प्रेमचंद आम जनता के लेखक हैं ..

गाँव के लोग टीम

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प्रेमचंद बच्चों के मनोविज्ञान को भी अच्छी तरह समझते थे 

नेहा गुप्ता, विधिक सलाहकार, अजेंटीयो सॉफ्टवेयर प्रा.लि., मुंबई

प्रेमचंद हिंदी सहित्य के उन महान लेखको मे से एक हैं जिंहोने अपने तात्कालिक समय को अपनी कहानियों में बेहद जीवन्त रूप से कैद किया हैं. पहली बार मैंने अपने पाठ्यक्रम में मुंशी प्रेमचंद की कहानी ईदगाह पढ़ी थी. ईदगाह ने मुझे काफ़ी प्रभावित किया था। जिस तरह हामिद अपनी ईदी से अपनी दादी के लिए चिमटा ख़रीद लाता है, वह बेहद मार्मिक हैं। जहाँ बच्चे मेले में मिठाई,खिलौने लेने और झूले झूलने की योजना बनाकर उत्साहित होते हैं,वहीँ हामिद के मन दादी को लेकर उथल-पुथल मची रहती है. खुद से बातचीत करते हुए और उसे जस्टिफाई करते हुए अंतत: चिमटा खरीद लेता है. मेले से वापसी पर सबका खेल खत्म और पैसा हजम हो जाता है, उस वक्त हामिद अपने दोस्तों के बीच जिस तरह शान बघारता और समझदारी दिखाता वापस आता है ..मन बहुत भावुक और द्रवित हो जाता है. इस मार्मिक कहानी को पढ़कर लगा कि प्रेमचंद बच्चों के मनोविज्ञान को भी कितनी अच्छी तरह विस्तार दिए हैं.

नेहा गुप्ता, रायगढ़

मुंशी जी मानव जीवन की गहराइयों को बड़ी ही कुशलता से दर्शाते थे उनकी कहनियों में महिलाओं के लिए विशेष स्थान है। वे स्त्री जीवन के दुःख को बड़ी खूबी से से समझते थे एवं बहुत सजीवता के साथ काग़ज़ पर उतारते थे. उनकी इन्हीं कहानियों की वजह से हम कह सकते हैं कि वह नारीवादी विचारधारा के मनुष्य थे.

साहित्य किसी भी समाज का आईना होता है। मुंशी जी की रचनाएँ उनके तात्कालीन समाज के लिए आईने का काम करती हैं। वे अपनी रचनऒ के माध्यम से समाज में फैली हुई जातिवाद, आर्थिक शोषण एवं अन्य कई ऐसी बुराइयों को लोगों के सामने लाने का प्रयास करते थे। यही खूबी उन्हें अन्य लेखकों से अलग करती हैं।
भले ही मुंशी जी आज हमारे बीच ना रहे हो लेकिन उनके द्वारा रचित साहित्य सदा के लिए उन्हें हम सब के बीच अमर बना दिया है

 

प्रेमचंद अपनी कहानियों से दिल-दिमाग में ऊर्जा पैदा कर देते हैं।

अंचित, विद्यार्थी और रंगकर्मी, पथ थिएटर, जमशेदपुर

कभी मन उदास हो तो पढ़ लेना
कभी जब मन निराश हो तो पढ़ लेना
मन प्रफुल्लित हो तो पढ़ लेना
और मन जब मांग करे तो पढ़ लेना
यह सब उन रचनाकार की कृतियों के लिए जो अत्यंत साधारण जान पड़ते हैं लेकिन है बहुत ही निराले। प्रेमचंद की कृतियों की खासियत यही है कि वह बहुत ही सहजता से पाठकों की समझ में आते हैं। वह अपनी बातों को बिना लाग लपेट के कह जाते हैं।

पहली बार प्रेमचंद को मैंने अपनी पाठ्यक्रम की किताबों में पढ़ा तो भीतर कुछ अलग सा घटता महसूस हुआ।
” नमक का दरोगा ” इस रचना की चर्चा सबसे पहले क्योंकि स्मृति पटल पर यही कहानी है जो सबसे पहले याद आ रही हैं । जिस तरह से छोटे बच्चों में संस्कार विकसित किए जाते हैं उसी तरह से प्रेमचंद की कहानियां बढ़ते उम्र में अच्छे संस्कार की तरह मानस पटल पर छपती सी जान पड़ती हैं।
ईमानदारी, भाईचारा, त्याग और कई – कई मानवीय गुण जो नैतिक शिक्षा के रूप में पढ़ाई जाती हैं वह प्रेमचंद अपनी कहानियों के माध्यम से सहज ही मानव मस्तिष्क में रोपित कर देते हैं।
कई – कई कहानियां जिनका ज़िक्र प्रेमचंद की अच्छी रचनाओं के रूप में करना चाहता हूं लेकिन फिर बात वही कि अच्छी या बुरी कहानी कोई भी नहीं, बल्कि श्रेष्ठ है सब की सब।
ईदगाह, कफन, लॉटरी, पूस की रात, दो बैलों की कथा और कई कई कहानियां जो “नमक के दारोगा” से शुरू हुई तो बाद के कई सालों तक गबन, गोदान, प्रेमाश्रम, निर्मला और कर्मभूमि से आगे बढ़ती रही। प्रेमचंद की रचनाओं को मैंने खूब-खूब पढ़ा हैं और कितना कुछ पाया है इसका बयान तो शायद मुश्किल हैं। जिन्होंने अपनी रचनाओं में सहज ही “सत्य” को पाठकों तक पहुंचाया उनकी तारीफ़ करना मेरे लिए तो मुश्किल हैं। आदर्शवाद की वकालत ना करते हुए या बिना किसी वाद के पक्षधर हुए वह चरित्रों को उन के परिवेश और परिस्थितियों में जस का तस उतार देते हैं। चरित्रों की बुनावट और उनके आसपास के किरदारों को उनके अपने रंग से रंगते प्रेमचंद साहित्य के फलक पर एक अमिट छाप छोड़ते हैं।

अंचित,जमशेदपुर

“रंगभूमि” जिसकी चर्चा मैं यहां करना चाहूंगा कि “सबकुछ” है इस उपन्यास में। जब मैंने इस उपन्यास को पढ़ा तो कुछ बदला था मुझमें। कुछ भरा था इस कृति ने और बहुत-बहुत ग्रंथियों से मुक्ति पाई थी मैंने। ठीक ठीक याद नहीं कि कब आदत बन गई मेरी उनकी कहानियों के साथ सफर करना। “रंगभूमि” जिस उपन्यास की बात मैं कर रहा हूं, उसके हर अध्याय के साथ एक घूंट और अमृत पान करता गया था मैं। वैसे तो प्रेमचंद की बात करता रहूं तो शायद नई नई बातें बताता जाऊंगा, पर “एक बार और पढ़ लूं” की चाह फिर से उठ रही है। जितनी बार उन्हें पढ़ता हूं, उनकी कृतियों में उतनी ही बार नवीनता पाता हूं। प्रेम, वात्सल्य, प्रेरणा और परंपरा की खुराक मिलती रही है मुझे उनकी कृतियों से। यहां परंपरा शब्द मैंने इसलिए लिखा कि प्रेमचंद एक नई लीक भी तो चलाते हैं अपनी कहानियों और उपन्यासों में जिसका एक उदाहरण “प्रेमाश्रम” है।

खैर, ढेर बातें हैं जो मैने की है उनके लिखे उपन्यासों के किरदारों से और अब भी करता हूं, जब कभी निर्जीव सा अनुभव करता हूं भीतर से। बस, इतना ही… क्योंकि प्रेमचंद ने मुझे जीवंत किया है अपने कलम के जादू से और मैं उन्हें सिपाही से ज्यादा मानता हूं जिन्होंने अमृतपान कराया है मुझे अपनी रचनाओं से।

 

 

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