Thursday, February 29, 2024
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पश्चिम एशिया के देशों में बाध्यकारी पलायन और सिनेमा

रूस और यूक्रेन के बीच लगभग तीन महीने से भीषण युद्ध चल रहा है और लगभग 14 मिलियन लोग विस्थापित हो चुके हैं, और पलायन लगातार जारी है। श्रीलंका आज भारी आर्थिक संकट मे फंस चुका है और गृहयुद्ध जैसे हालात हैं। तमिल-सिंघली विवाद में बडी संख्या में तमिलों को पलायन कर भारत में शरण […]

रूस और यूक्रेन के बीच लगभग तीन महीने से भीषण युद्ध चल रहा है और लगभग 14 मिलियन लोग विस्थापित हो चुके हैं, और पलायन लगातार जारी है। श्रीलंका आज भारी आर्थिक संकट मे फंस चुका है और गृहयुद्ध जैसे हालात हैं। तमिल-सिंघली विवाद में बडी संख्या में तमिलों को पलायन कर भारत में शरण लेनी पड़ी थी। बीस साल से ज्यादा समय तक लड़ाई लड़ने के बाद अफगानिस्तान की सत्ता पर तालिबान का पुनः कब्जा हो चुका है। कमजोर एथनिक समुदायों के लोग पड़ोसी देशों जैसे पाकिस्तान, ईरान और भारत में शरण लेने को बाध्य हुए हैं। म्यांमार मे लक्षित हिंसा का शिकार होकर रोहिंग्या मुसलिमों को बांग्लादेश, भारत और अन्य पड़ोसी देशों में अवैध प्रवासियों के रूप में जीवन गुजारना पड़ रहा है। मेक्सिको और अमेरिका के बॉर्डर पर अवैध प्रवासियों के कारण रोज घमासान मचा रहता है। और युद्ध, देशों के बंटवारे, अकाल, महामारी और रोजगार की तलाश में लोग एक देश से दूसरे देश को प्रवास करते रहे हैं। सूचना प्रौद्योगिकी एवं संचार तकनीकी एवं ट्रांसपोर्ट के साधनों की उपलब्धता ने मानवीय गतिशीलता को बहुत तीव्र कर दिया है। इस तेजी के कारण समुदायों के बीच वैमनस्य और टकराव भी बढ़ गए हैं। धार्मिक और एथनिक विविधता के कारण एक देश के भीतर भी साधनों और अवसरों के विभाजन में भेदभाव और घृणा भाव के कारण गृहयुद्ध जैसी परिस्थियाँ उत्पन्न होने के कारण कमजोर समुदायों को जबरदस्ती अनैच्छिक पलायन कर शरणार्थी बनने को बाध्य होना पड़ता है। सिनेमा के माध्यम से पलायन और उससे उत्पन्न समस्याओं को चित्रित करने का काम कई फ़िल्मकारों ने किया है। मध्य एशिया और पश्चिम एशिया के देशों में संघर्ष, हिंसा और पलायन एक गंभीर मुद्दा रहा है। इस लेख के माध्यम से हम पलायन के सिनेमा पर एक लेखों की शृंखला का आरंभ कर रहे हैं जिसमें सिनेमा के माध्यम से प्रवास और उसके प्रभावों पर विचार किया जाएगा।

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बाध्यकारी पलायन को स्नेजान स्टैंकोविक (Snezana Stankovic 2021) ने परिभाषित करते हुए लिखा है, Forced migration refers to the forcibly induced movement of people, for example, when migrants are forced to flee to escape conflict or persecution or become trafficked. The definition also encompasses situations of enforced immobility, for example, when displaced people are confined to refugee camps and detention centers. Forced displacement may occur within or across the borders of the nation-state. According to this definition, the effect of the force causing the migratory movement is crucial, and distinguishes forced migrants—who may be termed “refugee,” “trafficked person,” “stateless person,” “asylum seeker,” or “internally displaced persons” (IDPs)—from other migrants such as economic migrants. However, as anthropologists of forced migration illustrate, such distinctions by legal, state, or international organizations are not always relevant outside of institutional logics; when backed up by the force of the state, they can undermine the livelihoods and safety of migrants.

पश्चिमी एशिया की बात करें तो इस क्षेत्र में विभिन्न देशों आंतरिक और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार गृहयुद्ध, युद्ध, नृजातीय हिंसा और अशान्ति के कारण लोग बड़ी संख्या में पलायन को बाध्य हुए हैं। सोमालिया, सीरिया, यमन और इराक में आईएसआईएस (ISIS) के आतंकवादी आतताइयों के कारण निर्दोष नागरिकों को अपने घर व्यवसाय और देश को छोड़कर दूसरे देशों मे शरण लेनी पड़ी है। जब 2 सितंबर, 2015 को सीरिया के कुर्द समुदाय के दो वर्षीय लड़के ऐलान कुर्दी की भूमध्य सागर में डूबने से मौत हो गई तो उसकी फ़ोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो गई और दुनिया भर के लोगों के जेहन में बाध्यकारी पलायन को लेकर एक चिंता उभरी। उस छोटे बच्चे के साथ उसकी माँ और भाई की भी मौत हो गई थी। ऐलान का परिवार तुर्की होते हुए यूरोप जाना चाहता था और आगे अपने सुरक्षित भविष्य के लिए कनाडा पहुंचना चाहता था। मेक्सिको कनाडा बॉर्डर पार करने के चक्कर में कई परिवार आए दिन जान गँवाते रहते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक अन्तराष्ट्रीय संस्था के अनुसार मेक्सिको-अमेरिका सीमा पर सन 2021 से अब तक लगभग 650 लोग प्रवास के चक्कर में अपनी जान गंवा चुके हैं। मेक्सिको हरित क्रांति का जनक रहा है लेकिन आज रोजगार के बुरे हालात के कारण लोग अमेरिका में घुसना चाहते हैं लेकिन अमेरिका उन्हें रोकने में लगा है क्योंकि प्रवासी लोगों के कारण वहाँ कई तरह की समस्याए उत्पन्न हो रही हैं। दुनिया भर के फ़िल्मकारों ने इन मुद्दों को अपनी फिल्मों के माध्यम से चित्रित करने का काम किया है। सियासतदानों की अनियंत्रित इच्छाओ के कारण लादे गए युद्धों के प्रभाव में निर्दोष जनता को अपना घर, काम छोड़कर दूसरे क्षेत्रों या देशों को पलायन करना पड़ता है, इस पीड़ा को वही समझ सकते हैं जो इसके भुक्तभोगी हैं।

मैक्सिको सीमा पर पलायन का एक दृश्य

जहां पर एक ही धार्मिक मान्यता के लोग रहते हैं वहाँ भी अल्पसंख्यक और आर्थिक रूप से कमजोर एथनिक समुदायों को हिंसा और भेदभाव का शिकार बनाया जाता है और यहाँ के वातावरण में उन्हें अपने मूल स्थानों से पलायित होना पड़ता है। यह सारी लड़ाई धार्मिक उन्माद, सत्ता पर कब्जे एवं प्रभुत्व की है। रूस आज सोवियत संघ के विघटन के बाद अलग हुए राष्ट्र-राज्यों पर पुनः आधिपत्य स्थापित करने की नीयत से युद्ध में है और लेनिन की मूर्तियाँ भी स्थापित करने लगा है। लेफ्ट हो या राइट सभी विचारधाराओं के तानाशाह साम्राज्यवादी सोच के वशीभूत हो मानवाधिकारों का उल्लंघन कर निर्दोष समुदायों को युद्ध में धकेल रहे हैं और दूसरों की दया पर जीने को मजबूर कर रहे हैं। हिन्दी साहित्य और बॉलीवुड सिनेमा में महत्वपूर्ण योगदान करने वाले साहित्यकार कमलेश्वर ने अपने उपन्यास कितने पाकिस्तान (2000) में दुनिया भर के मिथकों और इतिहास में विद्यमान विभाजनकारी तत्वों की पड़ताल कर उनके दूषित मन्तव्य को उद्घाटित करने का काम किया है। जातिवाद, सांप्रदायिकता, सामुदायिक घृणा, बहुसंख्यकवाद, उग्र राष्ट्रवाद, के कारण श्रीलंका, यूक्रेन, म्यांमार आदि देशों में गृहयुद्ध या युद्ध जैसी स्थितियाँ बनी हुई हैं। अगर हम विश्वभर के देशों पर निगाह डाले तो पाएंगे कि लगातार युद्ध और एथनिक संघर्ष जैसी घटनाए कहीं न कहीं होती रहती हैं। लोग अपनी मातृभूमि से विस्थापित होकर स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास और रोजगार के लिए दूसरों की दया पर निर्भर हो जाते हैं और प्रवास की पीड़ा और वंचना को झेलते हैं।

पश्चिमी एशिया और विस्थापन का सिनेमा

पश्चिमी एशिया में बहरीन, इराक, जोर्डन, कुवैत, लेबनान, ओमान, फिलिस्तीन, कतर, सऊदी अरब, सीरिया, संयुक्त अरब अमीरात और यमन जैसे देश स्थित हैं। इन देशों में युद्ध और विस्थापन का लंबा इतिहास है जिसके कारण बड़े पैमाने पर दबाव में विस्थापन हुआ है। हिंसा और विस्थापन से एक बड़ी आबादी के प्रभावित होने के कारण सिनेमा और साहित्य में इन्हें अभिव्यक्ति भी मिली है। सिनेमा संदेशों को चित्रित करने और एक बड़ी दर्शक संख्या तक पहुंचाने का एक सशक्त माध्यम है। सिनेमा बीसवीं सदी की एक महत्वपूर्ण खोज है जिसमें चित्रित विषयों को हम मनोरंजन के साथ-साथ शोध एवं अध्ययन के लिए बार-बार प्रयोग में ला सकते हैं। यहाँ हम पश्चिमी एशिया के देशों मे युद्ध और हिंसा के कारण दबाववश हुए प्रवास को प्रस्तुत करने वाली फिल्मों के विषयवस्तु का विवरण प्रस्तुत करेंगे।

फिल्म बोर्न इन सीरिया का एक दृश्य

बोर्न इन सीरिया (2016) सात रिफ्यूजी बच्चों की दर्दनाक दास्तान है जो नए जीवन और अवसरों की तलाश में पूरे यूरोप की यात्रा करते हैं। वे अपने पीछे बिखरे हुए परिवार, उजड़ा हुआ वतन छोड़ आए हैं। वे सभी रात के समय एक ग्रीक द्वीप पर पहुंचते हैं। वे लोग दर्द से चीख रहे होते हैं। एक छोटी लड़की रो रही है, एक वृद्ध आदमी दम तोड़ देता है तो एक घायल छोटा बच्चा अपने पिता को पुकार रहा है। यह फिल्म का पहला दृश्य है जिसके बाद सात बच्चों की यूरोप यात्रा को दिखाया गया है। हर एक बच्चे की अलग कहानी है लेकिन पलायन का दुख एक समान है। इसमें आठ साल का लड़का हामुद है जिसके माँ-बाप की हत्या हो चुकी है और उसने देखा है कि पलायित लोग हंगरी के एक चिड़ियाघर में शरण लेने को मजबूर हैं। इंसान और जानवर के बीच का भेद मिट चुका है। एक दस साल का बच्चा कैस है जो बुरी तरह जला हुआ है और उसके चाचा से यह सच उसे नहीं बताया रहा कि उसके पिता की मौत हो चुकी है। बारह साल के असरौली के परिवार ने सीरिया से बाहर सुरक्षित निकलकर कैंप तक पहुँचने के लिए कई हजार डालर का घूस दिया है लेकिन उनके लिए शरणार्थी कैंप का गेट बंद है। तेरह साल का मारवान सोचता है कि ‘मेरी समझ में अपना घर छोड़कर भागना और समुद्र पार करना ही सबसे बुरी बात थी, लेकिन कहीं न जा पाने की स्थिति ज्यादा बुरी है।’ अपना घर छोड़ कर लोग कहाँ जाएँ, ये विकल्पहीनता की स्थिति कितनी भयावह है? युद्ध/ गृहयुद्ध बच्चों के लिए कितने आमनवीय और अन्यायपूर्ण हैं इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। वे बिना किसी गलती के युद्ध के दुष्परिणाम झेलते हैं। उन्हे नहीं पता होता कि वे कहाँ जाएँ? वे भोजन और आवास के अभाव में असमय और बेमौत मारे जाते हैं। तीन साल के बच्चे ऐला कुर्दी की भूमध्यसागर मे डूबकर हुई मौत को पूरी दुनिया ने देखा था। बार्न इन सीरिया के निर्देशक ने कम उम्र के बच्चों पर फोकस करते हुए इस फिल्म को बनाया था क्योंकि बच्चे अपने आसपास हो रही घटनाओं से अनजान होते हैं लेकिन जो भी घट रहा होता है वह गंभीर रूप से गलत और मुश्किल भरा होता है। परिवारों के बिखरने, बच्चों के अनाथ होने और अपने घरों के छूट जाने का दर्द इस फिल्म के माध्यम से सामने आता है। युद्ध और गृहयुद्ध की स्थितियों में दुनिया के अन्य देश भी अपने अपने लाभ और हानि के दृष्टिगत अपनी नीतियाँ और गतिविधियां संचालित करते रहते हैं। सीरिया के मामले में जर्मनी और हंगरी का नाम आता है। यह फिल्म इस बात को रेखांकित करना नहीं भूलती कि प्रत्येक समाज और देश में ऐसे लोग भी होते हैं जो युद्ध से प्रभावित असहाय लोगों की खूब मदद भी करते हैं।

व्हेन आई सा यू का एक मार्मिक दृश्य

वेन आई सा यू (When I saw you 2012) सन 1960 में जोर्डन देश की प्रवासी समस्या को दर्ज करती फिल्म है। अपनी जमीन से उजड़ जाने, बेघर होने और अपने पिता को खो देने की दिल को दहलाने वाली दास्तान है इस फिल्म में, जिसे फिलिस्तीनी महिला निर्देशक अन्नेमारी जाकिर ने बनाया है। तारेक एक ग्यारह साल का लड़का है और उसकी माँ घायदा है जो एक रिफ्यूजी कैंप मे रहते हैं। वे दोनों अपने पिता/पति से बिछड़े हुए हैं और उम्मीद के साथ उसके लौट आने का इंतजार करते हैं। उनका यह इंतजार और दर्द अकथनीय और असहनीय है। तारेक पढ़ाई में अच्छा है लेकिन उसका मन नहीं लगता। वह स्कूल से भाग जाता है और गुरिल्ला ट्रेनिंग कैंप मे पहुँच जाता है जहां वह एक सैनिक बनना चाहता है। यहाँ इस कैंप में वह मन लगाकर ट्रेनिंग लेता है। यहाँ भी उसकी माँ उसे जॉइन करती है। वे दोनों तारेक के पिता की अनुपस्थिति की पीड़ा को महसूस करते हैं और उसके लौट आने की उम्मीद के साथ उनकी ज़िंदगी आगे बढ़ती है।

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एक ऐसा अभिनेता जो हिंदी सिनेमा की परम्परा को तोड़ता है

युद्ध हो या गृहयुद्ध कुछ लोगों की शासक बनने की इच्छा और दूसरों को दबाकर अपने अधीन करने की इच्छा का परिणाम होते हैं जिसके कारण तमाम निर्दोष लोगों विशेषकर महिलाओं और बच्चों की ज़िंदगी तबाह हो जाती है। उन्हें बेवजह अपने घर-देश को छोड़कर दूसरे स्थानों पर पनाह लेनी पड़ती है। दुनिया में हर समय कोई न कोई युद्ध चलता रहता है और लोग रेफ्यूजी बनने को मजबूर होते हैं। चूंकि यह समस्या सार्वभौमिक है इसलिए दुनिया के सभी देशों में उनके ऊपर साहित्य और सिनेमा भी रचा गया है। दबाव के कारण पलायन करने को मजबूर समुदायों के दुख-दर्द को सामने लाने के लिए ऐसी फिल्मों को बार-बार देखने और उन पर चर्चा करने एवं लिखे जाने की आवश्यकता है।

 

 

डॉ. राकेश कबीर
डॉ राकेश कबीर जाने-माने कवि और सिनेमा के गंभीर अध्येता हैं।

7 COMMENTS

  1. वर्तमान परिस्थितियों के मुताबिक सारगर्भित लेख ।
    ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पहुच सकें मानव की पीड़ा जिससे ऐसे हलाल न बनें।
    एक मानवतावादी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से युक्त विश्व का निर्माण हो सके।

  2. वर्तमान परिदृश्य को केंद्र में रखकर लिखा गया गंभीर किंतु पठनीय आलेख। युद्ध, गृह युद्ध तथा अन्य प्रकार के संघर्षों और अन्य कारणों से होने वाले पलायनों का विशद विश्लेषण प्रस्तुत किया है राकेश जी आपने इस कड़ी में। बधाई।

  3. लोग सामान्य रूप से अपने जन्मस्थान से भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं किंतु लाखों लोग अपने जन्म के स्थान और निवास को छोड़ देते हैं। इसके मुख्य रूप से दो कारण है।
    1- प्रतिकर्ष कारक – जो लोगों का निवास स्थान छुड़वाने का कारण बनते हैं।
    2-आपकर्ष कारक -जो विभिन्न स्थानों से लोगों को आकर्षित करते है।
    हिंसा, आतंकवाद, जबरन पलायन प्रतिकर्ष कारक के ही उधारहण प्रस्तुत करते है।
    जिसका आपने बहुत ही गहनता से हम पाठको के समक्ष विश्लेषण रूप में प्रस्तुत किया है।????????

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