Sunday, May 26, 2024
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संक्रमण काल से गुजर रहे समाजों में ‘संघ’ की सेंध

माहौल और गतिविधियों से भी आभास हो रहा था कि यह प्रोग्राम 2024 के चुनाव को देखते हुए भाजपाइयों ने आयोजित किया था। लेकिन यादव समाज को यह आभास दिलाने की कोशिश की जा रही थी कि यादव बंधुओं को पुनर्जागृत करने के लिए एक मंच पर लाने हेतु इस 'गैर राजनीतिक' सभा को बुलाया गया है।

दिनांक दो अप्रैल को यदुकुल पुनर्जागरण मिशन के तत्वावधान में वृन्दावन गार्डन, कान्दिवली पश्चिम मुम्बई में यादव एकता सम्मेलन पूर्व सांसद डीपी यादव की अध्यक्षता में रखा गया था। पहले से काफी प्रचार-प्रसार भी किया गया था। मुंबई के यादव समाज की संस्थाओं के प्रतिनिधि तथा और भी गणमान्यबन्धु सभा में शामिल हुए थे। हॉल खचाखच भर गया था।

स्टेज पर मुम्बई और बाहर के भी सम्मानित अतिथिगण मौजूद थे। अतिथियों में ज्यादातर मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के भाजपाई करीब-करीब सभी विचारधारा के लोग मंच पर शोभा बढ़ा रहे थे। माहौल और गतिविधियों से भी आभास हो रहा था कि यह प्रोग्राम 2024 के चुनाव को देखते हुए भाजपाइयों ने आयोजित किया था। लेकिन यादव समाज को यह आभास दिलाने की कोशिश की जा रही थी कि यादव बंधुओं को पुनर्जागृत करने के लिए एक मंच पर लाने हेतु इस ‘गैर राजनीतिक’ सभा को बुलाया गया है।

ध्यान देने की बात थी कि सभी लोग गैर-राजनीतिक संस्था और मिशन की बात तो कर रहे थे लेकिन मंच पर सभी राजनीतिक लोग ही कब्जा किए हुए थे, हम जैसे अनेक सामाजिक लोग केवल श्रोता ही बने हुए थे।

एक कहावत है कि मांसाहारी को कितना भी बहलाकर, फुसलाकर, प्यार से शाकाहारी बनाने की कोशिश करेंगे, लेकिन थोड़ा भी मौक़ा मिलते वह मांसाहारी हो ही जाएगा। यही हालात भाषण देते समय भाजपाई नेताओं की भी थी। वे अपने भाषण में कभी अखिलेश यादव तो कभी  मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव पर गलत टिप्पणी कर रहे थे। हॉल में भाषण के शुरुआती दौर से ही खुसुर-फुसुर होना शुरू हो गई थी लेकिन सभी लोग शान्ति से निपट जाने में ही भलाई समझ बर्दाश्त कर रहे थे। मैं भी अनुभवों से यही उम्मीद कर रहा था कि यहां ऐसा कोई विरोध नहीं होगा, क्योंकि सामाजिक विचारधारा पर किसी यादव ने आज तक कभी विरोध दर्ज नहीं किया। हां, वर्चस्व के लिए बराबर विरोध होता आया है। लेकिन आज अध्यक्षीय भाषण में विचारधारा पर जबरदस्त विरोध हो ही गया। बुरा भी लगा लेकिन थोड़ी खुशी भी हुई कि अब यादव समाज में सामाजिक विचारों पर भी मतभेद करने और तर्क करने की इच्छाशक्ति जाग गई है।

मंच से लोगों को शांत करने की कोशिश

आज से 30-40 साल पहले यादव संघ मुम्बई के सामाजिक सम्मेलनों में मंचों पर मुख्य अतिथि चंद्रकांत त्रिपाठी, रमेश दुबे, कृपाशंकर सिंह जैसे ब्राह्मणवाद के पुरोधा ही हुआ करते थे। अपने भाषण में यादव समाज के प्रति नकारात्मक भावनाओं के बारे में बोलने के बाद भी हॉल में बैठे यादव बर्दाश्त करते हुए ताली बजाते थे। कृष्ण और सुदामा की दोस्ती का बखान हर सभा में होता था। मैं ही एक अकेला उनके विचारों और यादव समाज में इनकी अध्यक्षता पर प्रश्न खड़ा कर देता था लेकिन लालची नेताओं की राजनीतिक मजबूरी उस समय बन जाया करती थीं।

अब इस मीटिंग में विचारधारा का विरोध हुआ है, गुमराह करने वालों का विरोध हुआ है, साथ ही सामाजिक चेतना के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंकने वालों का भी विरोध हुआ है और होना भी चाहिए। यह विरोध सामाजिक प्रगति के लिए शुभ संकेत है। खैर कुछ दोनों तरफ के लोगों की सूझ-बूझ से अनहोनी होने से बच गयी। बीच-बचाव और सुलह का रास्ता निकालते हुए, बहुत से यादव बंधू, विशेष रूप से समाजवादी लोग नारा लगाते हुए मीटिंग का बहिष्कार कर हाल से बाहर चले गए।

थोड़ी देर के बाद फिर थोड़े बचे हुए लोगों के साथ मीटिंग शुरू हुईं, लेकिन सही ढंग से मीटिंग नहीं हो पाई, उनका कहना था कि यदि विचारों में मतभेद हैं तो सवाल जवाब से हल किया जा सकता है, इस तरह से व्यवधान पैदा नहीं करना चाहिए। अब क्या सवाल जवाब शुरू हो गया।हमारे कुछ समर्थकों ने सवाल पूछने के लिए प्रेरित किया। माहौल गर्म था इसलिए मैं और गर्म नहीं करना चाहता था लेकिन एक समर्थक ने माइक लाकर दे ही दिया। मेरे माइक लेते ही मंच से यह फरमान जारी हुआ कि अब एक या दो लोग ही सवाल पूछेंगे और एक आदमी एक ही सवाल पूछेगा।

जैसा आप लोग मुझे जानते हैं कि मैं पिछले सात सालों से तीन सवाल पूरे देश में घूम-घूम कर पूछता आ रहा हूं। यहाँ श्रीकृष्ण भक्त ज्यादा मौजूद थे। इसलिए मैंने एक सामाजिक सवाल डीपी यादव से पूछा- ‘कोई भी देवी-देवता या भगवान, जो इंसान के छूने या देखने मात्र से अपवित्र हो रहा था (आज भी हो रहा है, कोई ग़लती से अज्ञानता में दर्शन कर ले तो उसे मार पड़ती है।)  क्या वह भगवान हो सकता है? हां या नहीं में उत्तर दीजिये।

तब डीपी यादव से माइक लेकर विश्वात्मा यादव ने कहा कि ‘इसका जवाब यादवजी नहीं दे सकते हैं, मैं दे रहा हूं।’

उन्होंने जवाब दिया कि ‘जिस तरह से मुसलमान मस्जिद से दिन-रात अल्लाह हु अकबर सुनते-सुनते अल्लाह को मानने लगते हैं, उसी तरह यादव बचपन से ही श्रीकृष्ण भगवान के बारे में सुनते आते हैं और यही वजह है कि यह हमारे डीएनए में घुस गया है। इसलिए हम लोगों को श्रीकृष्ण भगवान को मानना चाहिए।’

पम्फलेट और व्हाट्सएप मैसेज

इस जवाब से मैं क्या कोई भी संतुष्ट नहीं हो सकता है? माइक चला गया था, मेरी मजबूरी भी थी। लेकिन मैं कुछ संतुष्ट इसलिए था कि अंधभक्तों को विचलित करने के लिए कुछ सवाल तो सोचने के लिए छोड़ ही दिया था।

यदि मुझे मौका मिला होता तो दो सवाल और पूछता। पहला यह कि क्या आपकी सामाजिक संस्था यदुकुल पुनर्जागरण मिशन यादव बन्धुओं को हिन्दू वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मणों से उच्च नहीं तो कम से कम उनके बराबर करने में सफल हो सकती है? और समाज से हमेशा के लिए ऊंच-नीच, छुआछूत का भेदभाव मिटा सकती है?

दूसरा सवाल, जो मेरे जेहन में है कि जिस परम्परा, व्यवस्था या धर्म में हजारों सालों से हमारे पूर्वज बाप, दादा-परदादा नीच, दुष्ट, पापी बनाए गए थे, आज भी हैं और पता नहीं कब तक बने रहेंगे? उन्हें ब्राह्मणों के बराबर कर पायेंगे या नहीं?

यह सवाल यादव संघ मुम्बई से है, श्रीकृष्ण के भक्तों और हिन्दू धर्म के ठेकेदारों से है। इसके लिए मुझे एक निश्चित मियाद दे दें- पांच साल, दस साल या बीस साल। यदि हमारे समाज के लोग डाक्टर, इन्जीनियर, अधिकारी या वैज्ञानिक बनते हैं, तब भी क्या ब्राह्मण के बराबर माने जायेंगे? यदि नहीं तो, तुम्हारी ऐसी घटिया परम्परा, व्यवस्था या धर्म को लात मारता हूं और ऐसे दूसरे कलंकित लोगों को भी लात मारने की हिदायत देता हूं। धन्यवाद!

गाँव के लोग
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