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सामाजिक न्याय
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यूजीसी एक्ट के खिलाफ क्यों अपनी कुंठा और विद्वेष लहरा रहे हैं भारतीय सवर्ण?
यदि यह जानने का प्रयास हो कि मानव जाति के हजारों साल के इतिहास में इस धरती पर ऐसा कौन सा समाज मौजूद रहा है ,जिसमें अपने ही धर्म के बहुसंख्य लोगों को आथिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक शक्ति के सभी स्रोतों में रत्ती भर भी हिस्सेदार बनाने की मानसिकता नहीं रही है बल्कि इसके उलट जब-जब राज्य द्वारा बहुसंख्य वंचितों को कुछ अधिकार देने का प्रयास हुआ, तब-तब उस समाज ने देश को एक रणभूमि में तब्दील कर दिया हो तब इसका एकमात्र जवाब है कि वह ब्राह्मण-क्षत्रिय- वैश्यों से युक्त भारत का सवर्ण समाज होगा! लाख प्रयास के बावजूद ऐसे किसी अन्य समाज का नाम नहीं ढूँढा जा सकता, जिसकी सवर्णों जैसी अपने ही सहधर्मियों को अधिकार- शून्य देखने की तीव्र चाह हो। जाने-माने एक्टिविस्ट लेखक और बहुजन डायवर्सिटी मिशन के अध्यक्ष एच एल दुसाध इस लेख में कहते हैं कि ‘यह समाज शुद्रातिशूद्रों के रूप में विद्यमान देश की 85 प्रतिशत आबादी के अधिकारों के इतना खिलाफ रहा कि उसे बहुसंख्य आबादी को अच्छा नाम रखने, शिक्षा पाने एवं मोक्ष के लिए आध्यात्मानुशीलन का अधिकार देना भी कभी गंवारा नहीं रहा। दुनिया के इतिहास में सबसे क्रूर माने जाने वाले एटिला द हूण, चंगेज खां जैसे शासकों ने पराधीन बनाये गए लोगों को अच्छा नाम रखने, शिक्षा ग्रहण करने एवं दुःख मोचन के लिए देवालयों में जाकर अपने भगवानों से प्रार्थना करने से कभी नहीं रोका। ऐसी बर्बरता का परिचय समग्र इतिहास में सिर्फ सवर्णों ने दिया।’
नांदेड़ : राजनीति और शासन जाति की सड़ांध से प्रेमियों को नहीं बचा सकते
इस कहानी का सबसे बुरा हिस्सा यह है कि सक्षम और आंचल के रिश्ते के बारे में परिवार में सभी जानते थे और उन्होंने उनके रिश्ते को स्वीकार करने का नाटक किया, लेकिन यह परिवार की एक चाल थी और आखिरी दिन उन्होंने सक्षम की हत्या कर दी। बात यहीं खत्म नहीं हुई, आंचल ने अपना विरोध दिखाया और सक्षम की लाश से शादी कर ली। 'सिंदूर' लगाया और मांग की कि उसके माता-पिता और भाइयों को फांसी दी जाए।
आरएसएस के संविधान विरोध पर गूगल का नज़रिया
यह सच है कि 26 नवम्बर, 1949 को संविधान राष्ट्र को सौंपे जाने के दिन से ही आरएसएस इसका विरोधी रहा है। हालांकि तमाम लोगों की भांति मुझे भी मालूम था कि डॉ. आंबेडकर द्वारा तैयार भारतीय संविधान मनुस्मृति पर आधारित न होने के कारण ही संघ इसका विरोधी रहा है, लेकिन यह लेख शुरू करने से पहले यह जानने का कौतूहल हुआ कि गूगल इस पर क्या राय देता है? मैंने गूगल से सवाल किया कि संघ भारतीय संविधान का क्यों विरोधी रहा है, तो जो जवाब मिला, वह वही था जो हम जानते हैं। आइये जानते हैं गूगल का जवाब-
बहुजनों के लिए बहुत बुरा साबित हुआ है यह अक्तूबर
आज 2025 का अक्तूबर का आखिरी दिन है। यह माह कई कारणों से बहुजनों के लिए दु:स्वप्न बना रहा। इसी माह की दो तारीख को 1925 में स्थापित आरएसएस ने सौ साल पूरे होने का जश्न मनाया। इसी माह में छः तारीख को देश के राजनीति की दिशा तय करने वाले बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई। लेकिन संघ के सौ साल पूरे होने व बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा के अतिरिक्त जिस एक अन्य कारण से इस बार का अक्टूबर दु:स्वप्न बना, वह है संघ के सौ साल पूरा होने के बाद से उत्तर प्रदेश सहित भाजपा शासित मध्य प्रदेश, हरियाणा में दलित–बहुजनों के खिलाफ शुरू हुआ अपमान, भेदभाव और उत्पीड़न से लेकर आत्महत्या की घटनाओं का सिलसिला, जो अब तक थमने का नाम नहीं ले रहा है। अक्तूबर 2025 के आकलन का यह मौलिक तरीका निस्संदेह एक महत्वपूर्ण पद्धति है।
जस्टिस गवई को ‘भीमटा’ की गाली सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक सरोकारों के सिमटते जाने का संकेत है
भारत की सड़ी हुई राजनीति और मनुवादी मानसिकता का असली चेहरा तब सामने आता है जब दलित समाज से आया व्यक्ति सत्ता, न्याय या प्रतिष्ठा की ऊँचाई पर पहुँच देश का मुख्य न्यायाधीश बनता हैऔर मनुवादी उसे सहज स्वीकार नहीं करते। इधर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई को सोशल मीडिया पर 'भीमटा' कहकर अपमानित किया गया। यह केवल एक गाली नहीं है। यह उस आंबेडकरवादी विचारधारा पर हमला है जिसने मनुवाद की नींव हिलाई थी। यह संविधान और लोकतंत्र को नीचा दिखाने की कोशिश है।
न्यायालय में देर है अंधेर नहीं, लेकिन यह देर अंधेर से कम नहीं
उत्तर प्रदेश के खीरी जिले के रोजगार अधिकारी से 10 डाक सहायकों की भर्ती के लिए योग्य उम्मीदवारों की सूची मांगी। जिसमें अंकुर गुप्ता का नाम भी था। लिखित परीक्षा के साथ टाइपिंग और कंप्यूटर योग्यता को देखने के लिए परीक्षा हुई। उसके बाद इंटरव्यू लिया गया जिसमें अंकुर का मेरिट लिस्ट में नाम आया। सफल उम्मीदवारों के लिए पंद्रह दिन का प्री इंडक्शन प्रशिक्षण देने का कार्यक्रम आयोजित हुआ। लेकिन इसके बाद 1996, मार्च में मुख्य पोस्ट जनरल ने अलग-अलग पोस्टमास्टर जनरल को पत्र के माध्यम से सूचना दी कि उम्मेदवार को बारहवीं कक्षा व्यावसायिक स्ट्रीम से पास की होना चाहिए। लेकिन अंकुर ने यह नहीं किया था, इसी वजह से उन्हें आगे के प्रशिक्षण के लिए नहीं भेजा गया, जिसके बाद अंकुर द्वारा अन्य असफल उम्मीदवारों के साथ केन्द्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) में मुकदमा किया गया।
महिलाओं के प्रति रूढ़िवादी सोच को कब बदलेगा समाज
साइंस और टेक्नोलॉजी हो या फिर अर्थव्यवस्था, हर क्षेत्र में आज भारत विश्व के विकसित देशों के साथ आंख से आंख मिलाकर बातें करता है। लेकिन भारतीय समाज विशेषकर भारत का ग्रामीण समाज आज भी वैचारिक रूप से पिछड़ा हुआ है। शहरों की अपेक्षा गांव में महिलाओं के साथ इस दौर में भी शारीरिक और मानसिक हिंसा आम बात है।
पूर्व सांसद आजम खान ने खुद के एनकाउंटर का खतरा बताया
यूपी में हालत कितने भयावह हैं। हिरासत के दौरान एनकाउंटर के खतरे की आशंका मानवाधिकार का गंभीर मसला है। एक नेता की सिर्फ बयानबाजी में इसे न देखा जाए। पिछले दिनों जिस तरह से पूर्व सांसद अतीक अहमद और पूर्व विधायक अशरफ जिन्होंने हत्या की आशंका जाहिर की थी और सरेआम पुलिस की भारी मौजूदगी में मीडिया कैमरों के सामने उनकी हत्या हुई उससे यह सवाल गंभीर हो जाता है।
दलित आंदोलन के प्रति उत्तर प्रदेश सरकार का रवैया दमनकारी
तेलंगाना सरकार ने यह फैसला लिया है कि वह जमीन खरीदकर भूमिहीन दलित महिलाओं को 3 एकड़ तक जमीन की स्वामिनी बनाएगी। मार्च 2022 तक 16,906.34 एकड़ भूमि रु. 755.94 में खरीद कर 6,874 परिवारों में वितरित की जा चुकी है। तेलंगाना सरकार दलित बंधु नामक योजना के तहत दलितों परिवारों कोे रोजगार के लिए रु. 10 लाख अनुदान भी उपलब्ध करा रही है।
स्टालिन ने जाति आधारित गणना को रूटीन जनगणना में शामिल करने की उठाई मांग
उन्होंने इस मामले में मोदी से निजी हस्तक्षेप करने का अनुरोध करते हुए कहा कि प्रस्तावित राष्ट्रीय दशकीय जनगणना के साथ जाति आधारित गणना को एकीकृत करने से समाज की जातीय संरचना और सामाजिक-आर्थिक संकेतकों में इसके असर के संबंध में समग्र और विश्वसनीय आंकड़े मिल सकते हैं।
उन्नाव रेप पीड़िता ने परिवार के खिलाफ दर्ज कराई प्राथमिकी
उन्नाव (उप्र) (भाषा)। बहुचर्चित उन्नाव के माखी रेप कांड मामले में अब एक नया मामला सामने आ गया है। वर्ष 2017 में उन्नाव जिले...

