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फिलिस्तीनी जनता का प्रतिरोध : हम किसी भी हालत में अपना देश नहीं छोड़ेंगे
नई दिल्ली में 2 जुलाई, 2026 को में गाज़ा में नरसंहार के 1000वें दिन को कविताओं और एकजुटता भाषणों के साथ याद किया गया। सभा के विशेष अतिथि, फ़िलिस्तीन राज्य के राजदूत डॉ. अब्दुल्ला एम. अबू शावेश ने आईपीएसएन को इस सार्थक कार्यक्रम के आयोजन पर धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि वे फ़िलिस्तीनी लोगों के लिए न्याय, आज़ादी और सम्मान की माँग में आईपीएसएन के साथियों की इस एकजुटता और प्रतिबद्धता से बहुत प्रभावित हैं।
बांडुंग से ब्रिक्स : अमेरिकी साम्राज्यवाद के विकल्प की संभावनाएँ और चुनौतियाँ
ब्रिक्स के सहयोग के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं: राजनीतिक और सुरक्षा, आर्थिक और वित्तीय तथा सांस्कृतिक और जन-जन के बीच आदान-प्रदान। आज अमेरिका को डॉलर-आधारित वर्चस्व का लाभ प्राप्त है। लगभग 67 देशों पर अमेरिकी शक्तियों द्वारा प्रतिबंध लगाए गए हैं। इस वर्चस्व को ध्वस्त करने के लिए ब्रिक्स ने द्विपक्षीय व्यापार, वैकल्पिक वित्तीय संदेश प्रणालियों तथा चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) जैसे व्यापारिक विकल्पों पर ध्यान केंद्रित किया है। ये छोटे, किंतु प्रभावशाली कदम एक बहुध्रुवीय आर्थिक व्यवस्था के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
शिक्षण संस्थानों में होने वाले भेदभाव की वास्तविकता और सिनेमा
क्या शिक्षण संस्थानों में भेदभाव होता है? क्या जातीय आधार पर अध्यापक अपने विद्यार्थियों से भेदभाव करते हैं? क्या सिनेमा में इस भेदभाव को यथार्थ ढंग से चित्रित किया गया है? क्या सुधारात्मक कानून समाज के विभिन्न वर्गों के बीच दूरी बढ़ा देते हैं? यह बहुत जटिल, बड़ा और वर्तमान का सबसे ज्वलंत सवाल है, क्योंकि इस सवाल को देखने और समझने की दृष्टि प्रायः पूर्वाग्रहों से भरी हुई होती है। सामाजिक स्तरीकरण और सामाजिक विभेदीकरण दुनिया के सभी समाजों में पाया जाता है। जाति, धर्म, लिंग, रंग और वर्गीय आधार पर लोगों के साथ भेदभाव करना, पूर्वाग्रहों और थोपी हुई निर्योग्ताओं पर आधारित व्यवहार करते हुए एक निश्चित आबादी को उसके मूलभूत, मानवाधिकारों और अवसरों से वंचित करना सामाजिक भेदभाव कहलाता है। पढ़िए जाने-माने कवि और सिनेमा के अध्येता राकेश कबीर का विश्लेषण जिसमें उन्होंने शिक्षण परिसरों में घटनेवाली घटनाओं के बहाने सिनेमा में उसके चित्रण पर कई सवाल उठाये हैं।
सिनेमा में ग्रीनलैंड : असाधारण जीवट की कहानियों पर ट्रम्प की लोलुपता की बढ़ती छाया
अमेरिका खुद को विश्व व्यवस्था में लोकतंत्र और शांति-व्यवस्था का संरक्षक मानता है जबकि वास्तविकता इसके उलट है। नब्बे के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया से दो ध्रुवीय व्यवस्था समाप्त हो गई और अमेरिका सबसे बड़ी शक्ति के रूप में उभरा और वहीं से उसकी दादागिरी और बढ़ गयी। अमेरिका और यूरोप के विकसित देशों ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं को अपनाकर एक खुली हुई विश्व व्यवस्था की वकालत की ताकि पूंजी और श्रम का बेरोकटोक प्रवाह हो सके। इस कार्य में विश्व व्यापार संगठन, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। खुली विश्व व्यवस्था का लाभ उठाकर चीन, अमेरिका और कई यूरोपीय देशों ने नव साम्राज्यवाद को बढ़ावा दिया। विकासशील और गरीब देशों के संसाधनों की लूट बढ़ गयी। जिन देशों ने इस लूट में सहयोग नहीं दिया उनके ऊपर वामपंथ, तानाशाही, परमाणु हथियार बनाने का आरोप मढ़कर, प्रायोजित विद्रोह कराकर वहां की शासन व्यवस्था को अस्थिर कर दिया गया। कमजोर और अमेरिकापरस्त लोगों के हाथ में सत्ता देकर अप्रत्यक्ष रूप से अपनी दादागिरी थोप दी गयी। अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, लेबनान, फिलिस्तीन, बांग्लादेश सभी इसके शिकार हो चुके हैं। फिल्म ‘अगेंस्ट द आइस’ दो बहादुर खोजी यात्रियों द्वारा अपने निजी अनुभवों पर लिखी गयी किताब पर आधारित फिल्म थी जिसने ग्रीनलैंड को अमेरका की विस्तारवादी नीति से बचाया था लेकिन एक शताब्दी बाद अमेरिका जैसे साम्राज्यवादी देश यह समझने को तैयार नहीं कि देश जमीन पर बना नक्शा नहीं होता। उसमें लोग भी रहते हैं जो अपने देश और लोगों से प्यार करते हैं और किसी बाहरी देश का कब्ज़ा या हस्तक्षेप नहीं चाहते। सबसे रार ठानकर अमेरिका अकेले नहीं रह सकता। उसके राष्ट्रपति को नहीं पता लेकिन वहां की जनता को पता है, इसलिए यूनाइटेड स्टेट के नागरिक अपने राष्ट्रपति के फैसलों के खिलाफ मुखर विरोध भी कर रहे हैं। पढ़िये ग्रीनलैंड के सिनेमा के बहाने साम्राज्यवाद के गहराते संकट पर राकेश कबीर का लेख।
वीरेंद्र यादव बनाम ज्वालामुखी यादव
आज सुबह अभी हम इलाहाबाद से आई प्रो राजेंद्र कुमार के न रहने की दुखद खबर से उबरे भी नहीं थे कि लखनऊ से प्रख्यात आलोचक वीरेंद्र यादव के जाने की स्तब्धकारी खबर आई। सहसा भरोसा करना मुश्किल था कि यह कैसे हो सकता है? दो दिन पहले उनके बीमार होने की सूचना मिली थी, लेकिन यह बीमारी इतनी घातक है यह न मालूम था। उनके जाने से बहुत कुछ खाली हो गया. वह गर्मजोशी से भरे बुद्धिजीवी थे जो केवल किताबी आलोचना तक सीमित नहीं थे, बल्कि लगभग सभी समकालीन मुद्दों पर लिखते और बोलते थे और बेलाग बोलते थे। उनके व्यक्तित्व के इन्हीं पहलुओं को छूता प्रख्यात कथाकार मधु कांकरिया की एक छोटी टिप्पणी जो उनके बहत्तरवें जन्मदिन पर चार साल पहले प्रकाशित की गई थी। आज पुनः उनको श्रद्धांजलिस्वरूप प्रकाशित की जा रही है।
सिनेमा और उसके अलावा काफी कुछ है – श्याम बेनेगल
न्यू वेव सिनेमा के सूत्रधार श्याम बेनेगल ने कल नब्बे वर्ष की आयु में दुनिया को अलविदा कहा। उनके निधन से सिनेमा के एक युग का अवसान हो गया। बेनेगल ने सत्तर के दशक में भारतीय सिनेमा में जिस तरह की फिल्में बनाना शुरू किया वे हिंदी में बिमल रॉय और बांग्ला में सत्यजीत रॉय के सिनेमा का एक अलग विस्तार था। सिनेमा की भूमिका को उन्होंने बदल कर रख दिया। यथार्थ की कलात्मक प्रस्तुति और यथार्थ की अतिरंजनापूर्ण सिनेमाई अभिव्यक्ति से अलग बेनेगल ने सामान्य भारतीय यथार्थ की जटिल संरचना को चित्रपट पर लाने का प्रयास किया। एक निर्देशक के रूप में वे बहुत प्रयोगशील भी रहे हैं। सिनेमा और रंगमंच की युक्तियों को उन्होंने काफी सफलता से उपयोग किया। इस प्रकार उनका कृतित्व न्यू वेव सिनेमा का केंद्रीय स्वर बन गया और उनके समकालीन और परवर्ती दोनों पीढ़ियों के फ़िल्मकारों पर उनका व्यापक असर रहा है। अनेक लोगों ने इस असर से मुक्ति के लिए मसालेदार सिनेमा को भी अपनी मंजिल बनाया लेकिन स्वयं बेनेगल ने अपना रास्ता नहीं बदला। उनका योगदान ऐतिहासिक रूप से हिंदी और भारतीय सिनेमा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे एक अध्येता और विचारक भी थे और अनेक समकालीन प्रश्नों पर बेबाकी से सोचते थे। मिळून सा-याजणी’ (मराठी भाषा की द्वैमासिक पत्रिका से अनुवादित -उषा वैरागकर आठले) की प्रतिनिधि डॉ. सविता द्वारा लिया गया उनका यह साक्षात्कार इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है जिसे हम श्रद्धाञ्जलि स्वरूप यहाँ छाप रहे हैं।
भिखारी ठाकुर – जिन्होंने अपने रंगकर्म का सरोकार ग्रामीण स्त्रियों के दुःख से जोड़ दिया
भिखारी ठाकुर स्त्री के पक्ष में न्याय करते नहीं दिखते, इसके पीछे कारण यह है कि उन्होंने समाज की सच्चाई को यथार्थ उजागर किया है। उस समय के समाज में पितृसत्ता की ऐसी ही धमक थी। वे समाज के बीच रहकर समाज की समस्या को पढ़ते थे और उनके चरित्र को नाटकों के माध्यम से समाज में अभिव्यक्त करते थे।
पानी की ‘ब्यूटी’ का इस्तेमाल करने वाला सिनेमा पानी के प्रति ड्यूटी’ कब निभाएगा
पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व लिए जल एक अपरिहार्य तत्व है। भारतवर्ष में हजारों नदियां हैं, झील, ताल, तालाब और झरने अपनी खूबसूरती के साथ यत्र-तत्र विद्यमान हैं लेकिन भारतीय सिनेमा में पानी और उससे जुड़े मुद्दों को बहुत कम स्पेस मिला है। हालांकि पानी और सिनेमा का हमेशा से करीबी रिश्ता रहा है लेकिन वह पानी के रोमांटिक पक्ष पर ही ज्यादा केंद्रित रहा है। भारतीय सिनेमा में जब हम हिन्दी भाषा से अलग अन्य भाषाओं के सिनेमा को देखते हैं तो पता चलता है कि सामाजिक और पर्यावरणीय विषयों पर कुछ गंभीर निर्देशकों ने सार्थक फिल्में बनाई हैं। पढ़िए डॉ राकेश कबीर का विश्लेषणपरक लेख
शताब्दी वर्ष में राजकपूर की याद : सिनेमा के कई छोरों को छूती हुई
भारतीय सिनेमा के इतिहास में शोमैन कहे जाने वाले राजकपूर की पारिवारिक पृष्ठभूमि भले ही फिल्मी रही हो, लेकिन उन्होंने अपनी जगह स्वयं के संघर्ष से हासिल की। दो राय नहीं कि राजकपूर (1924-1988) हिन्दी सिनेमा के महान अभिनेता, निर्माता एवं निर्देशक थे। उन्नीसवीं सदी के चालीस और पचास के दशक में जब भारतीय सिनेमा आरंभिक दौर में था और देश अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुआ था, जब आर्थिक और तकनीकी संसाधनों की कमी थी उस दौर में राजकपूर की श्वेत-श्याम फिल्मों में विषय चयन, सम्पादन, गीत-संगीत, संवाद, विचारधारात्मक परिपक्वता जैसे तत्व हमें आश्चर्यचकित करते हैं। भारतीय फिल्मों के इतिहास में उनकी अनेक फिल्में मील का पत्थर हैं। आज उनका शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है लेकिन उनका क्लासिक काम हमेशा याद किया जाता रहेगा।
Blood Speaks Too : यह किताब आरएसएस के दुष्प्रचार का कच्चा चिट्ठा खोल रही है
सौ साल से भी ज़्यादा समय से RSS का एक ही लक्ष्य रहा, मुसलमानों के खिलाफ़ भ्रांतियाँ फैलाने का, जिसे उसने भलीभांति अंजाम दिया। इसमें सबसे बड़ी बात है मुसलमानों पर देशद्रोही होने का आरोप लगाना और आज़ादी की लड़ाई की जगह उन्हें देश के बंटवारे के लिए ज़िम्मेदार ठहराना, इस संदर्भ में यह किताब Blood Speaks Too (The Role Of Muslims in India’s Independece) RSS द्वारा किए जा रहे दुष्प्रचार का करारा जवाब दे रही है हालाँकि RSS का आज़ादी की लड़ाई से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था।
यशपाल और विद्रोही जैसे रचनाकार मानव–मुक्ति के बड़े रचनाकार हैं – डॉ. रामबाबू आर्य
दरभंगा में जसम ने मार्क्सवादी कथाकार यशपाल एवं जनकवि रमाशंकर यादव विद्रोही को उनकी जयंती पर शिद्दत से याद किया और एक विचार संगोष्ठी का आयोजन किया।

