शिखर को छूती सापेक्षिक वंचना के सद्व्यवहार में व्यर्थ विपक्ष

एचएल दुसाध

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बतौर एक राजनीतिक विश्लेषक मैं 2019 से ही चुनाव दर चुनाव भाजपा की सफलता से विस्मित होते रहा हूँ। कारण, 2014 में मोदी के सत्ता में आने के बाद जिस तरह उनकी सवर्णपरस्त नीतियों के साथ सापेक्षिक वंचना(रिलेटिव डिप्रैवेशन डीप्राईवेशन) में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है, उससे मैं 2019 में ही मोदी सरकार के विदाई के प्रति आशावादी हो उठा था। और ऐसा इसलिए हुआ था कि मुझे पूरा विश्वास था विपक्ष सापेक्षिक वंचना का इस्तेमाल करेगा और भाजपा केंद्र के साथ राज्यों की सत्ता से भी धीरे-धीरे दूर हो जाएगी। किन्तु विपक्ष ने सापेक्षिक वंचना को हवा देने की कोशिश नहीं की और मोदी 2014 के मुकाबले 2019 में और मजबूती से सत्ता में वापसी किये। 2019 में प्रधानमंत्री मोदी की जोर-शोर से वापसी मेरे हिसाब से एक बहुत बड़ी राजनीतिक दुर्घटना थी, जो विपक्ष द्वारा सापेक्षिक वंचना की अनदेखी किये जाने के कारण घटित हुई। उसके बाद भाजपा हिन्दू धर्म-संस्कृति के गौरव-गान और मुस्लिम विद्वेष के प्रसार के जरिये ‘हेट पॉलिटिक्स’ को तुंग पर पंहुचा कर राज्यों में भी सफलता के नये- नये अध्याय जोड़ती गयी। किन्तु विपक्ष ने कहीं भी सापेक्षिक वंचना को हवा नहीं दिया। अब एक बार फिर भाजपा कुछ ही माह में 5 राज्यों में अनुष्ठित होने जा रहे विधानसभा चुनावो में अपने अमोघ अस्त्र: नफरत की राजनीति को तुंग पर पहुचाने की दिशा में अग्रसर हो गयी है, पर सापेक्षिक वंचना से विपक्ष अब भी आँखे मूंदे हुए है। देखना है इस बार वह इसका सा सद्व्यवहार करता है या नहीं?

बहरहाल भारत में सापेक्षिक वंचना के जो अभूतपूर्व हालात पैदा हुए हैं, उसके लिए स्वाधीन भारत के कमोबेश तमाम शासक ही जिम्मेवार रहे। कारण, आजादी की लड़ाई के दौरान किये गए वादों के मुताबिक उन्होंने स्वाधीन भारत में विभिन्न सामाजिक समूहों और उनकी महिलाओं के मध्य शक्ति के स्रोतों के न्यायोचित बंटवारे की योजना पर काम किया ही नहीं। वे अपनी स्व-वर्णीय/वर्गीय हित के हाथों विवश होकर ऐसी नीतियाँ बनाते रहे, जिससे ज्यादा लाभान्वित भारत का जन्मजात सुविधाभोगी अर्थात सवर्ण वर्ग हुआ। किन्तु मंडल उत्तरकाल में तो शक्ति के समस्त स्रोत सुविधाभोगी के हाथों में देने का खुला खेल शुरू हो गया। स्मरण रहे ओबीसी को आरक्षण के दायरे में लाने वाली मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के साथ ही आरक्षण पर केन्द्रित वर्ग संघर्ष सतह पर आ गया।

मोदी राज में जिस सापेक्षिक वंचना का विपक्ष द्वारा सद्व्यवहार किये जाने को लेकर यह लेखक 2019 के लोकसभा चुनाव से यह लेखक प्रतीक्षारत है, उससे ढेरों विद्वान पाठक अवगत होंगे, किन्तु कुछ ऐसे भी होंगे जो इससे अनजान हैं। ऐसे में सापेक्षिक वंचना क्या है और मोदी सरकार ने कैसे इसे शिखर पर पहुँचाया है, इससे अवगत कराने का प्रयास करता हूँ। बहरहाल मोदीराज में जिस सापेक्षिक वंचना को विपक्ष द्वारा मुद्दा न बनाये जाने से यह लेखक विस्मित है, उसके विषय में यह बाताना चाहूँगा कि क्रांति का अध्ययन करने वाले तमाम समाज विज्ञानियों के मुताबिक़ जब वंचित वर्गों में सापेक्षिक वंचना का भाव पनपने लगता है, तब उनमें शक्तिसंपन्न वर्गों के खिलाफ आक्रोश की चिंगारी फूट पड़ती है और वे इनके हित में नीतियाँ बनाने वाले शासकों को सत्ता से दूर धकेल देते हैं। समाज विज्ञानियों के मुताबिक़, ’दूसरे लोगों और समूहों के संदर्भ में जब कोई समूह या व्यक्ति किसी वस्तु से वंचित हो जाता है तो वह सापेक्षिक वंचना है दूसरे शब्दों में जब दूसरे वंचित नहीं हैं तब हम क्यों रहें!’ सापेक्षिक वंचना का यही अहसास बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में अमेरिकी कालों में पनपा, जिसके फलस्वरूप वहां 1960 के दशक में दंगों का सैलाब पैदा हुआ, जो परवर्तीकाल में वहां डाइवर्सिटी लागू होने का सबब बना। दक्षिण अफ्रीका में सापेक्षिक वंचना का अहसास ही वहां के मूलनिवासियों की क्रोधाग्नि में घी का काम किया, जिसमें  भस्म हो गयी वहां गोरों की तानाशाही सत्ता। जिस तरह आज शासकों, विशेषकर मोदी की सवर्णपरस्त नीतियों से जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग का शक्ति के स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक- पर बेहिसाब कब्जा कायम हुआ है, उससे सापेक्षिक वंचना के तुंग पर पहुंचने लायक जो हालात भारत में पूंजीभूत हुये हैं, वैसे हालात विश्व इतिहास में कहीं भी नहीं रहे, यहाँ तक कि फ्रांसीसी क्रांति या रूस की जारशाही के खिलाफ उठी वोल्सेविक क्रांति में भी नहीं!

बहरहाल भारत में सापेक्षिक वंचना के जो अभूतपूर्व हालात पैदा हुए हैं, उसके लिए स्वाधीन भारत के कमोबेश तमाम शासक ही जिम्मेवार रहे। कारण, आजादी की लड़ाई के दौरान किये गए वादों के मुताबिक उन्होंने स्वाधीन भारत में विभिन्न सामाजिक समूहों और उनकी महिलाओं के मध्य शक्ति के स्रोतों के न्यायोचित बंटवारे की योजना पर काम किया ही नहीं। वे अपनी स्व-वर्णीय/वर्गीय हित के हाथों विवश होकर ऐसी नीतियाँ बनाते रहे, जिससे ज्यादा लाभान्वित भारत का जन्मजात सुविधाभोगी अर्थात सवर्ण वर्ग हुआ। किन्तु मंडल उत्तरकाल में तो शक्ति के समस्त स्रोत सुविधाभोगी के हाथों में देने का खुला खेल शुरू हो गया। स्मरण रहे ओबीसी को आरक्षण के दायरे में लाने वाली मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के साथ ही आरक्षण पर केन्द्रित वर्ग संघर्ष सतह पर आ गया। 7 अगस्त, 1990 को मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होते ही सुविधाभोगी वर्ग के छात्र और उनके अभिभावक, साधु-संत, लेखक-पत्रकार, पूंजीपति तथा राजनीतिक दल आरक्षण के खात्मे की लड़ाई में कूद पड़े। इसी मकसद से खुद मोदी की पार्टी भाजपा ने मंदिर आन्दोलन का मुद्दा उठा दिया। किन्तु जिस शख्स ने आरक्षण के खात्मे तथा शक्ति के स्रोतों पर जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग के एकाधिकार को स्थापित करने की सबसे पहले व प्रबल परिकल्पना की, वह रहे कांग्रेस के नरसिंह राव। राव ने मुख्यतः अपनी परिकल्पना को मूर्त रूप देने के लिए ही 24 जुलाई,1991 को ग्रहण किया नवउदारवादी अर्थनीति, जिसके जरिये देश में निजीकरण का फ्लड-गेट खोल दिया गया! राव की उस नीति में निजीकरण- विनिवेशीकरण इत्यादि के जरिये आरक्षित वर्गों के सफाया और अल्पजन सुविधाभोगी वर्ग को और शक्तिसंपन्न करने का निर्भूल डिजाइन था। राव के बाद उस नीति को अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह ने भी आगे बढ़ाया । पर, सबसे जोरदार तरीके से किसी ने उसे हथियार के रूप में इस्तेमाल किया तो वह नरेंद्र मोदी ही रहे!

बहरहाल मोदी राज में जिन सवर्णों का धन- दौलत पर प्रायः 90 प्रतिशत कब्जा हो चुका है, उनका सर्विस सेक्टर पर भी जो कब्जा हुआ है उसका ठीक से जायजा लेने पर किसी का भी सर चकरा जायेगा। केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 1 जनवरी 2016 को जारी आंकड़े बताते हैं कि केंद्र सरकार में ग्रुप ‘ए’ की कुल नौकिरयों की संख्या 84 हजार 521 है। इसमें 57 हजार 202 पर सामान्य वर्गो ( सवर्णों ) का कब्जा है। यह कुल नौकरियों का 67.66 प्रतिशत होता है। इसका अर्थ है कि 15-16 प्रतिशत सवर्णों ने करीब 68 प्रतिशत ग्रुप ए के पदों पर कब्जा कर रखा है और देश की आबादी को 85 प्रतिशत ओबीसी, दलित और आदिवासियों के हि्स्से सिर्फ 32 प्रतिशत पद हैं।

2014 में जोरदार तरीके से सत्ता में आने के बाद मोदी ने राव की नीतियों को जोरदार तरीके से अनुसरण करने का जो काम शुरू किया, उसका चमत्कारिक परिणाम 22 जनवरी, 2018  को प्रकाशित ऑक्सफाम की रिपोर्ट के जरिये सामने आया। उस रिपोर्ट से पता चला कि टॉप की 1% आबादी अर्थात 1 करोड़ 3o लाख लोगों की धन-दौलत पर 73 प्रतिशत कब्ज़ा हो गया है। इसमें मोदी सरकार के विशेष योगदान का पता इसी बात से चलता है कि सन 2000 में 1% वालों की दौलत 37 प्रतिशत थी, जो बढ़कर 2016 में 58.5 प्रतिशत तक पहुच गयी। अर्थात 16 सालों में इनकी दौलत में 21 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। किन्तु, उनकी 2016 की 58.5  प्रतिशत दौलत सिर्फ एक साल के अन्तराल में 73% हो गयी अर्थात सिर्फ एक साल में 15% का इजाफा हो गया। शायद ही दुनिया में किसी परम्परागत सुविधाभोगी तबके की दौलत में एक साल में इतना इजाफा हुआ हो। किन्तु मोदी की सवर्णपरस्त नीतियों से भारत में ऐसा चमत्कार हो गया। 1%टॉप वालों से आगे बढ़कर यदि टॉप की 10% आबादी की दौलत का आंकलन किया जाय तो नजर आएगा कि मोदी राज में  देश की टॉप 10% आबादी, जिसमें 99.9% सवर्ण होंगे, का देश की धन-दौलत पर 90% से ज्यादा कब्ज़ा हो गया, जिसे विषमता का शिखर कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी।

बहरहाल मोदी राज में जिन सवर्णों का धन- दौलत पर प्रायः 90 प्रतिशत कब्जा हो चुका है, उनका सर्विस सेक्टर पर भी जो कब्जा हुआ है उसका ठीक से जायजा लेने पर किसी का भी सर चकरा जायेगा। केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 1 जनवरी 2016 को जारी आंकड़े बताते हैं कि केंद्र सरकार में ग्रुप ‘ए’ की कुल नौकिरयों की संख्या 84 हजार 521 है। इसमें 57 हजार 202 पर सामान्य वर्गो ( सवर्णों ) का कब्जा है। यह कुल नौकरियों का 67.66 प्रतिशत होता है। इसका अर्थ है कि 15-16 प्रतिशत सवर्णों ने करीब 68 प्रतिशत ग्रुप ए के पदों पर कब्जा कर रखा है और देश की आबादी को 85 प्रतिशत ओबीसी, दलित और आदिवासियों के हि्स्से सिर्फ 32 प्रतिशत पद हैं। अब गुप ‘बी’ के पदों को लेते हैं। इस ग्रुप में 2 लाख 90 हजार 598 पद हैं। इसमें से 1 लाख 80 हजार 130 पदों पर अनारक्षित वर्गों का कब्जा है। यह ग्रुप बी की कुल नौकरियों का 61.98 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि ग्रुप बी के पदों पर भी सर्वण जातियों का ही कब्जा है। यहां भी 85 प्रतिशत आरक्षित संवर्ग के लोगों को सिर्फ 28 प्रतिशत की ही हिस्सेदारी है। कुछ ज्यादा बेहतर स्थिति ग्रुप ‘सी’ में भी नहीं है। ग्रुप सी के 28 लाख 33 हजार 696 पदों में से 14 लाख 55 हजार 389 पदों पर अनारक्षित वर्गों ( अधिकांश सवर्ण )का ही कब्जा है, यानी 51.36 प्रतिशत पदों पर। हां, सफाई कर्मचारियों का एक ऐसा संवर्ग है, जिसमें एससी, एसटी और ओबीसी 50 प्रतिशत से अधिक हैं। जहां तक उच्च शिक्षा में नौकरियों का प्रश्न है 2019 के आरटीआई के सूत्रों से पता चला कि केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफ़ेसर, एसोसिएट और असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पदों पर सवर्णों की उपस्थित क्रमशः 95.2 , 92.90 और 76.12  प्रतिशत है।

उपरोक्त आंकड़े 2016 के हैं। जबकि 13 अगस्त, 2019 को संसद में प्रस्तुत एक रिपोर्ट पर नजर दौड़ाई जाय तो नौकरशाही के निर्णायक पदों पर सवर्णों का वर्चस्व देखकर किसी के भी होश उड़ जाएंगे। उस रिपोर्ट से पता चलता है कि मोदी सरकार के 89 सचिवों में से 1-1 एससी और एसटी के, जबकि ओबीसी का एक भी व्यक्ति नहीं है। उन आकड़ों से पता चलता है कि केंद्र सरकार के मंत्रालयों/विभागों में तैनात कुल 93 एडिशनल सेक्रेट्री में छह एसटी, पाँच एसटी और ओबीसी से एक भी नहीं. वहीं, 275 ज्वाइंट सेक्रेट्री में 13 एससी, 9 एसटी और 19 ओबीसी से रहे, बाकी सवर्ण। डायरेक्टर पद की बात करें तो इसमें कुल 288 पदों में महज 31 एससी, 12 एसटी और 40 ओबीसी से रहे, बाकी सवर्ण। डिप्टी सेक्रेट्री के कुल 79 पदों में 7 पर एससी, तीन पर एसटी और 21 पर ओबीसी रहे, बाकी सवर्ण। सर्विस सेक्टर से बढ़कर धार्मिक सेक्टर नज़र दौड़ाई तो वहाँ भी चौकाने वाला आंकड़ा ही दिखेगा। डॉ. आंबेडकर के अनुसार शक्ति के स्रोत के रूप में जो धर्म आर्थिक शक्ति के समतुल्य है, उस पर आज भी 100 प्रतिशत आरक्षण इसी वर्ग के लीडर समुदाय का है। धार्मिक आरक्षण सहित सरकारी नौकरियों के ये आंकडे चीख-चीख कह रहे हैं कि आजादी के 70 सालों बाद भी हजारों साल पूर्व की भांति विदेशी मूल के सवर्ण ही इस देश के मालिक हैं!

आज यदि कोई गौर से देखेगा तो पता चलेगा कि पूरे देश में जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हैं, उनमें  80- 90 प्रतिशत फ्लैट्स सवर्ण मालिकों के ही हैं। मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग मॉलों में 80-90 प्रतिशत दूकानें इन्हीं  की हैं। चार से आठ-आठ लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है, उनमें 90 प्रतिशत से ज्यादे गाडियां इन्हीं की होती हैं। देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल्स प्राय इन्हीं के हैं। फिल्म और मनोरंजन तथा ज्ञान-उद्योग पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा इन्हीं का है। संसद विधान सभाओं में वंचित वर्गों के जनप्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो, किन्तु मंत्रिमंडलों में दबदबा इन्हीं का है। मंत्रिमंडलों में लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने वाले 80-90 प्रतिशत अधिकारी इन्ही वर्गों से हैं। मोदी की सवर्णपरस्त नीतियों जिस तरह शक्ति के स्रोतों पर सवर्णों का वर्चस्व और ज्यादा बढ़ा है, उसके आधार पर दावे के साथ कहा जा सकता है कि न्यायिक सेवा, शासन-प्रशासन, उद्योग-व्यापार, फिल्म-मीडिया, धर्म और ज्ञान क्षेत्र में भारत के सवर्णों जैसा दबदबा आज की तारीख में दुनिया में कहीं भी किसी समुदाय विशेष का नहीं है। यही नहीं जिन- जिन देशों में मुक्ति के लिए वंचितों के क्रांतिकारी आंदोलन संगठित हुये क्या उन देशों में शासक वर्गों का शक्ति के स्रोतों पर भारत के सवर्णों से बहुत ज्यादा रहा? नहीं! लेकिन मोदी सरकार द्वार लगातार देश को बेचने तथा बहुजनों को गुलामी की स्थिति में पहुचाने का उपक्रम करते देखकर भी विपक्ष कभी सापेक्षिक वंचना के सद्व्यवहार के लिए आगे नहीं आया।

विधानसभा चुनाव 2022 : कैसे हो हेट पॉलिटिक्स की काट !

बहरहाल भारत में बरक़रार अभूतपूर्व सापेक्षिक वंचना का विपक्ष द्वारा बुरी तरह अनदेखी किये जाने के बावजूद यह सुखद तथ्य  है कि सोशल मीडिया पर सक्रीय बहुजन बुद्धिजीवियों के सौजन्य से जन्मजात सर्वहाराओं(दलित, आदिवासी, ओबीसी और इनसे धर्मातरित तबकों)में सापेक्षिक वंचना का अहसास पनपा है। इससे वोट के जरिये लोकतांत्रिक क्रांति के जो हालात आज भारत में पैदा हुए हैं, वैसे हालात विश्व इतिहास में कभी किसी देश में उपलब्ध नहीं रहे। ऐसे में विपक्ष, खासकर बहुजन नेता यदि जन्मजात सर्वहाराओं में सापेक्षिक वंचना का भाव भरने में सारी ताकत झोंक दें तो वोट के जरिये शर्तिया तौर पर भारत में लोकतान्त्रिक क्रांति का स्वर्णिम अध्याय रचित हो जायेगा। लेकिन विपक्ष अबतक ऐसा नहीं किया, इससे यह तुच्छ लेखक विस्मित है। बहरहाल 5 राज्यों के चुनाव प्रचार के शिखर पर पहुचने में अभी कुछ देर है। ऐसे में मोदी- योगी- शाह के हेट पॉलिटिक्स से भयाक्रांत बुद्धिजीवी चाहें तो यह आशा पोषण कर सकते हैं कि देश के राजनीति की दिशा तय करने वाले उत्तर प्रदेश की सत्ता हेट पॉलिटिक्स के चैम्पियनों के हाथ में जाने से रोकने के लिए कुछ सप्ताह के मध्य विपक्ष अवश्य ही सापेक्षिक वंचना के सद्व्यवहार का मन बनाएगा और अतीत के व्यर्थता का प्रायश्चित करेगा!

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

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