Wednesday, July 24, 2024
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आज की स्थिति में आधी आबादी को आर्थिक-सामाजिक समानता मिलना दूर की कौड़ी

किसी भी देश की आर्थिक असमानता उस देश के सामाजिक जीवन को पूरी तरह से प्रभावित करती है। भारत जैसे बड़े लोकतान्त्रिक देश में वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब की ताजी रिपोर्ट से यह बात सामने आई है कि पिछले दस वर्षों में सवर्णों की संपत्ति में हिस्सेदारी उत्तरोत्तर बढ़ती गई है, जबकि ओबीसी और एससी की हिस्सेदारी में हर वर्ष गिरावट आई है। जब तक स्थिति यही रहेगी, कभी भी समानता की कल्पना नहीं की जा सकती।

विश्व आर्थिक महाशक्ति बनने का ढिंढोरा पीटने वाली मोदी सरकार की पोल खोलने वाली एक और रिपोर्ट सामने आई है  टूवर्ड्स टैक्स जस्टिस एण्ड वेल्थ री-डिस्ट्रब्यूशन इन इंडिया शीर्षक से जारी वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब की ताजी रिपोर्ट। 15 मई, 2024 को जारी इस रिपोर्ट से पता चलता है कि देश की संपत्ति में 89% हिस्सेदारी सामान्य वर्ग अर्थात सवर्णों की है, जबकि दलित समुदाय की सिर्फ 2.8% है। वहीं भारत के विशालतम समुदाय ओबीसी की देश की धन-संपदा में 9%, जो आधी आबादी की महज 3% हिस्सेदारी है। नीचे वर्ष 2013 से 2022 तक के आंकड़े बताते हैं कि विगत दस सालों में सवर्णों की संपत्ति में हिस्सेदारी उत्तरोत्तर बढ़ती गई है, जबकि ओबीसी और एससी की हिस्सेदारी में हर वर्ष गिरावट आई है। इससे प्रमाणित होता है कि मोदी-राज में सवर्णों की स्थिति लगातार बेहतर तो गैर-सवर्णों की बद से बदतर होती गई है। साथ में देश में सामाजिक और आर्थिक विषमता की स्थिति भी बद से बदतर होती गई है। आंकड़े स्पष्ट गवाही देते हैं आर्थिक और सामाजिक असमानता, जो कि मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या है, के मामले मे भारत प्रायः विश्व चैंपियन बन चुका है।   

15 मई 2024 को जारी वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब की ताजी रिपोर्ट (प्रतिशत में)

 

वर्ष सवर्ण ओबीसी एससी
2013 80.3 17.8 1.8
2014 78.1 20.0 1.9
2015 78.4 17.6 4.0
2016 79.7 16.8 3.5
2017 80.1 16.1 3.7
2018 81.7 14.4 4.0
2019 81.4 15.2 3.5
2020 84.3 11.6 4.1
2021 86.0 10.1 3.9
2022 88.4 9.0 2.6

बहरहाल मोदी-राज में ऐसा नहीं कि पहली बार वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब की 2024 के रिपोर्ट में ही सामाजिक और आर्थिक असमानता का भयावह रूप सामने आया है। विगत वर्षों में एचजीआई, वर्ल्ड हैप्पीनेस, मानव विकास सूचकांक, क्वालिटी ऑफ़ लाइफ, जच्चा-बच्चा मृत्यु दर, प्रति व्यक्ति डॉक्टरों की उपलब्धता, क्वालिटी एजुकेशन इत्यादि से जुड़ी जितनी भी रिपोर्ट्स  जारी हुई हैं, सब में देश की स्थिति बद से बदतर ही नजर आई है। इसमें जारी आर्थिक और सामाजिक विषमता के आंकड़ें बदतर हुए हैं। किन्तु मोदी राज में जिस रिपोर्ट ने भारत की स्थिति सबसे शर्मनाक की है, वह है ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट, वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम द्वारा 2006 से हर वर्ष जो वैश्विक लैंगिक अन्तराल रिपोर्ट प्रकाशित हो रही है, उससे साफ़ पता चलता है कि नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से महिलाओं की हिस्सेदारी की स्थिति दयनीय हुई है। लैंगिक असमानता के मामले मे भारत दक्षिण एशियाई देशों में सबसे निचले पायदान पहुंच पर चुका है। बहरहाल आधी आबादी की स्थिति को देखते हुए ‘वैश्विक लैंगिक अंतराल रिपोर्ट – 2020’ में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि भारत में महिलाओं को आर्थिक रूप से पुरुषों के बराबर आने में 257 साल लग सकते हैं। यह कितनी चिंताजनक स्थिति है इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि इसकी 2019 की रिपोर्ट में आधी आबादी के समानता पाने में 202 साल लगने का अनुमान लगाया गया था लेकिन अगले एक साल में 202 से बढ़कर 257 हो गया, जो इस बात का संकेतक कि मोदी-राज में महिलाओं की स्थिति आश्चर्यजनक रूप से बद से बदतर होती जा रही है। अब यदि आधी आबादी को पुरुषों के बराबर आने में ढाई सौ साल से अधिक लग सकते हैं तो मानना पड़ेगा कि भारत में आर्थिक और सामाजिक विषमता की स्थिति अत्यंत भयावह है और इसका सर्वाधिक शिकार है देश की आधी आबादी। 

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भारत देश में असमानता की स्थिति 

दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश के रूप में चिन्हित भारत विश्व के सबसे असमान देशों में से एक है। ऐसी असमानता विश्व में शायद ही कहीं और हो,  इस बात पर मोहर वर्ष 2021 में लुकास चांसल द्वारा लिखित और चर्चित अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटि,  इमैनुएल सेज और गैब्रियल जुकमैन द्वारा समन्वित ‘विश्व असमानता रिपोर्ट-2022’ में भी लगी थी। 2015 के बाद क्रेडिट सुइसे और ऑक्सफाम की प्रकाशित सभी रिपोर्टों में ही भारत में बढती भयावह आर्थिक असमानता को लेकर चिंता जाहिर की जाती रही है। पर, मोदी सरकार इसकी लगातार अनदेखी करती रही, इसलिए विगत वर्षों से प्रकाशित अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्टो में देश की स्थिति देखकर हम शर्मसार हुए जा रहे हैं। लेकिन सिर्फ मोदी सरकार ने ही बढ़ती असमानता की अनदेखी नहीं की, विपक्षी दलों और बुद्धिजीवियों की ओर से भी इसे लेकर वाजिब चिन्ता जाहिर नहीं की गई। इस मामले में एक मात्र अपवाद साबित हुए राहुल गांधी, जिन्होंने इस वर्ष भारत जोड़ों न्याय यात्रा में  आर्थिक और सामाजिक विषमता को सबसे गंभीर समस्या चिन्हित करते हुए सत्ता में आने पर हर क्षेत्र मे ‘जितनी आबादी- उतना हक’ की नीति लागू करने की बात को बार-बार दोहराया।

समानता के राजनैतिक प्रयास कितने कारगर 

अठारहवीं लोकसभा चुनाव मे जारी कांग्रेस  के घोषणापत्र में जाति जनगणना के साथ आर्थिक सर्वे कराकर विभिन्न सामाजिक समूहों को उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर  संख्यानुपात मे हिस्सेदारी देने के साथ आरक्षण का 50 प्रतिशत दायरा खत्म करने तथा महिलाओं को सरकारी नौकरियों मे 50% आरक्षण देने जैसा वादा किया गया। निश्चय ही भारत में व्याप्त आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी के खात्मे तथा आधी आबादी की हिस्सेदारी का सबसे क्रांतिकारी नक्शा कांग्रेस की ओर सामने आया है। बहरहाल मान लिया जाए भविष्य में सत्ता में आने पर कांग्रेस पार्टी अवसरों और संसाधनों के बंटवारे में जितनी आबादी-उतना हक की पॉलिसी लागू करती है या खुद मोदी अपनी सत्ता बचाने के लिए जितनी आबादी- उतना हक को लागू करने की दिशा में अग्रसर होते हैं तो भी देश को असमानता से उबरने मे वर्षों लग सकते हैं। देश को असमानता से जल्दी उबरने के लिए कुछ अभूतपूर्व क्रांतिकारी कदम उठाने होंगे।

इसमे कोई शक नहीं कि राहुल गांधी के साहसिक प्रयास से धन-संपदा के बंटवारे में जितनी आबादी- उतना हक का मुद्दा स्थापित हो चुका है और भविष्य  में हम इसे लागू होते देख भी सकते हैं. लेकिन निकट भविष्य में अगर एससी, एसटी, ओबीसी ,धार्मिक अल्पसंख्यकों और सवर्णों के संख्यानुपात में शक्ति के स्रोतों के बंटवारे का सिलसिला चल पड़ता है तो भी देश विषमता की समस्या से जल्दी  पार नहीं पा सकता! देश तभी इससे पार पा सकता है जब धन संपदा पर 89% कब्जा जमाए सवर्ण वर्ग को अवसरों और संसाधनों के वितरण मे सबसे अंत में अवसर मिले और सबसे वंचित तबकों को सबसे पहले उनका हिस्सा मिले। अगर देश इस हिसाब से अवसरों के बंटवारे के लिए तैयार होता है तो सबसे पहले इस बात का पता लगाना होगा कि सर्वाधिक वंचित कौन? सर्वाधिक वंचित का पता लगने के बाद न सिर्फ अवसरों और संसाधनों पर उसका पहला हक घोषित हो बल्कि उसकी हिस्सेदारी सुनश्चित करने का युद्ध स्तर पर प्रयास हो। जहां तक वंचितों के संसाधनों पर पहला हक का सवाल है डॉ. मनमोहन सिंह सरकार से लेकर मोदी सरकार  के कार्यकाल में यह सवाल कई बार उठा और हर बार जो जवाब सामने आया, वह यह रहा कि संसाधनों पर पहला वंचितों और गरीबों का है लेकिन पहला  हक वंचितों/ गरीबों का है, यह उत्तर महज टालने वाला रहा : इसके पीछे  चिंतन- मनन का नितांत अभाव रहा।

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यदि सरकारों की नीयत सही होती तो वे सर्वाधिक वंचित तबके के संधान में गहराई से जुटते और ऐसा करने पर पाते कि सर्वाधिक वंचित आधी आबादी है। कम से कम 2019–20 के बाद ग्लोबल जेंडर गैप की रिपोर्ट देखने के बाद तो आँख मूँदकर घोषणा करते कि संसाधनों पर पहला आधी आबादी का है। लेकिन इस दौर में भी मोदी सरकार की ओर से बताया गया कि संसाधनों पर पहला हक गरीबों का है जो भ्रांत घोषणा रही। सच्ची बात तो यह है हाल के वर्षों की ग्लोबल जेंडर गैप की रिपोर्टों से यह निर्विवाद रूप से प्रमाणित हो चुका  है कि हमारी आधी आबादी सबसे ज्यादा वंचित है और संसाधनों पर पहला हक उसका होना चाहिए। ध्यान रहे हमारी आधी आबादी लगभग 70  करोड़ के आसपास है, जो  यूरोप के प्रायः तीन दर्जन देशों से अधिक, अमेरिका की कुल आबादी का डबल और लैटिन अमेरिका की सकल आबादी के बराबर है। ऐसे में क्या हमारी आधी आबादी की आर्थिक असमानता से बड़ी कोई समस्या भारत ही नहीं, पूरे विश्व में हो सकती है! अगर नहीं तो यदि आधी आबादी की समानता को ध्यान में रखकर विषमता के खिलाफ लड़ाई लड़ें, तो शायद बहुत ही बेहतर परिणाम दे पाएंगे। 

महिलाओं को सामाजिक/आर्थिक समानता मिलना सपना 

भारत में आर्थिक और सामाजिक असमानता का सर्वाधिक शिकार महिलायें हैं और महिलाओं में भी सर्वाधिक शिकार क्रमशः दलित और आदिवासी महिलाएं! यदि सवर्ण समुदाय की महिलाओं को आर्थिक समानता अर्जित करने में 250 साल लग सकते हैं तो दलित-आदिवासी महिलाओं को 350 साल से अधिक लग सकते हैं। यदि हमें 257 वर्षो के बजाय आगामी कुछ दशकों में लैंगिक समानता अर्जित करनी है तो अवसरों और संसाधनों के बंटवारे के रिवर्स पद्धति का अवलंबन करना होगा अर्थात सबसे पहले एससी/एसटी, उसके बाद ओबीसी, फिर धार्मिक अल्पसंख्यक और शेष में जेनरल अर्थात सवर्ण समुदाय की महिलाओं को प्राथमिकता के साथ 50 प्रतिशत हिस्सेदारी देने का प्रावधान करना होगा। इसके तहत संख्यानुपात में क्रमशः दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यकों और शेष में  सवर्ण महिलाओं को संख्यानुपात में अवसर सुलभ कराने का अभियान युद्ध स्तर पर छेड़ना होगा। एससी/एसटी, ओबीसी, धार्मिक अल्पसंख्यकों और सवर्ण समुदाय महिलाओं को उन के समुदाय के संख्यानुपात का आधा अर्थात 50% हिस्सा देने के बाद फिर बाकी आधा हिस्सा इन समुदायों के पुरुषों के मध्य वितरित करने का कठोर प्रावधान बनना होगा। यदि विभिन्न समुदायों की महिलाएं अपने प्राप्त हिस्से का सदुपयोग करने की स्थिति में न हों तो उनके हिस्से का बाकी अवसर उनके पुरुषों के मध्य ही बाँट दिया जाय: किसी भी सूरत में उनका हिस्सा अन्य समुदायों को न मिले।

यदि हम शक्ति के विविध स्रोतों – सेना व न्यायालयों सहित सरकारी और निजीक्षेत्र की सभी स्तर की,सभी प्रकार की नौकरियों, पौरोहित्य,डीलरशिप; सप्लाई,सड़क-भवन निर्माण इत्यादि के ठेकों,पार्किंग, परिवहन; शिक्षण संस्थानों, विज्ञापन व एनजीओ को बंटने वाली राशि, ग्राम-पंचायत, शहरी निकाय, संसद-विधानसभा की सीटों; राज्य एवं केन्द्र की कैबिनेट;विभिन्न मंत्रालयों के कार्यालयों; विधान परिषद-राज्यसभा;राष्ट्रपति,राज्यपाल एवं प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री के कार्यालयों इत्यादि के कार्यबल- में क्रमशः दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यक, और सवर्ण समुदायों की महिलाओं को इन समूहों के हिस्से का 50 प्रतिशत भाग सुनिश्चित कराने में सफल हो जाते हैं तो भारत 257 वर्षों के बजाय 57 वर्षों में लैंगिक समानता अर्जित कर विश्व के लिए एक मिसाल बन जायेगा।

 

एच एल दुसाध
एच एल दुसाध
लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.

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