भारत की सबसे बड़ी अहिंसक क्रांति के नायक

विद्या भूषण रावत

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यह एक विशाल सभा थी जिसने कई लोगों के दिलों को झकझोर दिया था, लेकिन लाखों लोगों के जीवन में एक नई आशा लेकर आई थी। आज भी, देश के विभिन्न हिस्सों से लाखों की संख्या में नागपुर में ‘दीक्षाभूमि’ पहुंचते हैं। इसका प्रभाव इतना अधिक है कि स्वतंत्रता के बाद के भारत के इतिहास में किसी अन्य राजनीतिक या आध्यात्मिक नेता के पास इतने अनुयायी नहीं हैं जितने डॉ बाबा साहेब अम्बेडकर के हैं। उत्तर भारत में बहुत से लोग अपनी राजनीति चमकाने के लिए यह कहते हैं कि बाबा साहेब आंबेडकर ‘मात्र’ एक बुद्धिजीवी थे लेकिन यदि आप वाकई में देखना चाहते है कि बाबा साहेब ने लोगो के दिलो में कैसा असर डाला, तो धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस के दौरान नागपुर दीक्षाभूमि चले जाइए या उनकी स्मृति दिवस पर चैत्य भूमि, मुंबई पहुँचिये तो अंदाज लग जाएगा बाबा साहेब आंबेडकर की रक्तहीन क्रांति का।

भारतीय यथास्थितिवादी लोग गांधी जी के जीवन को संत के रूप में मनाते हैं जिन्होंने अहिंसा या अहिंसा के बारे में बात की थी। पेरियार ने एक बार गाँधी जी को महात्मा कहने से इनकार कर दिया था क्योंकि उनका कहना था के जब मैं आत्मा को नहीं मानता तो किसी को महात्मा क्यों कहूं। बाबा साहेब ने गांधी जी को पूरा सम्मान दिया लेकिन उन्हें कभी भी महात्मा नहीं कहा। पूना समझौते के बाद तो बाबा साहेब ने यहाँ तक कहा के ‘महात्मा तो आये और गए लेकिन दलितों की स्थिति वैसी के वैसी ही बनी रही’। आज़ादी के बाद, भारत की सरकारों और राजनेताओं ने गांधीजी को इतना महिमामंडित किया कि लगा भारत की हर समस्या का ‘समाधान’ गाँधी जी के ‘सत्य’ वचनों’ में है और इसके लिए ‘अहिंसा’ को ऐसा बनाया गया जैसे यह बात करने वाले गाँधी पहले व्यक्ति थे। इससे ही उपजा यह भी सवाल है कि क्या गाँधी जी की अहिंसा वाकई अहिंसा है? गाँधी जी की जीवनशैली और विचारों को देखकर क्या यह नहीं लगता कि  उन्होंने अहिंसा का राजनीतिक इस्तेमाल किया क्योंकि उनके अधिकांश चाहने वाले कभी भी अहिंसक नहीं थे। अहिंसक होना केवल एक व्याख्यान दे देना नहीं है। अहिंसा एक वैचारिक ताकत है लेकिन अहिंसा के नाम पर हम यथास्थितिवाद को सही नहीं ठहरा सकते। जातिवाद और वर्णव्यस्था को सही ठहराना और ‘ईश्वर प्रदत्त’ बता देना कौन-सी अहिंसा है। आखिर देश के बहुजन समाज को इस वैचारिकी और सांस्थानिक हिंसा ने सबसे ज्यादा लूटा। गाँधी जी को गीता में अहिंसा दिखाई दी जिसमें कृष्ण अर्जुन को ‘न्यायिक हिंसा’ का पाठ पढ़ा रहे हैं-

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ।।23।।

इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती, जल गला नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकता।

इस पर मैं बहस नहीं करूंगा कि ये हिंसा को सही ठहराना है या नहीं। लेकिन मैं यह कहना चाहता हूँ कि गांधी के जन्म से दो हज़ार पाँच सौ साल पहले बुद्ध ने भारत और दुनिया में अहिंसा का सन्देश दिया लेकिन बुद्ध की अहिंसा यथास्थितिवादियों को मजबूत करने के लिए नहीं थी अपितु भारत के बहिष्कृत लोगों के जीवन में बदलाव का सन्देश देती है। बुद्ध ने ज्ञान का लोकतंत्रीकरण किया क्योंकि वर्णवादी व्यवस्था में ज्ञान का अधिकार ब्राह्मणों को ही था और वे ही संस्कृत भाषा में अध्ययन कर सकते थे। 14वीं सदी के बाद भारत में जो भी क्रांतिकारी व्यक्तित्व हुए वे सभी समाज में अहिंसा की बात कर रहे थे। रविदास, कबीर, नानक, तुकाराम, रहीम और जितने भी सूफी संत हुए सभी ने प्रेम और सद्भाव की बात तो कही लेकिन इन सभी में एक समानता थी और वह यह कि सभी ने ब्राह्मणवाद, जातिवाद, अंधविश्वास, छुआछूत के विरुद्ध जमकर  बोला और ‘वेदों’ की सर्वोच्चता को चुनौती भी दी।

18वीं और 19वीं सदी के सभी महत्वपूर्ण आन्दोलन अहिंसक थे। जातिवाद और अंधविश्वास के विरुद्ध  सबसे बड़ा संघर्ष क्रांतिदूत ज्योतिबा फुले ने किया। ब्राह्मणवादी जातिवाद के विरुद्ध संघर्ष में भी फुले अपनी मानवीयता और वैचारिक प्रतिबद्धता को नहीं भूले। ब्राह्मण विधवाओं के लिए उन्होंने स्कूल खोले तो उनके पुनर्विवाह की बात भी की। उन्होंने एक ब्राह्मण महिला के बेटे को ही गोद लिया और यह साबित कर दिया कि वह मानसिक घृणा के शिकार नहीं हैं और उनकी लड़ाई ब्राह्मणवादी व्यवस्था से है, किसी व्यक्ति से नहीं, जो उस घर में पैदा हुआ, हो जो ब्राह्मण है।

पेरियार ने भी जनांदोलनों का सहारा लिया और ब्राह्मणवाद का विकल्प दिया जो मानववाद था। पेरियार ने धार्मिक ग्रंथों और परम्पराओं की पोल खोल दी और लोगो को स्वाभिमान का विकल्प दिया जिसमें पुरोहितों और कर्मकांडों की जरूरत नहीं थी। ये विकल्प मानववादी थे। किसी ने भी ब्राह्मणवाद के विरुद्ध हिंसात्मक आन्दोलन की बात नहीं की और न ही राग द्वेष की बात की।

बीसवीं सदी में भारत में जातिवादी-वर्णवादी व्यवस्था के विरुद्ध सबसे बड़ा आन्दोलन बाबा साहेब आंबेडकर के नेतृत्व में हुआ। जब बाबा साहेब आंबेडकर ने अछूतों के अधिकारों के लिए गाँधी जी से सवाल किया तो भारत के प्रभुत्ववादी लोगों ने उनकी देशभक्ति पर सवाल खड़े किये। नासिक के कालाराम मंदिर में जब उन्होंने दलितों के मंदिर प्रवेश का आन्दोलन किया तो उन पर पत्थर फेंके गए और गालियां दी गईं। जब डॉ आंबेडकर ने प्रधानमंत्री नेहरू के अनुरोध पर बेहद मेहनत से  हिन्दू कोड बिल ड्राफ्ट किया तो संसद में कांग्रेस के ही खाकी निक्करधारी सांसदों ने उनका विरोध किया। देश के राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ही उस बिल के विरुद्ध थे। ये वही राष्ट्रपति थे जिनकी बुद्धिमत्ता और बुद्धिजीवी होने की सभी कहानियां हमें सुनाई जाती हैं लेकिन यह नहीं बताया जाता कि उन्होंने एक प्रगतिशील बिल को रोकने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी। ये ही वो राष्ट्रपति थे जो सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए गए जबकि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें ऐसा न करने की सलाह दी थी।

बाबा साहेब जानते थे कि वर्णवादी लोगों के दिलों को बदलने की जो बात गाँधी कर रहे हैं वह ढकोसला है।  क्योंकि अपनी सुविधाओं और प्रिविलेजेस को छोड़े बिना तो कोई शान्ति स्थापित नहीं हो सकती। गाँधी जी दलित-आदिवासियों से अहिंसा की बात कर रहे थे लेकिन सशक्त लोगों से अपने विशेषाधिकारों को ख़त्म करने या कम करने के लिए नहीं कह रहे थे। उनका ट्रस्टीशिप का सिद्धांत दरअसल यही है कि ताकतवर लोगों के हाथ में सत्ता रहे लेकिन गरीब लोग विद्रोह न कर सकें। इसलिए उन्हें भी ‘साथ’ रख लिया जाए और थोड़ा-बहुत उनका भी ध्यान रख लिया जाए। गांधीजी ने पूरे जीवन में उन्हें कभी भी नेतृत्व में भागीदारी नहीं दी और न ही स्वायत्तता के सवाल पर अछूतों का साथ दिया। ये कहना कि वे हिन्दू धर्म का हिस्सा है और छुआछूत खराब है लेकिन लोगों को अपने वर्ण के अनुसार काम करना चाहिए और सही मुआवजा न मिलने पर हड़ताल भी नहीं करनी चाहिए, केवल और केवल यथास्थितिवादियों की मदद करना ही था।

इसलिए अहिंसा को हम केवल इस सन्दर्भ में न देखें कि किसी ने किसी को शारीरिक तौर पर पीटा या नहीं।  अहिंसा के पूरे परिप्रेक्ष्य देखने होंगे। जाति की मार झेल रहे लोग या छुआछूत की मार झेल रहे लोगों को जब सभी जगह से निराशा मिलेगी तो वे क्या करेंगे? या तो आत्महत्या या हिंसा? जाति की मार झेल रहे लोग 2000 साल से ‘अहिंसक’ हैं और जो प्रभुत्वशाली वर्ग अहिंसा के नाम से इवेंट मैनेजमेंट कर कर रहे हैं वे और उनके समुदाय ही इस सामाजिक-सांस्कृतिक हिंसा को प्रायोजित और आयोजित कर रहे हैं। इसलिए भारत के सन्दर्भ में यदि हम जाति व्यवस्था, धार्मिक कुरीतियों और धर्मग्रंथों का पुनर्पाठ नहीं करेंगे तो अहिंसा की बात करना बेईमानी होगा। कुलीनवर्ग केवल हमारे संसाधनों का ‘ट्रस्टी’ होगा कहना दरअसल उसके कुलीन या शोषक  होने को एक ‘वैचारिक’ जामा पहनाने जैसा है। और यह क्यों स्वीकार्य हो? इसलिए यह कहना के अहिंसा की बात करने वाले गाँधी पहले और अकेले व्यक्ति थे पूरी तरह से फरेब और झूठ है.

भारत में अहिंसा का सबसे बड़ा उत्सव 14 अक्टूबर, 1956 का है, जब अशोक विजयदशमी के दिन, नागपुर में बाबा साहेब अम्बेडकर ने आधिकारिक तौर पर बौद्ध धम्म ग्रहण किया और फिर अपने लाखों अनुयायियों को दीक्षा दी।

तथ्य यह है कि गांधी से दो हजार चार सौ साल पहले, बुद्ध ने अहिंसा की बात की थी लेकिन उनकी ‘अहिंसा’ यथास्थितिवादी नहीं थी, बल्कि परिवर्तनगामी थी। बुद्ध की वैचारिक क्रांति भारत में डॉ बाबा साहेब अम्बेडकर के प्रबुद्ध भारत बनाने के आह्वान के रूप में पूरी हुई थी। यह अजीब बात है कि भारत में 20 करोड़ दलितों को बुद्ध के मार्ग पर चलने या देखने के लिए डॉ अंबेडकर की इस अहिंसक क्रांति को आज भी ब्राह्मणवादी बुद्धिजीवियों ने इस योग्य नहीं माना कि उस पर कोई चर्चा हो और इस देश के लिए आदर्श मॉडल हो। ये वे गांधीवादी बुद्धिजीवी हैं जो गांधी की यथास्थितिवादी अहिंसा को ‘मील का पत्थर’ के रूप में मनाते हैं, गरीबों का अहिंसक होने का पाठ पढ़ाते हैं और शोषकों को उनका ट्रस्टी कहते हैं।

अगर हम गांधी जी के काम और अहिंसा को देखें, तो उनके राजनीतिक संघर्षों और प्रयोगों से कोई इनकार नहीं हैं और निस्संदेह

उन्होंने अहिंसा को एक बड़े राजनीतिक हथियार के तौर पर प्रयोग किया और वर्तमान भारत को अहिंसात्मक राजनैतिक विरोध का मार्ग भी दिखाया लेकिन वृहत्तर तौर पर तो यह देखना भी महत्वपूर्ण है कि गांधी जी की अहिंसा वास्तव में कितनी परिवर्तनगामी थी? क्या उनकी ‘अहिंसा’ वर्णवादी जातिवादी उत्पीड़न के खिलाफ दलितों के गुस्से को शांत नहीं करना चाहती थी? क्या यह सत्य नहीं कि गांधी उन्हें वर्णाश्रम धर्म की 'महानता' का उपदेश दे रहे थे जो भारत के बहुजन समाज पर सबसे बड़ी सांस्कृतिक और सामाजिक हिंसा थी जिसे धार्मिक ग्रंथों और परम्पराओं ने न्यायोचित ठहराया। यह भी एक सत्य है कि कांग्रेस पार्टी मूल रूप से जमींदारों, ब्राह्मणों और अन्य उच्च जातियों की पार्टी थी जिसमें गाँधी जी ने पैसेवाले मारवाड़ी मित्रों को भी इसमें शामिल किया।

अहिंसा के हथियार का इस्तेमाल अंग्रेजों से अधिक स्थानीय आंदोलनों को विफल करने के लिए किया गया था। हमने चंपारण, चौरी चौरा और अवध किसान आंदोलन देखा है और इन आंदोलनों को  ईमानदारी से अध्ययन करने  से पता चलता है कि गांधी ने दलित-पिछड़ों के स्थानीय नेतृत्व को दमनकारी जमींदारों और सूदखोरों के खिलाफ था, उसे अपनी बड़ी बड़ी बातों से ध्वस्त कर दिया। नतीजा यह हुआ के इनमें से अधिकतर जगहों पर हाशिए पर पड़े लोगों का नेतृत्व अंततः दमनकारी जातिवादी ताकतों को सौंप दिया गया और सभी को ‘भारत की आज़ादी’ तक इंतज़ार करने को कहा गया।

मैंने गांधीवादियों को ‘अहिंसा’ की बात करते सुना है। भूमिहीन दलित-आदिवासियों, जिनका सदियों से शोषण जारी था, की एक विशाल जनसभा में हमने गांधीवादियों के ‘अहिंसा’ के पाखंड को देखा है। क्या हमें यह नहीं लगता कि अपने सैकड़ों हेक्टेयर में बने ‘आश्रमों’ में रहने वाले ये लोग कभी ईमानदारी से आदिवासियों और दलितों के हितों की बात उठाएंगे। अहिंसा की ये शुरुआत मात्र अहिंसा जिंदाबाद या गांधीजी अमर रहे से नहीं हो सकती। अपने पुराने सामाजिक विशेषाधिकारों को छोड़े बिना यह मन्त्र मात्र वंचित समूहों को ‘शोषकों’ के रहमोकरम पर छोड़ देने की चाल नहीं है तो क्या है? अगर यह ‘अहिंसा’ है, तो समय आ गया है कि गांधीवादी दो बार जन्म लेनेवाले सवर्णों के घरों में अपना अभियान शुरू करें, जो दलितों और आदिवासियों के प्रति घृणा से भरे हुए हैं। यह समय है, हम उन्हें अहिंसा के अच्छे संस्कार सिखाएं और यह बताये कि दलित पर हिंसा बंद करो, जातिवाद को ख़त्म करो, छुआछूत ख़त्म करो। सच्चाई यह है कि गांधी सवर्णों का दिल नहीं बदल सके, न ही वे दलितों और आदिवासियों का दिल जीत पाए।

इसके विपरीत, डॉ अम्बेडकर, जिन्हें जातिवादी हिंदुओं से अपमान और अलगाव का इसलिए सामना करना पड़ा, क्योंकि वे ‘दलित वर्गों’ के अधिकारों के लिए बोल रहे थे और उन सभी समुदायों से, जिन्हें हिंदुओं द्वारा अछूत माना जाता था, अभी भी ‘भाईचारे’ की बात करते थे। दलितों और आदिवासियों के लिए  हिंदुओं के मन में अभी भी मौजूद जहर के बावजूद अम्बेडकर उनका हृदय बदलना चाहते थे। उन्होंने हिंदू आधिपत्य के खिलाफ हिंसक क्रांति का आह्वान नहीं किया। उन्होंने हमेशा ब्राह्मणवादी जाति के हिंदुओं के लिए हिंदू शब्द का इस्तेमाल किया और इसलिए अम्बेडकर की बुद्ध में आस्था और उसको बदलाव के लिए उपयोग करना भारत के लिए गांधी की यथास्थितिवादी अहिंसा की तुलना में बहुत बड़ा है..

क्या भारत को अंबेडकर के बौद्ध धम्म के मार्ग और प्रबुद्ध भारत के उनके आह्वान का जश्न नहीं मनाना चाहिए जो कि यह केवल दलितों के लिए नहीं बल्कि हम सभी के लिए था? बाबा साहेब ने कहा कि यदि समाज में घृणा जारी हैं तो भारत को प्रबुद्ध नहीं किया जा सकता है। इसके लिए वह समानता की बात कर रहे थे और उनका यह विश्वास था कि बिना बंधुत्व के समानता के कोई मतलब नहीं है। उन्होंने दलितों से खूनी क्रांति की बात नहीं की। बुद्ध के तर्क और करुणा के मार्ग पर चल कर ही इसको आगे किया और लोगों ने उनके इस मार्ग पर आगे चल कर साबित कर दिया कि ये भारत की सबसे बड़ी सामाजिक क्रांति थी। गांधीजी और गांधीवादी जिस प्रेम और अहिंसा की बात कर रहे थे वह बिना ऐतिहासिक गलतियों को सुधार असंभव है। गांधी और अम्बेडकर दोनों अहिंसा की बात करते थे, लेकिन यह अब दिखाई दे रहा है कि  अम्बेडकर के मार्ग में गांधी की तुलना में अधिक ठोस वैचारिक आधार है। गांधीवादी आज भी वैचारिक तौर पर हिंसा से लड़ नहीं पाए है क्योंकि जिन वर्गों और जातियों में हिंसा और जातिवाद कूट कूट कर भरा है उन्होंने ही गाँधी की हत्या की और आज भी वे अपनी गलतियों पर पश्चाताप करने को तैयार नहीं। सच्चाई तो यह है कि आज का ‘संभ्रांत’ कहलाये जाने वाला यह वर्ग गाँधी का इस्तेमाल केवल एक इवेंट मैनेजमेंट के तौर पर कर रहा है, लेकिन अपनी सुविधाओं और पूर्वाग्रहों को छोड़ने को तैयार नहीं है। वैसे भी भारत में दलित-आदिवासियों पर हिंसा का आधार पुरानी परम्पराएँ और धार्मिक ग्रन्थ हैं जिन्हें गांधीजी ने ‘अहिंसात्मक’ बताया था। अगर गांधी के अहिंसा के आह्वान का उनके उच्च जाति के अनुयायियों पर कोई प्रभाव पड़ता, तो मैं शर्त लगा सकता हूं कि भारत में दलितों के खिलाफ हिंसा अब तक बंद हो गई होती।

डॉ अंबेडकर को देखिए। उन्होंने अहिंसक होने का कोई नाटक नहीं किया, लेकिन उनके सभी कार्यों से स्पष्ट रूप से संकेत मिलता है कि वे इसमें विश्वास करते थे और इससे भी अधिक उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता उस  दर्शन के प्रति थी जो समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व लाता है।

गांधी की अहिंसा समानता की कीमत पर भी हो सकती है और शास्त्रों की सर्वोच्चता को स्वीकारने पर भी, लेकिन डॉ अम्बेडकर के लिए, अहिंसा तभी स्वीकार्य है जब वह समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व लाए। गांधी अपने 'गांव-गणराज्यों' में विश्वास करते थे, जो वास्तव में कभी थे ही नहीं, जबकि डॉ अम्बेडकर ने महसूस किया कि गांवों का लोकतंत्रीकरण किये बिना समता, समानता और भ्रातृत्व संभव नहीं है। दरअसल बाबा साहेब जानते थे कि ये ‘गांधीवादी’ ही गाँव में दलितों को सम्मानपूर्वक जीने नहीं देंगे।

अम्बेडकर ने लगातार सामाजिक लोकतंत्र पर जोर दिया और 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में अपने संबोधन में चेतावनी दी कि यदि सामाजिक लोकतंत्र नहीं होगा, तो संवैधानिक लोकतंत्र विफल हो जाएगा और फिर वही लोग, जिन्होंने इस संरचना को इतनी मेहनत से बनाया है, इसे ध्वस्त कर देंगे। अम्बेडकर की चेतावनी स्पष्ट थी कि एक समान सामाजिक व्यवस्था के अभाव में, हमारी राजनीतिक व्यवस्था का विफल होना तय है जो अंततः हाशिए पर रहने वाले समुदायों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित कर देगी और फिर वह उन्हें हथियार उठाने के लिए मजबूर कर सकती है, जो हमारे लोकतंत्र के लिए सबसे विनाशकारी होगा।

सात दशक से अधिक समय बीत चुका है और दलितों और आदिवासियों के खिलाफ जातिगत नफरत बेरोकटोक जारी है। इतना ही नहीं, अस्पृश्यता के रूप में छिपा हुआ रंगभेद एक महान संविधान के बावजूद बड़े पैमाने पर प्रचलित है और इसका कारण उन लोगों की अक्षमता और दुर्भावना है जिन पर संवैधानिक प्रावधानों को लागू करने की जिम्मेदारी है। इसके बावजूद दलितों की संविधान में गहरी आस्था है। उन्होंने हिंसा के सभी रास्तों को खारिज कर दिया है क्योंकि बुद्ध का रास्ता उन्हें ज्ञानोदय दिखा रहा है  और इस बात पर शोध किया जाना चाहिए। इसलिए, मैंने उल्लेख किया, यदि कोई यह देखना चाहता है कि भारत के बीस करोड़ से अधिक दलितों के लिए बाबा साहेब अम्बेडकर का क्या अर्थ है, तो धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस के दौरान नागपुर में दीक्षाभूमि, 5 और 6 दिसंबर को मुंबई की चैत्यभूमि और 14 अप्रैल को शेष भारत में जाएँ। जो भीड़ गांवों में अंबेडकर जयंती मनाने आती है, वह राज्य द्वारा प्रायोजित नहीं होती है अपितु स्वतःस्फूर्त होती है। पूरे देश में इन आयोजनों के दौरान अम्बेडकरवादी साहित्य भारी मात्रा में बेचा जाता है।

दलितों के लिए बाबा साहेब अम्बेडकर का मार्ग  स्पष्ट है कि उन्हें उस धर्म और मूल्यों को छोड़ना होगा जो उन्हें नीचा दिखाते हैं और जन्म आधारित असमानता में विश्वास करते हैं और उन्होंने पाया कि केवल बुद्ध का तरीका ही समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व में आधारित एक प्रबुद्ध समाज का निर्माण कर सकता है और दिलचस्प रूप से न केवल दलित, लेकिन आज पिछड़े वर्ग के लोग भी बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा सुझाए गए धम्म  आंदोलन की ओर आकर्षित हैं। अब यह बढ़ रहा है और भारत के कोने-कोने तक पहुंचेगा।

दीक्षाभूमि का एक विहंगम दृश्य

अब सभी को न्याय मांगने के लिए गाँव के चौधरियों और पुरोहितों के पास जाने की जरूरत नहीं है क्योंकि बाबा साहेब का दिया हुआ संविधान है। अब जरुरत इस बात की है यह संविधान निष्पक्ष रूप से लागू हो और सत्ता के सभी ढांचे में दलितों को उनका उचित प्रतिनिधित्व मिले। हमें उस विचार को त्यागना होगा और उससे अपने आपको पूरी तरह से अलग करना होगा जिसने असमानता को दैवीय बताया और कुछ समुदायों का महिमामंडन और अन्य को अपमानित किया। ऐसा दर्शन केवल बीमार समाज का निर्माण करेगा जो एक मजबूत भारत नहीं बना सकता। इसलिए डॉ अम्बेडकर चाहते थे कि लोग ‘नवयान’, नए रास्ते पर चलें। यह नया मार्ग जात-पात की पुरानी गंदी दुनिया को छोड़कर, बुद्ध और उनके  ज्ञान की दुनिया में अपने दम पर जीवन जी रहा है।

गांधी और गांधीवादियों के विपरीत, अम्बेडकर और अम्बेडकरवादी ‘अहिंसा’ विषय पर बहुत अधिक ज्ञान  नहीं देते क्योंकि उनका ध्यान समानता-स्वतंत्रता और बंधुत्व है और इसके लिए अम्बेडकर ने दलितों को बंदूकें उठाने और जातिवादी हिंदुओं को खत्म करने के लिए नहीं कहा था। उन्होंने दबे-कुचले समुदायों को हमेशा के लिए नफरत में जीने के लिए नहीं कहा, बल्कि खुद को ‘उनके सर्वश्रेष्ठ से बेहतर’ बनने के लिए कहा, जैसा कि हमारे अंबेडकरवादी मित्र एन जी उइके कहा करते थे।

यह समय है जब भारत डॉ अंबेडकर के ज्ञान के मार्ग का जश्न मनाये। समानता-स्वतंत्रता और बंधुत्व को गले लगाये, जिसे उन्होंने बुद्ध के मार्ग के माध्यम से वर्णित किया, वैयक्तिकता का सम्मान करें और एक आधुनिक समाज का निर्माण करें। आप मनुस्मृति की भावना से आधुनिक भारत का निर्माण नहीं कर सकते।  आधुनिक भारत जो सबको समान अधिकार देता है वह केवल बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा दिखाए गए समतावाद और सांस्कृतिक पथ के संवैधानिक मूल्यों के समाजीकरण के माध्यम से ही संभव है, जिन्होंने 14 अक्टूबर, 1956 को धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस पर स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे बड़ी अहिंसक क्रांति का सूत्रपात किया था।

विद्याभूषण रावत प्रखर सामाजिक चिंतक और कार्यकर्ता हैं। उन्होंने भारत के सबसे वंचित और बहिष्कृत सामाजिक समूहों के मानवीय और संवैधानिक अधिकारों पर अनवरत काम किया है।

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