Saturday, May 9, 2026
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पूर्वांचल का चेहरा - पूर्वांचल की आवाज़

साहित्य

वीरेंद्र यादव बनाम ज्वालामुखी यादव

आज सुबह अभी हम इलाहाबाद से आई प्रो राजेंद्र कुमार के न रहने की दुखद खबर से उबरे भी नहीं थे कि लखनऊ से प्रख्यात आलोचक वीरेंद्र यादव के जाने की स्तब्धकारी खबर आई। सहसा भरोसा करना मुश्किल था कि यह कैसे हो सकता है? दो दिन पहले उनके बीमार होने की सूचना मिली थी, लेकिन यह बीमारी इतनी घातक है यह न मालूम था। उनके जाने से बहुत कुछ खाली हो गया. वह गर्मजोशी से भरे बुद्धिजीवी थे जो केवल किताबी आलोचना तक सीमित नहीं थे, बल्कि लगभग सभी समकालीन मुद्दों पर लिखते और बोलते थे और बेलाग बोलते थे। उनके व्यक्तित्व के इन्हीं पहलुओं को छूता प्रख्यात कथाकार मधु कांकरिया की एक छोटी टिप्पणी जो उनके बहत्तरवें जन्मदिन पर चार साल पहले प्रकाशित की गई थी। आज पुनः उनको श्रद्धांजलिस्वरूप प्रकाशित की जा रही है।

मूँदहु आंख भूख कहुं नाहीं

अब गरज तो विश्व गुरु कहलाने से है, भूख बढ़ाने में विश्व गुरु कहलाए तो और भूख मिटाने में विश्व गुरु कहलाए तो। उसके ऊपर से 111 की संख्या तो वैसे भी हमारे यहां शुभ मानी जाती है। भारत चाहता तो पिछली बार की तरह, भूख सूचकांक पर 107वें नंबर पर तो इस बार भी रह ही सकता था। पर जब 111 का शुभ अंक उपलब्ध था, तो भला हम 107 पर ही क्यों अटके रहते? कम से कम 111 शुभ तो है। भूख न भी कम हो, शुभ तो ज्यादा होगा।

विश्वगुरु की सीख का अपमान ना करे गैर गोदी मीडिया

इन पत्रकारों की नस्ल वाकई कुत्तों वाली है। देसी हों तो और विदेशी हों तो, रहेंगे तो कुत्ते...

तुम्हारी लिखी कविता का छंद पाप है

मणिपुर हिंसा पर केन्द्रित कवितायें  हम यहाँ ख्यातिलब्ध बांग्ला कवि जय गोस्वामी की कुछ कवितायें प्रकाशित कर रहे हैं।...

हरिशंकर परसाई और शंकर शैलेंद्र की जन्मशती पर हुआ संगोष्ठी का आयोजन

ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में  हरिशंकर परसाई और शंकर शैलेंद्र की जन्मशती पर संगोष्ठी का...

दलितों को ‘हरिजन’ कहकर दिव्यता में उलझानेवाले उनके सिर उठाते ही दमन करते हैं

दूसरा और अंतिम हिस्साज़िंदगी की गहराई किताबों से नहीं अनुभव की आँखों से नापी जाती है। जो आँखें जूते के अंदर घुसे आदमी...

कविता में मोचीराम की प्रशंसा कवि धूमिल की ब्राह्मणवादी चाल है?

पहला भाग पेट की भूख इस बात की परवाह नहीं करती कि कौन छोटा है और कौन बड़ा है। जहाँ से भी व्यक्ति का पेट...

प्रेमचंद आम जनता के लेखक हैं ..

  प्रेमचंद बच्चों के मनोविज्ञान को भी अच्छी तरह समझते थे  नेहा गुप्ता, विधिक सलाहकार, अजेंटीयो सॉफ्टवेयर प्रा.लि., मुंबई प्रेमचंद हिंदी सहित्य के उन महान लेखको मे...

लिट्टी-चोखा और चिड़िया

एकभला सड़कें भी जाती हैं कहींरोज दीखती हैं वहीं की वहींपर कभी तो चलती होंगी,कहीं तो जाती होंगीतभी तो पहुंचाती हैं लोगों को...

कफन कहानी विरोधाभासों का पुलिंदा है

कफन कहानी के संदर्भ में मैं एक बात निःसंदेह कह सकता हूँ कि यह कहानी अपने कथानक के विरोधाभासों की वजह से दलित विरोधी कहानी साबित होती है। इस कहानी के विरोधाभासों की वजह से उनकी दलित जीवन से जुड़ी अन्य कहानियों की प्रासंगिकता और दलितों के प्रति उनकी संवेदनशीलता सवालों के घेरे में आ जाती है।

प्रेमचंद एक साथ सामंतवादी शक्तियों और सामाजिक विषमता के खिलाफ लड़ रहे थे -वीरेंद्र यादव

‘प्रेमचंद बीसवीं सदी के सबसे बड़े रचनाकार हैं। उन्होंने सोजे वतन लिखकर स्वाधीनता-संग्राम को गति देने की कोशिश की। प्रेमचंद ग्रामीण जीवन और कृषि...
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