लोकल फॉर ग्लोबल तो क्या लोकल फॉर लोकल का कांसेप्ट भी असफल

अपर्णा , कार्यकारी संपादक , गाँव के लोग डॉट कॉम

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किसान, जिनकी बदौलत हम और आप हैं लेकिन किसान लगातार सड़क पर हैं. सिंघु बॉर्डर पर किसानों को तीन काले कृषि कानून के विरोध में आन्दोलन करते 330 दिन हो चुके हैं और इधर देश के किसी न किसी हिस्से से किसानों के मरने-आत्महत्या करने और मारने की खबर आये दिन सोशल मीडिया पर वायरल होती रहती है। सच कहूँ तो अब ऐसी खबरें सिर्फ  सोशल मीडिया पर ही आ पा रही हैं और उसी के सरोकार किसानों के साथ हैं भी। हम सब जानते हैं कि सभी प्राइवेट चैनल जो सरकारी हो चुके हैं, सरकार की गोद में जा बैठे हैं और वे किसानों-मजदूरों की खबरों से लगातार परहेज रखे हुए हैं। इसके बावजूद मजदूरों और किसानों के सवाल आज के सबसे जलते हुये सवाल हैं।

25 अक्टूबर को ललितपुर के सोनी अहिरवार नामक किसान ने केवल इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि लाइन में लगने के बाद भी खाद की आपूर्ति की कमी के कारण उसे खाद नहीं मिल पाई और महेश नामक किसान लगातार तीन दिन से दिन-दिनभर लाइन में खड़े रहने की वजह से तबीयत बिगड़ने से जान से हाथ धो बैठा। इन दो छोटी घटनाओं से सरकार की व्यवस्था की पोल खुल गई। लोकल फॉर ग्लोबल जैसी बड़ी-बड़ी बातें करने वाले मोदीजी लोकल फॉर लोकल के कांसेप्ट पर भी खरे नही उतर पा रहे हैं।

आज ही दिल्ली के टिकरी बॉर्डर के पास हरियाणा के बहादुरगढ़ में एक तेज रफ्तार ट्रक ने छह महिला आंदोलनकरी किसानों  पर ट्रक चढ़ गई या चढ़ाकर कुचल दिया, जिसमें से झज्जर में तीन महिला किसानों, जिससे तीनों महिला किसानों की मौत हो गई। सरकार किसानों से इतनी डरी हुई है कि किसानों के आन्दोलन को हिंसक तरीके से खत्म करना चाहती है।

डाउन टू अर्थ मैगज़ीन और सेण्टर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर दिन 28 से ज्यादा किसान आत्महत्या करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में 5957 किसान और 4324 खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की। यह बहुत ही भयानक स्थिति है। आप सोचकर देखिये कि जब घर का मुखिया किसान जब खेती-किसानी कर परिवार नहीं चला पा रहा है तब उसकी अनुपस्थिति में परिवार का क्या हश्र होगा? किसानों को नहीं चाहिए स्मार्ट सिटी, नहीं चाहिए बुलेट ट्रेन, उन्हें चाहिए उचित दाम पर खाद, बिजली-पानी और तैयार फसल के लिए उपयुक्त मंडी, जहाँ अपनी फसल बेचकर वे सम्मानपूर्वक जीवन गुजार सकें।

आपको याद होगा कि पिछले हफ्ते ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दावा किया कि उनकी सरकार इस कदर किसान हितैषी है कि दो हज़ार सत्रह के बाद एक भी किसान ने आत्महत्या नहीं की। योगी सरकार के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने कहा कि योगी सराकर ने किसानों का हित में कार्य कर रही है। योगी सरकार ने सबसे पहले प्रदेश के 86 हजार किसानों का 46 हजार करोड़ रुपये कर्ज माफी की थी। यही नहीं सरकार ने इन चार सालों में रिकार्ड खाद्यान्न की खरीद एमएसपी पर की है। इसका भुगान भी किसानों को किया जा चुका है। यह बातें उन्होंने सर्किट हाउस में पत्रकारों से वार्ता के दौरान कहीं। कहा कि धरना-प्रदर्शन करने वाले कुछ लोग पूरे देश की दिशा और दशा नहीं तय कर सकते हैं। भाजपा सरकार से किसान पूरी तरह से संतुष्ट हैं। सपा सरकार में प्रदेश में खाद्यान्न उत्पादन 439 लाख 47 हजार मीट्रिक टन था जो योगी सरकार में बढ़कर 624 लाख 33 हजार मीट्रिक टन पहुंच गया है। प्रति हेक्टयर 22.69 हजार हेक्टेयर उत्पादन बढ़ा है। चार साल में उत्पादन 184 लाख मिट्रीक टन बढ़ा है। किसानों की हितैषी बताने वाली सपा-बसपा सरकार में 18,79,362 किसानों से 10 साल में 238 करोड़ 49 लाख मीट्रिक टन धान खरीदा गया था। 28 हजार 40 करोड़ रुपये का भुगतान किसानों को किया गया था। इसके सापेक्ष योगी सरकार ने चार सालों में 21,88,581 किसानों से 214 लाख 56 हजार मीट्रिक टन धान खरीदा। 37 हजार 825 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान भी कर दिया। कहा कि पीएम सम्मान निधि योजना के तहत प्रदेश में ढाई करोड़ से ज्यादा किसानों को लाभ मिल रहा है। ढाई सालों में 37 हजार 175 करोड़ की धनराशि किसानों के खातों में भेजी जा चुकी है।

पिछले हफ्ते ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दावा किया कि उनकी सरकार इस कदर किसान हितैषी है कि दो हज़ार सत्रह के बाद एक भी किसान ने आत्महत्या नहीं की।

लेकिन इस दावे की ढ़ोल में कितना पोल है इसे जानने के लिए आपको वास्तविकता की ओर नज़र दौड़ानी होगी। डाउन टू अर्थ मैगज़ीन और सेण्टर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर दिन 28 से ज्यादा किसान आत्महत्या करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में 5957 किसान और 4324 खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की। यह बहुत ही भयानक स्थिति है। आप सोचकर देखिये कि जब घर का मुखिया किसान जब खेती-किसानी कर परिवार नहीं चला पा रहा है तब उसकी अनुपस्थिति में परिवार का क्या हश्र होगा? किसानों को नहीं चाहिए स्मार्ट सिटी, नहीं चाहिए बुलेट ट्रेन, उन्हें चाहिए उचित दाम पर खाद, बिजली-पानी और तैयार फसल के लिए उपयुक्त मंडी, जहाँ अपनी फसल बेचकर वे सम्मानपूर्वक जीवन गुजार सकें। आप किसानों के हालात को खुली आँखों से देखने की कोशिश और साहस कीजिये। नाबार्ड के एक हालिया अध्ययन के मुताबिक भारत में 10.07 करोड़ किसानों में से 52.5 प्रतिशत क़र्ज़ में दबे हुए हैं। वर्ष 2017 में एक किसान परिवार की कुल मासिक आय 8,931 रुपये थी।

आपको याद होगा कि कुछ साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह दावा किया था कि उनके कार्यकाल में लोगों को सस्ते दाम पर नीम कोटेड यूरिया मिल रही है। उन्होंने बड़े-बड़े विज्ञापन छपवाए कि जितना नीम कोटेड यूरिया उनके राज में मिल रही है उतना पिछले सत्तर सालों में नहीं मिली। लेकिन यह थोथा दावा था। जिस इफको के भरोसे वे यह दावा कर रहे थे उसने ही अपनी रिपोर्ट में कहा है कि खाद नहीं है। उसके उत्पादन में आधे से भी अधिक कमी आई है । पिछले कुछ वर्षों में किसानों को डीएपी के लिए पहले रजिस्ट्रेशन कराते थे तब भी बड़ी मुश्किल से उन्हें खाद मिल पाती थी और अधिकतर को निराश रह जाना पड़ता था। उसी समय डीएपी की कालाबाज़ारी की ढेरों खबरें आईं। कालाबाज़ारियों ने दूगुने दाम पर बेची। बात यहाँ तक चली गई कि हर बोरी में पाँच किलो कम खाद आने लगी। लेकिन दलाल मीडिया ने इसकी खबर नहीं दी और प्लास्टिक कोटेड यूरिया का फर्जी राग अलापते रहे।

आज खाद की कमी से पूरा देश जूझ रहा है और किसान अगली फसल की बुवाई की तैयारी के लिए खाद की बाट जोह रहा है। किसान फसल के लिए जुताई-बुवाई करें या खाद के लिए दुकानों के सामने दिन-दिनभर लाइन लगाकर भी हताश-निराश हो वापस लौटें? इफको के अनुसार डीएपी (डीअमोनियम फास्फेट) और एनपीके ( नाइट्रोजन,फास्फोरस और पोटैशियम) जैसी खाद की मांग के बनिस्पत चालीस फीसदी ही उत्पादन हो पा रहा है। ज़ाहिर है यह पर्याप्त नहीं हैं और बाज़ार में इन खादों की कमी का खामियाजा किसान और उनके परिवारों को भुगतना पड़ रहा है। डीएपी की  कमी लगातार बनी हुई है और बीज एवं खाद के दामों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। इफ्को ने 1 अप्रैल से डीएपी, एनपीके, एनओपी को पुराने रेट यानी 1200/- रु प्रति बोरी (50 किलो) बेचने का निर्णय लिया था लेकिन दूसरी कम्पनियों ने कालाबाजारी करते हुए इसके दाम में 700/- का इजाफा कर 1900 रु प्रति बोरी (50 किलो) कर किसानों के लिए भारी समस्या खड़ी कर दी। दाम में रिकॉर्ड यानि लगभग साठ फीसदी तक की बढ़ोत्तरी हुई है लेकिन इस अनुपात में फसल के दामों में वृद्धि नहीं हुई याने की फसल की लागत का भार किसान की जेब पर पड़ रहा है। लेकिन हमारी तथाकथित दयालु सरकार किसानों की परेशानी को लेकर इतनी चिंतित है कि किसानों के लिए प्रधानमन्त्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत वर्ष भर में छ हजार रूपये तीन किस्तों में देकर किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के दे रही है। अभी तक नौ किस्तें आ चुकी है और दो हजार की दसवीं क़िस्त के लिए विज्ञापन चलाये जा रहे हैं। ये प्रधानमंत्री के लिए शर्म की बात होनी चाहिए कि आज के इस महंगाई के दौर में दो हजार रुपए में कोई एक किसान क्या कर लेगा? किसान का हित ऐसा व्यक्ति सोच रहा है जिसने कभी खेती-किसानी का काम नहीं किया या जिसके पूर्वज कभी किसान नहीं रहे और जो यह दावा करता रहा है कि उसके खून में व्यापार यानी मुनाफाखोरी है।

फासीवाद को अपना युगधर्म बनाने वाली सरकार के किसान विरोधी कारनामों से आम जनता को खतरा तो है ही लेकिन सबसे ज्यादा खतरा कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था होने का दावा किए जाने वाले देश के किसानों को है।

3 Comments
  1. Gulabchand Yadav says

    यथार्थपरक विश्लेषण। खेती किसानी की स्थिति का सटीक चित्रण। धन्यवाद अपर्णा जी।

  2. सुरेंद्र कुमार says

    यथार्थ चित्रण आपने किया बहुत बहुत धन्यवाद

  3. Dr K L Sonkar 'Saumitra' says

    सही विश्लेषण, बधाई।

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