चमचा बिनु बेस्वादी दुनिया

रेखा शाह आरबी

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हम हिंदुस्तानियों को दो चीजें काफी पसंद हैं। एक चाय और दूसरा चमचे…! चाय तो अंग्रेजों की देन है लेकिन हम लोगों ने उसे बहुत ही प्रेम से अपने जीवन में आत्मसात कर लिया। लेकिन चमचे देसी उपज हैं, देसी पैदावार…। इसीलिए चाय से ज्यादा हम लोगों को चमचे पसंद हैं। हमारा चमचा प्रेम एकदम अव्वल दर्जे का है। हम हिंदुस्तानियों का चमचा प्रेम इतना है जितना लैला को मजनू से… हीर को रांझा से… और सोनी को महिवाल से भी नहीं रहा होगा। इन सभी का प्यार किसी न किसी कालखंड तक ही सीमित रहा, लेकिन हमारा चमचा प्रेम युगो-युगांतर, जन्म-जन्मांतर से है।

दुनिया में सबसे ज्यादा हम लोगों को अपने चमचों से प्रेम है। हम कुछ समय तक बिना ऑक्सीजन के जिंदा रह सकते हैं। बिना पानी के जिंदा रह सकते हैं बिना भोजन के जिंदा रह सकते हैं। पर चमचों के बिना हिंदुस्तानियों का जिंदा रहना असंभव है। चमचे हमारी रक्तवाहिनियों में निर्बाध रूप से जीवन संजीवनी बनकर विचरण करते रहते हैं। चमचे भी सोचते होंगे वाह… ईश्वर! किस ग्रह पर भेज दिए। वे अपने भाग्य पर इठलाकर भांगड़ा करते होंगे। हम हिंदुस्तानी चमचों के इतने बड़े कद्रदान हैं कि उनको अपने भाग्य पर इतराना तो बनता है। हमारी कद्रदानी देखनी हो तो कोई सूक्ष्म दृष्टि की आवश्यकता नहीं है, बस चारों तरफ एक बार नजर मार लीजिए आपको चमचा प्रेम का वृहद विस्तृत नजर आएगा।

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हँसे तो फंसे!

आप जहां देखें वहां चमचे नजर आएंगे। घर में, ऑफिस में, मॉल में, शहर में, गांव में, गली में, नुक्कड़ पे, किचन में, ड्राइंग रूम में, राजनीति में, इतिहास में, धरती के हर कोने में चमचे विद्यमान हैं। चमचे वर्तमान में भी हैं, भूत में भी थे और भविष्य में भी रहेंगे। हमारे देश में इनका भविष्य आज भी पूर्णतः उज्जवल है और कल भी इनका भविष्य उज्जवल ही रहने की संभावना है। अगर आपको चमचों पर भरोसा नहीं है तो आप जीवन में कुछ बड़ा नहीं कर सकते। बड़ा करने के लिए चमचा बहुत जरूरी वस्तु है। सारे बड़े कार्य चमचों के द्वारा ही सिद्ध किए जाते हैं।

सावन में जिस प्रकार पानी बिना सब सूना रहता है। वैसे ही भारतीयों का जीवन चमचों के बिना सूना रहता है। चमचे हैं तो हर तरफ मंगल ही मंगल है। हमारे देश में चमचे तो नमक के समान हैं जिनके बिना थाली में सजा-धजा और मजेदार खाना भी बेस्वाद है। कहने का मतलब जिंदगी का असली स्वाद चमचों में ही है। राजनीति हो या आम जिंदगी, आप अपना सिर चाहे कितना भी हिलाते रहिए लेकिन उनकी गैर हाजिरी में भी उनकी सीट पूरी तरह से आरक्षित है। इस धरती पर चमचों से ज्यादा उपयोगी वस्तु ना कोई हुई है, ना होने की संभावना है। सभी प्रकार के चमचे उपयोगी होते हैं। सुंदर, ढंग के, बेढंगे, टूटे-फूटे, आड़े-तिरछे, सभी प्रकार के चमचों की अपनी अपनी अहमियत होती है। अब यह आपकी कला के ऊपर है कि आप अपने चमचों का कैसे इस्तेमाल करते हैं? चमचा टूट भी जाए तो डिब्बे से नमक निकालने के काम तो आ ही जाता है। अतः आप भी यदि चमचा बनना चाहते हैं तो जल्दी करिए। कहीं ऐसा ना हो कि बीत न जाए उमरिया… तब का होगा सांवरिया…!

रेखा शाह आरबी, बलिया में सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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