रिस्ट एश्योर्ड यानी विश्वनाथ की आत्मकथा के बहाने मेरी दीवानगी के कुछ किस्से

   एच.एल.दुसाध

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मैं स्वभाव से बहुत ही अतिवादी व्यक्ति हूँ। प्रेम और नफरत दोनों में मुझ जैसा एक्सट्रीमिस्ट व्यक्ति ढूंढे नहीं मिलेगा। जो चीज अच्छी लगती है, मैं उसकी सीमाएं तोड़ देता हूँ। इस डर से मैंने कभी ताश नहीं खेला। कभी शतरंज से लगाव हुआ तो रात-रात भर जगकर मजा लेने लगा, किन्तु अपने अतिवादी स्वभाव से डर कर बड़ी मुश्किल से इससे पीछा छुड़ाया। प्रौढावस्था में  मेरा यही अतिवाद लेखन में भी दिखा। सिर्फ शक्ति के स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक विविधता के सम्यक प्रतिबिम्बन होने से ही मानव जाति सुखी हो सकती है, यह विचार जब मन में घर कर गया, उसके बाद अपने एक्सट्रीमिस्ट स्वभाव के चलते इतने जूनून के साथ डाइवर्सिटी पर लेखन किया कि सिर्फ दो दशकों में ही सामाजिक बदलाव से जुड़े किसी विषय विशेष पर लेखन के मामले में दुनिया का सारा रिकॉर्ड ही ध्वस्त कर दिया। अभी तक भारत के लोग मेरे लेखन के इस पक्ष की जानबूझकर अनदेखी किये जा रहे हैं, पर, सच्चाई यह है कि जिस तरह मैंने डाइवर्सिटी पर विपुल लेखन किया है, वैसा शायद दुनिया के इतिहास में और कोई नहीं कर पाया। यह अपने शोध से मैं जानता हूँ। अगर हिन्दू जातिवादी सोच के शिकार नहीं होते तो अब तक नोबेल के लिए दुसाध के नाम की सिफारिश हो चुकी होती। लेकिन दुसाध ने कभी भौतिक सुख को जीवन में तरजीह दिया नहीं, इसलिए नोबेल-फोबेल दुसाध के लिए कोई मायने ही नहीं रखता। बहरहाल अपने अतिवादी स्वभाव के चलते जिन कई क्षेत्रों में सारी हदें पार कर गया, उनमे एक क्षेत्र अध्यात्म का है। अगर आज मैं मानव जाति को सुखी बनाने के लिए जूनून की हद तक लेखन डूबा हूँ तो, कभी इस मकसद के लिए मैंने ईश्वर भक्ति को माध्यम बनाया, जिसके लिए जिम्मेवार बनी 1979 में क्रिकेट से जुड़ी एक नाटकीय घटना!

मैंने ईश्वर भक्ति के सहारे दुनिया बदलने का जो डेढ़ दशक तक प्रयास किया, मेरे हिसाब से वह भक्ति के इतिहास की अनोखी घटना होगी। लोगों को खुशहाल बनाने लिए जो भक्ति शुरू किया, वह इस लेवल पर पहुंची थी कि जब मैं चलता तो मेरे हर कदम से सीता-राम, लखन-हनुमान जय का रिदम पैदा होता। मेरे लिए मंदिर- चर्च- मस्जिद समान थे। वहाँ पहुंचकर जब आँखों से प्रेमाश्रु नहीं टपकता तब पैसे और समय की बर्बादी का अहसास होता। मैंने कभी धूप-अगरबत्ती जलाकर ईश्वर भक्ति नहीं की। हाँ, 1996 में कोलकाता छोड़ने के पूर्व तक विदाउट फेल एक मजार : बाबा करीम शाह के मजार पर 1979- 96 तक प्रत्येक शुकवार को लड्डू जरूर चढ़ाता रहा। लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए जो भक्ति किया, वह शायद दुनिया के इतिहास की अपने किस्म की अनोखी घटना होगी। मैंने सघन भक्ति के दरम्यान निज उन्नति या बाल बच्चों तथा निजी जागतिक दुखों के निवारण के लिए कभी खुदा-भगवान-गॉड से याचना ही नहीं की।

1978 में पकिस्तान के खिलाफ टीम मैचों की सीरीज में भारत की इकतरफा हार से मैं बहुत ही व्यथित हुआ था। जैसा कि मैंने बताया कि स्वभाव से अतिवादी हूँ, इसलिए 1978 पकिस्तान की भूमि पर क्रिकेट में मिली बेहद शर्मनाक हार से शायद औरों की तुलना में कुछ ज्यादा ही आहत हुआ था। बहरहाल 1979 के नवम्बर में 6 टेस्ट मैचों की सीरिज खेलने के पाक टीम भारत आई : कप्तान थे मेरे फेवरिट पाकिस्तानी आसिक इकबाल! पहला ही मैंच दिल्ली में था, जिसमें दुबले-पतले सिकंदर बख्त ने असाधारण फ़ास्ट बोलिंग का मुजाहिरा करते हुए भारत को 124 पर आल आउट कर दिया था।  इससे मैं सदमे में आ गया था।  शाम को मेरे मित्र आर के त्रिपाठी घर आये और मेरी उदासी का सबब पूछा। जब मैंने देश की राजधानी में पाकिस्तान के समक्ष भारत की हार की सम्भावना जाहिर की, तब वह भी बहुत उदास हुए। फिर कुछ देर बाद उदासी पर काबू पाते हुए उन्होंने जो कहा, वह आज भी याद है. उन्होंने कहा था ,’ देखिये हरि लाल जी, जब भी कोई संकट आता है, मैं भोले शंकर को याद करता हूँ और वे संकट दूर कर देते हैं!’ मैंने कहा,’ यदि आपके भोले शंकर भारत को हार से बचा लेंगे तो मैं भी उनका भक्त हो जाऊंगा और आपकी तरह प्रत्येक सोमवार को व्रत रहूँगा.’ उसके बाद चमत्कार हुआ और भारत की हार ही नहीं टली : हम जीतते-जीतते रह गये! उसके बाद मैं सोमवार को शिव के नाम पर व्रत रखने लगा और यह सिलसिला 1995 तक चला.

थोड़े ही दिनों बाद मेरी भक्ति का लक्ष्य राष्ट्र की उन्नति और गरीब-दुखियों के चेहरे पर मुस्कान लाना हो गया। तब मैं जाति-फाति के विषय में नहीं जानता था। उन दिनों फिल्म और क्रिकेट तथा नावेल एन्जॉय करना ही मेरा नशा था। तब मेरे लिए राष्ट्र की उन्नति का मतलब यह था कि किसी के चेहरे पर उदासी न रहे : हर कोई मेरी तरह खुशहाल रहे। लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाने के क्रम में 1979 से 1995 तक साल में औसतन 80-90 दिन उपवास रहा। 52 सोमवार के अतिरिक्त, दुर्गापूजा की नवरात्रि, 9-10 दिन मुसलमानों के पर्व रोजा में भूखे रहना अपनी भक्ति में शुमार था। वैसे तो व्रत का सिलसिला 19 95 तक चला, किन्तु भक्ति का क्रम लगभग 1997 तक चला। 1990 में डॉ आंबेडकर पर मेगा टीवी सीरियल का प्रोजेक्ट मंडी हाउस में जमा करने के बाद जब इसके एप्रूवल के लिए विभिन्न अम्बेडकरवादी शख्सियात और संगठनों के संसर्ग में आने का सिलसिला शुरू हुआ, तब भक्ति का नशा टूटने लगा और 1997 में मैं इस निष्कर्ष पर पहुंच गया कि ईश्वर-फिश्वर से दुनिया नहीं बदली जा सकती: लोगों के चेहरे पर मुस्कान नहीं लाई जा सकती! 19 97 में ईश्वरीय शक्ति से पूरी तरह निराश होने के बाद मैंने दुनिया बदलने के लिए जो कलम थामा तो मानव जाति को सुखी बनाने के लिए लेखन में इतिहास ही रच दिया।

जी. आर. विश्वनाथ के साथ मेरा रिश्ता भक्त और भगवान का था और मेरे भगवान ने शायद इसे महसूसा भी था. एक बार ईडन गार्डन में कर्णाटक और बंगाल रणजी ट्राफी मैच था. उस दिनशायद होली थी, किन्तु गुरु को देखने के लिए होली की उपेक्षा कर मैं अपने दोस्तों के साथ पहुँच गया था ईडन गार्डन ! अभी हम टिकट ले ही रहे थे कि विश्वनाथ मेन गेट के सामने अपनी टीम के साथ उतरे. उन्हें देखते ही लोग शोर मचाने लगे. मेरे नजर गयी तो मैं लोगों को धकेलते सीधाउनके सामने आ गया और उत्साह में गुरु कहकर उनका पैर छूने के लिए झुक गया.लेकिन उन्होंने पकड़ कर मुझे गले लगा लिया

मैंने ईश्वर भक्ति के सहारे दुनिया बदलने का जो डेढ़ दशक तक प्रयास किया, मेरे हिसाब से वह भक्ति के इतिहास की अनोखी घटना होगी। लोगों को खुशहाल बनाने लिए जो भक्ति शुरू किया, वह इस लेवल पर पहुंची थी कि जब मैं चलता तो मेरे हर कदम से सीता-राम, लखन-हनुमान जय का रिदम पैदा होता। मेरे लिए मंदिर- चर्च- मस्जिद समान थे। वहाँ पहुंचकर जब आँखों से प्रेमाश्रु नहीं टपकता तब पैसे और समय की बर्बादी का अहसास होता। मैंने कभी धूप-अगरबत्ती जलाकर ईश्वर भक्ति नहीं की। हाँ, 1996 में कोलकाता छोड़ने के पूर्व तक विदाउट फेल एक मजार : बाबा करीम शाह के मजार पर 1979- 96 तक प्रत्येक शुकवार को लड्डू जरूर चढ़ाता रहा। लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए जो भक्ति किया, वह शायद दुनिया के इतिहास की अपने किस्म की अनोखी घटना होगी। मैंने सघन भक्ति के दरम्यान निज उन्नति या बाल बच्चों तथा निजी जागतिक दुखों के निवारण के लिए कभी खुदा-भगवान-गॉड से याचना ही नहीं की।  ईश्वर भक्ति से निराश होने बाद मैं भगवानों को सदम्भ 50 जूते मारने की बात करता रहा हूँ, तो इसलिए कि मैंने विभिन्न धर्मों के भगवानों से कभी अपने जागतिक सुख की याचना ही नहीं की. मेरे स्वाभिमान ने कभी इजाजत नहीं दी कि भक्ति-श्रद्धा के विनिमय में भगवानों से कुछ मांगूं। इसलिए माँगा तो सिर्फ यही कि ये दबे-कुचले लोग भी यदि ईश्वर की संतान हैं तो उनके चेहरे पर भी मुस्कान बिखेरने में अपनी शक्ति का इस्तेमाल करे।

मेरा दावा है दुनिया के जितने भी संत हुए उन्होंने कुछ न कुछ निजी लाभ के लिए भगवानों याचना किया होगा। जो बहुत अच्छे संत हुए हुए, उन्होंने जागतिक सुख की  नहीं तो मोक्ष की कामना जरूर की होगी, किन्तु मेरे लिए मोक्ष भी बहुत तुच्छ चीज रही। मैंने भक्ति के दौर में खूब आला दर्जे का भक्ति साहित्य पढ़ा : रामायण-महाभारत तो किशोरवय में पढ़ लिया था। प्रौढ़ावस्था में मैंने बांग्ला में भारतेर साधक सीरिज की प्रायः सारी किताबें ठीक से पढ़ लिया। भारतेर साधक सीरिज किताबों का स्तर हिंदी भक्ति साहित्य से कई गुणा स्तरीय रहा।  उस सीरिज से मैंने रामदास कठियाबाबा, बामा क्षेपा, तैलंग स्वामी, निगमानंद सरस्वती, श्यामाचरण लाहिरी इत्यादि आध्यात्मिक जगत के दर्जनों सुपर स्टार साधकों  को खूब पढ़ा। लेकिन आज जब अध्यात्मिक जगत के सुपर स्टारों की बातें याद करता हूँ तो सभी दुसाध के सामने बौने लगते हैं। कारण हिस्ट्री में किसी ने दुसाध जैसी निष्काम भक्ति की ही नहीं होगी, ऐसा मेरा दृढ विश्वास है। आज अगर मैं धर्म के मामले में चार धाम के शंकराचार्यों और लाखों साधु -संतों को चैलेन्ज करते रहता हूँ : अगर मैं हिन्दू धर्म को विश्व का सबसे अमानवीय धर्म घोषित करता हूँ तो उसके पीछे : 1979 से 19 97 तक की निष्काम भक्ति है जिसका अनुशीलन मैंने लोगों के चेहरे पर छाई उदासी दूर करने के मकसद से किया था। 1979- से 1997 : लगभग 18 सालों का वह दौर था जब मुझे ईश्वर का मानवीय स्वरूप दो व्यक्तियों में दिखा था और वे थे एक्टर दिलीप कुमार और क्रिकेटर जी. आर विश्वनाथ! इन दोनों का अपने-अपने क्षेत्र का काम मुझे मानवीय- प्रयास के बूते के बाहर का लगता था। मैं यह मानता था कि न तो प्रयास करके दिलीप साहब जैसी एक्टिंग की जा सकती है और न ही जी- आर विश्वनाथ जैसी बैटिंग!

जी. आर. विश्वनाथ के साथ मेरा रिश्ता भक्त और भगवान का था और मेरे भगवान ने शायद इसे महसूसा भी था। एक बार ईडन गार्डन में कर्णाटक और बंगाल रणजी ट्राफी मैच था। उस दिन शायद होली थी, किन्तु गुरु को देखने के लिए होली की उपेक्षा कर मैं अपने दोस्तों के साथ पहुँच गया था ईडन गार्डन! अभी हम टिकट ले ही रहे थे कि विश्वनाथ मेन गेट के सामने अपनी टीम के साथ उतरे। उन्हें देखते ही लोग शोर मचाने लगे। मेरी नजर गयी तो मैं लोगों को धकेलते  सीधा उनके सामने आ गया और उत्साह में गुरु कहकर उनका पैर छूने के लिए झुक गया। लेकिन उन्होंने पकड़ कर मुझे गले लगा लिया। उस ज़माने में अपने चहेते नायकों को करीब से देखना ही बहुत बड़ी बात होती थी और गुरु ने तो मुझे गले….बहरहाल टिकट लेकर जब हम ईडन में प्रवेश किये, उस समय विश्वनाथ प्रैक्टिस के लिए सीढियों से उतरते हुए फील्ड में जा रहे रहे थे। सीढियों के बगल में बने फेंसिंग पकड़कर सैकड़ों लोग विश्वनाथ-विश्वनाथ का शोर मचा रहे थे। इन सब बातों से बेखबर वह तेजी से सीढियां उतरते हुए मैदान में जा रहे थे। कुछ मिनट पहले ही उनके गले लगने का अवसर मुझे मिल चुका था। किन्तु उनको सीढियां उतरते देख अपनी भक्ति का टेस्ट लेने के लिए मन फिर मचल उठा। मैंने जोर से आवाज़ दिया,’ गुरु एक नजर इधर भी !’ और मैं चकित रहा गया कि जो विश्वनाथ सैकड़ों लोगो के चीत्कार की अनसुनी कर मैदान की ओर बढे जा रहे थे, मेरी आवाज सुनकर मुड़े और बल्ला उठाकर मेरी ओर चौड़ी मुस्कान फेंकी। मुझे उन्हें 7-8 बार मैदान में खेलते हुए देखने का अवसर मिला था, जिनमें वेस्ट इंडीज के खिलाफ इडेन में खेला गया 139 रन का यादगार नॉक भी था। उसी ईडन में मैंने किम ह्यूज की टीम के ब्रूस यार्डली के हाथों 96 पर आउट होते हुए भी देखा था, लेकिन जब भी उन्हें फिल्ड पर देखा : जेंटलमैन गेम क्रिकेट के सबसे जेटलमैन को खेल के हर पल को एन्जॉय करते हुए पाया।

मेरे क्रिकेट के उसी भगवन को जब पकिस्तान में आशानुरूप प्रदर्शन न कर पाने के बाद 1983 में जब वेस्ट इंडीज के लिए नहीं चुना गया, मुझे बहुत ही आघात लगा। तब मैंने उनकी तुलना सत्यजित रे से करते हुए चार पेज का एक लेटर लिखा. यह किसी सेलेब्रेटी को मेरी ओर से लिखा गया पहला पत्र। मैंने उन्हें सांत्वना देने के लिए कर्णाटक क्रिकेट एसोसिएशन के मार्फ़त वह पत्र भेजा। मुझे यकीन नहीं था कि वह पत्र उन तक पहुंचेगा और वे जवाब देंगे। किन्तु मुझे विस्मित करते हुए दो सप्ताह के अन्दर उनका लिखा पत्रोत्तर मिल गया, जिसमें उन्होंने मुझे धन्यवाद देते हुए टीम में वापसी का यकीन दिलाया था। यह निश्चय ही उनके प्रति मेरे प्रबल भक्ति का कमाल था, जो मेरा पत्र उन तक किसी तरह पहुंचा और उसका उन्होंने जवाब दिया था।

बहरहाल, गुरु विश्वनाथ की वापसी न हो सकी और क्रिकेट के प्रति मेरा जूनून ख़त्म सा हो गया। उनके क्रिकेट से सन्यास लेने के बाद वह दीवानगी कुछ-कुछ पहले राहुल द्रविड़ और फिर विराट कोहली के लिए ही पैदा हुई।

गुरु विश्वनाथ के प्रति मेरी दीवानगी मेरे अतिवादी स्वभाव के कारण भिन्न रूप में प्रकट हुई। ढेरों लोग उनकी तुलना में गावस्कर के प्रति ज्यादे क्रेजी थे। इस क्रेज ने मुझे गावस्कर के प्रति बेहिसाब इर्ष्या से भर दिया। हालाँकि व्यक्तिगत जीवन में दोनों में परस्पर के प्रति बेपनाह सम्मान और प्यार था, जिस कारण एक अन्तराल के बाद गावस्कर की छोटी बहन कविता से उनकी शादी भी हुई, किन्तु मैं ठहरा अतिवादी व्यक्ति। मेरे लिए एक से पांच तक कोई क्रिकटर था तो वह विश्वनाथ थे : बाकियों की गिनती छठे नंबर से शुरू होती थी। किन्तु, आम लोगों में क्रेज तो गावस्कर का था। इसलिए विशी के प्रेम में मैं गावस्कर से नफरत करने लगा।  बाद में एक दौर ऐसा आया कि जो ही समीक्षक गावस्कर को तरजीह देता, मैं अपने मित्र मंडली में गावस्कर को साधारण क्रिकेटर साबित कर देता। अस्सी के दशक में हमारे मित्र मंडली में चर्चा का प्रमुख विषय होता था क्रिकेट और मेरी हर चर्चाविश्वनाथ के मुकाबले गावस्कर को हीनतर साबित करने पर जाकर ख़त्म होती। मैं उस दौर में बहुत ही दावे के साथ कहा करता था कि गावस्कर विश्व स्तर के क्रिकेटरों में सबसे कम प्रतिभाशाली है। गावस्कर विश्व स्तर के खिलाड़ियों सबसे साधारण है, अपने इस दावे को मैं बहुत ही बलिष्ठतापूर्वक स्थापित कर लेता था। गावस्कर को कम प्रतिभाशाली साबित करने के क्रम में ही मुझमे उस दौर में लॉजिक खड़ा करने की क्षमता विकसित होती गयी। तब लेखन में उतरने का सपना भी नहीं देख सकता था। आज अगर पत्रकारीय लेखन में में खुद को ग्रेटेस्ट कहने की स्थिति में पहुंचा हूँ तो उसके पीछे मेरी विश्वनाथ के प्रति भक्ति ही है जब मैं गावस्कर को उनसे हीनतर साबित करने में अपनी सारी युक्ति झोंक देता था।

क्रिकेट मेरे सबसे प्रिय विषयों में एक रहा है और मुझे इस बात का भारी अफ़सोस है कि आजतक कोई ऐसा नहीं मिला जिससे जी भर कर तर्क कर सकूं : जितने भी मिले इस मामले में बहुत साधारण लगे। गावस्कर वर्ल्ड क्लास के सबसे साधारण खिलाड़ी हैं यह साबित करने के लिए मैंने कभी डेनिस लिली को पत्र लिखकर गावस्कर के विषय में उनकी धारणा को चुनौती दी थी। इसी तरह मैंने कभी क्रिकेटर गोपाल बोस को बड़ा सा लेख लिखकर गावस्कर पर डिबेट करने के लिए ललकारा था, पर किसी ने आज तक मेरी चुनौती कबूल नहीं की। गावस्कर के  प्रति अपने नफरत पर काबू पाने के लिए उनकी जीवनी सन्नी डेज की वह पंक्तियाँ कई -बार दोहराया ,जिसमें उन्होंने लिखा है कि जो शॉट हमलोग नेट प्राक्टिस लगाने का साहस नहीं जुटा पाते थे, वैसे शॉट विश्वनाथ टेस्ट मैचों में लगाया करते थे। बावजूद इसके गावस्कर के प्रति मेरी नफरत में कभी कमी नहीं आई, जबकि अन्य कई क्रिकेटर विश्वनाथ के विषय में अच्छी राय देकर मेरी नज़रों में नायक बन गए। मसलन मैं रवि शास्त्री का कर्नाटक मूल का होने के कारण फैन बन चुका था, किन्तु उन्होंने जब विश्वनाथ के बारे में एक बार यह कहा- ऑन एनी विकेट ही वाज ग्रेटेस्ट– तब मेरी नज़रों शास्त्री का कद और बढ़ गया। इसी तरह ग्रेट कपिल देव ने कई मौकों पर कहा था,’ वह मेरे सर्वकालिक हीरो हैं!’

अगोरा प्रकाशन की किताबें अब किन्डल पर भी उपलब्ध –

मेरे लिए ईश्वर के साक्षात् रूप रहे विश्वनाथ के विषय में भारत की हिस्ट्री के ग्रेटेस्ट आलराउंडर कपिल देव ने फिर एक वही पुरानी बात लिखकर फिर अपना मुरीद बना लिया है। मौका था जी आर विश्वनाथ की आत्मकथा रिस्ट एश्योर्ड के विमोचन का, जिसके सह-लेखक वरिष्ठ पत्रकार आर कौशिक हैं। वर्षों आनाकानी के बाद कलाइयों के जादूगर जी आर विश्वनाथ अपनी आत्मकथा लिखने के लिए तैयार हुए और इसका विमोचन सन्नी गावस्कर, कपिलदेव, सौरभ गांगुली जैसे दिग्गजों की उपस्थिति में 12 मार्च को बेंगलुरु में भारत और श्रीलंका के मध्य शुरू हुए दिन-रात्रि टेस्ट के डिनर ब्रेक के दौरान हुआ। इस अवसर पर लाइमलाइट से अक्सर दूर रहने वाले संकोची स्वभाव के जी आर विश्वनाथ ने कहा है कि शुरुआत में किताब के सह लेखक कौशिक के विचार को ठुकरा दिया था, किन्तु बाद में परिवार के बहुत कहने पर इसके लिए तैयार हुआ। मेरे साथ जिस तरह का बर्ताव किया गया, वह शानदार है। विश्व क्रिकेट के दो महान खिलाडियों (गावस्कर और कपिल) के बीच खड़ा होना, मेरे लिए अविश्वसनीय बर्ताव है।’ कपिल देव ने उक्त अवसर पर फिर एक बार कहा,’ वह मेरे सर्वकालिक हीरो हैं।’ कपिल ने यह भी कहा, ‘इस किताब को 20 साल पहले लिखा जाना चाहिए था। काश ! मैं उनकी तरह बन पाता और उनकी तरह व्यवहार कर पाता। मैं हमेशा उनकी तरफ देखता था। वह खेल के सच्चे दूत हैं।  क्रिकेट के प्रशंसक के रूप में मैंने पहला ऑटोग्राफ विश्वनाथ का ही लिया था, जिसे आज भी सहेज कर रखा हूँ।’ इस मौके पर पूर्व भारतीय कप्तान और भारतीय क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष सौरव गांगुली ने कहा कि भारत के लिए खेलने की इच्छा रखने वाले युवा खिलाडियों को यह किताब पढ़कर खेल के बारे में काफी कुछ सीखने को मिलेगा।’

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गांगुली के मुताबिक़ निश्चय ही क्रिकेट खेलने के आकांक्षी युवाओं के लिए रिस्ट  अश्योर्ड एक संग्रहणीय पुस्तक साबित होगी, किन्तु मेरे हिसाब से क्रिकेट को धर्म समझने वाले भारतीयों के लिए रिस्ट एश्योर्ड एक धरोहर साबित होगी। कारण, विश्वनाथ जैसी शख्सियत क्रिकेट इतिहास में बहुत कम पैदा हुई होंगी। उनके खेल में जो कलात्मकता रही, उसकी मिसाल मिलनी मुश्किल है। लेकिन सबसे बड़ी बात है क्रिकेट यदि जेंटलमैन गेम है तो विश्वनाथ जैसे विशुद्ध जेंटलमैन क्रिकेटर धरती पर बहुत कम हुए होंगे। आउट होने पर अम्पायर की अंगुली उठने के पहले वह क्रीज छोड़कर चल देते थे। कौन भूल सकता है उनका वह गेस्चर जब अम्पायर द्वारा आउट दिए जाने के बाद बाद पैविलियन की ओर जाते अंग्रेज क्रिकेटर बॉब टेलर को बुलाकर बैटिंग का अवसर दिया था। उसके फलस्वरूप उनकी कप्तानी में मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम खेला गया वह मैच भारतीय टीम हार गयी, किस्तु विशी का फैसला क्रिकेट इतिहास के सबसे यादगार घटनाओं में शुमार हो गया।  उनकी बोयोग्रफी रिस्ट एश्योर्ड में पाठकों को ऐसे ढेरों रोचक प्रसंगों से रूबरू होने का अवसर मिल सकता है। इस किताब में 1974- 75 एंडी रोबर्ट्स, होल्डर, बर्नाड जुलियन जैसे खौफनाक फ़ास्ट बॉलरों के खिलाफ चीपक के हरियाली पिच पर खेली गयी 97 रनों की अविस्मर्णीय पारी का जिक्र होगा, जिसे विजडन ने क्रिकेट हिस्ट्री की 38 बेहतरीन परियों में जगह दिया था। किस तरह उन्होंने 1979 में कालीचरण की टीम के खिलाफ चीपक में ही 124 रनों की वह पारी खेली थी जिसमें गावस्कर दोनों परियों में सिंगल फिगर में आउट हुए और विश्वनाथ की उस पारी के वजह से भारत सीरिज जीतने में सफल रहा। मैंने अपनी जिंदगी में अब तक दो किताबें खरीद कर पढी है: पहली, आस्ट्रेलिया के  महान क्रिकेट समीक्षक रे रोबिन्सन की वाइल्डेस्ट टेस्ट और दूसरी सुनील गावस्कर की आत्मकथा  सन्नी डेज! अब मैंने जो तीसरी किताब खरीद कर पढ़ने  का मन बनाया है , वह है भगवान के जीते-जागते स्वरुप जी आर विश्वनाथ की आत्मकथा : रिस्ट  एश्योर्ड !

दुसाध बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और कैसे हो संविधान के उद्देश्यों की पूर्ति जैसी चर्चित पुस्तक के लेखक हैं।

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