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तेईस मार्च को भगत सिंह और लोहिया को याद करने के मायने
डॉ. राम मनोहर लोहिया फ़ासीवाद, पूँजीवाद और साम्राज्यवाद-विरोधी थे लेकिन समाजवाद के समर्थक थे। डॉ लोहिया का जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ एक गहरा बौद्धिक और वैचारिक जुड़ाव था। इसी प्रभाव के चलते, 1934 में जर्मनी से लौटने के बाद, उन्होंने (24 वर्ष की आयु में) 'कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी' की स्थापना में सक्रिय योगदान दिया। वे इसकी कार्यकारिणी समिति के सदस्य बने और पार्टी के मुखपत्र, 'कांग्रेस सोशलिस्ट' के संपादक नियुक्त किए गए। आज उनकी 116 वीं जयंती पर उन्हें याद करते हुए पढ़िए डॉ सुरेश खैरनार का यह लेख।
शहीद भगत सिंह : साम्राज्यवाद के नए दौर में बढ़ती जा रही प्रासंगिकता
भगत सिंह को 23 मार्च, 1931 को फांसी की सजा दी गई थी और अपनी शहादत के बाद वे हमारे देश के उन बेहतरीन स्वाधीनता संग्राम सेनानियों में शामिल हो गये, जिन्होंने देश और अवाम को निःस्वार्थ भाव से अपनी सेवाएं दी। उन्होंने अंगेजी साम्राज्यवाद को ललकारा। मात्र 23 साल की उम्र में उन्होंने शहादत पाई, लेकिन शहादत के वक्त भी वे आजादी के आंदोलन की उस धारा का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, जो हमारे देश की राजनैतिक आजादी को आर्थिक आजादी में बदलने के लक्ष्य को लेकर लड़ रहे थे, जो चाहते थे कि आजादी के बाद देश के तमाम नागरिकों को जाति, भाषा, संप्रदाय के परे एक सुंदर जीवन जीने का और इस हेतु रोजी-रोटी का अधिकार मिले। निश्चित ही यह लक्ष्य अमीर और गरीब के बीच असमानता को खत्म किये बिना और समाज का समतामूलक आधार पर पुनर्गठन किये बिना पूरा नही हो सकता था। इसी कारण वे वैज्ञानिक समाजवाद की ओर आकर्षित हुए। उन्होंने मार्क्सवाद का अध्ययन किया, सोवियत संघ की मजदूर क्रांति का स्वागत किया और अपने विशद अध्ययन के क्रम में उनका रूपांतरण एक आतंकवादी से एक क्रांतिकारी में और फिर एक कम्युनिस्ट के रूप में हुआ।
किसानों की समस्या के संदर्भ में भगत सिंह के संघर्षों को कैसे देखा जाए
भगत सिंह की जयंती पर विशेष
भगत सिंह को 23 मार्च, 1931 को फांसी दी गई थी और अपनी शहादत के बाद वे हमारे देश...
आज अपने चारों ओर बुने जा रहे झूठ से कैसे लड़ते भगतसिंह
गांधीजी यह कभी नहीं चाहते थे कि भगत सिंह की फांसी की सजा माफ हो। वह केवल भगत सिंह की सजा को कुछ समय के लिए टालना चाहते थे। तथ्य इस बात की ओर इशारा करते हैं कि भगत सिंह की फांसी की सजा के कम्युटेशन के लिए कानूनी पहलुओं को गांधीजी ने बड़ी बारीकी से खंगाला था और उन्हें जब यह अच्छी तरह ज्ञात हो गया कि कानूनी रूप से ब्रिटिश सरकार को भगत सिंह की फांसी की सजा माफ करने हेतु बाध्य करना संभव नहीं है तब उन्होंने फांसी की सजा को निलंबित या स्थगित करने का प्रस्ताव दिया। यह फांसी को टालकर ब्रिटिश सरकार से समय प्राप्त करने की रणनीति का एक भाग था।

