Sunday, July 14, 2024
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रवीश! तुमसे माइक कोई नहीं छीनेगा!

डियर रवीश कुमार! तुम अपना माइक छीने  जाने को लेकर कुछ परेशां हो, ऐसा यह पोस्ट पढ़कर लगता है। किन्तु, दुसाध आश्वस्त करता है कि अंततः माइक, भले ही उसका रंग लाल न होकर कोई और हो, कोई तुमसे नहीं छिनेगा। ऐसा इसलिए कि परम्परागत विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न अल्पजनों को और शक्तिसंपन्न करने में सर्वशक्ति […]

डियर रवीश कुमार!

तुम अपना माइक छीने  जाने को लेकर कुछ परेशां हो, ऐसा यह पोस्ट पढ़कर लगता है। किन्तु, दुसाध आश्वस्त करता है कि अंततः माइक, भले ही उसका रंग लाल न होकर कोई और हो, कोई तुमसे नहीं छिनेगा। ऐसा इसलिए कि परम्परागत विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न अल्पजनों को और शक्तिसंपन्न करने में सर्वशक्ति से क्रियाशील सवर्णवादी सत्ता को  बहुजनों में पनपते आक्रोश को फैलेने से रोकने के लिए, तुम जैसे कई आभासी सवर्ण क्रान्तिकारियों  की जरुरत है।

इसलिए कहता हूं कि तुम सवर्णवादी सत्ता और समाज व्यवस्था की एक सुरक्षित दूरी बनाकर आलोचना करते  रहते हो, जो अन्य सवर्ण माइकबाज नहीं के बराबर करते हैं। तुम्हारी इस अदा से प्रगतिशील सवर्णों को छोड़ो, हमारे बहुजन समाज के भारी संख्यक लोग भी फिदा रहते हैं।

[bs-quote quote=”तुम्हे प्रेमचंद, निराला, पंडित राहुल संकृत्यायन, विवेकानंद इत्यादि हिन्दू हीरोज का इतिहास स्मरण कर लेना  चाहिए, जो सवर्ण-हित में तुम्हारी ही तरह शक्ति के स्रोतों के बंटवारे से पूरी तरह आंखे मूंदे, सिर्फ हिन्दू समाज के प्रभुवर्ग की मामूली-सी आलोचना कर, क्रान्तिकारी हिन्दू हीरो का ख़िताब चिस्थाईतौर पर सुरक्षित कर लिए।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

पांडे रवीश, तुम्हारे भक्त मेरे इस कमेन्ट को ईर्ष्या से प्रेरित बताएँगे, जिसमें छिपी आंशिक सचाई से इंकार भी नहीं करूँगा। हाँ, थोड़ी ईर्ष्या मुझमें  भी पैदा होती है। आखिर हो क्यों नहीं, जब यह देखता हूँ कि भारत में भीषणतम रूप में व्याप्त मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या, आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी, के खात्मे की दिशा अपने बेहद दमदार हथियार (माइक) का रत्ती भर भी इस्तेमाल न कर, तुम क्रान्तिकारी बने फिरते हो तो थोड़ी ईर्ष्या दुसाध को भी होती है।

बहरहाल, तुम्हे और तुम्हारे भक्तों को 1000% गारंटी के साथ आश्वस्त करता हूँ कि जब तक तुम शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-धार्मिक-शैक्षिक इत्यादि ) में  सवर्ण-ओबीसी-एससी/ एसटी और इनसे धर्मातरित तबकों के मध्य वाजिब बंटवारे पर ख़ामोशी अख्तियार किये रहोगे, एनडीटीवी बिक भी जाए तो तुम्हे कोई और चैनल नौकरी दे ही देगा और तुम्हारी हिरोगिरी बरक़रार रहेगी!

अगोरा प्रकाशन की किताबें किंडल पर भी –

इस मामले में तुम्हे प्रेमचंद, निराला, पंडित राहुल सांकृत्यायन, विवेकानंद इत्यादि हिन्दू हीरोज का इतिहास स्मरण कर लेना  चाहिए, जो सवर्ण-हित में तुम्हारी ही तरह शक्ति के स्रोतों के बंटवारे से पूरी तरह आंखे मूंदे, सिर्फ हिन्दू समाज के प्रभुवर्ग की मामूली-सी आलोचना कर, क्रान्तिकारी हिन्दू हीरो का ख़िताब चिस्थाईतौर पर सुरक्षित कर लिए।

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हाँ, जिस दिन मिलिट्री और न्यायपालिका सहित सरकारी और निजी क्षेत्र की सभी प्रकार की नौकरियों, आउटसोर्सिंग जॉब, सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, पार्किंग, परिवहन, फिल्म-मीडिया इत्यादि में एससी/ एसटी, ओबीसी और इनसे धर्मांतरित लोगों की संख्यानुपात में हिस्सेदारी के लिए इस माइक का इस्तेमाल करना शुरू कर दोगे, उस दिन से शायद मुख्यधारा के चैनलों से तुम्हारा बहिष्कार शुरू हो जायेगा। तब घबराना नहीं, मुख्यधारा की बौद्धिक दुनिया से बहिष्कृत दुसाध जैसे लाखों लोग तुम्हे अपनाने के लिए हाथ बढ़ाएंगे। जब तक यह स्थित नहीं आती है तुम बेफिक्र होकर अपने हिरोगिरी को एन्जॉय करते रहो। हमारी शुभकामना तुम्हारे साथ है।

  लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के संस्थापक अध्यक्ष हैं।

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