प्रेमचंद एक साथ सामंतवादी शक्तियों और सामाजिक विषमता के खिलाफ लड़ रहे थे -वीरेंद्र यादव

सुरेन्द्र प्रसाद सुमन

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‘प्रेमचंद बीसवीं सदी के सबसे बड़े रचनाकार हैं। उन्होंने सोजे वतन लिखकर स्वाधीनता-संग्राम को गति देने की कोशिश की। प्रेमचंद ग्रामीण जीवन और कृषि संस्कृति का यथार्थ चितेरा थे। उस समय किस प्रकार किसान चौतरफा शोषण को झेलते हुए किसान से मजदूर बन रहे थे, इसे प्रेमचंद ने यथार्थ रूप में रखा है।’

उक्त विचार आज 31 जुलाई, 2021 को सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक वीरेंद्र यादव ने व्यक्त किया जो एल.सी.एस. कॉलेज, दरभंगा में महाविद्यालय तथा जन संस्कृति मंच,दरभंगा के संयुक्त तत्वावधान में प्रेमचंद की 141वीं जयंती-समारोह के अवसर पर ऑनलाइन तथा ऑफलाइन माध्यम से आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी मौजूदा चुनौतियाँ और प्रेमचंद के सपनों का भारत में मुख्य वक्ता के तौर पर बोल रहे थे।

डॉ एस.एस. सिंह,वरीय क्षेत्रीय निदेशक, इग्नू, दरभंगा ने कहा कि 'प्रेमचंद के साहित्य को पढ़कर भारत को संपूर्णता के साथ जाना जा सकता है। वे समतामूलक समाज की स्थापना के लिए रचनात्मक स्तर पर जीवनभर लड़ते रहे। आज की पीढ़ी के लिए उनकी रचनाएँ किसी प्रकाश-पुंज से कम नहीं है। प्रेमचंद का जीवन अत्यंत अभावों में बीता था, जिसकी अमिट छाप उनकी रचना पर परिलक्षित होती है।

वीरेन्द्र यादव ने आगे कहा कि ‘प्रेमचन्द जहाँ एक ओर सामंतवादी शक्तियों से लड़ रहे थे तो दूसरी ओर वे सामाजिक विषमता के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे। प्रेमचंद बीसवीं सदी के सबसे बड़े रचनाकार हैं। उन्होंने सोजे वतन लिखकर स्वाधीनता-संग्राम को गति देने की कोशिश की। प्रेमचंद ग्रामीण जीवन और कृषि संस्कृति का यथार्थ चितेरे थे। उस समय किस प्रकार किसान चौतरफा शोषण को झेलते हुए किसान से मजदूर बन रहे थे, इसे प्रेमचंद ने यथार्थ रूप में रखा है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद युगद्रष्टा रचनाकार थे। इसीलिए उनकी रचनाओं की प्रासंगिकता आज भी बरकरार है। प्रेमचंद अंबेडकरवाद से बेहद प्रभावित थे, जिसके कारण उन्होंने उपन्यास गोदान समेत अपनी अनेक कहानियों में दलित-प्रतिरोध को अभिव्यक्त किया है। प्रेमचंद ने हिन्दी कथा साहित्य के परंपरागत सौंदर्यशास्त्र को बदल दिया।’

संगोष्ठी का आरंभ डॉ रामबाबू आर्य, जिला सचिव,  जन संस्कृति मंच, दरभंगा के स्वागत भाषण से हुआ।  समकालीन चुनौती के संपादक और जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य डॉ  सुरेन्द्र प्रसाद सुमन ने विषय-प्रवेश कराया। उन्होंने कहा कि आज की विकृत सामाजिक-राजनीतिक परिस्थित में प्रेमचंद की रचनाएँ संपूर्ण राष्ट्र के लिए ऊर्जा का स्रोत हैं। प्रेमचंद गुलाम भारत में उत्पन्न आजाद भारत के प्रथम परिकल्पक थे। वे जीवनपर्यंत भारत की मूलभूत आजादी के लिए संघर्ष करते रहे। प्रेमचंद ने उस समय में दलितों और स्त्रियों के उद्धार की कामना की, जब दलित विमर्श और स्त्री-विमर्श की चर्चा भी नहीं हुई थी। आज प्रेमचंद और भगतसिंह के सपनों के साथ ही संविधान एवं लोकतंत्र पर खतरा है। प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में किसानों-मजदूरों और शोषितों के जीवन के यथार्थ का चित्रण किया है। उनके साहित्य से प्रेरणा ग्रहण कर मौजूदा खूंख्वार फासिस्ट सत्ता से दो-दो हाथ करते हुए मुकम्मल आजाद भारत के प्रेमचंद के सपनों को साकार किया जा सकता है।

डाॅ. रविभूषण ने कहा कि गोदान में प्रेमचंद ने दलाल कल्चर पर भी करारा प्रहार किया, जो आज की सबसे बड़ी समस्या है। किस प्रकार बैंक किसानों और मजदूरों को लूट रहा है, यह प्रेमचंद ने स्पष्ट कर दिया है। वे कथनी और करनी की विषमता पर प्रहार करने वाले लेखक हैं। प्रेमचंद की रचनाओं का आज जो दलित पाठ या स्त्री पाठ किया जा रहा है, यह अनुचित है। प्रेमचंद की रचनाओं का मुकम्मल पाठ जरूरी है।

इस अवसर पर डॉ एस.एस. सिंह,वरीय क्षेत्रीय निदेशक, इग्नू, दरभंगा ने कहा कि ‘प्रेमचंद के साहित्य को पढ़कर भारत को संपूर्णता के साथ जाना जा सकता है। वे समतामूलक समाज की स्थापना के लिए रचनात्मक स्तर पर जीवनभर लड़ते रहे। आज की पीढ़ी के लिए उनकी रचनाएँ किसी प्रकाश-पुंज से कम नहीं है। प्रेमचंद का जीवन अत्यंत अभावों में बीता था, जिसकी अमिट छाप उनकी रचना पर परिलक्षित होती है।’

इस अवसर पर सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक और जनसंस्कृति मंच के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष प्रोफेसर रविभूषण ने अपने वक्तव्य में कहा कि अभी जब हमारी अभिव्यक्ति पर पाबंदी लगायी जा रही है, तब प्रेमचंद की प्रासंगिकता और भी अधिक बढ़ जाती है। वे अंग्रेजी गुलामी के दौर में भी सच बोलने से बाज नहीं आए। आज राष्ट्र कई मौजूदा संकटों और चुनौतियों से गुजर रहा है। सबसे बड़ा संकट है आर्थिक विषमता। राजनीतिक निरंकुशता, गरीबी, बेरोजगारी, औद्योगिकीकरण आदि। आज गरीब,गरीबी की गर्त में समाता जा रहा है। दूसरी ओर करोड़पतियों की संख्या बढ़ती जा रही है। आज की मौजूदा चुनौतियाँ यह है कि पूंजीवाद और बाजारवाद ने संपूर्ण सभ्यता को निगल लिया है। वैश्विक महामारी कोरोना भी एक तरह से अवसर के रूप में देखा जा रहा है। प्रेमचंद ने बहुत पहले ही इस संकट के प्रति भारतीयों को आगाह कर दिया था।

पूंजीवाद के इस विकट दौर में हमारा प्रजातंत्र भीड़तंत्र बनकर रह गया है। पूंजीपतियों ने प्रजातंत्र की शुचिता को निगल लिया है। ‘गोदान’ में वर्णित महाजनी सभ्यता का प्रसार आज कार्पोरेट जगत के रूप में देखा जा सकता है। गोदान के सभी पात्र उस समय के प्रतिनिधि पात्र थे, जिसके माध्यम से अपने समय के सत्य का वे उद्घाटन करते हैं। डाॅ. रविभूषण ने कहा कि गोदान में प्रेमचंद ने दलाल कल्चर पर भी करारा प्रहार किया, जो आज की सबसे बड़ी समस्या है। किस प्रकार बैंक किसानों और मजदूरों को लूट रहा है, यह प्रेमचंद ने स्पष्ट कर दिया है। वे कथनी और करनी की विषमता पर प्रहार करने वाले लेखक हैं। प्रेमचंद की रचनाओं का आज जो दलित पाठ या स्त्री पाठ किया जा रहा है, यह अनुचित है। प्रेमचंद की रचनाओं का मुकम्मल पाठ जरूरी है। उनकी रचनाओं का मुकम्मल पाठ ही राष्ट्र को उन्नत बना सकता है। मौजूदा चुनौतियों और  संकटों से उबरने का मार्ग प्रेमचंद की रचनाएँ हो सकती हैं।

डॉ शिवनारायण यादव, प्रधानाचार्य, एल.सी.एस.कालेज, दरभंगा की अध्यक्षता में संगोष्ठी के प्रमुख वक्ता, सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक श्री

इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में छात्र नेता रोहित कुमार यादव, भोला जी, प्रो एम अंसारी तथा अनेक शोधार्थी,विद्यार्थी शिक्षकों सहित लगभग 150 ऑफलाइन तथा 100 ऑनलाइन की उपस्थिति दर्ज हुई। संपूर्ण कार्यक्रम का संचालन डॉ सुरेन्द्र प्रसाद सुमन ने किया, जबकि उपस्थित वक्ताओं तथा स्रोताओं के प्रति धन्यवाद ज्ञापन महाविद्यालय के वरीय प्राध्यापक डॉ मिथिलेश कुमार यादव ने किया।

 

सात दिवसीय जन अधिकार चेतना यात्रा का लमही से आगाज़

(मुंशी प्रेमचंद जयंती से प्रारम्भ होकर 6 अगस्त हिरोशिमा दिवस पर सारनाथ में होगा समापन । 10 जिलों से होकर गुजरेगी जन अधिकार चेतना यात्रा)

देश में सभी नागरिकों के लिए बेहतर एवं समान शिक्षा, उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सुविधाएं, सम्मानजक रोजगार और खेती किसानी की बेहतरी सुनिश्चित करने के अधिकार की मांग के समर्थन में सामाजिक संस्था आशा ट्रस्ट एवं एक देश समान शिक्षा अभियान के संयुक्त तत्वावधान में 7 दिवसीय जन अधिकार चेतना यात्रा का शुभारम्भ मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर उनके पैतृक गांव लमही से हुआ.

इस अवसर पर समाजवादी चिंतक अफलातून ने कहा चाहे जो भी सरकार सत्ता में आये लेकिन देश के सभी नागरिकों के लिए उच्चस्तरीय शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य, सम्मानजनक रोजगार (आजीविका) के अवसर और खेती किसानी के परेशानियों का मौलिक सवाल प्रायः अनुत्तरित ही है ऐसे में आम व्यक्ति अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा एवं परिवारजनों को उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सेवा दिला पाने के लिए जद्दोजहद कर रहा है, युवा वर्ग चाहे वह गांव का हो या शहर का आज रोजगार और आजीविका के अवसर खोजने के लिए भटकने को मजबूर है. सार्वजनिक क्षेत्र में आउट सोर्सिंग,  संविदा प्रणाली और सेवा प्रदाता कम्पनियों द्वारा ठेकेदारी पर काम लेने के बढ़ते चलन से पढ़े लिखे युवकों का शोषण दिनों दिन बढ़ता जा रहा है. खेती किसानी और स्वरोजगार में भी जोखिम दिनों दिन बढ़ रहा है.

सात दिवसीय जन अधिकार चेतना यात्रा का लमही से आगाज़

आशा ट्रस्ट के समन्वयक वल्लभाचार्य पाण्डेय ने कहा कि जन अधिकार चेतना यात्रा के माध्यम से हम सभी के लिए बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के अधिकार और खेती किसानी से जुड़े मुद्दे को आमजन की आवाज बनाना चाहते हैं जिससे ये सवाल तमाम राजनैतिक पार्टियों और चुनाव में आने वाले प्रत्याशियों तक पहुंचे और वे इसके प्रति संवेदनशील बन सकें सदन में जाने पर उनकी कोई जवाबदेही सुनिश्चित हो.

यात्रा के संयोजक दीन दयाल सिंह ने बताया कि लमही (वाराणसी) से प्रारंभ होकर यात्रा गाजीपुर, मऊ,  बलिया,  देवरिया, गोरखपुर, कुशीनगर, महराजगंज, आजमगढ़, जौनपुर होते हुए हिरोशिमा दिवस पर 6 अगस्त को सारनाथ वाराणसी पहुंचेगी. इस दौरान यात्रा दल के साथी रास्ते में पड़ने वाले गावों, बस्तियों, कस्बो और शहरों में पर्चे, पोस्टर, स्टीकर, जन गीत, जन संवाद आदि के माध्यम से अपनी 4 सूत्रीय मांगो के पक्ष में समर्थन जुटाएंगे. यात्रा में 12 सदस्य शामिल हैं. जिनमे दीन दयाल, अजय पटेल, महेंद्र राठौर, मनोज कुमार, श्रद्धा पटेल, प्रियंका जायसवाल, अजय पटेल, दिव्या पांडेय, राजकुमार गुप्ता, सुरेश राठौर, अरविंद मूर्ति शामिल है। इस अवसर पर राम जनम, चंचल मुखर्जी, प्रदीप सिंह, सूरज पांडेय, विनय सिंह, रमेश प्रसाद, केशव शरण , राजेश, हरीश पाल आदि उपस्थित रहे.

 

जब समूचे समाज को आनंद मिलेगा तभी हम आनंद ले पाएंगे – प्रो अपूर्वानन्द

दिल्ली। ‘हम भी इस घृणा, नफरत, छोटेपन और ओछेपन से बाहर निकल आएंगे और हम उस सफर को जारी रख सकेंगे जो मनुष्यता का सच्चा सफर है।  किन्तु प्रेमचंद की बातों को याद रखें कि इंसान होने का भरपूर आनंद तभी ले पाएंगे जब यह आनंद समूचे समाज और समूह को मिले।’ महान कथाकार प्रेमचंद की 141 जयंती के अवसर पर हिंदी साहित्य सभा, हिंदू कॉलेज द्वारा आयोजित ऑनलाइन वेबिनार में जाने माने आलोचक और हिंदी साहित्य के आचार्य डॉ अपूर्वानंद ने उक्त विचार व्यक्त किए। ‘प्रेमचंद को क्यों पढ़ें?’ विषय पर प्रो अपूर्वानंद ने कहा कि प्रेमचंद पर बात करते हुए कुछ भी नया नहीं कहा जा सकता बल्कि सब दोहराया ही जाता है किंतु दोहराने का शिक्षा और साहित्य दोनों में ही बहुत महत्त्व  है। प्रेमचंद को पढ़ते हुए उनके विचार से शायद ही प्रेमचंद के साहित्य का कोई कोना है जो महादेवी वर्मा, जैनेंद्र, अज्ञेय, निराला, बेनीपुरी, दिनकर, नागार्जुन, भीष्म साहनी जैसे पुराने साहित्यकार व लेखकों से छूटा होगा। प्रेमचंद समस्याओं के कारण लेखक नहीं बने अपितु याद रखना चाहिए कि रचनाकार जब लिखता है तो वह दरअसल किसी राष्ट्रीय कर्त्तव्यवश या किसी सामाजिक सुधार के  कर्त्तव्यवश नहीं लिखता है बल्कि इसलिए लिखता है क्योंकि उसे लोगों में दिलचस्पी हैं, उसे आसपास की जिंदगी में लुफ्त आता है। प्रेमचंद को भी इस जिंदगी में अत्यधिक आनंद आता है और उनकी गहरी दिलचस्पी चलते-फिरते लोगों में है कि यह काम करते हुए क्या सोच रही है?, इसका दिल कैसे धड़क रहा है? उन लोगों के भाव भंगिमाओं अंदाज, मनोभावों में बहुत दिलचस्पी है । प्रेमचंद की साहित्य की परिभाषा के अनुसार  मनोभावों का चित्रण करने वाला ही लेखन साहित्य है।

महादेवी वर्मा भी प्रेमचंद की भाषा पर कहती हैं कि एक तरफ उनकी भाषा में जल है और दूसरी तरफ ज्वाला है। प्रेमचंद भाषा को जिस नजरिए से गढ़ रहे हैं उस नजरिए को ध्यान रखना चाहिए ,वह भाषा में आनंद लेने योग्य है। प्रेमचंद के लेख 'दास्तान ए आजाद' में भाषा का आनंद देखा जा सकता है।

प्रो. अपूर्वानंद

उन्होंने कहा कि गोदान केवल भारतीय किसान की त्रासदी नहीं बल्कि होरी, धनिया, गोविंदी, मालती, मिर्जा साहब, राय साहब आदि तमाम लोगों के जीवन की कहानी है इसलिए केवल एक सूत्र देखना प्रेमचंद और गोदान दोनों के साथ अन्याय हैं। अपने मित्र डॉ यशपाल की बात याद करते हुए हमें कहते हैं चलते समय लक्ष्य पर निगाह रखो पर रास्ता है जिस पर चलना है तो उसे पकड़कर मत रहो, रुक-रुक कर चलो रास्ते का आनंद लो, आप सिर्फ अंतिम बिंदु लक्ष्य पर निगाह रखने की हड़बड़ी ना करें। यही उपन्यासकार की दृष्टि है जिसमें वे जीवन के विस्तार को उसकी विविधता को प्रस्तावित करता है। अतः सही कहा गया है प्रेमचंद उपन्यास पढ़ने वालों का एक समाज बनाते थे।

प्रो अपूर्वानंद ने कहा कि साहित्य की भाषा विद्वानों के बीच बनती है अर्थात जो भाषा के साथ अदब से पेश आते हैं ना कि सड़क किनारे बनती हैं। उस भाषा के लिए रचनाकार को अत्यधिक जतन करना होता है। महादेवी वर्मा भी प्रेमचंद की भाषा पर कहती हैं कि एक तरफ उनकी भाषा में जल है और दूसरी तरफ ज्वाला है। प्रेमचंद भाषा को जिस नजरिए से गढ़ रहे हैं उस नजरिए को ध्यान रखना चाहिए ,वह भाषा में आनंद लेने योग्य है। प्रेमचंद के लेख ‘दास्तान ए आजाद’ में भाषा का आनंद  देखा जा सकता है।

प्रो अपूर्वानंद ने कहा कि इंसान होना बहुत कठिन काम है यह प्रेमचंद बार-बार अपने कहानियों- उपन्यासों से हमें याद दिलाते हैं। ‘पंच परमेश्वर’ कहानी के अमर प्रश्न ‘क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात ना कहोगे?’ के माध्यम से नैतिकता की शिक्षा देने का प्रयास करते हैं। प्रेमचंद का साहित्य धर्मनिरपेक्ष है, वे अपने लेखन में हिंदू -मुसलमान की बराबर सहारना एवं आलोचना करते हैं। प्रेमचंद की वैचारिकी और भाषा को समझाने के लिए प्रो अपूर्वानंद ने अनेक सूत्र रखते हुए प्रेमचंद के संदर्भ में लिखे गए अनेक हिंदी साहित्यकारों के लेखों का उन्होंने अपने व्याख्यान में ज़िक्र किया। प्रश्नोत्तरी सत्र में विद्यार्थियों के जिज्ञासा पूर्ण प्रश्नों के उत्तर देते हुए प्रो अपूर्वानंद ने कहा प्रत्येक साहित्य का यही उद्देश्य है कि वह मनुष्य को मनुष्य होने का एहसास दिला सके। प्रश्नोत्तरी सत्र का संयोजन विभाग के अध्यापक डॉ नौशाद द्वारा किया गया।

इससे पहले हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ रामेश्वर राय ने प्रो अपूर्वानंद का स्वागत और विषय प्रवर्तन किया। उन्होंने प्रो अपूर्वानंद की सद्य प्रकाशित पुस्तक यह प्रेमचंद हैं का उल्लेख कर बताया कि साधारण पाठकों को ध्यान में रखकर प्रेमचंद के महत्त्व की पुनर्स्थापना करने वाली यह पहली आलोचना पुस्तक है। विभाग के वरिष्ठ अध्यापक डॉ विमलेन्दु तीर्थंकर ने प्रो अपूर्वानंद का परिचय दिया। हिंदी साहित्य सभा के परामर्शदाता डॉ पल्लव ने सभा के इतिहास और गतिविधियों का परिचय दिया। उन्होंने कहा कि नयी पीढ़ी को साहित्य की विरासत से जोड़कर संवेदनशील पाठक और नागरिक बनाना ही सभा का उद्देश्य है। आयोजन में विभाग के डॉ अभय रंजन, डॉ हरींद्र कुमार, डॉ रचना सिंह सहित दूरदराज के अनेक लेखक- पाठक और विद्यार्थी -शोधार्थी भी शामिल हुए। वेबिनार का संयोजन डॉ धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने किया।

प्रस्तुति : दिशा ग्रोवर

 

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