साहित्य
साहित्य
वीरेंद्र यादव बनाम ज्वालामुखी यादव
आज सुबह अभी हम इलाहाबाद से आई प्रो राजेंद्र कुमार के न रहने की दुखद खबर से उबरे भी नहीं थे कि लखनऊ से प्रख्यात आलोचक वीरेंद्र यादव के जाने की स्तब्धकारी खबर आई। सहसा भरोसा करना मुश्किल था कि यह कैसे हो सकता है? दो दिन पहले उनके बीमार होने की सूचना मिली थी, लेकिन यह बीमारी इतनी घातक है यह न मालूम था। उनके जाने से बहुत कुछ खाली हो गया. वह गर्मजोशी से भरे बुद्धिजीवी थे जो केवल किताबी आलोचना तक सीमित नहीं थे, बल्कि लगभग सभी समकालीन मुद्दों पर लिखते और बोलते थे और बेलाग बोलते थे। उनके व्यक्तित्व के इन्हीं पहलुओं को छूता प्रख्यात कथाकार मधु कांकरिया की एक छोटी टिप्पणी जो उनके बहत्तरवें जन्मदिन पर चार साल पहले प्रकाशित की गई थी। आज पुनः उनको श्रद्धांजलिस्वरूप प्रकाशित की जा रही है।
मूँदहु आंख भूख कहुं नाहीं
अब गरज तो विश्व गुरु कहलाने से है, भूख बढ़ाने में विश्व गुरु कहलाए तो और भूख मिटाने में विश्व गुरु कहलाए तो। उसके ऊपर से 111 की संख्या तो वैसे भी हमारे यहां शुभ मानी जाती है। भारत चाहता तो पिछली बार की तरह, भूख सूचकांक पर 107वें नंबर पर तो इस बार भी रह ही सकता था। पर जब 111 का शुभ अंक उपलब्ध था, तो भला हम 107 पर ही क्यों अटके रहते? कम से कम 111 शुभ तो है। भूख न भी कम हो, शुभ तो ज्यादा होगा।
विश्वगुरु की सीख का अपमान ना करे गैर गोदी मीडिया
इन पत्रकारों की नस्ल वाकई कुत्तों वाली है। देसी हों तो और विदेशी हों तो, रहेंगे तो कुत्ते...
तुम्हारी लिखी कविता का छंद पाप है
मणिपुर हिंसा पर केन्द्रित कवितायें
हम यहाँ ख्यातिलब्ध बांग्ला कवि जय गोस्वामी की कुछ कवितायें प्रकाशित कर रहे हैं।...
हरिशंकर परसाई और शंकर शैलेंद्र की जन्मशती पर हुआ संगोष्ठी का आयोजन
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में हरिशंकर परसाई और शंकर शैलेंद्र की जन्मशती पर संगोष्ठी का...
चमचा बिनु बेस्वादी दुनिया
हम हिंदुस्तानियों को दो चीजें काफी पसंद हैं। एक चाय और दूसरा चमचे...! चाय तो अंग्रेजों की देन है लेकिन हम लोगों ने उसे...
गांधियों… रास्ता छोड़ो!
आखिर ये गांधी सरनेम वाले, कब तक मोदीजी के रास्ते में आते रहेंगे। पहले नेहरू सरनेम की आड़ में बेचारों को कभी इसके, तो...
अब… हिस्ट्री नहीं पढ़ाएंगे!
ये लो, कर लो बात। अब विरोधियों को मोदीजी के इतिहास की किताबों में काट-पीट करवाने से भी प्राब्लम है। हर चैप्टर के फटने...
रणनीतिक कौशल के रूप में खंडन मंडन की शैली का उपयोग
विगत 26 फरवरी 2023 को समय संज्ञान फाउंडेशन द्वारा आयोजित ईश कुमार गंगानिया के आत्मवृत्त मैं और मेरा गिरेबां का लोकार्पण व परिचर्चा का आयोजन गांधी...
आदर्शवादिता और सभ्यता मानव की, सिर पे धरके पाँव नाचती होली में
होली के मौके पर तेजपाल सिंह तेज की दो गज़लें प्रस्तुत हैं। इनमें आज के दौर का कड़वा सच अभिव्यक्त हुआ है।
आधुनिक भारत के वजूद को तलाशती किताब
पुस्तक समीक्षा - भारत का संविधान : महत्वपूर्ण तथ्य और तर्क
भारत को ब्रिटिश हुकूमत से आज़ादी मिले 75 साल से ज्यादा हो चुके हैं।...

