महिलाओं के विरुद्ध जारी है डायन के नाम पर अपराध

संजय वर्मा

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भारत के कुछ राज्यों, खासकर झारखंड और उड़ीसा में स्त्रियों के विरुद्ध अपराधों में डायन कहकर उनको प्रताड़ित करना और उनकी हत्या तक कर देना एक भयावह स्तर तक बढ़ा है। गरीब, पिछड़ी और दलित स्त्रियों के पास यदि थोड़ी भी जमीन और संपत्ति है और वे विधवा हैं या अकेली हैं तो अक्सर उन पर डायन-बिसाही का आरोप लगाकर प्रताड़ित किया जाता है। उनके खिलाफ इतना गहरा षड्यंत्र किया जाता है कि उन्हें आसानी से भीड़ द्वारा मार डाला जाता है। झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों में स्त्रियों को डायन साबित करने की घटना बहुत आम बात है। ग्रामीण क्षेत्रों में अंधविश्वास इस कदर हावी है कि लोग क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए डायन-बिसाही होने का आरोप लगाकर नृशंस तरीके से हत्या करने से बाज नहीं आ रहे हैं। पिछले पैंतीस वर्षों का आंकड़ा देखें तो इसने एक कुप्रथा का रूप ले लिया है। तकरीबन पचास हज़ार से भी अधिक महिलाएं डायन होने के आरोप में प्रताड़ित की गई हैं। उन्हें गाँव से भगा दिया गया अथवा सामाजिक बहिष्कार का शिकार होकर वे नारकीय जीवन जी रही हैं। आठ हज़ार से अधिक महिलाओं की हत्याएं डायन होने के आरोप में कर दी गई हैं।

ढाई महीने पहले 9 जून को झारखंड के लोहरदगा जिले के सेन्हा प्रखंड के सेरेंगदाग थाना क्षेत्र स्थित गणेशपुर गांव में भी एक बुजुर्ग महिला की नृशंस हत्या कर दी गई। जिस तरह इस हत्याकांड को अंजाम दिया गया, उसे सुनकर ही रुह कांप जाती है।

यह स्पष्ट है कि सिर्फ सरकार के प्रयास या पुलिस के भरोसे ग्रामीणों में व्याप्त अंधविश्वास को खत्म नहीं किया जा सकता। ऐसे में पंचायत जनप्रतिनियों को अंधविश्वास दूर करने के लिए आगे आना होगा। क्योंकि पंचायत चुनाव में चुनकर आए वार्ड सदस्य से लेकर जिला परिषद सदस्य तक पंचायत के ही लोग होते हैं, जो सरकार और ग्रामीणों के बीच की कड़ी होते हैं। ये सभी जनप्रतिनिधि अगर ग्रामीणों को जागरूक करने का काम करें।

जमीन विवाद में डायन प्रचारित कर की गई हत्या

घटना के बारे में मृतक होलो देवी के पुत्र बिनोद खेरवार बताते हैं कि गणेशपुर गांव में हर गुरुवार को ग्रामीणों की बैठक होती है, जिसमें गांव की समस्या या छोटे-मोटे विवादों पर विचार-विमर्श कर मामले का निपटारा किया जाता है। 9 जून, गुरुवार की सुबह मेरे घर में गांव के ही दो लड़के पहुंचे और उन्होंने मुझे, मेरी पत्नी और मां को बैठक में बुलाया। मेरे बड़े भाई जो थोड़ी दूरी पर अलग घर में रहते हैं, उन्हें भी बैठक में बुलाया गया। बैठक में पहुंचने के बाद मेरे सौतेले भाई ने मेरी मां पर यह आरोप लगाया कि मेरी मां होलो देवी डायन हैं। मेरे 5 सौतेले भाइयों में से एक भाई की मृत्यु 8 दिन पहले घर में ही बीमारी की वजह से हो गई थी। उसकी मौत का जिम्मेवार मेरी मां को डायन बताकर ठहराया गया। मेरे सौतेले भाई और बैठक में मौजूद अन्य लोग मेरी मां को घेरकर लाठी-डंडे से मारने लगे। जब मैंने और मेरे भाई ने लोगों को रोकने का प्रयास किया, तो वे लोग हम दोनों भाइयों को भी जान से मारने की धमकी देने लगे, जिसके बाद हम दोनों भाई डरकर चुपचाप वहीं बैठे रहे।

थोड़ी देर पिटाई करने के बाद जब वे लोग रुके, तब मेरी मां ने दर्द से कराहते हुए कहा कि तुम लोग हमको मार देगा, हम मर जाएंगे, लेकिन मरने से पहले थोड़ा-सा भात (उबला चावल) हमको दो, हम खाकर मरेंगे। मां के कहने पर थाली में चावल लाया गया और उसी थाली में खेतों में डाले जाने वाली जहरीली कीटनाशक दवा मिलाकर मां को खाने के लिए दिया। उस वक्त दिन के 12 बज रहे थे। खाना खाने के थोड़ी देर बाद मां के मुंह से झाग निकलने लगा और वे बेहोश होकर लुढ़क गईं। मां को पीटने वाले लोग वहीं बैठकर उसके मरने का इंतजार करते रहे। जब हम दोनों भाइयों से मां को तड़पते हुए नहीं देखा गया, तो हम दोनों भाई वहां से अपने घर आ गए। जहर खाने के बाद भी तीन बजे तक मां की मौत नहीं हुई थी, जिसके बाद वे लोग प्लास्टिक का बोरा लेकर आये और बेहोश पड़ी मां को उसी बोरे में डालकर बांध दिया और गांव से थोड़ी दूरी पर स्थित धरधरिया घाटी के ऊपर से नीचे घाटी में फेंक दिया, जिससे मां की मौत हो गई।

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प्रधान की भी कुछ नहीं चली

ग्राम प्रधान ने बताया कि ग्रामसभा की बैठक गांव में हर गुरुवार को होती है, जिसका प्रतिनिधित्व वे स्वयं ही करते हैं।  उन्होंने बताया कि उस दिन पहले से यह तय नहीं था कि 9 जून की बैठक में होलो देवी को बुलाया जाएगा। मेरी मौजूदगी में ही होलो देवी, उसके बेटों को और उसकी सौत के बेटों को बुलवाया गया। बुलवाने के बाद उसे घेर कर पीटने लगे। मैंने तथा गांव के चार-पांच लोगों ने होलो देवी को पीटने से मना भी किया लेकिन वे नहीं माने। इसके बाद मैं बैठक से उठकर बैल चराने के लिए चला गया। ग्राम प्रधान ने बताया कि होलो देवी मेरी समधिन थी। उसके मंझले बेटे से मेरी बेटी की शादी हुई है।

सुस्त और संवेदनहीन ग्राम प्रधान 

अब सवाल यह कि जब होलो देवी को घेरकर उसके सौतेले बेटे और परिजनों के साथ गांव के लोग पीट रहे थे, उस दौरान ग्राम प्रधान द्वारा आरोपियों को मना करने के बाद भी जब वे उनकी बात नहीं माने तब पुलिस को खबर करने की बजाय वे अपने घरेलू काम निपटाने (बैल चराने) के लिए चल दिए। जबकि ग्राम प्रधान को इस घटना को रोकने के लिए हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए था। वे घरेलू काम निपटाने के बजाय स्वयं थाना जाते या किसी को भेजकर थाने में सूचना दे सकते थे। लेकिन ग्राम प्रधान ने इसे बहुत हल्के में लेते हुए गैर जिम्मेदाराना तरीके से संवैधानिक पद की गरिमा के खिलाफ काम किया।

मृतका होलो देवी के पुत्र बिनोद खेरवार ने आगे बताया कि घटना के बाद हम दोनों भाई काफी डर गए थे। हम दोनों को ही डर था कि वे लोग हमें और हमारे परिवार को भी मार डालेंगे। तब हमने भाई के फ़ोन से इस घटना के बारे में लातेहार जिला के चंदवा प्रखंड में रहने वाले अपने जीजा और दीदी को सूचित किया। जीजा और दीदी के कहने के बाद घटना के दिन रात में ही आठ बजे थाने जाकर पूरी जानकारी दी और रिपोर्ट (एफआईआर ) लिखवाई।

8 बजे रिपोर्ट दर्ज कराया लेकिन पुलिस रात 11 बजे पहुँची

सेरेंगदाग थाना प्रभारी ने बताया कि यह पूरा क्षेत्र नक्सल प्रभावित है। पूर्व में यहां कई बड़ी नक्सली घटनाएं हो चुकी हैं इसलिए रात के आठ बजे जब बिनोद खेरवार द्वारा सूचना दी गई तो हमने जिले के एसपी को इस मामले की सूचना देने का काम किया। एसपी ने आदेश दिया कि नक्सल प्रभावित इलाका है, इसलिए पैरा मिलिट्री फोर्स के साथ ही आप घटनास्थल जाएं। पैरा मिलिट्री फोर्स को दूसरे थाने से यहाँ पहुँचने में समय लगा, जिसके कारण थोड़ी देर हुई। रात के 11 बजे घटनास्थल पर पहुंचने के बाद गांव के लोगों को घरों से बाहर बुलाया गया और पूछताछ की गई कि किन लोगों ने होलो देवी के साथ मारपीट की? तब गांव वालों ने कहा कि हम सब लोग शामिल थे। इस पर मैंने उन्हें समझाया और कहा कि जो लोग मारपीट में शामिल थे, वे एक तरफ हो जाएं।

मृतक के बेटे बिनोद ने एफआईआर में 27 लोगों का नाम दर्ज करवाया था। इसलिए उसी समय नामजद 27 में से 24 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। तीन अभियुक्त फरार हैं लेकिन जल्द ही उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

होलो देवी को प्लास्टिक के बोरे में बंद कर घाटी से नीचे फेंका गया था। शव धरधरिया घाटी के नीचे दो बड़ी चट्टानों के बीच में फंसा हुआ था, जिसे घटना के दूसरे दिन सुबह बरामद कर लिया गया। इस मामले में जांच टीम में पीयूसीएल के राज्य सचिव अनूप अग्रवाल, सामाजिक कार्यकर्ता ज्योति लकड़ा, पत्रकार संजय वर्मा और सुनीता मुंडा शामिल थे। इन लोगों ने सेरेंगदाग थाना प्रभारी अनंत मुर्मू से बात की और अब तक हुए कार्रवाई के बारे में जानकारी ली।

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पहले से चल रहा था पारिवारिक जमीन का विवाद

मृतका होलो देवी के छोटे पुत्र बिनोद खेरवार ने बताया कि मेरे पिताजी ने दो शादियाँ की थी। पिताजी की पहली पत्नी से 5 बेटे हैं और दूसरी मेरी मां होलो देवी हैं, जिनसे हम तीन भाई और एक बहन हैं। मेरे पिताजी मेरी मां होलो देवी के साथ ही रहते थे लेकिन जब हमलोग छोटे थे, उसी दौरान पिताजी की हत्या कर दी गई। उसके बाद मेरे पिताजी की सारी जमीन- जायदाद पर मेरी बड़ी मां के बेटों ने कब्जा कर लिया। हमलोग अपनी नानी की जमीन पर रहते हैं। मेरी मां ने कई बार, बड़ी मां से जमीन में हिस्सा मांगा कि मेरे बच्चों को भी जमीन दो, मेरे बच्चे अपना हिस्सा क्यों छोड़ेंगे। इस मांग पर इन्हें प्रताड़ित कर मारपीट की जाती थी।

सुरक्षा प्रदान करने में नाकाम पुलिस व्यवस्था 

पुलिस हर व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान कर सके इसके लिए क्षेत्र की जनसंख्या के हिसाब से थाना या टीओपी की स्थापना की गई है। सेरेंगदाग थाना क्षेत्र अंतर्गत गणेशपुर गांव में 9 जून की सुबह 6 बजे से लेकर शाम के 4 बजे तक होलो देवी की हत्या करने के मंशा से प्रताड़ित करने की घटना एक के बाद एक होती रही। मारपीट करने, जहर पिलाने और घाटी से नीचे फेंककर मौत के घाट उतारने के दौरान लगभग 10 घंटे का समय लगा लेकिन इस बीच प्रताड़ित किए जाने की घटना की सूचना पुलिस तक नही पहुंच पाई। अगर इस तरह की घटना शहर में होती तो शायद चंद मिनटों में ही पुलिस तक सूचना पहुंच जाती और पुलिस घटना स्थल पर पहुंचकर उसे रोकने में कामयाब हो जाती। स्पष्ट है कि पुलिस सेवा का लाभ देश के हर नागरिक को समान रुप से नहीं मिल पा रहा है। देश के संविधान में हर नागरिक को समान अधिकार प्राप्त है। ऐसे में यह स्पष्ट है कि पुलिस हर व्यक्ति को सुरक्षा देने में विफल है, जो स्टेट की विफलता है।

कानूनी प्रावधान

अगर कोई व्यक्ति किसी को डायन घोषित करता है, तो उसे तीन महीने की सज़ा या 1000 रुपये का जुर्माना या दोनों सज़ा एक साथ हो सकती है।

अगर कोई व्यक्ति किसी महिला को डायन करार देकर शारीरिक या मानसिक तौर पर प्रताड़ित करता है, तो उसे 6 माह का कारावास या 2000 रुपये का जुर्माना या दोनों सजा एक साथ हो सकती है।

स्वावलंबी बनाने और अंधविश्वास खत्म करने के लिए गरिमा योजना की शुरुआत 

सरकार के लाख प्रयास के बाद भी ओझा-गुणी और डायन होने का आरोप लगाकर हत्या करने का सिलसिला जारी है। झारखंड पुलिस के आंकड़ों पर गौर करें तो राज्य में 2011 से 2019 तक डायन-बिसाही होने के आरोप में 235 हत्या की घटनाएं हुई हैं और 2014-17 के बीच 2835 मामलों में एफआईआर दर्ज किया गया है।

गौरतलब है कि झारखंड सरकार ने इस तरह के मामले को रोकने और पीड़ितों को न्याय दिलाने के साथ-साथ उन्हें स्वावलंबी बनाने के लिए गरिमा योजना की शुरुआत भी की है। इसके तहत गांव स्तर तक जागरुकता फैलाने और अंधविश्वास को खत्म करने के लिए झारखंड स्टेट लाइवलीहुड सोसाइटी (जेएसएलपीएस) के माध्यम से राज्य के 7 डायन-प्रथा प्रभावित जिलों खूंटी, सिमडेगा, सरायकेला, लोहरदगा, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिम सिंहभूम और पलामू जिले में गरिमा योजना चल रही है।

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डायन-बिसाही प्रथा के खिलाफ जन प्रतिनिधियों की पहल जरूरी

यह स्पष्ट है कि सिर्फ सरकार के प्रयास या पुलिस के भरोसे ग्रामीणों में व्याप्त अंधविश्वास को खत्म नहीं किया जा सकता। ऐसे में पंचायत जनप्रतिनियों को अंधविश्वास दूर करने के लिए आगे आना होगा। क्योंकि पंचायत चुनाव में चुनकर आए वार्ड सदस्य से लेकर जिला परिषद सदस्य तक पंचायत के ही लोग होते हैं, जो सरकार और ग्रामीणों के बीच की कड़ी होते हैं। ये सभी जनप्रतिनिधि अगर ग्रामीणों को जागरूक करने का काम करें। ग्रामीणों को कानून और उनके हक/ अधिकारों के बारे में जानकारी दें तो ग्रामीणों में व्याप्त अंधविश्वास को काफी हद तक खत्म किया जा सकता है।

संजय वर्मा झारखंड के पत्रकार हैं।

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