साहित्य
साहित्य
यादवों ने किस कृष्ण का निर्माण किया है?
पिछड़ों के साहित्य की खोज में जेल की कोठरियों की छानबीन, अदालती पराजयों का गहन अध्ययन, फांसी के फंदों और थानों की हवालातों के विश्लेषण से पिछड़ों का साहित्य खोजने की परिकल्पना की गई है। इसके साथ ही आदि लिपिकार पथरकटों, आदि आविष्कारक चरवाहों, किसानों, देशों के अन्वेषक और खोजी मल्लाहों, नाइयों, धोबियों, बुनकरों की ऐतिहासिक जीवन यात्राओं के अलावा विभिन्न घटनाओं के प्रभावों का गहन अध्ययन भी एक मुख्य परिकल्पना है और मुझे लगता है इन्हीं सब में एक विराट पिछड़ा साहित्य मौजूद है।
वीरेंद्र यादव बनाम ज्वालामुखी यादव
आज सुबह अभी हम इलाहाबाद से आई प्रो राजेंद्र कुमार के न रहने की दुखद खबर से उबरे भी नहीं थे कि लखनऊ से प्रख्यात आलोचक वीरेंद्र यादव के जाने की स्तब्धकारी खबर आई। सहसा भरोसा करना मुश्किल था कि यह कैसे हो सकता है? दो दिन पहले उनके बीमार होने की सूचना मिली थी, लेकिन यह बीमारी इतनी घातक है यह न मालूम था। उनके जाने से बहुत कुछ खाली हो गया. वह गर्मजोशी से भरे बुद्धिजीवी थे जो केवल किताबी आलोचना तक सीमित नहीं थे, बल्कि लगभग सभी समकालीन मुद्दों पर लिखते और बोलते थे और बेलाग बोलते थे। उनके व्यक्तित्व के इन्हीं पहलुओं को छूता प्रख्यात कथाकार मधु कांकरिया की एक छोटी टिप्पणी जो उनके बहत्तरवें जन्मदिन पर चार साल पहले प्रकाशित की गई थी। आज पुनः उनको श्रद्धांजलिस्वरूप प्रकाशित की जा रही है।
मूँदहु आंख भूख कहुं नाहीं
अब गरज तो विश्व गुरु कहलाने से है, भूख बढ़ाने में विश्व गुरु कहलाए तो और भूख मिटाने में विश्व गुरु कहलाए तो। उसके ऊपर से 111 की संख्या तो वैसे भी हमारे यहां शुभ मानी जाती है। भारत चाहता तो पिछली बार की तरह, भूख सूचकांक पर 107वें नंबर पर तो इस बार भी रह ही सकता था। पर जब 111 का शुभ अंक उपलब्ध था, तो भला हम 107 पर ही क्यों अटके रहते? कम से कम 111 शुभ तो है। भूख न भी कम हो, शुभ तो ज्यादा होगा।
विश्वगुरु की सीख का अपमान ना करे गैर गोदी मीडिया
इन पत्रकारों की नस्ल वाकई कुत्तों वाली है। देसी हों तो और विदेशी हों तो, रहेंगे तो कुत्ते...
तुम्हारी लिखी कविता का छंद पाप है
मणिपुर हिंसा पर केन्द्रित कवितायें
हम यहाँ ख्यातिलब्ध बांग्ला कवि जय गोस्वामी की कुछ कवितायें प्रकाशित कर रहे हैं।...
देशभक्ति की चाशनी में रची बॉलीवुड सिनेमा की महिला जासूस और राज़ी
भारत-पाकिस्तान के द्विपक्षीय संबंधों को देखें तो वे कभी भी सामान्य नहीं रहे हैं। संबंधों में तनाव और अविश्वास के कारण गुप्तचर संस्थाओं की अहमियत रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। बॉलीवुड ने दोनों देशों के बीच रणनीतिक मुद्दों को ध्यान में रखते हुए कई जासूसी फिल्में बनाई हैं। यद्यपि फिल्में मनोरंजन, समाजीकरण और सांस्कृतिक तत्वों के प्रसार का सबसे सरल परंतु अत्यंत प्रभावी माध्यम हैं। सिनेमा साहित्य की एक विधा है जो सामाजिक वास्तविकताओं का चित्रण करती है। एक कला माध्यम के रूप में इसमें कल्पना और नई व्याख्याओं का भी सहारा लिया जाता है। फिल्में प्रोपेगण्डा और छवि निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और एक साथ बहुत बड़े दर्शक वर्ग को प्रभावित कर धारणा निर्माण में मदद करती हैं। भारत-पाकिस्तान संबंधों पर बनीं फिल्मों को दर्शक पसंद भी बहुत करते हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में हम सन 2018 में रिलीज हुई फिल्म राज़ी के बारे में आगे चर्चा करेंगे।
चमचा बिनु बेस्वादी दुनिया
हम हिंदुस्तानियों को दो चीजें काफी पसंद हैं। एक चाय और दूसरा चमचे...! चाय तो अंग्रेजों की देन है लेकिन हम लोगों ने उसे...
गांधियों… रास्ता छोड़ो!
डेमोक्रेसी की मम्मी की गद्दी पर मोदीजी ने दावा ऐंवें ही थोड़े ठोक रखा है। खैर! नेहरूओं की छोड़ें, पर ओरिजिनल वाले गांधी इन नकली गांधियों के रास्ते पर क्यों चल पड़े? दावेदारी राष्ट्रपिता के पद की और चिंता सिर्फ अपनी कि बच्चों को सब बताओ कि गोडसे ने गोली मारी; कि गोडसे हिंदू अतिवादी था; कि ओरिजिनल वाले सरदार ने आरएसएस पर पाबंदी लगायी थी; वगैरह, वगैरह...!
अब… हिस्ट्री नहीं पढ़ाएंगे!
हां! बुढ़ऊ गांधी के अंत की नयी कहानी को अभी भी व्हाट्सएप से निकलकर, स्कूलों की किताबों तक पहुंचने में कुछ टैम लगेगा। आत्महत्या से लेकर बुढ़ापे की बीमारियों तक, अंत के आप्शन पहले ही सर्कुलेशन में हैं। इतिहास अनुसंधान परिषद 2025 तक शोधपूर्वक इनमें से किसी न किसी विकल्प को प्रमाणित कर देगी और स्कूली किताबों में नयी कहानी थेल ही देगी। तब तक के लिए चुपके से पहली वाली कहानी से खाली करवा दी है।
रणनीतिक कौशल के रूप में खंडन मंडन की शैली का उपयोग
दलित लेखन में गांधी की नकारात्मक छवि को लेकर डॉ. अनुज कुमार ने खिन्नता प्रकट की कि दलित लेखक गांधी और आर. एस. एस. की विचारधारा में अंतर नहीं करते। गांधी को कोसने वाले नेता भी आर. एस. एस. की झंडाबरदारी में संकोच नहीं करते। जामिया में किसी तरह का जाति भेद या धार्मिक भेदभाव नहीं है।' लेखक के इस कथन पर बिस्मिल्लाह जी मुग्ध थे। उन्होंने आत्मकथा का विवेचन विमर्शों के आईने में भी किया। गंगानिया जी के जाति विषयक अनुभव अन्य दलित लेखकों से अलग हैं, इसके दो प्रमुख कारण बिस्मिल्लाह जी ने बताए-एक तो यह कि उनके पिता आर्य समाजी थे और लेखक को शिक्षा का अवसर मिला। शिक्षित और समर्थ दलित जाति की समस्या से ऊपर उठ जाता है।
आदर्शवादिता और सभ्यता मानव की, सिर पे धरके पाँव नाचती होली में
होली के मौके पर तेजपाल सिंह तेज की दो गज़लें प्रस्तुत हैं। इनमें आज के दौर का कड़वा सच अभिव्यक्त हुआ है।

