श्रमिकों को आज़ादी मिले बिना किसी भी देश को औद्योगिक ऊंचाई नहीं मिल सकती

जयप्रकाश कर्दम

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इस छोटी-सी किताब में कई मुद्दे डॉ. अम्बेडकर ने रखे है जो सिर्फ अनुसूचित जातियों को समर्थवान बनाने के लिए ही नहीं बल्कि एक समतामूलक समाज बनाने के लिए, एक उन्नतशील राष्ट्र बनाने के लिए यह प्रावधान किए।इस सबका मतलब यह है कि उनके दिमाग में संविधान का एक खाका थाकि संविधान में किस प्रकार के प्रावधान होने चाहिए। ये सब बातें उन्होंने संविधान सभा में जाने से पहले, संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष बनने से पहले ही इस किताब में लिख दी थीं। और हम देखते है कि इनमें से अधिकतर  मुद्दों को संविधान में ज्यों की त्यों लागू करवाने में वह सफल रहे। यह सब तब ही संभव हो पाता है जब किसी व्यक्ति के भीतर अच्छा विचार होता है, वह ईमानदार होता है, अपने विचार के प्रति दृढ़ रहता है, और यही गुण थे बाबासाहेब अम्बेडकर में थे।

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दूसरा भाग 

दूसरी चीज जो उन्होंने सुझाव दिया था इस ज्ञापन में। उन्होंने शिक्षा की बात की और बताया कि अनुसूचित जातियों को, उनके अधिकारों के लिए संरक्षण की जरूरत है और शिक्षा में भी प्रावधान करने की जरूरत है और शिक्षा में प्रतिनिधित्व देने की जरूरत है इसके लिए उन्होंने कहा कि केन्द्र की सरकार और राज्य की सरकार अपने बजट में उसके लिए प्रावधान करें और बजट में न केवल एक अच्छे खासे का प्रावधान करें बल्कि इसको अपने बजट में प्राथमिकता दें। यानि की इसमें दो चीजें हैं, एक तो ये कि अनुसूचित जाति के शिक्षा को बढ़ावा देना, उसे महत्व देना, शिक्षण संस्थाओं में प्रतिनिधित्व ताकि वो भी पढ़ सके, दूसरी उनकी शिक्षाओं के लिए बजट देना। शिक्षा को प्राथमिकता देने के लिए वो इसलिए जोर दे रहे हैं क्योंकि शिक्षा सबसे आवश्यक है किसी राष्ट्र को बढ़ाने के लिए,उसे प्रगतिशील बनाने के लिए, विकसित करने के लिए, उन्नत बनाने के लिए, जितने ज्यादा हम देश के नागरिकों को शिक्षित करेंगे, शिक्षा से सशक्त होंगे उतना ही, हम सभी क्षेत्रों में शसक्त होंगे और राष्ट्र शसक्त होता जाएगा और इसमें यदि कोई एक वर्ग पिछड़ता चला जाएगा उतना ही राष्ट्र पिछड़ता चला जाएगा।

दूसरा, जिस बिंदु पर उन्होंने जिक्र किया है उसमें वे कहते हैं कि उत्पादकता है चाहे उद्योगों में, चाहे वो कृषि का उद्योग हो या अन्य उद्योग उसमें उत्पादकता का सर्वोच्च बिंदु हासिल करना चाहिए, हमारी कोशिश हो कि हम ज्यादा से ज्यादा उत्पादकता पर ध्यान दें और वो तभी कर सकते हैं जब उत्पादन के क्षेत्र में श्रम को उत्पादन की महत्वपूर्ण इकाई मानेंगे। श्रमिक को एक अच्छा माहोल देंगे उसके अंदर कोई हीनता बोध नहीं होगा, उसको अच्छा खासा वेतन मिलेगा और वहाँ पर जाति के आधार पर, छूआछूत के आधार पर, ऊच-नीच के आधार पर भेदभाव नहीं होगा तो ऐसा अच्छा माहोल होगा तो किसी भी कंपनी में, किसी भी कारखाने में ज्यादा और अच्छा उत्पादन हो सकता है। कुछ दिन पहले मैं एक किताब पढ़ रहा था, उसमें दुनिया के सफल लोगों के अनुभव लिखे गए थे जिसमें इलेक्ट्रॉन के क्षेत्र के कंपनी के CEO का स्टेटमेंट था, जिसमें उन्होंने बताया था कि एकबार जब कंपनी घाटे पर चल रही थी तब वो CEO नहीं बने थे, कंपनी को घाटे से कैसे मुनाफे में लाया जाए इसके लिए उन्होंने कुछ सोचा। पहले कंपनी के सभी कर्मचारीयों को इकट्ठा किया और उसने बात की कि अब आपको कोई आदेश, निर्देश नहीं देगा, आप समझदार है, आप आजाद है। आप मशीनों को जानते हैं, आप कच्चे मालों को जानते हैं, आपको क्या बनाना है, क्या उत्पादन करना है ये आप जानते हैं, आप अपने मन से जो बेहतर कर सकते हैं वो करें, उन्होंने सबको पूरी छूट दी, जिसका नतिजा यह हुआ कि, पहले की तुलना में कई गुणा ज्यादा उत्पादन बढ़ गया और उत्पादन की गुण भी अपने आप बढ़ गई। और कंपनी जो घाटे में चल रही थी वह अब मुनाफे में चली गई। और ऐसा तब होता है जब हम श्रमिक को ऐसा माहौल देते हैं चाहे वो किसी भी क्षेत्र में हो। जब तक एक आदमी भयभीत रहता है कि वो मुझे डांटेगा, मुझे गाली देगा तो वो खुलेपन से लगाव नहीं होता, अपनापन नहीं लगता।

जिस तेजी से निजीकरण हो रहा है यहाँ तक कि सरकारी कंपनीयां का भी निजीकरण हो रहा है, वो भी दूसरे के हाथों में बेची जा रही है। सरकारी कंपनीयों में लोगों को आरक्षण मिलता था उनके प्रतिनिधित्व की गुंजाइश थी अब वो भी नीजी हाथों में चली जायेंगी तो वो सब भी खत्म हो जाएगा। मुझे लगता है आने वाले दिनों में इस किताब की ओर लौटना पड़ेगा और इस किताब में जो मेमोरेन्डम है, उनकी जो माँग, थी उन माँगों को मुद्दा बनाकर के दलित समुदाय को आने वाले समय में अपने हितों की संरक्षण के लिए संघर्ष करने पड़ेगें।

उसे लगता है कि समय पार हो जाए, मुझे किसी तरह से बेगार करनी है, वो अपना समझकर नहीं करता इसलिए जो कोपरेटिव फार्मिंग का कंसेप्ट बाबा साहेब का था वो यही था कि जब हमारे पास खेती है, हमारे पास बहुत सारी जमीन पड़ी हुई है तो यदि हम इस तरह से करेंगे तो वो सबको अपनी लगेगी और सब मेहनत करेंगेऔर जब मेहनत करेंगे तो हम उसपर अधिक से अधिक उत्पादन कर सकेंगे और उत्पादन के क्षेत्र में या अन्य क्षेत्र में हम इतने आत्मनिर्भर बन सकेंगे कि हमको आयात करने की जरूरत नहीं पड़ेगी बल्कि निर्यात कर सकेंगे।

तीसरी बात इसमें यह थी कि जमीन जो पट्टे में देने वाली बात थी कि लोगों को खाली जमीन पट्टे में दिया गया लेकिन ये अलग कहानी है कि बहुत सारे लोगों को जहाँ-जहाँ पट्टे पर जमीन दिया गया और जब लोगों ने उस जमीन को उपजाऊ बना लिया तो दबंगों ने उन जगहों पर कब्जा करना शुरू कर लिया और उन लोगों की रिपोर्ट न पुलिस में हुई,न किसी प्रकार की सुनवाई हुई इस प्रकार से उनका दोहरा शोषण हुआ। जिस बंजर जमीन को उन्होंने रात दिन जुटा करके मेहनत करके, कर्ज लेकर के उसे पैदावार के लायक बनाया और उसके फसल दूसरे लोग काटकर के ले जाते हो या उन फसलों पर जबरन कब्जा कर लेते हो, ऐसे में वो चारों ओर से लूट जाते हैं। इस किताब में बाबा साहेब ने लोकतांत्रिकरण की बात, स्वाराज की जहाँ टिप्पणी कर रहे हैं उस टिप्पणी के साथ वो ये टिप्पणी भी कर रहे हैं कि भारत में जो सरकारी कार्यालय है उन सरकारी कार्यालयों में भी एक विशेष समुदाय का वर्चस्व है, वो स्पष्ट रूप से कहते हैं कि वहाँ हिंदुओं का बहुमत है और सारे कर्मचारी उच्च वर्ग के है और वो कर्मचारी  किसी भी दफ़्तर में है वे अपने ही लोगों का, अपने जाति के लोगों का, अपने ही समुदाय के लोगों के लोगों के प्रति सह्रदय रहते हैं और यदि उनके समुदाय के लोगों के विरुद्ध कोई चीज जा रही हो तो वो उन चीजों पर कार्यवाही नहीं करते हैं और ऐसे में दुसरे समुदाय के लोगों को जो अधिकार, जो संरक्षण मिलना चाहिए वो नहीं मिल पाता। संरक्षण तभी मिल सकता है जब सभी जगह सभी समुदाय के लोगों का प्रतिनिधित्व हो।

मांगों के माध्यम से समकालीन परिस्थितियां आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक उन सबका एक खाका है। और उस खाके में बहुत सारे सवाल, समस्याएं हैं और उन समस्याओं के समाधान भी इस किताब में उन्होंने सुझाए है। जिससे कि जब हमारा संविधान बने तो उसमें इस तरह की चीज़ें होनी चाहिए। क्योंकि इसमें उन्होंने यह भी कहा है कि मानो मौलिक अधिकारों की जब बात आती है कि यदि किसी व्यक्ति को अधिकार मिल जाते है और उसके अधिकारों का अतिक्रमण होता है या शोषण होता है क्योंकि इस किताब में अनेक सुझाव दिए गए है जैसे मैंने कहा कि दलितों के लिए अलग बस्तियाँ बसाई जाय इनके लिए वे Settlement Commission की बात करते है जो यह सारे मुद्दे देखे और लोगों को बसाने में मदद करे।

इस किताब में बहुत बड़ी चीजें नहीं है, छोटी चीजें हैं लेकिन महत्वपूर्ण चीजें हैं क्योंकि आज के संदर्भ में भी ऐसे बहुत सारे मुद्दे आरक्षण को लेकर के हर तीसरे दिन सामने आ रहे हैं कभी  राजनीतिक आरक्षण को लेकर के, कभी सरकारी तंत्र को लेकर के। सरकारी तंत्र के आंकड़े हमारे सामने आते जा रहे हैं, हम देखते हैं कि क्लास 1 में कभी रिजर्वेशन 3-4 से ज्यादा नहीं होता, क्लास 3 में भी ज्यादा नहीं होता, क्लास 2 में थोड़ा ज्यादा होता है और क्लास 4 में पूरा भरा रहता है,तो ये क्यों हो रहा है? और जबसे हमारा LPGsystem लागू हुआ है, और उसके साथ तेजी से निजीकरण हुआ है, और जिस तरह से निजीकरण में विदेशी कंपनियां, प्राइवेट कंपनीयां आयी है और जिस तरह से इकोनॉमिक ड्राइव के नाम पर पहले 10% सरकारी पदो को काटकर आ गया, फिर 10%कट गया, इस प्रकार सरकारी क्षेत्र सिमटता चला जा रहा है, और आरक्षण अपने आप में निष्प्रभावी होता चला जा रहा है और जो खतरा इस किताब में डाक्टर अम्बेडकर देखते थे वो चीजें  अब दिखाई दे रहा है। जिस तेजी से निजीकरण हो रहा है यहाँ तक कि सरकारी कंपनीयां का भी निजीकरण हो रहा है, वो भी दूसरे के हाथों में बेची जा रही है। सरकारी कंपनीयों में लोगों को आरक्षण मिलता था उनके प्रतिनिधित्व की गुंजाइश थी अब वो भी नीजी हाथों में चली जायेंगी तो वो सब भी खत्म हो जाएगा। मुझे लगता है आने वाले दिनों में इस किताब की ओर लौटना पड़ेगा और इस किताब में जो मेमोरेन्डम है, उनकी जो माँग, थी उन माँगों को मुद्दा बनाकर के दलित समुदाय को आने वाले समय में अपने हितों की संरक्षण  के लिए संघर्ष करने पड़ेगें।

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दलित समुदाय को आगे आने वाले समय में इन्हें कुछ अपने हितों के संरक्षण के लिए संघर्ष करने पड़ेंगे।क्योंकि अब जो स्तिथि हम कोरोना के समय भी देख रहे है जिस तरह से। प्रवासी मजदूर लोग जा रहे है और वह गाँव जो वे लौट कर जा रहे है, आखिर उन गाँव में उनके लिए क्या है? उनके टूटे फूटे घर है केवल। यदि गाँव मे कुछ होता तो शहर में वे आते क्यों मजदूरी, बेगारी करने के लिए और शहर में भी कभी काम मिलता कभी नहीं मिलता। यदि गाँव मे उनका पेट भर सकता, उनको सम्मान से दो रोटी मिल पाती, वे आए है तो सिर्फ अपने पेट भरने के साधन की तलाश में और गाँव में जो पेट भरने के साधन उन्हें मिल रहे थे वे सम्मानजनक तरीके से नहीं अपमानजनक तरीके से मिल रहा था उनको। लेकिन अब वे फिर उसी स्तिथि में लौटकर जा रहे है। क्यों जा रहे है? वहाँ जाकर उन्हें क्या मिल जाएगा? और कितने दिनों तक वे गाँव में रह लेंगे? और गाँव मे वे किस तरह से जिंदा रहेंगे यह बहुत बड़ा सवाल है।

इन सवालों के जवाब इस किताब में है, यह सिर्फ ज्ञापन के रूप में अपनी मांग डॉ० अम्बेडकर ने नहीं रखी है। बल्कि इन मांगों के माध्यम से समकालीन परिस्थितियां आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक उन सबका एक खाका है। और उस खाके में बहुत सारे सवाल, समस्याएं हैं और उन समस्याओं के समाधान भी इस किताब में उन्होंने सुझाए है। जिससे कि जब हमारा संविधान बने तो उसमें इस तरह की चीज़ें होनी चाहिए। क्योंकि इसमें उन्होंने यह भी कहा है कि मानो मौलिक अधिकारों की जब बात आती है कि यदि किसी व्यक्ति को अधिकार मिल जाते है और उसके अधिकारों का अतिक्रमण होता है या शोषण होता है क्योंकि इस किताब में अनेक सुझाव दिए गए है जैसे मैंने कहा कि दलितों के लिए अलग बस्तियाँ बसाई जाय इनके लिए वे Settlement Commission की बात करते है जो यह सारे मुद्दे देखे और लोगों को बसाने में मदद करे।

बाबासाहब के अंदर अपने विचार और सिद्धांतों के प्रति दृढ़ता थी तथा एक सही और आवश्यक मुद्दे के लिए लड़ रहे थे, और ऐसा करते समय वह न केवल अनुसूचित जाति के प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहे थे बल्कि उनकी दृष्टि में पूरा समाज और राष्ट्र था। मुझे लगता है कि संविधान की पृष्ठभूमि और बाबासाहब अंबेडकर के योगदान को समझने के लिए इस छोटी सी किताब को जरूर पढ़ा जाना चाहिए।

डॉ. अम्बेडकर ने एक महत्वपूर्ण मुद्दे को उठाया कि जो अनुसूचित लोगों के साथ जो ज्यादतियां होती थी, और उसके ख़िलाफ़ वे जाए, तो उनको संरक्षण इस तरह का चाहिए कियदि वे मुकदमा लड़ते है तो उसका खर्च कहाँ से आए?यदि वह मजदूर आदमी है और मुकदमा लम्बा खींचता चला जायेगा, तो उसका खाने पीने का खर्च कहाँ से आएगा?तो इस प्रकार उत्पीड़ित वर्ग को कई तरह के खर्च उठाने पड़ते है जो उनके पास नहीं होते, अतः उत्पीड़ित वर्ग को संरक्षण देने के लिए यह जरूरी है कि उन्हें यह सुविधाएँ भी राज्य द्वारा उपलब्ध कराई जाए। जैसे उन्हें वकील राज्य की ओर से करवा देना चाहिए जिससे वकील को उन्हें पैसा ना देना पड़े तथा और भी आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए। क्योंकि वह मजदूर आदमी बार बार अपना काम छोड़कर मुकदमें के लिए शहर नहीं जा पाएगा, इसलिए कई बार आदमी टूट जाता है और उन तारीखों पर जा नहीं पाता है। तो पैसे की उसे बहुत जरूरत होती है।

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इस प्रकर इस छोटी-सी किताब में कई मुद्दे डॉ. अम्बेडकर ने रखे है जो सिर्फ अनुसूचित जातियों को समर्थवान बनाने के लिए ही नहीं बल्कि एक समतामूलक समाज बनाने के लिए, एक उन्नतशील राष्ट्र बनाने के लिए यह प्रावधान किए।इस सबका मतलब यह है कि उनके दिमाग में संविधान का एक खाका थाकि संविधान में किस प्रकार के प्रावधान होने चाहिए। ये सब बातें उन्होंने संविधान सभा में जाने से पहले, संविधान की प्रारुप समिति के अध्यक्ष बनने से पहले ही इस किताब में लिख दी थीं। और हम देखते है कि इनमें से अधिकांश मुद्दों को संविधान में ज्यों की त्यों लागू करवाने में वह सफल रहे।यह सब तब ही संभव हो पाता है जब किसी व्यक्ति के भीतर अच्छा विचार होता है, वह ईमानदार होता है, अपने विचार के प्रति दृढ़ रहता है, और यही गुण थे बाबासाहेब अम्बेडकर में थे। बाबासाहब के अंदर अपने विचार और सिद्धांतों के प्रति दृढ़ता थी तथा एक सही और आवश्यक मुद्दे के लिए लड़ रहे थे, और ऐसा करते समय वह न केवल अनुसूचित जाति के प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहे थे बल्कि उनकी दृष्टि में पूरा समाज और राष्ट्र था। मुझे लगता है कि संविधान की पृष्ठभूमि और बाबासाहब अंबेडकर के योगदान को समझने के लिए इस छोटी सी किताब को जरूर पढ़ा जाना चाहिए।

जयप्रकाश कर्दम हिन्दी के जाने-माने कवि-कथाकार और विचारक हैं।

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