1.फादर स्टेन स्वामी…’न तुम कभी गए, न हुआ उलगुलान का अंत
आज जब उधेड़ा जाएगा तुम्हारा पार्थिव शरीर,
क्या देखेंगे ये समाज, सरकारें, और न्यायपालिका?
डली भर ईमानदारी, आदिवासी संघर्षों के प्रति
चंद लेख, चिन्हित करते अन्याय के किस्से
और विचाराधीन कैदियों की आजादी का एक छोटा सा गीत.
फिर परसों जब बगाईचा तक लाई जाएगी तुम्हारी राख
आंगन में स्थित बिरसा मुंडा की मूरत से रूबरू होगे तुम
तब उलगुलान की आग फिर होगी ज्वलंत
क्योंकि न बिरसा कभी मरा था,
न हुआ उलगुलान का अंत!
जब सत्ता के गलियारों में तुम्हें फिर “आतंकी” कहा जाएगा
और न्यायपालिका पुलिस के झूठों पर फिर भरेगी हामी
तभी झारखंड के पेड़ों और नदियों से उछलेंगे नारे
कहीं एक कलम भी उठेगी तुम्हारी याद में
क्योंकि न तुम कभी गए,
न हुआ उलगुलान का अंत!
मेघा बहल
2. माफ करना
हे आसमानी परमपिता!
माफ कर देना उस जाँच आयोग को
और न्यायालय को भी।
उन्हें भी माफ करना, जिन्होंने मुझ पर लगाया
देशद्रोह का आरोप –
अपने मनमाफिक सबूत रचकर।
जिन्होंने नकार दिया,
सत्य को बेल पर छोड़ने से –
उन्हें भी माफ कर देना।
जो डरते हैं अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनने से,
उनके लिए घृणाभक्ति ही है सिर्फ देशभक्ति,
वे सोचते हैं कि,
देह को क़ैद करने पर रोका जा सकता है आत्मप्रकाश,
ऐसे अतल अज्ञानियों को भी
माफ कर देना।
हे आसमानी परमपिता!
वे भी हैं मुझ जैसे मर्त्यलोकवासी।
“शाश्वत होता है सिर्फ सत्य और परस्पर प्रेम”,
तुम्हारे इन वचनों का मैं
करता रहा अनुसरण जीवनभर।
मैं आ रहा हूँ तुम्हारे पास
आसमानी परमपिता,
तुममें मिल जाने के लिए…
वहाँ से कूच करने से पहले
मैंने अपना ख़ून दिया उन्हें
पीने के लिए – वाइन की तरह,
उसके साथ डबलरोटी भी बाँटी उन्हें
अपनी देह के टुकड़ों की।
अंतिम भोज के समय
मेरे साथ ही थे वे सब,
जो मेरे शिष्य नहीं थे।
बस,
झारखंड के मेरे आदिवासियों को गले नहीं लगा पाया मैं
अंतिम समय में।
वे अभी भी तड़प रहे हैं भूख और प्यास से…
अभी भी हजारों क़ैदी सड़ रहे हैं ‘ट्रायल’ पर —
कानून के मनोरंजन की खातिर।
संभव हो तो मुझे फिर एक बार पैदा करना सचमुच में
किसी आदिवासी औरत के गर्भ से —
तुमने सौंपा हुआ काम
मैं पूरा नहीं कर पाया इस जन्म में
इसके लिए भी मुझे माफ करना!
महेश केळुसकर (अनुवाद : उषा वैरागकर आठले)
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