कविता में मोचीराम की प्रशंसा कवि धूमिल की ब्राह्मणवादी चाल है?

जयप्रकाश कर्दम

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पहला भाग 

पेट की भूख इस बात की परवाह नहीं करती कि कौन छोटा है और कौन बड़ा है। जहाँ से भी व्यक्ति का पेट भरता है या पेट भरने की उम्मीद होती है वही उसके लिए अर्थवान होता है, अन्यथा बाक़ी सारी दुनिया उसके लिए अर्थहीन है। ‘मोचीराम’ धूमिल की प्रसिद्ध कविता है, इस कविता में हाथों में रांपी पकड़े जूती गाँठने वाले मोचीराम की नज़रें जूते पर हैं। वह जूतों को देखने का अभ्यस्त है, सिर उठाकर आदमी का चेहरा वह नहीं देख पाता। चेहरे से वह आदमी को नहीं पहचानता, जूतों से पहचानता है, और उसके लिए आदमी की पहचान बहुत स्पष्ट है-एक जोड़ी जूता, और जूता भी वह है जो उसके पास मरम्मत के लिए आता है। ’बाबूजी सच कहूँ- मेरी निगाह में/ न कोई छोटा है/ न कोई बड़ा है/ मेरे लिए, हर आदमी एक जोड़ी जूता है/ जो मेरे सामने मरम्मत के लिए खड़ा है।’1 (मोचीराम से)।

आदमी की इस पहचान के ज़रिए कहीं न कहीं मोचीराम अपनी पहचान बताता है कि समाज की नज़र में उसकी पहचान केवल एक जूता बनाने और मरम्मत करने वाले की है। जूता आदमी के पैर में रहता है इसलिए जूते की मरम्मत करने वाले मोचीराम की जगह आदमी के पैरों में है। जूता मोचीराम की औक़ात बताता है। यहाँ यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि कविता का मोचीराम नया जूता नहीं बनाता, पुराने जूते की मरम्मत करता है। नए जूते का मुनाफ़े का बाज़ार है। नया जूता वणिक पूँजीपति के कारख़ाने में बनता है, जो उस पर भारी मुनाफ़ा  कमाता है। हाँ, काम चमड़े का है तो बहुत स्वाभाविक रूप से उस कारख़ाने में भी जूता बनाने का काम बहुत ही कम मज़दूरी पर मोचीराम ही करते हैं। जूता बनाने के कारख़ाने लगने से पहले मोचीराम जूते बनाता था, लेकिन कारख़ाना मालिक की तरह अपने बनाए जूते की क़ीमत माँगने का अधिकारी वह नहीं था। कारख़ाना मालिक को अधिकार है कि वह वह स्वेच्छा से जूते की क़ीमत निर्धारित कर सकता है और क़ीमत चुकाने वाले को ही जूता बेच सकता है। मोचीराम को वह अधिकार और सुविधा नहीं थी। उसका काम जूता बनाना था, जूता बेचना नहीं। अंत्यज और अस्पृश्य मोचीराम का काम था कि जो कोई भी उससे जूता बनाने को कहे, वह उसके लिए जूता बना दे, और जो कुछ भी वह मोचीराम को दे, वह उसे चुपचाप स्वीकार कर ले, बिना यह देखे और विचार किए कि यह उसकी मेहनत का उचित मूल्य है अथवा नहीं है। यदि कोई अधिक दबंगई पर आकर कुछ न देकर केवल आँख दिखा दे तो मोचीराम सिर और आंख नीची करके चुप रह जाए और अपने मन में यह संतोष कर ले कि उसे जूते की क़ीमत मिल गयी है।सत्ता, सम्पत्ति पर क़ाबिज़ लोग निम्न और कमज़ोर  वर्ग के लोगों को दबाकर रखते हैं और हीनता से देखते हैं। उनकी भूख और ग़रीबी पेट भरे और तमाम स्रोतों पर क़ाबिज़ लोगों के लिए अप्रिय और अनावश्यक विषय है। इसी की अभिव्यक्ति धूमिल जी के इन शब्दों में देखने को मिलती है, ’जिसके पास थाली है/ हर भूखा आदमी/ उसके लिए, सबसे भद्दी/ गाली है.’2 (धूमिल)

मोचीराम के बारे में कवि का कहना है कि ‘भाष़ा उसे काटती है’, लेकिन सवाल यह है कि वह कौन सी भाषा है, जो उसे काटती है। किसी भी व्यक्ति को वह भाषा कभी नहीं काटेगी जिसमें प्रेम और अपनापन हो, सद्भाव, सम्मान और मानवीय गरिमा का भाव हो। भाषा वह काटती है जो हीनता और अपमान का बोध कराए। जूतों की मरम्मत कराने वाले व्यक्तियों द्वारा मोचीराम से जिस भाषा में व्यवहार किया जाता है, उसमें प्रेम, सद्भाव और अपनेपन की जगह घृणा, तिरस्कार और पराएपन का भाव होता है। वह भाषा मोचीराम की मानवीय गरिमा को नकारती और ध्वस्त करती है।

जूतों की मरम्मत करता मोचीराम हर गाँव और शहर में मिलेगा अपने गुरु रविदास की मूर्ति के साथ। मोचीराम के ठीये पर, उसके सिर के ऊपर टंगी अथवा उसके दायीं या बायीं-बग़ल में सम्मान के साथ रखी संत रविदास की मूर्ति केवल यही अर्थबोध नहीं कराती कि संत रविदास भी चर्मकार और मोची थे, जिन्हें मोचीराम अपना महापुरुष और देवता-तुल्य मानते हुए उनके प्रति अपार श्रद्धा रखता है। रविदास के प्रति मोचीराम का श्रद्धा और समान मिश्रित भाव यह अर्थबोध भी कराता है कि रविदास ज़ूता बनाने और मरम्मत करने के काम में अत्यंत कुशल थे। प्रत्येक क्षेत्र में जिस प्रकार लोग अपने-अपने गुरु का स्मरण करते हैं तथा उनके प्रति श्रद्धा और समान व्यक्त करते हैं, ठीक उसी तरह मोचीराम अपने गुरु संत रविदास के प्रति व्यक्त करते हैं। बहुत से मोचीराम अपने नाम के साथ रविदास उपनाम भी लगाते हैं। मोचीराम के अंदर किसी को ऊँचा-नीचा या छोटा-बड़ा नहीं मानने की चेतना का बीजारोपण रविदास के विचारों से होता है, जिनका कहना था-‘ऐसा चाहूँ राज मैं जहाँ मिले सभी को अन्न। ऊँच-नीच सब सम बसें रविदास रहे प्रसन्न।’3

सीमोन बोउवार ने स्त्री अस्मिता पर केंद्रित अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘दि सेकेंड सेक्स’ में लिखा है स्त्री पैदा नहीं होती, उसे स्त्री बनाया जाता है।’ किंतु मोचीरामों के मामले में ऐसा नहीं है। मोची या चमार एक जाति है, और भारतीय हिंदू समाज में जन्म लेने वाला कोई भी बच्चा केवल मनुष्य के रूप में जन्म नहीं लेता, वह एक वर्ण और जाति के रूप में जन्म लेता है। मोचीराम भी जिस जाति में जन्म लेते हैं शास्त्र आधारित भारतीय समाज-व्यवस्था में चर्मकार का काम करना उसका दायित्व है। उससे अपेक्षा की जाती है कि वह मरे हुए पशुओं को उठाए, लोगों को पैरों में पहनने के लिए जूते बनाए और फटे-पुराने जूतों की मरम्मत करे।

यह कविता इस बात को समझे जाने की ज़रूरत पर बल देती है कि जूता बनाना एक उद्योग है, मुनाफ़ा कमाने का तंत्र। पूँजी-संचालित उद्योग का यह तंत्र श्रमिकों का शोषण भी करता है। जबकि जूते की मरम्मत करना मज़दूरी है-पेट भरने का एक साधन। मोचीराम जूता बनाने के कारख़ाने में काम करे या बाज़ार में किसी जूते के शोरूम में, अथवा जूतों की मरम्मत करे वह हमेशा पेट भरने को दो रोटी के लिए संघर्ष करता है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि कारख़ाने में काम करने वाले संगठित क्षेत्र के श्रमिक और मोचीराम की तरह जूतों की मरम्मत करने वाले असंगठित क्षेत्र के मज़दूर में भी अंतर होता है। संगठित क्षेत्रों में श्रम क़ानून और श्रम अधिकारों के उल्लंघन के विरुद्ध श्रमिक संगठनों द्वारा आंदोलन और मोर्चाबंदी की जा सकती है, किंतु निजी रूप में काम करके रोज़ कमाने, खाने वाले मोचीराम जैसे मज़दूरों के लिए कहीं कोई आवाज़ नहीं उठती है। मोचीरामों को अपने स्तर पर स्वयं ही संघर्ष करना होता है। धूमिल की कविता के ये शब्द मोचीराम की बेचारगी और दर्द को बयान करते हैं, ’पेशेवर हाथों और फटे जूतों के बीच/ कहीं न कहीं एक आदमी है/ जिस पर टाँके पड़ते हैं,/ जो जूते से झाँकती हुई अँगुली की चोट छाती पर/ हथौड़े की तरह सहता है।’4 यानी जूते की मरम्मत करने अपने वाले पेशेवर हाथ और फटे जूते के बीच होता है मोचीराम, जो जूते में लगाए जाने वाले हर टाँके का दर्द अपनी चेतना और कलेजे पर महसूस करता है।चोट खा-खाकर पत्थर हो चुके उसके कलेजे पर हज़ारों ज़ख़्म हैं। उसका यह दर्द अभाव, भूख और बेबसी के अलावा घृणा, अपमान, उपेक्षा और अस्पृश्यता का दर्द है, दूसरे शब्दों में कहें तो मनुष्य नहीं माने जाने का दर्द है। यह दर्द बाहर से दिखायी नहीं देता लेकिन अंदर से उसे आहत करता है और बुरी तरह तोड़ता है।

जूतों को देखने के आदी मोचीराम को हर जूते की पहचान है। जूते से ही वह आदमी को पहचानता है। इसीलिए हर आदमी उसके लिए एक जोड़ी जूता है। जितने भी जूते वह देखता है, सबके सब कहीं न कहीं से फटे-टूटे और घूल में सने हैं। किसी के अंदर से वर्ण-व्यवस्था का दंभ झाँकता है तो किसी के अंदर से जातिवाद की दुर्गंध आती है। कोई सामंती शान में अकड़ा हुआ है तो कोई धार्मिक कुटिलता से बदमैल है। मोचीराम इन सब को ठोक-पीटकर, सिल-गाँठकर सही बनाता है।

जूते की मरम्मत करवाने के लिए आने वाला व्यक्ति मोचीराम को अपना नौकर समझकर मालिक की तरह हुकुम चलाता है, और चाहता है कि मोचीराम उसके जूते बिलकुल चमकदार और नया बना दे। ‘इशे बाँद्धो,उशे काट्टो,हियाँ ठोक्को,वहाँ पीट्टो/ घिस्सा दो,अइशा चमकाओ,जूत्ते को ऐना बनाओ’5 (मोचीराम)। अपने पूरे कौशल और अनुभव का इस्तेमाल करते हुए मोचीराम ऐसा करता भी है। जगह-जगह चिन्दी लगे, फटे-पुराने जूते को मरम्मत और पोलिस करके वह चमकाकर नया जैसा बना देता है। किंतु पैसे देने की नाम पर वही व्यक्ति मोचीराम को दुत्कारता, गुर्राता और आँखें दिखाता है और मोचीराम को उसकी मेहनत की सही मज़दूरी न देकर भीख देने के अन्दाज़ में कुछ सिक्के उसकी ओर फेंककर चला जाता है। मोचीराम के लिए जूतों की मरम्मत करने का काम बेगार करने जैसा है। यही मोचीराम का दर्द है। उसका यह दर्द धूमिल की कविता के इन शब्दों में अभिव्यक्त होता है, ‘घण्टे भर खटवाता है/ मगर नामा देते वक्त/ साफ ‘नट’ जाता है/ शरीफों को लूटते हो’ वह गुर्राता है/ और कुछ सिक्के फेंककर/ आगे बढ़ जाता है।’6 (मोचीराम)

मेहनत की उपयुक्त मज़दूरी न मिलना दलित जीवन की वह त्रासदी है जिसका दर्द और दंश उनको निरंतर सहना पड़ा है, और इसके चलते वे अभाव और दरिद्रता का नारकीय जीवन जीने को विवश हैं। इसके बावजूद वे अच्छे भविष्य के सपने देखते हैं तथा ख़ुद भूखे-नंगे रहकर अपने बच्चों को पढ़ाने के प्रति सजग होते जा रहे हैं, क्योंकि दूसरों को देखकर वे यह समझ चुके हैं कि शिक्षा से ही उनके सपने साकार हो सकते हैं तथा शिक्षा ही उनको अपमान, उत्पीड़न और अन्याय की ज़िंदगी से मुक्ति दिला सकती है। किंतु कँवल भारती को ‘मोचीराम’ कविता में वह संभावना दिखायी नहीं देती है। कविता पर आलोचनात्मक टिप्पणी करते हुए वह लिखते हैं, ’धूमिल की कविता में मोचीराम सिर्फ़ एक मोची ही। उसके सिवा कुछ नहीं है। उसकी दृष्टि सिर्फ़ लोगों के फटे जूतों पर रहती है और उसकी दृष्टि पेशेवर है। उसके और आदमी के बीच सिर्फ़ जूता है और कुछ नहीं है। उसकी आँखों में न कोई सपना है और न वह अपना कोई भविष्य गढ़ता है।’7 (दलित कविता: नवें दशक के बाद, पृष्ठ-२३१)

मोचीराम के बारे में कवि का कहना है कि ‘भाष़ा उसे काटती है’, लेकिन सवाल यह है कि   वह कौन सी भाषा है, जो उसे काटती है। किसी भी व्यक्ति को वह भाषा कभी नहीं काटेगी जिसमें प्रेम और अपनापन हो, सद्भाव, सम्मान और मानवीय गरिमा का भाव हो। भाषा वह काटती है जो हीनता और अपमान का बोध कराए। जूतों की मरम्मत कराने वाले व्यक्तियों द्वारा मोचीराम से जिस भाषा में व्यवहार किया जाता है, उसमें प्रेम, सद्भाव और अपनेपन की जगह घृणा, तिरस्कार और पराएपन का भाव होता है। वह भाषा मोचीराम की मानवीय गरिमा को नकारती और ध्वस्त करती है। भाषा ही नहीं काटती मोचीराम को मौसम भी सताता है। सर्दी, गर्मी और बरसात, कोई मौसम उसके अनुकूल नहीं है। हर मौसम उस पर कहर बरसाता है। किन कठिन परिस्थितियों में मोचीराम जूतों की मरम्मत करता है, कवि ने इसका चित्रण इस प्रकार किया है, ‘अब आप इस बसन्त को ही लो,/ यह दिन को ताँत की तरह तानता है/ पेड़ों पर लाल-लाल पत्तों के हजा़रों सुखतल्ले/ धूप में, सीझने के लिये लटकाता है/ सच कहता हूँ-उस समय/ राँपी की मूठ को हाथ में सँभालना/ मुश्किल हो जाता है।’8 लेकिन इसके बावजूद मोचीराम दूसरों के जूतों की मरम्मत करता है।

रविदास से समुज्ज्वल चर्मकार होने की ही अपेक्षा है और उसी रूप में वह प्रशंसनीय है। ज्ञान गंगा में बहता रहे, लेकिन रहे चर्मकार ही, अपने कर्म के अभ्यास में अविरत। वह प्रशंसनीय है क्योंकि वर्ण-व्यवस्था के अनुसार अपने पैतृक पेशे को करता है। यदि रविदास जूते नहीं बनाते और अन्य कोई व्यवसाय कर रहे होते, तब भी समुज्ज्वल व्यवसायी कहकर उनकी प्रशंसा की जाती, इसमें संदेह है।

मोचीराम संत रविदास का वर्तमान रूप है। रविदास जूता बनाते थे, आज जूता बनाने का काम पूँजीपति व्यवसायी वर्ग द्वारा किया जाता है, तो मोचीराम के रूप में रविदास के पास जूतों की मरम्मत करने का काम ही रह गया है। जूते बनाना हो या जूतों की मरम्मत करना, काम चमड़े का है और वह भी पैरों में पहने जाने वाले जूते का, तो इस काम को चर्मकार ही करेगा। यहाँ प्रश्न यह है कि मोचीराम जूतों की मरम्मत का काम छोड़कर कोई अन्य काम क्यों नहीं करता जिसमें उसे इस तरह हिक़ारत से न देखा जाए, कोई उसे दुत्कारे या गुर्राए नहीं, उसे अपना नौकर न समझे और जिस काम को करने में उसकी कोई गरिमा और सम्मान हो। सीमोन द बोउवा ने स्त्री अस्मिता पर केंद्रित अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘दि सेकेंड सेक्स’ में लिखा है स्त्री पैदा नहीं होती, उसे स्त्री बनाया जाता है।’ किंतु मोचीरामों के मामले में ऐसा नहीं है। मोची या चमार एक जाति है, और भारतीय हिंदू समाज में जन्म लेने वाला कोई भी बच्चा केवल मनुष्य के रूप में जन्म नहीं लेता, वह एक वर्ण और जाति के रूप में जन्म लेता है। मोचीराम भी जिस जाति में जन्म लेते हैं शास्त्र आधारित भारतीय समाज-व्यवस्था में चर्मकार का काम करना उसका दायित्व है। उससे अपेक्षा की जाती है कि वह मरे हुए पशुओं को उठाए, लोगों को पैरों में पहनने के लिए जूते बनाए और फटे-पुराने जूतों की मरम्मत करे। इस सब की अपेक्षा ही नहीं की जाती अपितु ऐसी परिस्थितियाँ पैदा की जाती हैं कि उसे यह सब करने के लिए बाध्य होना पड़ता है। और उसके इस काम को आध्यात्म से जोड़कर तथा पुरखों की परम्परा अथवा जाति का गौरव बताकर उसकी प्रशंसा की जाती है। वह ज्ञान, गुण में प्रवीण भी हो तो आध्यात्मिक ज्ञान और गुण में ही, अपने पैत्रक पेशे पर गर्व करता हुआ। पेशे की पैतृकता से मुक्त होता हुआ चर्मकार प्रशंसा का पात्र नहीं हो सकता।

चर्मकार रविदास के इस कामके प्रति भक्ति-भाव प्रकट करते हुए निराला जी कहते हैं, ’छुआ पारस भी नही तुम ने, रहे/ कर्म के अभ्यास में, अविरत बहे/ ज्ञान-गंगा में, समुज्ज्वल चर्मकार।’9(सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, सन्त कवि रविदास जी के प्रति, हिंदी कविता डॉट कॉम)। रविदास से समुज्ज्वल चर्मकार होने की ही अपेक्षा है और उसी रूप में वह प्रशंसनीय है। ज्ञान गंगा में बहता रहे, लेकिन रहे चर्मकार ही, अपने कर्म के अभ्यास में अविरत। वह प्रशंसनीय है क्योंकि वर्ण-व्यवस्था के अनुसार अपने पैतृक पेशे को करता है। यदि रविदास जूते नहीं बनाते और अन्य कोई व्यवसाय कर रहे होते, तब भी समुज्ज्वल व्यवसायी कहकर उनकी प्रशंसा की जाती, इसमें संदेह है। वस्तुत: समुज्ज्वल चर्मकार के रूप में रविदास की प्रशंसा प्रकारांतर से वर्ण-व्यवस्था का समर्थन और पंडित-पुरोहिताई के अपने पैत्रक पेशे को कुशलतापूर्वक करने वाले ब्राह्मण की प्रशंसा है। क्योंकि इसमें रविदास की नहीं उसके पेशे अर्थात जाति को समुज्ज्वल बताकर उसकी प्रशंसा की गयी है। एक ब्राह्मण और चर्मकार में यही तो अंतर है कि एक शब्द चलाता और दूसरा रांपी चलाता है। एक को शब्दों का कौशल आता है, दूसरे को रांपी का आता है। एक के लिए शब्द का जो अर्थ और महत्व है, दूसरे के लिए वही अर्थ और महत्व रांपी का है। कल का मोची रांपी को कलम की तरह चलाता था लेकिन आज मोची का बेटा पढ़-लिखकर क़लम को रांपी की तरह चलाता है। ‘पिता ने/ निब को पत्थर पर/ घिसकर/ एक कलाम बना/ मेरे हाथों में थमाई।/ मुझे/ पढ़ना और चमड़ा काटना/ दोनों सिखाया/ इसके साथ ही/ दोनों में से/ कोई एक रास्ता/ चुनने का विकल्प दिया/ और कहा/‘ख़ुद तुम्हें ही चुनना है/ इन दोनों में से कोई एक’/ मैं आज कलम को रांपी की तरह चला रहा हूँ।’10 (कविता-मेरा चयन, असंगघोष, तुम देखना काल, पृष्ठ-58) और इसीलिए अम्बेडकर की तरह वह फटे-टूटे समाज की अच्छी तरह से मरम्मत कर पाता है।

एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जूतों को देखने के आदी मोचीराम को हर जूते की पहचान है। जूते से ही वह आदमी को पहचानता है। इसीलिए हर आदमी उसके लिए एक जोड़ी जूता है। जितने भी जूते वह देखता है, सबके सब कहीं न कहीं से फटे-टूटे और घूल में सने हैं। किसी के अंदर से वर्ण-व्यवस्था का दंभ झाँकता है तो किसी के अंदर से जातिवाद की दुर्गंध आती है। कोई सामंती शान में अकड़ा हुआ है तो कोई धार्मिक कुटिलता से बदमैल है। मोचीराम इन सब को ठोक-पीटकर, सिल-गाँठकर सही बनाता है।आदमी को जूते की नाप से नापने वाली यह मोचीराम की दृष्टि ही है, जिसे कवि धूमिल अपने शब्दों में इस तरह कहता कि ‘चाहे जो है/ जैसा है, जहाँ कहीं है/ आजकल/ कोई आदमी जूते की नाप से/ बाहर नहीं है।’11

संदर्भ:

  1. सुदामा पांडेय ‘धूमिल’, मोचीराम, ——, पृष्ठ——
  2. वही
  3. संत रविदास, रविदास वाणी, पृष्ठ-
  4. सुदामा पांडेय ‘धूमिल’, मोचीराम, ——, पृष्ठ——
  5. वही
  6. वही
  7. कँवल भारती, दलित कविता: नवें दशक के बाद, पृष्ठ-२३१
  8. सुदामा पांडेय ‘धूमिल’, मोचीराम, ——, पृष्ठ——
  9. सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, सन्त कवि रविदास जी के प्रति, हिंदी कविता डॉट कॉम
  10. असंगघोष, तुम देखना काल, पृष्ठ-५८
  11. सुदामा पांडेय ‘धूमिल’, मोचीराम, ——, पृष्ठ—

 

शेष दूसरा भाग जल्द ही ..

1 Comment
  1. Keshav Sharan says

    दलित साहित्य में ब्राह्मणवाद का विरोध अम्बेडकरवादी दलित चेतना के अनुरूप है लेकिन दलित राजनीति में ब्राह्मणवाद का समर्थन दिखता है। यह सब क्या है ? इस दलित राजनीति का दलित साहित्य विरोध भी नहीं करता।

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