काले पानी में आजादी के दीवानों की यादें

कल्याणी मुखर्जी

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बंगाल की खाड़ी में स्थित 572 द्वीपों के छोटे-बड़े समूहों से बना अंडमान निकोबार समुद्री जल में स्थित, पहाड़ों की विस्तृत श्रृंखला में फैला हुआ है। यहां भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी बैरन आईलैंड है। मूलतः यह आदिवासी जनजातियों का क्षेत्र रहा है। इसके नामांकरण को लेकर भी भिन्न-भिन्न मत हैं। मार्कोपोलो के  ‘अंगामानियम’ से अंडमान बना या लॉर्ड हन्डूमान  से अंडमान नाम की उत्पत्ति हुई है, इस पर संशय बरकरार है।

हम कलकत्ता से सवेरे वीर सावरकर एयरपोर्ट,पोर्ट ब्लेयर पहुंचे। सर्वप्रथम हम  नीरव साक्षी भाव से खड़े क्रांतिवीरों की भूमि राष्ट्रीय स्मारक सेल्यूलर जेल देखने गये, जो अंग्रेजो की जुल्मों की मुक गवाह है। जेल में सीलन भरी तंग एकांत कोठरियां, मोटी-मोटी दीवारें, लोहे की मोटी सलाखों के दरवाजे, जिसकी कुंडी लगभग 1 फुट दूर दीवार पर बनायी गयी थी, जिससे कैदी दरवाजा खोल ना सके। उन आजादी के दीवानों पर हुए अमानवीय अत्याचारों की कथा कहती है, जिसे सुनकर शहीदों की याद में आंखें नम हो गई। मैं वहां बरामदे में बैठकर रोने लगी, तब गाइड ने कहा कि सैलानी सिर्फ इसे देखने आते हैं, लेकिन आप ने इसे महसूस किया है।

सेल्यूलर जेल की दिवारें

सेल्यूलर जेल की 7 शाखाओं में से अभी मात्र 2 शाखाएं बची हुई हैं। जापानी आक्रमण के कारण बाकी शाखाएं नष्ट हो गई थीं। वीर सावरकर ने यहां 10 वर्ष जेल में बिताए। काला पानी की सजा पाए स्वतंत्रता सेनानी इस कठिनतम यात्रा को इसलिए झेले कि हम स्वतंत्र भारत में रह सके। हमारे बहनोई स्वपन बनर्जी के दूर के रिश्तेदार जो स्वतंत्रता सेनानी थे, श्री उपेंद्र नाथ बनर्जी का नाम यहां दीवार पर अंकित है। यह हमारे लिए गर्व की बात है।

इसे देखने के पश्चात हम एक्वामरीन म्यूजियम और एंथ्रोपोलॉजी सेंटर गए। नीला, गुलाबी, सफेद रंग के कोरल हमने देखे। यहां लगभग 350 किस्मों के समुद्री प्राणी एवं मुंगो का संग्रह है। एंथ्रोपोलॉजी सेंटर में वहां के सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन एवं प्रकृति विज्ञान संबंधीत संग्रहालय है। इसे देखने के पश्चात हम चाय के बाद शाम को पुनः सेल्यूलर जेल ‘लाइट एंड साउंड’ प्रोग्राम देखने  गये। यहां हमें वीर भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों का सजीव चित्रण देखने को मिला। कार्यक्रम के अंत में पर्यटकों द्वारा किए गए जय घोष-भारत माता की जय, वंदे मातरम, जय हिंद के नारों से सेल्यूलर जेल गूंज उठा।

वाईपर आईलैंड का दृश्य

पोर्ट ब्लेयर में दक्षिण भारतीय भोजन की प्रचुरता है। दूसरे दिन सवेरे हमने नाश्ते में दक्षिण भारतीय व्यंजन का स्वाद लिया और फेरी घाट वाईपर आईलैंड जाने के लिए पहुंचे। समुद्र बहुत ही अच्छा लग रहा था, ठंडी हवा चल रही थी, बहुत सारे यात्री साथ में थे, यह पोर्ट ब्लेयर से 4 किलोमीटर दूर है। वहां पहुंचते ही हमने वह स्थान  देखा, जहां सबसे पहले तुरंत फैसला सुना कर फांसी दी जाती थी। नीचे एक कमरे में फांसी की सजा सुनाई जाती थी और उसे ऊपर ले जाकर तुरंत फांसी दे दी जाती थी। वहां फांसी की काठ को आज भी देखा जा सकता है। इसमें क्रांतिकारी शेर अली को लॉर्ड मेयो की हत्या के आरोप में फांसी दी गई। साथ ही कई क्रांतिकारियों को जहाज डूब जाने के आरोप में फांसी दी गई थी।

वहां से लौटकर हम चौथम सॉ मिल देखने गए जो अद्भुत, अविस्मरणीय था। यहां हजारों मजदूर कार्य करते हैं, एशिया की प्राचीनतम एवं वृहदतम आरा मील है। यहां जापानी बंकर और साथ ही जापानियों द्वारा फेंके गए  बम से बने विशाल कुआं जैसा गड्ढा भी देखें। इसके बाद हम रॉस आईलैंड गए, जिसे लक्ष्मीबाई द्वीप भी कहा जाता है। अंग्रेजों ने यहां अपना प्रशासनिक दफ्तर खोला था। ब्रिटिश चीफ मिनिस्टर का निवास स्थान था। भूकंप और जापानी बमबारी के बाद रॉस आईलैंड बस्ती विहीन हो गई। इस द्वीप में अंग्रेजों एवं जापानीयों द्वारा स्थापित स्मारक, लाइट हाउस, चर्च, अस्पताल, कोर्ट, बेकरी, क्लब हाउस आदि स्मारकों पर वृक्ष उगाए हैं। कोई-कोई वृक्ष 200 फीट ऊंचा भी है और यह स्थान पूरी तरह जंगल से घिरा हुआ है और हॉरर लगता है।

यहां एक आश्चर्य करने वाली चीज दिखी, समुद्र के रास्ते जहाज से बर्फ लाए जाते थे जिसे सुरक्षित रखने के लिए बड़े-बड़े कंटेनर थे। रास्ते में हम काला पाथर समुद्री किनारे से होते हुए चिड़िया टापू सूर्यास्त देखने गए, जहां ढाई सौ किस्म के प्रवासी पक्षियां विचरण करती हैं। होटल पहुंचने से पहले  सीसेल बाज़ार गए, वहां समुद्री जीवों के खोल से बने विभिन्न प्रकार के आभूषण, बैग, रंगीन पत्थर, शंख के सेल से बने सजावटी वस्तुएं प्रचुर मात्रा में थी।

आज अंडमान यात्रा का अंतिम और छठवां दिन है। यहां की सुखद स्मृतियां लिए हम आज वापस कोलकाता के लिए रवाना होंगे। वन, पहाड़ और समुद्र से घिरा यह मायावी द्वीप सहज ही पर्यटकों का आकर्षण का केंद्र रहा है। हमने भी इसका भरपूर आनंद लिया। यहां के आदिवासियों की अपनी निजी संस्कृति है। बाहर से आए हुए बहुत से लोग यहां बस गए हैं जो शहरी क्षेत्र  में ही अपना काम कर आजीविका चलाते हैं, परंतु जनजाति अभी भी अपने आदिम युग का जीवन जी रहे हैं। यहां वर्षा जल को संरक्षित कर पीने के काम में लाया जाता है। यहां की आबोहवा नम है। गर्मी अधिक  होने के कारण टोपी, छाता, सनग्लास, सूती कपड़े पहनना बहुत जरूरी है। सभी धर्मों के मानने वाले यहां रहते हैं।

अंडमान का फेमस हट हाउस

यहां सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों ही अनुपम है। अंडमान निकोबार में कई द्वीप ऐसे हैं जो पर्यटकों के लिए आज भी प्रतिबंधित है। यहां 15 द्विपों को राष्ट्रीय उद्यान का रूप दिया गया है। आवागमन के लिए सड़क मार्ग के साथ-साथ बैक वाटर मार्ग व समुद्री मार्ग का उपयोग किया जाता हैफोटो ग्राफी के द्वारा इस अपूर्व यादगार स्मृति को संजोने में मेरे बहनोई स्वपन बनर्जी का योगदान रहा। हम लोग शहीदों की याद में बने स्वतंत्र ज्योति स्तम्भ और शहीद स्मारक को नमन कर एयरपोर्ट की ओर निकल गए।

 

 

 

कल्याणी मुख़र्जी प्राचार्य पद से सेवानिवृत हो रायगढ़ में बच्चों के साथ रंगकर्म कर रही हैं ।

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