कहना है कि ज्ञान का प्रसार हमेशा से ही वास्तविक समानता को संभव बनाने का एक मुख्य साधन रहा है – फिर चाहे किसी की पृष्ठभूमि कुछ भी क्यों न हो। लेकिन समस्या यह है कि, लगभग हर जगह, अवसरों की समानता के संबंध में दिए गए आधिकारिक बयानों और वंचित वर्गों को झेली जाने वाली शैक्षिक असमानताओं की वास्तविकता के बीच एक बहुत बड़ा अंतर मौजूद है। (Piketty 2021:176).

यूरोप और अमेरिका के विश्विद्यालयों में उच्च शिक्षा के लिए प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या का विश्लेषण करते हुए पिकेटि बताते हैं कि कम वेतन पाने वाले माता-पिता के बच्चे कम संख्या में उच्च शिक्षा में जा पाते हैं और जो प्रवेश ले
भी लेते हैं वे सरकारी अनुदान पर निर्भर कम गुणवत्ता वाले विश्वविद्यालयों में जाते हैं जबकि उच्च वेतन पाने और ज्यादा टैक्स देने वाले पेरेंट्स के बच्चे उच्च शिक्षा के बेहतरीन निजी कैम्पसों में विशेषीकृत कोर्सेज में प्रवेश लेकर डिग्री के उच्च आय वाली नौकरियां पाते हैं।
स्कूल के अंदर भेदभाव
प्राइमरी से यूनिवर्सिटी तक अंग्रेजी राज से आजाद होने के बाद और भारतीय संविधान के लागू के होने के बाद स्कूलों में सभी जाति-धर्म के बच्चों को स्कूलों में प्रवेश का अधिकार, शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिला। बच्चे स्कूलों की तरफ गए लेकिन परम्परागत प्रभु वर्ग द्वारा इस परिवर्तन को स्वीकार कर लेना आसान नहीं था। अध्यापक उच्च जाति-वर्ग के थे वे कमजोर जाति-वर्ग के बच्चों को प्रवेश न देने, अलग बैठने, जातिसूचक गालियाँ देने, मारने-पीटने, साफ़-सफाई का काम करवाने, कम नम्बर देने, फेल करने, माँ बाप को सलाह देकर प्राइमरी या जूनियर क्लास के बाद पढ़ाई बंद करवाकर काम पर लगा देने, शादी करवा देने, बाहर कमाने भेज देने जैसे कृत्य करते रहे। मेरे पिताजी का तो नाम तक बदल दिया मुंशी जी ने क्योंकि उनके नाम का कोई विद्यार्थी कैसे हो सकता था स्कूल में। अपने पिताजी की पीढ़ी के पढ़े लिखे लोगों से पचास-साठ साल पहले की दास्तान पूछिए उनका अनुभव भी यही होगा।
हालात धीरे-धीरे बदले। स्कूलों में सभी तबके के विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी, कटुता घटी दोनों तरफ से स्वीकार्यता भी बढ़ी, नौकरियां भी मिली लेकिन संख्या बहुत कम रही। मिड डे मील (15 अगस्त 1995) के आरम्भ होने के बाद स्कूलों में रसोइयों की बहाली के बाद जातिवाद का नया गन्दा स्वरूप दिखा। योजना के आरम्भ होने के 30 साल बाद भी अनुसूचित जाति का रसोइया नियुक्त होने पर अन्य जातियों के बच्चे उनके हाथ का भोजन करने से मना कर देते हैं। गुठली लड्डू फिल्म दो दोस्तों के माध्यम से प्राइमरी स्कूल स्तर पर व्याप्त छुआछूत और भेदभाव को प्रदर्शित करती है कि किस तरह एक प्रतिभावान छात्र की राह में जातीय पहचान बाधा बनकर आती है।
दिनांक 7 अगस्त, 1990 को मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू होने के बाद आरक्षण के पक्ष और विपक्ष में आन्दोलन हुए, कटुता फिर बढ़ी। सन 2006 में केन्द्रीय शैक्षिक संस्थान (प्रवेश में आरक्षण) अधिनियम के तहत 93वां संविधान संशोधन हुआ जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अंततः 10 अप्रैल 2008 को प्रभावी रूप से लागू हुआ. पूरे देश में कैम्पसो से लेकर सडक तक पक्ष और विपक्ष में आन्दोलन हुए। उच्च शिक्षा प्राप्त अन्य पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोग विश्वविद्यालयों में पढने के बाद शिक्षक बनने के प्रयास में लगे, कुछ सफल भी हुए।विश्वविद्यालयों में कई पीढ़ियों से शिक्षक बनते आ रहे लोगों ने यहाँ भी ‘नॉट फाउंड सूटेबल’ का मारक हथियार ईजाद करके शिक्षक बनने का रास्ता रोकने लगे। घृणा इतनी बढ़ी कि स्वनामधन्य दिल्ली-जेएनयू के बड़े प्रोफेसर ने अपने एक अत्यंत होनहार शोध छात्र को खुद ही नॉट फाउंड सूटेबल करके आ गये। वे महान प्रोफेसर खुद को सबसे बड़ा प्रगतिशील घोषित कर किताबें लिखते हुए मंच घेरे रहते हैं। इंटरव्यू, वाइवा, होस्टल आवंटन से लेकर परीक्षा में नम्बर देने तक प्रत्येक स्तर पर कमजोर पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों के साथ भेदभाव किये जाने की शिकायतें देश भर से आती रहती हैं।
माध्यमिक शिक्षा और भेदभाव
जमीन का मालिकाना हक किसानों को देकर जमींदारी का विनाश हुआ लेकिन नयी जमींदारी की कई व्यवस्थाएं लोगों ने खोज ली। शहर में जमींदारी खत्म नहीं हुई और ज्यादातर स्कूल शहरों में थे। जिनके पास पैसा था और जमीनें थीं और शिक्षित लोग थे उन्होंने स्कूल कॉलेज खोले। मैनेजमेंट कमेटी बनाकर अपनी पसंद, परिवार और बिरादरी के लोगों को शिक्षक, और गैर-शिक्षक पदों पर नियुक्ति करने के उपरान्त मान्यता लेकर सरकार से आर्थिक सहायता प्राप्त कर मजे से जमींदार कीतरह व्यवहार करने लगे। चयन आयोगों से चयनित होकर जॉयनिंग देने गए अध्यापकों से मैनेंजमेंट के जमींदार शोषण का कोई तरीका नहीं छोड़ते। प्रमोशन में भेदभाव, प्रिंसिपल की नियुक्ति में जातीय भेदभाव इन मैनेजमेंट कॉलेजों में आम बात है।
शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी फ़िल्में
स्कूल डेज (1988), द बॉयज ऑफ बराका (2005), ट्विंकल ट्विंकल लिटल कास्ट (2009), आरक्षण (2011), द डेथ ऑफ मेरिट (2011), फ़ंड्री (2014), टीच अस ऑल (2017), अनलाइकली (2018), ओलेना (1994), हाइयर लर्निंग (1995), गुड विल हंटिंग 1997, रूबी ब्रिज 1998, द क्लास 2008, द पेपर क्लास 1973. स्कूल डेज 1988, हॉस्टल 2011, द डेथ ऑफ मेरिट 2011, फ़ंद्री 2014, आरक्षण 2011, ट्विंकल ट्विंकल लिटल कास्ट 2009, टीच अस ऑल 2017, अनलाइकली 2018, द बॉयज ऑफ बराका 2005, द पेपर क्लास 1973, Olenna 1994, हाइयर लर्निंग 1995, गुड विल हंटिंग 1997, रूबी ब्रिज 1998, द क्लास 2008. तारे जमीन पर (भारत 2007-डिस्लेक्सिक), द क्लास (फ़्रांस 2008), ऑन द वे टू स्कूल (केन्या2013), 3 इडियट्स (भारत 2009), नॉट वन लेस (चीन1999), द फर्स्ट ग्रेडर (केन्या2010), स्कूलिंग द वर्ल्ड (लदाख भारत 2010), अ स्माल एक्ट (केन्या/स्वीडन2010), द नेबरहुड स्टोरीटेलर (सीरिया/जॉर्डन2022) टू सर विथ लव (इंग्लैंड1967), एडूकेटिंग रीटा 1983, स्टैंड एंड डिलीवर (1988), डेड पोएट्स सोसाइटी (1989 अमेरिका), डेंजरस माइंड (1995), द मिरर (ईरान 1997), द कोरस (फ़्रांस2004), अकीला एंड बी (अमेरिका और नाइजीरिया2006), द रोन क्लार्क स्टोरी (2006), फ्रीडम राईटर्स (2007), द ग्रेट डिबेटर्स (2007), प्रेशियस 2009, द लास्ट लेसंस (भारत), द आर्ट टीचर (साउथ कोरिया), हु केयर्स अबाउट केल्सी
2012, रेस टू नो हवेयर (2009), लिन ऑन मी (1989), द सोशल नेटवर्क’ (2010), पिस्तुल्या (2012), गर्ल्स राइज़िंग (2013), थ्योरी ऑफ एवरीथिंग (2014), अबाउट अ टीचर (2019), गुल मकई (2020 – मलाला की बायोपिक). अप फ्रॉम स्लेवरी (2011)।

शिक्षा के लिए भेदभाव के शिकार रहे महान लोग
मक्लौरेन ने सन 1948 में ओक्लाहोमा विश्वविद्यालय में पहले अश्वेत शोध छात्र के तौर पर प्रवेश लिया था। उनके लिए सबसे अलग, एक कोने में श्वेत विद्यार्थियों से अलग बैठने की व्यवस्था की गयी थी। लाइब्रेरी और कैफेटेरिया में भी उनके बैठने के लिए अलग व्यवस्था की गयी थी। इन सब के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई बहुत अच्छे से की और उत्कृष्ट उपलब्धियां अर्जित की।
उनके मुकदमे मक्लौरेन वर्सेज ओक्लाहोमा स्टेट रीजेन्ट्स (1950) के निर्णय से उच्च शिक्षा में ‘separate but equal’ सिद्धांत का प्रतिपादन हुआ। वह पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रोफेसर बने। आज उसी विश्वविद्यालय के सामुदायिक केंद्र में मक्लौरेन के नाम से एक मेमोरियल बना है। डेविड डब्लू. लेवी ने उनकी जीवनी ब्रेकिंग डाउन बैरियर्स : जार्ज मक्लौरेन एंड द स्ट्रगल टू एंड सेग्रेगेटेड एजुकेशन (2020) नाम से लिखा। भारत देश में डॉ भीमराव आंबेडकर ने शिक्षा प्राप्त करने के लिए बहुत ही संघर्ष किया। वे जातीय विषमता और भेदभाव का शिकार हुए लेकिन इंग्लैण्ड और अमेरिका में उच्च शिक्षा प्राप्त कर भारतीय संविधान के निर्माता बने और सभी तरह के भेदभाव और विषमताओं से निपटने के लिए क़ानूनी प्रावधान किये। डॉ आंबेडकर के जीवन पर डॉ ज़ब्बार पटेल की फिल्म डॉ बाबा साहब आंबेडकर (2000) शिक्षा के लिए उनके किये गए त्याग और संघर्ष को प्रभावी ढंग से चित्रित करती है। भारत में प्राइमरी से लेकर विश्वविद्यालय तक में ऐसे भेदभाव के शिकार और शिक्षा के लिए संघर्ष करने वाले लोग मिल जायेंगे जिनके अनुभवों से यह बात साबित हो सकती है कि जातीय स्तरीकरण के कारण इस देश में कितने लोगों को विषमताओं और भेदभावों का सामना करना पड़ता है।
समाज बनाम उच्च शिक्षा के कैंपस
जब हम स्कूल कॉलेज और विश्वविद्यालय में समानता की बात करते हैं तो भारतीय समाज में व्याप्त जातीय धार्मिक सांप्रदायिक और वर्गीय भेदभाव की भांति कैम्पस के भीतर भी भेदभाव होते हैं। अगर हम शिक्षण संस्थानों के भीतर भेदभाव को समझने की कोशिश करें तो उसे तीन आधारों पर समझना होगा 1. जातीय 2. लैंगिक और 3. वर्गीय आधार। इसी तरह विश्वविद्यालय या किसी भी शिक्षण संस्थानों से जुड़े तीन स्टेकहोल्डर्स हैं 1. विद्यार्थी 2. प्रोफेसर और 3. शिक्षणेत्तर कर्मचारी। पिछले दो-तीन दशकों में भारतीय विश्वविद्यालयों और अन्य कैम्पसों में आए बदलावों और नई शिक्षा नीति के तहत घटित हुए परिवर्तनों का आकलन करें तो हम पाते हैं कि लिंगदोह समिति (2005) की सिफारिशों के लागू होने के बाद विश्वविद्यालयों और डिग्री कॉलेजों में छात्र संघ के चुनाव पर रोक लग गई, जिसके कारण विद्यार्थियों के सामूहिक हितों को उठाने वाले संगठनों का अभाव दिखता है। परिणामस्वरूप क्लासरूम, परीक्षाओं और हॉस्टल से जुड़े मुद्दों पर छात्र हितों की बात करने वाले चुने हुए पदाधिकारी कॉलेज और यूनिवर्सिटी कैंप से गायब हो चुके हैं, लेकिन अध्यापकों का शिक्षक संघ कहीं ना कहीं अपने मुद्दों को लेकर कॉलेज प्रिंसिपल्स और विश्वविद्यालय के कुलपतियों पर दबाव बनाए रहते हैं और कैंपस का माहौल बहुत हद तक उनकी वजह से डेमोक्रेटिक बना रहता है। इसी तरह से गैर-शैक्षिक कर्मचारियों के संगठन भी विद्यमान हैं जो अपने हित से जुड़े मुद्दों के लिए कॉलेज प्रशासन और कुलपतियों से बारगेनिंग करने की स्थिति में रहते हैं। वे धरना प्रदर्शन भी कर लेते हैं और अपनी मांगों को मनवाने के लिए दबाव भी बना लेते हैं। लेकिन विद्यार्थियों के संगठन न होने के कारण उनके स्तर पर यह संभव नहीं है। अगर विद्यार्थियों के लिए हॉस्टल आवंटन, पीएचडी में एडमिशन, इंटरव्यू और वाइवा में नंबर पाने की बात हो, किसी डिपार्टमेंट में निकली प्रोफेसर की भर्तियों में गड़बड़ी की बात हो तो वहां पर उनके साथ जातीय, वर्गीय, लैंगिक और धार्मिक कई आधारों पर भेदभाव होते हैं लेकिन वे इसका विरोध नहीं कर पाते हैं।
इस देश में परंपरागत रूप से जो प्रभु वर्ग है जिसमें जाति और वर्ग का एक नेक्सस भी दिखता है कि उच्च जाति लोग ही उच्च वर्ग के हैं और समाज के ज्यादातर महत्त्वपूर्ण उच्च स्तरीय शिक्षण संस्थानों में उनकी भागीदारी भी सबसे ज्यादा है। इसीलिए इंडिया के बारे में कहा जाता है कि ‘यहां पर जो लोग अल्पसंख्यक हैं वही संस्थानों में और सत्ता के सिर्फ पर बहुसंख्यक हैं और इस देश की जो बहुसंख्यक आबादी है वह निर्णय लेने वाले और शिक्षण संस्थानों में तथा संविधान के द्वारा वर्गीकृत न्यायपालिका विधायिका और कार्यपालिका के महत्वपूर्ण उच्च पदों पर उनकी भागीदारी कम है’। दुनिया का कोई भी समाज हो वहां पर परंपरागत पर प्रभु वर्ग अपनी लाभप्रद स्थिति को बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास करता है। इसके लिए वह कई तरह के हथकंडे अपना कर वंचितों के अधिकारों में कटौती करने के प्रयास करता रहता है। प्रभु वर्ग किसी भी ऐसे प्रयास का विरोध करता है, जिसके माध्यम से पीछे छूट गए वंचित वर्गों को और हाशिये के समाजों की परस्थिति सुधारने की कोशिश की जाती है। शिक्षा, स्वास्थ्य और नौकरियों में जब वंचित वर्गों की भागीदारी के सामान अवसर उपलब्ध करने की पहल होती है, आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने की बात होती है तो यथास्थितिवादी लोग ऐसे निर्णयों और किए गए प्रयासों का विरोध करते हैं। वर्तमान यूजीसी रेगुलेशन बिल का प्रभु वर्ग द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध करना यह दिखाता है कि कॉलेज और यूनिवर्सिटी कैंपस में वंचित तबकों के विद्यार्थियों, कर्मचारियों और अध्यापकों के साथ भी जिस तरह के जातीय धार्मिक और वर्गीय भेदभाव किए जाते हैं उनको दूर करने के लिए क़ानूनी प्रावधान करना नितांत आवश्यक है। जब हम दुनिया भर में कॉलेज और विश्वविद्यालयों के आंतरिक जीवन पर केंद्रित सिनेमा को देखने और समझने की कोशिश करते हैं तो हम पाते हैं कि अफ्रीका हो या अमेरिका, लैटिन अमेरिका हो या यूरोप या साउथ एशिया के देश सभी स्थानों पर कहीं ना कहीं किसी न किसी रूप में जातीय, धार्मिक, लैंगिक, रंगभेद एवं वर्गभेद के आधार पर कमजोर और वंचित तबके के विद्यार्थियों के साथ भेदभाव होता है। भारतीय सिनेमा में भी कई फिल्में इन विषयों पर बनी है जिनमें वर्गीय और जातीय भेदभाव के शिकार बच्चों के मुद्दों को उठाया गया है। लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई लोकप्रिय सरकारों का या प्रथम दृष्टि आधारित होना चाहिए कि समाज में व्याप्त भेदभाव को कानूनी तौर पर समाप्त करने की हर पल करें कोशिश करें ताकि विविधतापूर्ण भारतीय समाज में कमजोर वर्ग जैसे कि अन्य पिछड़े वर्ग अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति अल्पसंख्यक आदि को समान रूप से सभी जगह समान अवसर उपलब्ध हो सके और उनके रंग जाति या वर्ग धार्मिक पहचान के आधार पर कोई भेदभाव ना हो।
बॉलीवुड और भारतीय शिक्षण संस्थान
शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थी को समानता और नैतिकता आधारित एक महान समाज और राष्ट्र निर्माण का होना चाहिए परन्तु जब डॉ. पायल तड़वी, रोहित वेमुला, डेल्टा मेघवाल जैसे दलित-पिछड़े/वंचित समाजों के विद्यार्थियों को अपने सहपाठियों के भेदभाव और शोषण से तंग आकर आत्महत्या करनी पड़ती है, तब हमारे आधुनिक शिक्षा संस्थानों के सामने एक गम्भीर सवाल खड़ा होता है। हमारे देश के कई विद्वान यह बताते नहीं थकते कि जाति और जातिवाद अब बीते दिनों की बात हो चुके हैं। दीपांकर गुप्ता, अरविन्द एम. शाह जैसे समाजशास्त्री तो गाँव और जाति के इक्कीसवी सदी में समाप्त होने की झूठी घोषणा तक कर देते हैं। लेकिन दुखद सत्य यह है कि देश के शिक्षण संस्थान एक ऐसे पब्लिक स्फीयर के रूप में मौजूद हैं, जहाँ जातिवाद अभी भी जिन्दा ही नहीं है जिसकी सबूत ऊपर वर्णित घटनाएँ हैं। सन 2007 में इंडिया अनटच्ड शीर्षक डाक्यूमेंट्री में डायरेक्टर स्टालिन के. ने देश में प्रचलित विभिन्न प्रकार के छुआछूत को प्रस्तुत किया था जिसमें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली कैम्पस में भी जातिवाद और छुआछूत का दृश्य मौजूद था। सामाजिक न्याय की कब्रगाह बनते शिक्षण संस्थानों के कैम्पस खतरनाक स्थिति की तरफ संकेत करते हैं। भारत में शिक्षा व्यवस्था के बारे में बात करते हुए कई सरे विरोधाभासों को ध्यान में रखना होता है जैसे कि ‘सरकारी संस्थान-प्राइवेट संस्थान’, ‘इंग्लिश मीडियम-देशी मीडियम’, ‘गाँव-शहर’, ‘आर्ट साइड-साइंस साइड’ बोर्डिंग स्कूल-डे स्कूल इत्यादि। कैम्पस के अंदर किस तरह के भेदभाव मौजूद हैं इस पर कोई गंभीर फिल्म भारतीय सिनेमा में नहीं मिलती। इसकी कमी डाक्युमेंट्री फ़िल्में करती हैं।

द डेथ ऑफ़ मेरिट चार भागों में एक डाक्युमेंट्री फिल्म है जिसमें दलित-आदिवासी छात्रों के साथ उच्च-शिक्षा संस्थानों में किये जाने वाले भेदभाव को दिखाया गया है। पहले भाग में नई दिल्ली एम्स के अंतिम वर्ष के एमबीबीएस छात्र डॉ बालमुकुन्द भारती जिन्होंने 3 मार्च 2010 को आत्महत्या कर ली थी के परिजनों के बयानों और अभिलेखों के माध्यम से आत्महत्या के कारणों को सामने रखने की कोशिश की गयी है। दूसरे भाग में गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल चंडीगढ़ के डॉक्टर जसप्रीत सिंह के जीवन और आत्महत्या (27 जनवरी 2008) के कारणों को चित्रित किया गया है। डाक्युमेंट्री का तीसरा अंश आईआईटी रूडकी के छात्र मनीष कुमार गुड्डोलियन पर केन्द्रित है। मनीष कंप्यूटर साइंस और इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी के द्वितीय वर्ष के स्टूडेंट थे। उन्होंने अपने होस्टल के 5वें तल से कूदकर 6 फरवरी 2011 कूदकर आत्महत्या कर ली थी। इसी तरह चौथे भाग में डॉ वी. अजय श्री चन्द्र ने इंडियन स्कूल ऑफ़ साइंस के हॉस्टल में फांसी लगाकर 27 अगस्त, 2007 को आत्महत्या कर लिया था। चारों डाक्युमेंट्री को देखने से स्पष्ट पता चलता है कि उच्च अध्ययन संस्थानों में पढ़ने वाले होनहार दलित-आदिवासी पृष्ठभूमि के छात्रों द्वारा आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर क्यों होना पड़ा।
भारतीय समाज के साथ-साथ शिक्षण संस्थानों में भी जातीय भेदभाव का घृणित रूप मौजूद है। जिसे रोकने के लिए यूजीसी विनियम को लागू किया जाना अपरिहार्य है। कोटा (Quota 2020) एक तमिल भाषा की फिल्म है जिसमें एक आदिवासी छात्र जिमनास्ट बनना चाहता है लेकिन उसकी कमजोर आर्थिक स्थिति और जनजातीय पहचान इस सपने को पूरा करने में बाधा बनती है। यह फिल्म अपनी कहानी में अवसरों की असमानता, वैचारिक भिन्नता, पूर्वाग्रह, आरक्षण इत्यादि पर विमर्श प्रस्तुत करती है। लेकिन सच यही है कि हिंदी सिनेमा में कैम्पस डेमोक्रेसी और असमानता पर कोई उल्लेखनीय फिल्म नहीं है।
तिग्मांशु धुलिया की कल्ट फ़िल्म हासिल (2003) में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति और उससे जुड़े तमाम स्याह पहलुओं को उजागर किया है। रणविजय सिंह (इरफ़ान खान), गौरी शंकर पांडे (आशुतोष राणा) दो छात्रनेता अनिरुद्ध (जिम्मी शेरगिल) और निहारिका (ऋषिता भट्ट) दोस्त और प्रेमी युगल हैं। इलाहाबाद-प्रयागराज के आसपास का वातावरण है, जातीय सामाजिक संरचना है, भाषा है और कैम्पस में जातीय संघर्ष और वर्चस्व की जंग भी है। यह फिल्म बिना किसी शोरगुल के यह बता देती है कि इधर के विश्वविद्यालयों में राजनीति कुछ ख़ास जातियों के लोग ही कर सकते हैं बाकि लोग चुपचाप पढ़ाई कर सकते हैं और दबंग छात्रों के उत्पीडन को बिना प्रतिक्रिया दिए बर्दाश्त कर सकते हैं।
द ग्रेट डिबेटर्स (The Great Debaters 2007) एक अमेरिकी ऐतिहासिक ड्रामा फिल्म है जो सच्ची घटना पर केन्द्रित है। सन 1935 में टेक्सास के विले कॉलेज में होने वाले डिबेट टीम के ट्रायल और समस्याओं को चित्रित करती है। व्हाइट और ब्लैक लोगों के बीच रंगभेद इस फिल्म के केंद्र में है। अफ्रीकन-अमेरिकन्स के साथ दुर्व्यवहार और लिंचिंग उस समय रोज की बात थी। एक्टिविस्ट जेम्स फार्मर को 14 साल की उम्र में हाई स्कूल पास करने के बाद विले कॉलेज की डिबेट टीम में चयनित होना बताया गया है। फार्मर ने बाद के जीवन में कांग्रेस ऑफ़ सोशल इक्वलिटी स्थापित किया था। इस फिल्म में एक धर्मशास्त्री अगस्टिन ऑफ़ हिप्पो के संवाद को कई बार दुहराया गया है, ‘An unjust law is no law at all’ (Martin Luther King Jr. later made this the central thesis of his ‘Letter from a Birmingham Jail’)।
अपने इंटरमीडिएट क्लास की अंग्रेजी साहित्य की किताब में अश्वेत अफ्रीकन-अमेरिकन जार्ज टी. वाशिंगटन की आत्मकथा का एक अंश ‘My Struggle to An Education’ में शिक्षा प्राप्त करने के लिए उनके द्वारा किये गए संघर्षों के बारे में पढ़ा था। भारत हो या अमेरिका दुनिया के सभी देशों में गरीब और वंचित समाज के लोगों के संघर्ष विद्यमान हैं। समाज में सकारात्मक बदलावों को लाने के लिए शिक्षा प्रमुख कारक है। इसीलिए यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि शिक्षा सभी के लिए नि:शुल्क उपलब्ध हो ताकि प्रतिभाओं को पल्लवित होने का अवसर मिल सके। कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए विशेष प्रावधान किये जाएँ ताकि आर्थिक सामाजिक या जातीय भेदभाव की वजह से उनके साथ किसी तरह का भेदभाव न हो सके। दुनिया के कई देशों के फिल्मकारों ने शिक्षण संस्थानों में विद्यमान विषमता एवं शैक्षिक समानता के लिए किये जा रहे उपायों, निजी संघर्षों पर केन्द्रित फ़िल्में बनायीं हैं जिन्हें देखकर हमारी समझदारी बढती है। यूजीसी विनियमन 2026 सामाजिक-शैक्षिक समानता की दिशा में किये जा रहे महत्वपूर्ण प्रावधान हैं जिन्हें देश के सभी संस्थानों में लागू किया जाना चाहिए। ध्यान यह रखना होगा कि इसका दुरुपयोग न हो और किसी छात्र का भविष्य खराब न हो।
सन्दर्भ
John Becker Arguing for Equality 1987, verso publication UK, USA.
Piketty, Thomas (2022) A Brief History of Equality, Harvard University Press, USA.
Rawls, John (1999) A theory of Justice, Harvard University Press, USA.
Sharma, Sampda (2021) revisiting Haasil : Tigmanshu Dhulia’s first film that put Irfan
Khan on the map, in Indian Express, 4 July 2021.



