कबीर का अद्भुत साहित्य (डायरी 14 जून, 2022)

नवल किशोर कुमार

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साहित्य का मतलब क्या होता है? मेरे हिसाब से वह, सबके हित में हो, वही साहित्य है। और यदि हम इस कसौटी पर साहित्यिक रचनाओं को परखें तो हमें निराशा भी मिलती ही है। अनेक रचनाएं ऐसी हैं, जिनमें केवल खास तबके का हित है। खासकर हिंदू धर्म ग्रंथों को जब हम पढ़ते हैं तो हम पाते हैं कि इन ग्रंथों की रचना केवल इसलिए की गई ताकि ब्राह्मण वर्ग के वर्चस्व को कायम रखा जा सके। फिर बात चाहे पुराणों की हो या फिर स्मृतियों की।
दरअसल, किसी भी साहित्य के लिए आवश्यक यही है कि उसके केंद्र में बड़े समूह का हित शामिल हो। मसलन जब हम कबीर को पढ़ते हैं तो कुछ ऐसा ही पाते हैं। हालांकि कबीर को पढ़ना आसान नहीं है। ऐसा अहसास तब होता है जब हम उनकी रचनाओं को पढ़ते हैं। हालांकि उनकी भाषा ऐसी नहीं है कि जिसे समझा ही नहीं जा सकता। दरअसल, कबीर अलहदा कवि रहे। उनकी भाषा में एक तरह रहस्य है। ऐसे बिंब हैं, जिनके अनेक अर्थ लगाए जा सकते हैं और यह कहना अधिक सत्य से निकट रहना होगा कि लगाए जाते रहे हैं।
मैं इस बात के बारे में नहीं सोच रहा हूं कि कबीर द्वैतवादी थे या अद्वैतवादी। मैं यह भी नहीं सोच रहा हूं कि कबीर अनीश्वरवादी से ईश्वरवादी क्यों और कैसे हो गए। मैं तो केवल उनके साहित्य पर सोच रहा हूं, जिसमें बेशक द्विज साहित्यकारों के साहित्य वाली खूबसूरती नहीं है। कबीर के साहित्य में खुरदुरापन है। या कहिए कि एक पथरीला रास्ता है। सबसे खास कबीर के साहित्य में कबीर के द्वारा उपयोग किये गये बिंब हैं। एक उदाहरण देखिए–
भंवर उड़े बक बैठे आई। रैनि गई दिवसौ चलि जाइ।
हल हल कांपै बाला जीव। ना जानै का करिहै पीव।
अब इस पद में भौंरा, बगुला, रात, दिन, जीव और पीव जैसे बिंब हैं। इस पद में उपयोग किये गये शब्दों का अर्थ जानने के बाद भी आप पद को तभी समझ सकते हैं जब आप इनके मर्म को समझेंगे। इसके लिए कबीर की परंपरा को समझने की आवश्यकता है। जैसे इसी पद में  ‘भंवर’ और ‘रैन’ दोनोे का अर्थ ‘जवानी’ है; ‘बक’ और दिन’ दोनों का अर्थ ‘बुढ़ापा’ है; ‘पीव’ ईश्वर है; ‘हंस’ आत्मा है और ‘कौए उड़ाने’ का अर्थ ब्राह्मणवादी पाखंडों का विरोध करना है।

दरअसल, किसी भी साहित्य के लिए आवश्यक यही है कि उसके केंद्र में बड़े समूह का हित शामिल हो। मसलन जब हम कबीर को पढ़ते हैं तो कुछ ऐसा ही पाते हैं। हालांकि कबीर को पढ़ना आसान नहीं है। ऐसा अहसास तब होता है जब हम उनकी रचनाओं को पढ़ते हैं। हालांकि उनकी भाषा ऐसी नहीं है कि जिसे समझा ही नहीं जा सकता। दरअसल, कबीर अलहदा कवि रहे। उनकी भाषा में एक तरह रहस्य है। ऐसे बिंब हैं, जिनके अनेक अर्थ लगाए जा सकते हैं और यह कहना अधिक सत्य से निकट रहना होगा कि लगाए जाते रहे हैं।

 

कबीर की खासियत उनकी जबरदस्त शैली रही है। वह शब्दों का इतना खूबसूरत उपयोग करते हैं कि पढ़नेवाला बस उनकी सृजनतात्मकता के गहरे समंदर में डुबकियां लगाने लगे।अब उनकी एक साखी है। इसमें कबीर शब्दों से कैसे खेलते हैं, इसकी बानगी देखें–

माला फेरत युग गया, पाया न मन का फेर।
कर का मनका छांड़िके, मन का मनका फेर।
यह कबीर के साहित्य का विस्तार है। वह रहस्य की बातें करते हैं। लेकिन अपने आपको लोगों से दूर नहीं करते। वह उन शब्दों का ही उपयोग करते हैं जो लोगों के द्वारा उपयोग में लाए जाते रहे। अब उपरोक्त को ही देखें तो इसकी दूसरी पंक्ति में कबीर का जादू है। कर का मनका से कबीर हाथ की माला कह रहे हैं। हाथ की माला का मतलब वह माला जो हम हाथ से बनाते हैं। अब हम हाथ से बनाते क्या हैं और क्या है जिसे हम फेरते रहते हैं। सामान्य अर्थ में तो यह कि एक माला है जिसे ब्राह्मणवादी लोग फेरते रहते हैं और हर मनका फेरते समय ईश्वर को याद करते हैं। कुछ लोगों के लिए यह ईश्वर को पाने हेतु साधना करने के जैसा है। लेकिन कबीर इससे भी बड़ी बात कहते हैं। वे कहते हैं कि हाथ की बनाई माला, यानी इस जीवन में जो कुछ भी रचा-गढ़ा, उसे छोड़ दो। मन की माला को फेरो और नये सृजन करो। जो माला पहले बना दी गयी, उसको फेरने से कुछ भी हासिल नहीं होनेवाला। उससे केवल जड़ता बढ़ेगी।
सचमुच बेहद अद्भुत  हैं कबीर। वह इश्क के कवि हैं। अब उनकी एक रचना है और कहिए कि बहुअर्थी रचना है–
जा घट प्रेम ना बसे, सो घट जानु मसान।
जैसे खाल लुहार की, श्वांस लेत बिन प्रान।
अब इसमें घट का अर्थ पहले घाट समझते हैं। तब इसका मतलब यह है कि वह घाट, जहां प्रेम नहीं है, वह श्मशान के घाट के समान है। ठीक वैसे ही जैसे लोहार की घौंकनी है। वह भी सांस लेती है और छोड़ती है, लेकिन उसमें कोई प्राण नहीं है। अब गणितीय प्रमेयों के जैसे घट का अर्थ बर्तन रखते हैं या फिर हृदय या घर। तब देखिए कितनी खूबसूरत बात कबीर कह गये हैं। जिस हृदय में प्रेम नहीं है, उसका महत्व क्या?

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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