Friday, February 27, 2026
Friday, February 27, 2026




Basic Horizontal Scrolling



पूर्वांचल का चेहरा - पूर्वांचल की आवाज़

होमराजनीति

राजनीति

अगर टीपू सुलतान हिन्दू राजा होते तो क्या करती भाजपा

महाराष्ट्र के मालेगाँव में नवनिर्वाचित उपमहापौर निहाल अहमद ने शान-ए-हिन्द टीपू सुल्तान का एक चित्र अपने कार्यालय में लगाया। इसकी जानकारी मिलने के बाद शिवसैनिकों ने अधिकारियों का हस्तक्षेप करवाकर उसे हटवा दिया। कुछ विरोध प्रदर्शन भी हुए। महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने चित्र हटाए जाने को अनुचित बताते हुए कहा कि टीपू का मैसूर के लिए उतना ही योगदान है जितना छत्रपति शिवाजी महाराज का महाराष्ट्र के लिए है। इस बात का भाजपा ने घोर विरोध दर्ज करते हुए कांग्रेस कार्यालय पर पथराव किया।

मोहम्मद दीपक : देश में बिगड़ती दोस्ती के हालात में भाईचारा बनाए रखना

लोकतंत्र को एक सांप्रदायिक राष्ट्रवादी देश में बदलने की इस कोशिश के दौरान, उन्होंने खासकर मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ नई-नई भाषाएं और नारे बनाए। अब हालात बहुत खराब हैं। सामाजिक कॉमन सेंस मुसलमानों के खिलाफ नफरत से भरा है और यह दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है। लेकिन हिंदू राष्ट्रवाद के मानने वालों की फैलाई गई नफ़रत की बाढ़ में इंसानियत पूरी तरह खत्म नहीं हो जाएगी। दीपक उन गहरे हिंदू-मुस्लिम रिश्तों का जीता-जागता उदाहरण हैं जो यहां पहले थे लेकिन अब एक अपवाद बन गए हैं।

वेनेज़ुएला पर हमला असभ्य गुंडागिरी की निशानी

दुनिया अच्छे से जानती है कि रूस और यूक्रेन के दरम्यान जंग छेड़ने और नाटो के मसले के पीछे भी अमेरिकी षड्यंत्र है, और फ़लस्तीन के ग़ज़ा में जारी नरसंहार के पीछे भी इजरायल को हासिल अमेरिकी शह है और अब अमेरिकी राष्ट्रपति एक सनकी की तरह व्यवहार करते हुए अपनी सनक में दुनिया को नाभिकीय युद्ध के मुहाने पर ला रहे हैं।

अल्पसंख्यक ईसाइयों की दुर्दशा

यह प्रोपेगेंडा कि ईसाई धर्म परिवर्तन कर रहे हैं, इस पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है। ईसाई धर्म भारत में एक पुराना धर्म है, जो 52 ईस्वी में सेंट थॉमस के ज़रिए मालाबार तट पर आया था। यह सामाजिक धारणा कि यह ब्रिटिश शासन के साथ आया, इसका कोई आधार नहीं है। 52 ईस्वी से 2011 तक, जब आखिरी जनगणना हुई थी, जनगणना के आंकड़ों के अनुसार ईसाइयों का प्रतिशत बढ़कर 2.3% हो गया। यह कोई नहीं कह सकता कि कुछ जानबूझकर धर्म परिवर्तन का काम नहीं हुआ होगा।

वंदे मातरम् : पहले परहेज अब मौका देख विवाद खड़ा कर रही संघी ताकतें

सांप्रदायिक धारा अब पूरा वंदे मातरम् गाना लाने की मांग कर रही है, उसने यह गाना कभी नहीं गाया था। यह मुख्य रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बैठकों में गाया जाता था। वंदे मातरम् का नारा अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वालों ने लगाया था। चूंकि RSS आज़ादी के आंदोलन से दूर रहा और अंग्रेजों की 'बांटो और राज करो' की नीति को जारी रखने में उनकी मदद की, इसलिए उन्होंने यह गाना नहीं गाया और न ही यह नारा लगाया।

शक्ति संवाद स्थगित, जन विश्वास यात्रा और विजय यात्रा की बारी ?

बुधवार 5 जनवरी का दिन, देश की मीडिया और राजनीतिक गलियारा सुर्ख़ियों भरा रहा! एक कोरोना महामारी की तीसरे लहर को देखते हुए, कांग्रेस...

शिखर को छूती सापेक्षिक वंचना के सद्व्यवहार में व्यर्थ विपक्ष

बतौर एक राजनीतिक विश्लेषक मैं 2019 से ही चुनाव दर चुनाव भाजपा की सफलता से विस्मित होते रहा हूँ। कारण, 2014 में मोदी के...

क्या अब हिंदुत्व की हिमायती फासीवादी ताकतें अपना ध्यान सांप्रदायिकता से अछूते प्रदेशों पर केंद्रित करने वाली हैं?

धर्म संसद के नाम पर समाज में हिंसा का जहर घोलने की सुनियोजित कोशिशें धीरे-धीरे अपना असर दिखाने लगी हैं। हिंसा को स्वीकार्य बनाकर...

क्या किसान आंदोलन स्थगित हुआ है, खत्म नहीं हुआ?

मेघालय के राज्यपाल सतपाल मलिक और किसान नेता राकेश टिकैत के अलग-अलग दिए गए बयान कि, किसान आंदोलन स्थगित हुआ है, आंदोलन अभी खत्म...

जाति जनगणना ने मोदी सरकार का बहुजन विरोधी चेहरा सामने ला दिया – मनीष शर्मा

जाति जनगणना संयुक्त मोर्चा के बैनर तले आज वाराणसी के अजगरा विधानसभा के मुनारी बाजार में सामाजिक न्याय व जातिवार जनगणना की मांग को...

सत्ता और संगठन की मलाई एक ही थाली में !

राजनीति में फार्मूला, एक ऐसा शब्द है, जिसमें सस्पेंस और भ्रम अंत तक छिपा हुआ रहता है। राजनीतिक दल फार्मूला बनाता है इसकी खबर तो...
Bollywood Lifestyle and Entertainment