नेता बनना है तो संघर्ष करना सीखिए

डॉ. ओमशंकर

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लोकतंत्र में कभी कोई व्यक्ति महत्वपूर्ण नहीं हो सकता। लोकतंत्र में कभी सत्ता का केंद्रीकरण नहीं हो सकता। जिस दिन लोकतंत्र के नाम पर चलाई जानेवाली सरकारें व्यक्ति के अधीन हो जाती हैं उसी दिन उस राष्ट्र से लोकतंत्र का खात्मा और वहां राजतंत्र की स्थापना हो जाती है। सच्चे लोकतंत्र का अर्थ होता है राष्ट्र की सत्ता में सभी वर्गों का आनुपातिक प्रतिनिधित्व होना जिससे वहां बनने वाली सरकारें उस राष्ट्र के सभी वर्गों के कल्याण के लिए कार्य करें।

जब किसी लोकतांत्रिक राष्ट्र में वहां की कोई राजनैतिक पार्टी डंके की चोट पर यह कहना शुरू कर दे कि हमने तो सिर्फ एक वर्ग के लोगों को ही चुनावों में टिकट दिया है तो समझ लीजिए ऐसी पार्टी सिर्फ सामाजिक विद्वेष फैलाने वाली ही होगी। वह कभी लोकतांत्रिक और संविधान में विश्वास रखने वाली तो हो ही नहीं सकती और जैसे ही यह पार्टी सत्ता पर काबिज होगी उनका उद्देश्य ही उस देश के संविधान तथा संस्थाओं को मिटाना होगा, जैसा कि आज इस देश में देखने को भी मिल रहा है।

भारतवर्ष के साथ यह विडंबना रही है कि यहां आजतक कभी भी कोई लोकतांत्रिक सत्ता मजबूती से स्थापित हो ही नहीं पायी। यूँ कहिए कि ऐसा इस देश के अल्पसंख्यक बुद्धिजीवियों ने कभी होने ही नहीं दिया। ऐसा करने के लिए इस देश के ‘शिक्षा माफियाओं’ ने ‘शिक्षा को’ अपने वर्ग विशेष की बपौती घोषित कर किया, जो सोच आज भी इस वर्ग के ज्यादातर लोगों के कुंठित दिमाग में कायम है!

इसलिए शुरुआती दौर से लेकर हाल तक यहां राजतांत्रिक सत्ता लागू थी, जो हमेशा ही एक वर्ग विशेष के लोगों के कल्याण और उत्थान के लिए कार्य करती रही। इसी वजह से इस देश का बहुसंख्यक तबका आज भी हाशिए पर खड़ा है। ये समाज, बहुसंख्यक वर्ग को मूर्ख बनाने के लिए या तो ‘उत्तर सत्य की राजनीति’ अथवा ‘फूट डालो और राज करो’ की नीतियों को अपनाता है जहां नारा तो वह ‘अंत्योदय’ का गढ़ता है परंतु सत्ता पाते ही अपने उत्थान तथा उनके सर्वनाश में लग जाता है।

इसलिए शुरुआती दौर से लेकर हाल तक यहां राजतांत्रिक सत्ता लागू थी, जो हमेशा ही एक वर्ग विशेष के लोगों के कल्याण और उत्थान के लिए कार्य करती रही। इसी वजह से इस देश का बहुसंख्यक तबका आज भी हाशिए पर खड़ा है। ये समाज, बहुसंख्यक वर्ग को मूर्ख बनाने के लिए या तो ‘उत्तर सत्य की राजनीति’ अथवा ‘फूट डालो और राज करो’ की नीतियों को अपनाता है जहां नारा तो वह ‘अंत्योदय’ का गढ़ता है परंतु सत्ता पाते ही अपने उत्थान तथा उनके सर्वनाश में लग जाता है।

 

आज़ादी के बाद कहने को इस देश में लोकतंत्र बहाली के कुछ प्रयास जरूर हुए परन्तु बिना मजबूत नेता और नीतियों के वह कभी परवान नहीं चढ़ पाया, जिससे आज़ादी 70 सालों बाद भी सिर्फ अंग्रेजों से उच्च वर्ग को ‘सत्ता हस्तांतरित’  करने तक ही सीमित रह गई। अर्थात कुल मिलाकर देखा जाए तो पहले इस देश की बहुसंख्यक आबादी एक वर्ग विशेष का गुलाम थी, फिर विदेशियों का गुलाम हो गयी और विदेशी शासकों से आज़ादी के बाद एक बार फिर से उसी वर्ग विशेष की गुलाम बनकर रह गयी है। इस वर्ग ने विगत के कुछ सालों से अपना पौराणिक तथा ऐतिहासिक विकराल रूप धीरे-धीरे धारण करना शुरू कर दिया है जिससे बहुसंख्यक समाज के मौलिक अधिकारों के आज छिनने तथा उसके फिर से दास बन जाने की संभावना अति प्रबल हो गयी है!

मेरा मानना है कि जिस तरह एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र पर सत्ता कायम करना गलत है ठीक उसी तरह किसी भी देश में अल्पसंख्यक बौद्धिक वर्ग के लोगों द्वारा बहुसंख्यक वर्गों पर कायम सत्ता भी अनैतिक और अलोकतांत्रिक है जिससे आज़ादी के लिए व्यापक जन-आंदोलनों की आवश्यकता है।

दुःख की बात यह है कि बहुसंख्यक समाज के नेतृत्व का दावा करनेवाले राजनेता भी सत्ता पाते ही अपने समाज का कल्याण करने के बजाय,अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति की खातिर अल्पसंख्यक बुद्धिजीवियों के उत्थान के कार्यों में ही लग जाते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि जिन अल्पसंख्यक बुद्धिजीवियों के कंधों पर चढ़कर वे सत्ता के शिखर पर चढ़ना चाहते हैं वह एक बुद्धिजीवी है जिसका लक्ष्य आपके साथ समन्वय स्थापित कर अपने वर्ग के लोगों के कल्याण का कार्य करवाना और आपको गलत सलाह देकर अगली बार सत्ता में आने से रोककर आपकी राजनैतिक हत्या करना होता है। इस बुद्धिजीवी वर्ग ने न कभी किसी बहुसंख्यक की सत्ता कायम करने के लिए मतदान किया है और न ही कभी भविष्य में ही करेंगे, सिवाय कुछ अपवादों को छोड़कर!

जब हम इस बात की विवेचना करते हैं कि बहुसंख्यक वर्ग के नेता सत्ता प्राप्ति के बाद भी आखिर बहुसंख्यकों के कल्याण का कार्य क्यों नहीं कर पाते ? उनका सत्ता पाना सिर्फ सत्ता परिवर्तन तक ही क्यों सीमित होकर रह जाता और व्यवस्था परिवर्तन तक नहीं पहुंच पाता है । हम पाते हैं कि ऐसे नेता अति महत्त्वाकांक्षी होते हैं तथा इनके पास ठोस नीतियों तथा दूरदर्शिता का घोर अभाव होता है। इन सबके अलावा इनकी  विफलताओं की एक प्रमुख वजह यह भी है कि आज भी इस देश में लोकतंत्र के ज्यादातर स्तंभों पर अल्पसंख्यक बुद्धिजीवियों का ही कब्जा बरकरार है जिसका दुरुपयोग कर वे इनको सत्ता परिवर्तन के बाद भी सिर्फ कुर्सियों तक सीमित कर देते हैं और जिससे बहुसंख्यक वर्ग इनसे नाराज हो जाते हैं और ये फिर से चुनाव नहीं जीत पाते!

दूसरी बात यह है कि इस देश के ‘अल्पसंख्यक बुद्विजीवी’ वर्ग के पास अपना एक बौद्धिक बैंक अथवा संगठन है जो उनके द्वारा स्थापित सरकारों को समय-समय पर उचित सलाह देकर उनको विकट राजनैतिक परिस्थितियों में मदद कर संकटों से उबारते रहते हैं जबकि बहुसंख्यक समाज के नेता सत्ता पाते ही सबसे पहले अपने वर्ग के बुद्धिजीवियों को ही अपने आपसे अलग कर देते हैं। ऐसा आत्मघाती कदम वो खुद से कम परंतु तथाकथित बुद्धिजीवियों के मायावी जाल में फंसकर ज्यादा करते हैं। तथाकथित बुद्धिजिवी वर्ग ऐसा कार्य उनके अंदर अपने ही  वर्ग के बुद्धिजीवियों के हाथों सत्ता छिन जाने का भय दिखाकर करवाता है  जबकि सच्चाई इसके ठीक विपरीत होती है। वह  उनको अपने वर्ग के बुद्धिजीवियों से अलग इसलिए करते हैं ताकि जब उन्हें नीतिगत सलाहों की जरूरत पड़े तो वे तथाकथित बुद्धिजीवियों पर आश्रित हो जाये अर्थात उन्के जाल में फंसकर उनके इशारों पर नाचना शुरू कर दें जिससे सत्ता में आये बहुसंख्यक समाज के राजनेता अपने अंत की दास्तान अपने ही हाथों से लिख लें। मीडिया और न्यायपालिका, लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ होता है, जिनपर आनुपातिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किए बगैर व्यवस्था परिवर्तन करना असंभव है।

मेरा मानना है कि जिस तरह एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र पर सत्ता कायम करना गलत है ठीक उसी तरह किसी भी देश में अल्पसंख्यक बौद्धिक वर्ग के लोगों द्वारा बहुसंख्यक वर्गों पर कायम सत्ता भी अनैतिक और अलोकतांत्रिक है जिससे आज़ादी के लिए व्यापक जन-आंदोलनों की आवश्यकता है।

 

चलते-चलते आखिरी सलाह यह दूंगा कि जनता अपना नेता उसे ही मानती हैं जो उसके हक की बात करता है, जो उसके लिए सड़क से लेकर संसद तक संघर्ष करता है न कि उसे जो बंद कमरों में बैठकर सोशल मीडिया पर सुविधजनक राजनीति करता है और जेल जाने से डरता है। अगर आपको बहुसंख्यक राजनीति करनी है तो अपने ऐशो-आराम को त्यागिए, धरना-प्रदर्शन शुरू कीजिए, जेल जाइये, वर्तमान सरकार की निजीकरण की नीति से लेकर नोटबन्दी, GST, आरक्षित वर्ग को विखंडत करनेवाली राजनीति, बेतहाशा बढ़ती महंगाई, भ्रष्टाचार, किसानों की बदहाली, नौजवानों की जाती नौकरियों, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की घटती कीमतों के बाद भी देश में महंगे दामों पर बिकते तेलों तथा निरंकुश सरकार द्वारा किये जा रहे संस्थाओं के दुरुपयोग तथा RBI को लूटने की साजिशों को बेनकाब करने के लिए जेल भरो आंदोलन शुरू कीजिए। इसके लिए देश के अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ समन्वय बैठाकर 2022 के चुनाव में तीसरा विकल्प पेश करिए वर्ना 2024 के लोकसभा चुनावों में भी आप लोग हाल में हुए विधानसभा चुनावों की तरह अप्रासंगिक हो जाएंगे और अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं ही आपलोगों को ‘राजनैतिक आत्महत्या’ करवा डालेगी जिससे एक बार फिर से इस देश पर अल्पसंख्यक बुद्धिजीवियों की सत्ता कायम हो जाएगी और आपलोगों के हाथ से यह सुनहरा अवसर निकल जायेगा जो फिर 15 साल से पहले फिर आपके पास नहीं आएगा। जब तक जातिगत जनगणना के साथ नए सामाजिक समूहों का निर्माण नहीं होगा, जिनमें दलित आदिवासी पिछड़े और अल्पसंख्यक युवाओं तथा स्त्रियों के मजबूत गठजोड़  और उनके आनुपातिक प्रतिनिधित्व को आने वाले चुनाव में(टिकट बँटवारे में) एक बुनियादी सिद्धान्त नहीं बनाया जाएगा तब तक चुनाव जीत पाना बहुत मुश्किल है। 2022 के जरूरी मुद्दे बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य , मजदूर और किसान से जुड़े हैं। किसान सड़क पर हैं। मजदूर बहिष्कृत हैं और स्वास्थ्य व्यवस्था  दुनिया के सबसे खराब हालत में है। शिक्षा का निजीकरण किया जा रहा है। ऐसा में यह सवाल उठाया जाना चाहिए कि विकास क्या हो रहा है? देश का बजट कौन खा रहा है? नेता को अपने दौर के संकटों से कभी भी आँख नहीं मूँदना चाहिए। 

नेता बनना है तो संघर्ष करना सीखिए, जेल जाना सीखिए और पुलिस की लाठियां खाना भी सीखिए क्योंकि आज सत्ता के शिखर पर मौजूद ज्यादातर बहुसंख्यक नेता शायद जे पी आंदोलन की ही देन है !

डॉ. ओमशंकर

डॉ.ओमशंकर सर सुन्दरलाल अस्पताल के मशहूर हृदय रोग विशेषज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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