Monday, April 13, 2026
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पूर्वांचल का चेहरा - पूर्वांचल की आवाज़

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तेईस मार्च को भगत सिंह और लोहिया को याद करने के मायने

डॉ. राम मनोहर लोहिया फ़ासीवाद, पूँजीवाद और साम्राज्यवाद-विरोधी थे लेकिन समाजवाद के समर्थक थे। डॉ लोहिया का जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ एक गहरा बौद्धिक और वैचारिक जुड़ाव था। इसी प्रभाव के चलते, 1934 में जर्मनी से लौटने के बाद, उन्होंने (24 वर्ष की आयु में) 'कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी' की स्थापना में सक्रिय योगदान दिया। वे इसकी कार्यकारिणी समिति के सदस्य बने और पार्टी के मुखपत्र, 'कांग्रेस सोशलिस्ट' के संपादक नियुक्त किए गए। आज उनकी 116 वीं जयंती पर उन्हें याद करते हुए पढ़िए डॉ सुरेश खैरनार का यह लेख। 

क्या भारत के पहले आदिवासी राष्ट्रपति संविधान की रक्षा करेंगे या चुप्पी साध लेंगे?

माननीय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, आपके होम स्टेट ओडिशा में – नियमगिरी, गोपालपुर और पूरे दंडकारण्य में – आदिवासी कितने सालों से नुकसान पहुंचाने वाले डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स का विरोध कर रहे हैं। भारत की आबादी में आदिवासी सिर्फ़ 8-9% हैं, लेकिन आज़ादी के बाद से डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स की वजह से बेघर हुए लोगों में वे 75% हैं। उनके विरोध को नक्सलवाद का लेबल लगाकर कुचला जा रहा है। आपके साइन लेने और संविधान बनाने वालों द्वारा आदिवासियों को दिए गए खास अधिकारों को खत्म करने के लिए आदिवासी समुदाय की एक महिला को सबसे ऊंचे पद पर बिठाने की साज़िश है। मैं यह खुला खत खास तौर पर, श्रीमती द्रौपदी मुर्मू, इस साज़िश से सावधान करने के लिए लिख रहा हूं।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस : एपिस्टन फाइल के शिकारियों के देश में महिलाओं के सामने अभी भी कई पहाड़

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 115 साल पहले शुरू हुआ था, लेकिन दुनिया भर में पुरुष-प्रधान सोच अभी भी कायम है। ताकतवर नेताओं और उद्योगपतियों से जुड़े एपस्टीन के खुलासे हमें याद दिलाते हैं कि कितनी आसानी से महिलाओं के साथ आज भी मज़े की चीज़ जैसा बर्ताव किया जाता है। जब तक महिलाओं को मर्दों की खुशी के लिए सामान समझा जाता रहेगा, तब तक असली आज़ादी नामुमकिन रहेगी। पढ़िए डॉ सुरेश खैरनार का यह लेख।

अंध भक्त ही नहीं, अपशब्द और नफरती भाषण देने में सर्वोच्च नेता भी पीछे नहीं

देश में नफरत फैलाने वालों को राज्य का संरक्षण प्राप्त है, यहां तक ​​कि केंद्र सरकार ने हाल ही में भारत मंडपम में सनातन राष्ट्र शंखनाद की बैठक के लिए 63 लाख रुपए दिए। इस कार्यक्रम में मुसलमानों के खिलाफ भाषण दिए गए, जिनका मुख्य विषय हिंदू राष्ट्र की मांग था। मुंबई स्थित सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेक्युलरिज्म द्वारा प्रस्तुत एक हालिया अध्ययन में घृणास्पद भाषणों के प्रकारों और विवरणों का गहन विश्लेषण किया गया है। इस अध्ययन के अनुसार, 2024 से 2025 के बीच घृणास्पद भाषणों की संख्या में कमी आई है। रिपोर्ट में सामने आया है कि सबसे अधिक घृणास्पद भाषण महाराष्ट्र सरकार में मत्स्य एवं बंदरगाह विकास मंत्री नितेश राणे (10) ने दिए, उसके बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (6), असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पांच-पांच भाषण दिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन घृणास्पद भाषण दिए।

महात्मा गांधी …जै राम जी!

मनरेगा मांग-आधारित योजना है, लेकिन नए विधेयक में इससे राम-राम कर लिया गया है। 125 दिनों के रोजगार की उपलब्धता उन क्षेत्रों के लिए होगी, जिसका चयन केंद्र सरकार करेगी। इस चयन के मापदंड का उल्लेख विधेयक में नहीं मिलता और हम आसानी से अनुमान लगा सकते है कि यह चयन भाजपा की राजनैतिक जरूरतों को पूरा करने का माध्यम बनेगा। इसके साथ ही, ग्रामीण विकास योजनाओं को तैयार करने में ग्राम पंचायतों की स्वायत्तता भी खत्म हो जाएगी और उन्हें केंद्र की बनी-बनाई लीक पर काम करना होगा। इस प्रकार, राज्यों और केंद्र के बीच संविधान में उल्लेखित सहकारी संघवाद की अवधारणा को भी दफनाया जाएगा।

हैदराबाद का विलय : लोकतांत्रिक सफर की शुरुआत

भारत में हैदराबाद के विलय के पीछे इस्लामोफोबिया नहीं था। इसकी मुख्य वजहों में से एक थी भौगोलिक और दूसरी थी राजशाही से लोकतंत्र की ओर यात्रा। हैदराबाद रियासत की भौगोलिक स्थिति, जो भारत के लगभग मध्य में था, चारों ओर से भारत से घिरा एक स्वतंत्र देश या एक ऐसा राज्य जो पाकिस्तान का हिस्सा होता, एक स्थायी समस्या बन जाता। नेहरू-पटेल की नजरों में भी यही बात सबसे महत्वपूर्ण थी। हैदराबाद के विलय को रेखांकित करता राम पुनियानी का लेख ।

अन्ना की मौत : कॉर्पोरेट का क्रूर चेहरा

अन्ना की मौत हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या यह तथाकथित 'विकास' और 'प्रगति' वाकई में लोगों के लिए है? पूंजीपतियों की लालच और सरकार की पूंजीवाद-समर्थक नीतियाँ न केवल लोगों की आजीविका छीन रही हैं, बल्कि उनकी जान भी ले रही हैं। असली विकास का मतलब केवल आर्थिक मुनाफा नहीं है। असली विकास तब होगा जब लोग शोषण-मुक्त जीवन जी सकें और उन्हें काम का आनंद मिले।

क्यों नहीं कम हो रहे हैं दलितों पर अत्याचार

बिहार के नवादा में घटी घटना आज भी जातीय भेदभाव को प्रदर्शित करती है। जब बीजेपी और आरएसएस जैसे संगठन हिन्दू एकता का नारा लगाते है तो वे इस तरह दलित उत्पीड़न पर मौन क्यों है? जातिगत उत्पीड़न और पूंजीवादी शोषण आपस में गहरे जुड़े हुए हैं। जब तक ऐसी जातिगत व्यवस्था को चुनौती नहीं दी जाएगी तब तक शोषण जारी रहेगा ।

बुद्धदेव भट्टाचार्य : हाशिए के समाजों का भरोसेमंद नेता

कॉमरेड बुद्धदेव भट्टाचार्य ग्यारह वर्ष तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे, लेकिन उन्होंने हमेशा अपने को एक मेहनतकश मजदूर से ज्यादा कुछ नही समझा। अपने जीवन को मेहनतकशों के जीवन का ही हिस्सा मानते थे, मेहनतकशों की जीवन संस्कृति ही उनकी संस्कृति थी।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पिछड़े, दलित, आदिवासी और दिव्यांगों के आठ पदों को NFS क्यों किया गया?

आज से 70 वर्ष पहले ऐसे वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था संविधान में लाई गई थी, जो सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से हाशिये पर जीवन जीने को मजबूर थे क्योंकि देश का सवर्ण तबका, खासकर ब्राह्मण, उन्हें आगे बढ़ने देना नहीं चाहते थे लेकिन संविधान के सामने विवश थे। हाशिये के इन समाजों ने शिक्षित हो आगे आना शुरू किया। यही बात भारतीय सवर्णों के लिए अपच हो गई। फिर भी भारतीय संविधान हाशिये के समाजों के अधिकारों की सुरक्षा करता रहा है। अब आरएसएस के दिमाग से संचालित भाजपानीत सरकार ने हाशिये के समाज के लोगों को फिर से हाशिये पर ढकेलने के लिए अलग षड्यंत्र कर रही है। देश का अपना संविधान होने के बावजूद आरएसएस यहाँ अपना एक अलग मनुवादी संविधान थोपने के प्रयास में है। प्रायः सभी चयन समितियों में अपने वर्चस्व का लाभ उठाकर शिक्षा और नौकरियों के मामले में उन्हें NFS कर हटाने के प्रयास में है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के ताजा मामले में जानिए कि कैसे आठ उम्मीदवारों को NFS कर दिया गया।

दुकानों पर नाम प्रकरण : निशाने पर पसमांदा मुसलमान, सुप्रीम कोर्ट ने लोकतन्त्र की हिमायत की

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की भाजपा सरकारों ने जिस तरह से काँवड़ यात्रा की राह में पड़ने वाली दुकानों, ठेलों और होटलों पर मालिक के नाम की तख्ती अथवा फ़्लेक्स लगाने का फरमान जारी किया वह निश्चित रूप मेहनतकश पसमांदा मुसलमानों को निशाने पर लेने का प्रयास था। यह 2024 के चुनाव में घुटनों के बल आई भाजपा की हताशा को दर्शाता है। लेकिन इससे भी बढ़कर विकराल होती बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों को उलझाने का षड्यंत्र भी है। भाजपा को लगता है कि इस तरह के नैरेटिव बनाकर वह न सिर्फ हिंदू दूकानदारों बल्कि रोजगार की उम्मीद में उम्रदराज़ हो रहे युवाओं को भी खुश कर देगी। यह एक खतरनाक कदम था जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाम लगाया।
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