नौगढ़ के एक गाँव के विस्थापित अपना गाँव उठा लाए दूसरी जगह

अपर्णा

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चंदौली के आदिवासी इलाकों में वनाधिकार पट्टे के लिए पुरजोर कोशिश कर रहे ग्रामवासी अपने पुराने कागज़-पत्तर ठीक कर रहे हैं। बहुतों के पास तो कागज़ ही नहीं है लेकिन जिनके पास है उन्होंने हर कागज़ को फ़ाइल में करीने से रखा है। पिछले दिनों यह चर्चा तेजी से फैली थी कि प्रशासन ग्रामवासियों से 1930 का निवास प्रमाणपत्र माँग रहा है। विगत कई वर्षों से चंदौली समेत सोनभद्र, मिर्ज़ापुर, चित्रकूट, बांदा आदि जिलों में वन अधिकार के दावे किए जा रहे हैं लेकिन उतनी ही तेजी से वे निरस्त भी किए जा रहे हैं। इसको लेकर असंतोष और आंदोलन एक बड़े हिस्से में फैला हुआ है। इस क्रम में गाँव के लोग डॉट कॉम ने नौगढ़ के गांव चकचुइयाँ के लोगों से बातचीत की। मजे की बात यह है कि चकचुइयाँ गाँव ढाई दशक पहले कहीं और था लेकिन जब वहाँ से लोग विस्थापित हुये तो वर्तमान लालतापुर के पड़ोस में वन विभाग की ज़मीन पर उन्होंने उस गाँव को फिर आबाद कर लिया।

चकचुइयाँ गाँव और भेड़ा फार्म के बीच की सड़क से गुजरते हुये हम उस गाँव में पहुंचे जहां 2000 में ग्रामीणों ने वन विभाग से एक लड़ाई लड़ी और उसके खोदे गड्ढों को पाट दिया और अपनी दावेदारी कायम की। हालाँकि अभी भी वहाँ अनेक जटिलताएँ हैं। वन विभाग उन्हें फिर से वहाँ से हटाना चाहता है। लोगों के मन में आशंकाएं हैं। इसके बावजूद अतीत के संघर्षों की उनके पास अनेकों यादें हैं। गाँव की सबसे बुजुर्गवार हैं बीफी जिन्हें सब लोग चाची कहते हैं। उनकी उम्र 80-82 वर्ष है। बीफी ने अपनी कांपती आवाज़ में कहा- ‘जंगल विभाग का उड़ाका दल पहरा देता था और कहता था कि गोली मार देंगे।’ वह कहती हैं कि ‘वन विभाग के कर्मचारियों के पास बंदूकें थीं। गड्ढा खोदने के लिए वन दरोगा, गार्ड  के साथ लगभग सौ से ज्यादा लोग पहुंचे हुए थे।’

बीफी की नज़रें आज भी स्थिरता की उम्मीद लगाए हुए हैं

वर्ष 1999 में वन विभाग ने नौगढ़ में जगह-जगह जंगल की जमीन पर, जिसका घर-खेत है उसे हटाने और लोगों को भगाने के लिए गड्ढा खोदकर एक अभियान चलाया। इस गाँव के लोग भेड़ा फॉर्म बनने के बाद दुबारा विस्थापित होकर यहाँ आकर बसे थे और वन विभाग द्वारा उन्हें फिर यहाँ से विस्थापित करने हेतु अभियान चलाया जा रहा था जबकि वन अधिकार का यह नियम है कि जंगल की जमीन से एक विस्थापन के बाद दूसरा विस्थापन नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद वन विभाग ने इन्हें इस जगह से विस्थापित करने के लिए इनके खेतों में गड्ढे खोद दिए। पचपन साल के गुड्डू दलित समुदाय से आते हैं। वे बताते हैं कि ‘फरवरी का महीना था। हमारे खेतों में खेतों में तीसी और गेहूं बोया हुआ था। वन विभाग द्वारा पहले भी परेशान किया जा रहा था जिसका हम लोगों ने दबी जुबान में विरोध तो किया था लेकिन उसका कोई असर उन पर नहीं हुआ। कर्मचारी आकर खेतों में सैकड़ों बड़े-बड़े गड्ढे खोद दिए और हमें भाग जाने के लिए धमकाया।  हम गाँव वालों की विरोध करने की हिम्मत नहीं हुई, क्योंकि ये गोली मार देने की धमकी दे रहे थे और गाँव वाले दहशत में थे।’

लालतापुर के पूर्व प्रधान नंदू राम कहे हैं कि यहाँ जंगल विभाग और वन दरोगा अपनी फ़ौज के साथ आये थे। हम लोग, आसपास के गाँव के लोग, बच्चे,बूढ़े जवान और पढ़ने वाले बच्चे जो प्राइमरी तक पढ़े हुए थे, सबको साथ लेकर विरोध करने यहाँ पहुंचे। नरपत सिंह वन दरोगा था, जिसने गाँव वालों को यहां से भाग जाने को कहा। उसने गाँव वालों को धमकाते हुए खुलकर कहा मैं गोली चला दूंगा। उसने खुद कहा कि वह जाति का ठाकुर है और मिलिट्री से रिटायर होकर वन दरोगा बना है, वह यह सब बर्दाश्त नहीं करेगा। लेकिन गाँव वालों ने भी कहा जो भी हो। चाहे गोली खाना पड़े या मरना पड़े हम पीछे नही हटेंगे। पूरे गाँव वालों का जोश, जूनून देखकर उस वन दरोगा ने सरेंडर कर दिया और मुझे कहा – ‘नंदू भैया, मैं सरेंडर करता हूँ।’ सरेंडर करते ही गाँव वाले और ग्राम्या संस्थान के अध्यापक और कार्यकर्ताओं ने कहा कि शुरू हो जाएँ? (मतलब पीटने से था) तब  मैंने कहा- ‘जब इसने खुद ही सरेंडर कर दिया है तो इस पर हाथ उठाने की बजाय बात करनी चाहिए।’

यही वे खेत हैं,जहाँ पर वन विभाग वालों ने गड्ढा खोद खड़ी फसल बर्बाद कर दी थी

बात होने पर नरपत सिंह ने कहा कि ‘आप लोग मुझे यहाँ रहने का आदेश पत्र दिखाइये।’ मैंने कहा – ‘हमारे पास कोई कागज़ नहीं है। हम लोग इस जगह पर बहुत सालों से बसे हुए हैं।’ उसने कहा – ‘यदि रेंजर साहब यहाँ आयेंगे और कुछ सवाल–जवाब करेंगे तब आप लोग बता पायेंगे।’ मैंने कहा- ‘हाँ, हम बोल सकते ।’ लेकिन उसके बाद कभी पलटकर रेंजर आया न ही वनविभाग के कर्मचारी ही। उसके बाद जो गड्ढा खोदा गया था, उसे पाटने के लिए सारे गाँव वालों के साथ बिंदु दीदी ने फ़ोन करके अन्य सामाजिक संगठनों के लोगों को बुलाया था, सभी लोग आये ढोल-मंजीरा और ताली बजाते हुए। उन सैकड़ों गड्ढों को पाटने के लिए किसी फावड़ा या अन्य चीजों की जरूरत नहीं पड़ी बल्कि सभी ने एक-एक मुट्ठी मिट्टी से ही पाटकर भर दिया। उसके बाद आजतक इस वन भूमि से हमें किसी ने भगाया नहीं।’

पूर्व सरपंच नंदू चकचुइयाँ की लड़ाई के बारे में बताते हुए

नंदू और गाँव वालों ने कहा कि इस मुहिम में जो जीत मिली उसका पूरा श्रेय बिंदु सिंह को है। बातचीत होने पर  बिंदु सिंह कहती हैं कि ‘ मैं तो लोगों के साथ थी। चाहती थी कि इनको बेवजह उजाड़ा न जाय। यह सब संभव हुआ गाँव के लोगों के साहस और संगठित होने से।’

वास्तव में उन दिनों वन विभाग की बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ जब गांवों में घूम जातीं तो चारों ओर सन्नाटा फैल जाता। अमदहा और सहरसताल ग्राम पंचायतों में भी यही आतंक था लेकिन उन सभी गाँव वालों ने संगठित होकर इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाया।

गुड्डू ने बताया कि ‘जहाँ बैठे हैं वहाँ 2000 में वन विभाग ने बिना किसी सूचना के हमारे खेतों में गड्ढे खोदना शुरू कर दिया। अचानक हुए इस तरह के काम से सभी गाँव वाले इकट्ठे तो हो गये लेकिन विरोध नहीं कर पाए।’  गुड्डू कहते हैं कि जब भेड़ा फॉर्म बना तब वहां से बेदखल होने पर मेरे पिताजी को दस बिस्सा जमीन मुआवज़े के रूप में मिली थी लेकिन हम उस पर कब्जा नहीं कर पाए और गाँव के मजबूत यादवों ने उस पर कब्जा कर लिया। तब पिताजी यहाँ आकर बसे और 1972 से यहीं रहने लगे। यहीं खेती किसानी की व्यवस्था कर लिए।’

परमशीला, जो मिर्ची के खेत में मिर्च तोड़कर रोजी कमाती हैं

सन 1973 में बना भेड़ाफॉर्म प्रारंभ में पांच हजार एकड़ में फैला हुआ था। यह नौगढ़ के जरगर, बसौली, लालतापुर, भसौड़ा और रिठिया तक फैला हुआ था। भेड़ा प्रजनन केंद्र अर्थात भेड़ा फॉर्म की स्थापना के चलते लोग वहां से विस्थापित हुए। भेड़ा फॉर्म की जमीन भी वन विभाग की थी। विस्थापन के बदले में कुछ काश्तकारों को मुआवजे के रूप में जमीनें दी गईं लेकिन वहां से विस्थापित दलितों में एक को छोड़कर किसी को मुआवजे के तौर पर कोई जमीन नहीं मिली। तब विस्थापित लोग चकचुइया में आकर बसे और यहीं रहने लायक घर बनाकर खेती-किसानी करने लगे। गौरतलब है कि वे लोग चकचुइंया गाँव से विस्थापित हुए थे और अपने साथ गाँव का नाम चकचुइयाँ भी यहाँ ले आये।

इस लड़ाई में सबसे महत्वपूर्ण बात थी कि गाँव के पुरुष तो लड़े ही लेकिन गाँव की सारी महिलाओं ने हिम्मत दिखाकर इसमें हिस्सा लिया और कहा कि आगे भी इस तरह की कोई स्थिति आती है तो हम अपनी जमीनें नहीं देंगे बल्कि उस स्थिति का सामना करेंगे। गाँव वालों को यह समझ आ गया कि कागज या दस्तावेज भले न हो लेकिन संगठन है तो मजबूती से आवाज उठाई जा सकती है।

वन अधिकार अधिनियम क्या कहता है 

वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत प्रावधान है कि वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासियों के किसी सदस्य या किन्हीं सदस्यों द्वारा निवास के लिए या स्वयं की खेती करने (जीविका के लिए)  व्यक्तिगत या सामूहिक अधिभोग के अधीन वन भूमि को धारित करने और उसमें रहने का पूरा अधिकार हैं। उन्हें बिना ग्रामसभा की अनुमति के या कहें सहमति से विस्थापित नहीं किया जा सकता।

प्रस्तावित पुनर्व्यव्स्थापन पर और पैकेज के लिए सम्बद्ध क्षेत्रों में ग्राम सभाओं की स्वतंत्र सहमति लिखित में प्राप्त की गई हो साथ ही यहाँ  पुनर्व्यव्स्थाप्न तभी होगा जब पुनर्वास पर सुविधाएं और भूमि आबंटन तय किये गए मानकों पर हो।

‘निवास स्थल’ सिर्फ कृषि पूर्व और आदिम जनजातीय समूहों पर लागू होता है। अधिनियम के तहत, ‘आदिम जनजातीय समूहों और कृषि पूर्व समुदायों (जैसे झूमिया/झूम कृषक) को निवास का अधिकार है’ (धारा 3 (ङ)) यहाँ ‘निवास स्थल’ की परिभाषा वैसे परंपरागत क्षेत्र के अर्थ में की गई है जहाँ ये समुदाय रहे हैं, भले ही वे आरक्षित/संरक्षित वनों के अंदर हों। किसी भी निवास स्थल का अधिकार इस प्रकार है कि उन वन क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों को वहां से बेदखल नहीं किये जाने का अधिकार है।साथ ही जंगलों को नष्ट होने या खत्म होने से रोकने का भी अधिकार है, क्योंकि जंगल के खत्म होने से इन समुदायों के लिए कोई भी निवास स्थल नहीं बचेगा।

रामचंदर का अधूरा बना शौचालय,जिसे अब स्टोर के रूप में उपयोग किया जा रहा है ..

चकचुइयाँ में अभी भी नहीं किया गया है वन अधिकार का दावा

इसके बावजूद कि हाल के दिनों में इस गाँव के लोगों पर वन विभाग का दबाव बढ़ा है लेकिन आज तक इस जगह के लिए वन अधिकार का दावा प्रस्तुत नहीं किया गया है। इस दावे को प्रस्तुत करना जरूरी इसलिए है कि यहाँ रह रहे ग्रामीणों के मन में खदेड़े जाने का  डर बना हुआ है। लोग बताते हैं कि हमारे यहाँ के सरपंच ने इसके लिए किसी भी तरह की कोई पहल आज तक नहीं की है। जबकि इस अधिनियम में यह प्रावधान है कि वन अधिकार कानून के अंतर्गत व्यक्तिगत और सामुदायिक दोनों प्रकार के समुदाय को अधिकार है। वे अपनी वन भूमियों में बसें। उस भूमि पर अनुसूचित जनजातियों और अन्य परम्परागत वन निवासियों का अधिकार होगा।

जंगल की जमीनों पर पट्टा नहीं मिलता है लेकिन वन अधिकार अधिनियम 2006 में यह प्रावधान है कि वन अधिकार समितियों का गठन गाँव वाले बनाकर दावे प्रस्तुत करें।  कुछ गाँव वालों ने दावा प्रस्तुत किया लेकिन उन दावों पर आज तक कोई ध्यान नहीं दिया गया। यदि दावा स्वीकृत हो जाता है तो गाँव वाले वन प्रबंधन समिति बनाकर अपनी आजीविका और रहने की दिक्कतों को लेकर निश्चिंत हो सकते।

इस गाँव की लड़ाई में शामिल रहनेवली नर्वदापुर गाँव की प्यारी आनेवाली विपत्ति के लिए गाँववालों को जिम्मेदार मानती हैं। वह कहती हैं ‘काम निसर गया दुख बिसर गया।’ अब सब अपने में मगन हैं लेकिन संगठन कमजोर हो गया। अब भी अगर वे लोग संगठित नहीं हुये तो फिर लड़ेंगे कैसे?’

सिंचाई के अभाव में सूखती रहती हैं फसलें 

चकचुइयाँ के लोगों का मुख्य काम खेती-किसानी ही है। यहाँ धान, गेहूं, चना, मसूर तीसी आदि फसलें होती हैं। फ़िलहाल कुछ खेतों में धान लगा हुआ है, लेकिन सिंचाई एक समस्या बनी हुई है। नौगढ़ में कई बांध हैं लेकिन वे नौगढ़ के लिए किसी काम के नहीं हैं क्योंकि सारा पानी नीचे चंदौली में चला जाता है। विडंबना ही है नौगढ़ के पानी से अन्य जिलों में सिंचाई होती है और यहाँ सिंचाई के लिए प्राकृतिक रूप से या फिर बोर के पानी के ऊपर निर्भर रहना पड़ता है। भैसौड़ा बाँध जो चकचुइयाँ से केवल कुछ दूरी पर है लेकिन सिर्फ दिखाई देने के लिए।  ग्रामीणों ने बताया कि सोनभद्र से आने वाली नहर से यहाँ सिंचाई होती है। अभी तक जिसे मैंने नाला समझा था असल में वह नहर है, जिसकी सहायता से वे सिंचाई करते हैं।  हालाँकि पानी उसमें बिलकुल कम था।

 

चकचुइयाँ गाँव में नहर ,जो नाले में तब्दील हो गई है

चकचुइंयाँ की जमीन की इस लड़ाई को बीस साल हो चुके हैं लेकिन इन बीस सालों में एक नई पीढी तैयार हो चुकी है लेकिन इनके पास भी कोई रोज़गार नहीं। सभी लोग मजदूरी करते हैं लेकिन उसमें भी काम रोज नहीं मिलता। परमशीला दूसरों के खेत में मिर्च तोड़ने जाती हैं,जहाँ से 150/- मजदूरी मिलती है, जिसमें 25 रुपया किराया भाड़ा में खर्च हो जाता।

रामचंदर और सुभावती के घर टायलेट देखकर मुझे अच्छा लगा लेकिन पूछने पर उन्होंने बताया कि केवल तीन तरफ दीवार ही खड़ी है। न छत है न गड्ढा बनाए हैं और न ही गमला (सीट) बिठाए। पता करने गए तो कहा कि आयेंगे, लेकिन आज छः माह हो गये कोई काम नहीं हुआ। सुभावती हँसते हुये कहती हैं -‘और अब तो हम लोग लकड़ी रखने के लिए इसका उपयोग कर रहे हैं।’

सुभावती के आंगन में आधा-अधूरा टॉयलेट,जो लकड़ी रखने के काम में लाया जा रहा है

सुभावती कक्षा बारह तक पढ़ी हैं। इस गाँव में उनकी ससुराल है। वह बताती हैं कि आजतक राशन कार्ड नहीं बन पाया जबकि प्रधान से कई बार मिल चुके हैं। तीन बार कुछ पैसे भी दिए, ऑनलाइन आवेदन भी कर चुके हैं। इस महंगाई में जहां काम नहीं मिलता, वहां राशन भी दुकान से खरीदना पड़ता है। बहुत मुश्किल से गुजारा हो पाता है। उनके तीन छोटे-छोटे बच्चे हैं। इस जंगल में रहते हैं न पानी की व्यवस्था है न स्कूल है।

हर घर नल से जल योजना अब तक इस गांव में नहीं पहुँच पाई है ..

सुबह साढ़े आठ बजे जब हम चकचुइया गाँव पहुंचे तब सबसे पहले जो दिखा वह था महिलाओं की सुबह की दिनचर्या का पहला और जरूरी काम कर रहीं थीं। वह काम था पानी भरने का। घरों  में नल का कनेक्शन नहीं है जबकि केंद्र सरकार ने 2024 तक हर घर नल से जल की योजना घोषित की है। हालाँकि अभी इसमें दो साल का समय है लेकिन इस गाँव में क्या, यहाँ के किसी भी गाँव में इस योजना की आहट नहीं सुनाई पड़ रही है।

कुत्ते की भूमिका में बिल्ली

बरसों-बरस बीत जाते हैं लेकिन लोगों का इंतज़ार खत्म नहीं होता। चुनाव के समय किए गए वादे धुंधले पड़ते जाते हैं। लोग अपने ही हालात में जीना सीख लेते हैं। उन्हें कुछ नहीं मिलता फिर भी उनकी उम्मीदें नहीं मरतीं। समय के साथ बहुत सी चीजों की भूमिका बदल जाती है। बहुत सी नई विशेषताएँ पैदा हो जाती हैं। मसलन गाँव के आसपास मुर्गे, कुत्ते, गाय-गोरु तो दिखाई दे रहे थे लेकिन परमशीला के दरवाजे पर मुर्गा खाने से बचाने के लिए पालतू बिल्ली को बांधकर रखा गया था। लग रहा था कि कुत्ते की भूमिका अब बिल्ली ने ले ली थी। लेकिन परमशीला ने बताया कि घर में चूहे बड़े दुष्ट हो गए हैं। कपड़े-लत्ते काट देते हैं। उनके लिए बिल्ली जरूरी है। मुर्गों को बचाने के लिए इसको बाँधना पड़ता है। लेकिन बिल्ली भौंक नहीं सकती इसलिए कुत्ते बहुत जरूरी हैं!

अपर्णा रंगकर्मी और गाँव के लोग की कार्यकारी संपादक हैं।

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