अंतरिक्ष के बाशिंदे (8 जुलाई, 2021 की डायरी)

  नवल किशोर कुमार

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बचपन में अंतरिक्ष को लेकर मन में बड़ी दिलचस्पी रहती थी। आज भी है लेकिन आज मेरे सवालों के जवाब हैं। बचपन में जवाब नहीं थे। यह अंतरिक्ष के प्रति दिलचस्पी ही थी, जिसके कारण मैं विज्ञान का छात्र बना। अंतरिक्ष को लेकर तब तरह-तरह के सवाल होते थे। सबसे अधिक तो आकाशगंगा के बारे में। तब यह शब्द अपने आप में बेहद खास लगता था। इस शब्द में दो शब्द हैं। एक आकाश और दूसरा गंगा। बचपन में समझता था कि जैसे गंगा हमारे शहर पटना से होकर गुजरने वाली एक नदी है वैसे ही आसमान में भी होगी।

मेरे मन में अंधविश्वास रामायण और महाभारत जैसे टीवी सीरियलों ने भर दिया था। हुआ यह था कि इन सीरियलों में जब कभी स्वर्ग का दृश्य दिखाया जाता तो ऐसा लगता कि बादलों के उपर कोई नगर है। मन में यह बात बैठ गयी कि बादलों के उपर भी कोई नगर है। हालांकि नवीं कक्षा तक आते-आते ये सारे अंधविश्वास खत्म हो गए। तब अंतरिक्ष से वाकिफ हो चुका था और इसमें आइंस्टीन का सापेक्षवाद का सिद्धांत बेहद खास था।

लेकिन मन में यह बात बनी रही कि बादलों का भौतिक अस्तित्व तो है। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता है। वजह यह कि जब बादल टकराते हैं तो विद्युतीय तरंगें पैदा होती हैं और तेज आवाज भी होती है। यदि बादलों का भौतिक अस्तित्व नहीं होता तो यह सब कहां संभव होता। फिर एक बात यह भी कि कोई पिंड फिर चाहे वह कोई मानव निर्मित उपग्रह हो या फिर कोई आदमी अंतरिक्ष में स्वतंत्र हो जाय तो क्या हो। जवाब बहुत आसान है। वह अंतरिक्ष में कचरा के रूप में बदल जाएगा। अभी हाल ही में नासा की एक रिपोर्ट देख रहा था। रिपोर्ट में अंतरिक्ष में कचरे की बात थी। इसके मुताबिक अंतरिक्ष में कचरा बढ़ता जा रहा है। यह कचरा विभिन्न देशों द्वारा भेजे गए यानों और उपग्रहों के कारण बने हैं। इसमें भारत का भी योगदान है। आंकड़ों के आधार पर कहूं तो अंतरिक्ष के कचरे में सबसे अधिक 41 फीसदी भागीदारी अमेरिका की है और अपने मुल्क भारत की हिस्सेदारी करीब 14 फीसदी। रूस और चीन भी अंतरिक्ष में कचरा फैलाने में अव्वल राष्ट्र हैं।

मैंने मुसहरों की भूमिहीनता को लेकर अपनी खबर को बिहारी अस्मिता से जोड़ दिया ओर शीर्षक रखा - जिनका कोई पता ही नहीं, उनकी कैसी अस्मिता। मेरी रिपोर्ट का आधार बिहार सरकार द्वारा गठित भूमि सुधार आयोग की रपट थी, जिसमें कहा गया था कि करीब 47 फीसदी दलित न केवल भूमिहीन हैं बल्कि आवासहीन भी हैं। ठीक वैसे ही जैसे पलंगा मुसहरी के बाशिंदे। उन सबका कॉमन पता था - नहर पर, पलंगा मुसहरी, फुलवारी शरीफ, पटना।

खैर, मैं कचरे के फेर में नहीं जाना चाहता। हम मनुष्य स्वार्थ में इतने अंधे हो चुके हैं कि अंतरिक्ष को भी हम अय्याशी का अड्डा मानने लगे हैं। अंतरिक्ष पर्यटन का बाजार भी खुल चुका है। बशर्ते कि आपके पास पैसे हों। आप आराम से अंतरिक्ष में रंगरेलियां मनाने जा सकते हैं।

मैं तो उनके बारे में सोच रहा हूं जो इसी धरती पर रहते हैं और बिल्कुल मेरे बगलगीर हैं। पटना में मेरा घर ब्रह्मपुर नामक गांव में है और वहां से करीब 4 किलोमीटर की दूरी पर एक गांव है- पलंगा। वहां एक मुसहरी है। मुसहरी मतलब जहां मुसहर रहते हैं। सवर्णों ने मुसहरों के लिए एक और शब्द अपने शब्दकोश में रखा है – मांझी। कहीं-कहीं भुईयां भी कहे जाते हैं। हिंदी साहित्य में मांझी को मुसहर नहीं कहा जाता। वहां तो मांझी नाव खेता है।

भुइयां हमारे मगह में धरती को कहते हैं। एक वाक्य से इसका अर्थ समझा जा सकता है – भुइयां पर मत बैठो, चौकी पर बैठो। इस वाक्य के आधार पर मैं यदि विश्लेषण करूं तो वे लोग जो चौकी पर नहीं बैठते, जमीन पर बैठते हैं या फिर उन्हें मजबूर किया गया है, भुइयां कहलाते हैं। हमारे यहां तो एक देवता भी है – भुइयां महादेव। इसके बारे में खास जानकारी नहीं है। हो सकता है किसी ब्राह्मण ने किसी मुसहरी में अपना वर्चस्व बनाने के लिए भुइयां महादेव को स्थापित कर दिया होगा।

खैर, भुइयां यानी मुसहरों का जमीन से कोई लेना-देना नहीं है। पलंगा मुसहरी में जितने लोग रहते हैं, उनमें से कई मुझे नाम से जानते हैं। वजह यह कि मैंने एक समय उनकी भूमिहीनता को लेकर खूब लिखा। हर महीने कम से कम एक रिपोर्ट जरूर लिखता था। कोशिश रहती थी कि भूदान यज्ञ कमेटी वाले या फिर राज्य सरकार के भूमि सुधार विभाग की नजर पड़ जाय। एक बार तो मैंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की कार्यशैली पर लिखा। उन दिनों नीतीश बिहारी अस्मिता की राजनीति कर रहे थे और अपनी हर सभा में बिहारी अस्मिता की बात करते थे। उन दिनों ही उन्होंने गप्प किया था कि वे हर भारतीय की थाली में बिहारी व्यंजन देखना चाहते हैं।

तो हुआ यह कि मैंने मुसहरों की भूमिहीनता को लेकर अपनी खबर को बिहारी अस्मिता से जोड़ दिया ओर शीर्षक रखा – जिनका कोई पता ही नहीं, उनकी कैसी अस्मिता। मेरी रिपोर्ट का आधार बिहार सरकार द्वारा गठित भूमि सुधार आयोग की रपट थी, जिसमें कहा गया था कि करीब 47 फीसदी दलित न केवल भूमिहीन हैं बल्कि आवासहीन भी हैं। ठीक वैसे ही जैसे पलंगा मुसहरी के बाशिंदे। उन सबका कॉमन पता था – नहर पर, पलंगा मुसहरी, फुलवारी शरीफ, पटना।

सामान्य तौर पर किसी भी आदमी के पते में मकान संख्या होती है, गली का भी नंबर होता है, लेकिन बिहार के मुसहरों के पास केवल नाम है और पता के रूप में नहर पर।

कई बार मुझे लगा कि यह जो नहर है जिसके किनारे पर लोग बसे हैं, वे धरती पर नहीं रहते हैं। अंतरिक्ष में रहते हैं और इस कारण वे सरकार को नजर नहीं आते

 

फिल्म सगीना महतो का एक दृश्य

खैर, कल दिलीप कुमार का निधन हो गया। वे 98 वर्ष के थे। कल उन्हें याद किया तो जेहन में उनकी अनेक फिल्में आ गयीं। मुगलेआजम से लेकर सौदागर तक। एक फिल्मी सगीना महतो का उल्लेख इसलिए कि 1970 में तपन मेहता के निर्देशन में बनी यह फिल्म बेहद खास थी। इसका नायक एक गैर द्विज था। इसके अलावा एक और फिल्म की याद आ रही है, जिसमें दिलीप कुमार ने गाना भी गाया है।

यह फिल्म थी मुसाफिर जो शायद 1947 में रिलीज हुई थी। निर्देशक थे ऋषिकेश मुखर्जी। इस फिल्म में एक प्रेम कहानी थी। नायिका शायद उषा किरण थीं और नायक दिलीप कुमार। विवाहेतर संबंधों पर आधारित कहानी भी कह सकते हैं। लेकिन वैसी कहानी नहीं जो सिलसिला में थी। इसमें तो ग्लैमर का तड़का था और एक खास वर्ग की फिल्म थी। लेकिन मुसाफिर की बात अलग थी, जिसमें नायक और नायिका एक-दूसरे को चाहते थे, लेकिन एक नहीं हो पाते। वे दोनों फिर मिलते हैं लेकिन तब तक नायिका की शादी हो चुकी होती है और उसका एक बेटा भी राजा। इसी फिल्म में एक गाना है – लागी नहीं छूटे रामा चाहे जिया जाए । इसमें महिला की आवाज लता मंगेश्कर की है और पुरुष की आवाज दिलीप कुमार की।

कभी गौर से सुनिए इस गीत को। दिलीप कुमार की आवाज मन को मोह लेगी।

खैर, मैं पाकिस्तानी हुक्मरान की तारीफ करना चाहता हूं, जिसने पेशावर स्थित दिलीप कुमार के पैतृक मकान को राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर रखा है और उसे संग्रहालय बनाने जा रही है।

मैं सोच रहा हूं कि क्या भारत सरकार दिलीप कुमार की स्मृति में कोई संग्रहालय बनाएगी? क्या इतनी उदार है भारत की हुकूमत?

मेरे मन में अब भी अंतरिक्ष है। और इस अंतरिक्ष में मुसहर भी हैं और दिलीप कुमार भी हैं। मैं इस अंतरिक्ष का हिस्सा नहीं हूं क्योंकि मेरे पास पता है। दिल्ली में बेशक यह किराए का है, लेकिन है।

बहरहाल, कल दो पंक्तियां जेहन में आयी थीं-

शहर में है खबर और हमको ही खबर नहीं,

सब जगह धर्म है मेरे ईमान का रास्ता रोके।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

 

 

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