सवर्ण हिंदुओं और जाट सिखों ने परिषद चुनाव में मुझे हराने का हर संभव प्रयास किया(भाग-एक)

बिशन दास बैंस की विद्या भूषण रावत से बातचीत

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बातचीत का पहला हिस्सा

बिशन दास बैंस नवंबर 1985 में लेबर पार्टी के टिकट पर चुने गए यूनाइटेड किंगडम में वॉल्वरहैम्प्टन के पहले दक्षिण एशियायी मेयर हैं। एक निडर अंबेडकरवादी बैंस साहब आजीविका की तलाश में और साथ ही आगे की शिक्षा हासिल करने के लिए 1963 में इंग्लैंड चले गए। उनकी जीवनयात्रा संघर्षपूर्ण और दृढ़ संकल्प से भरपूर है। एक अम्बेडकरवादी के रूप में उन्होंने शुरुआत में ग्रेट ब्रिटेन की रिपब्लिकन पार्टी के तहत विभिन्न आंदोलनों में भाग लिया, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें अहसास हुआ कि वे यूके में मुख्यधारा के राजनीतिक दलों के तहत अपने लोगों की बेहतर सेवा कर सकेंगे और इस प्रकार लेबर पार्टी उनकी स्वाभाविक पसंद बनी। यह समाजवादी सिद्धांतों वाली पार्टी थी और प्रवासियों के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के भेदभाव का सामना करने वाले लोगों का समर्थन करती थी। बैंस ने अपने मेयर पद का उपयोग अपने सिद्धांतों और सोच को व्यावहारिक ज़मीन प्रदान करने के लिए किया। उन्होंने उद्घाटन के पारंपरिक तरीके का पालन करने से इनकार कर दिया जो स्थानीय चर्च का डोमेन था। इसके बजाय, उन्होंने एक स्थानीय नागरिक स्वागत समारोह का आयोजन किया। उनकी पुस्तक प्राइड वर्सेज प्रेजुडिस जाति के आधार पर उनके उनके साथ हुये भेदभाव को दर्शाती है और विस्तार से बताती है कि कैसे जाट सिखों और सवर्ण हिंदुओं ने उन्हें चुनावों में हराने की पूरी कोशिश की। उनके साथ हुई इस महत्वपूर्ण बातचीत से पता चलता है कि कैसे जातिवाद से बजबजाते दिमागों ने विदेशों में वर्चस्व  कायम किया और वहां सभी को संक्रमित किया। बैंस साहब सक्रिय राजनीति में नहीं हैं, लेकिन वॉल्वर हैम्प्टन ने उनको हमेशा एक राजनीतिक व्यक्तित्व की तरह सम्मान दिया। उन्हें ‘एल्डरमैन’ की उपाधि प्रदान की गई, जिसकी पुष्टि नगर परिषद द्वारा की जाती है। वह ब्रिटेन और भारत में अम्बेडकरवादी-बौद्ध आंदोलन को मजबूत करने में सक्रिय हैं। प्रस्तुत है उनके साथ विद्या भूषण रावत की बातचीत ।

आप यूके कब पहुंचे? आपके यहाँ आने का क्या कारण था? मेरा मतलब है कि आपके माता-पिता क्या थे और वे पंजाब में कहाँ रह रहे थे?  हमें अपनी शिक्षा के बारे में भी बताएं? क्या आपको अपनी जाति के कारण अपने घर में किसी प्रकार के भेदभाव का सामना करना पड़ा? इंग्लैंड के बारे में आपका पहला प्रभाव क्या था?
मेरा जन्म और पालन-पोषण भारत के उत्तरी राज्य पंजाब के सुदूर एक छोटे से गाँव शफीपुर में हुआ था। गाँव में कोई दुकान, स्कूल और स्वास्थ्य व्यवस्था नहीं थी और लोगों के इकट्ठा होने के लिए कोई सामुदायिक सुविधा या धार्मिक स्थान नहीं था। शिक्षा उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं थी। नतीजतन, 99% निवासी पिछड़े, अनपढ़, रूढ़िवादी और अंधविश्वासी थे। गाँव भारत के उन हज़ारों गाँवों का प्रतीक था जहाँ लोग थे और अभी भी गरीबी में पैदा हुए थे। गरीबी में जीते थे और गरीबी में ही मरते थे। मैं अपने माता-पिता की दस संतानों में दूसरे स्थान पर था। अपने प्रारंभिक जीवन में बहुत कठिनाइयाँ झेलने के बाद प्राथमिक और उच्च विद्यालयों तक पाँच मील पैदल चलकर पढ़ाई की। कॉलेज की पढ़ाई के लिए बीस मील की यात्रा करनी पड़ी। मैंने 1963 में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। जातिगत पूर्वाग्रह जीवन के हर स्तर पर व्यापक रूप से मौजूद था। खासकर उच्च शिक्षा में जाट सिख, अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़े वर्ग के छात्रों के साथ सामाजिक रूप से न तो मिश्रित होते और न ही भोजन करते थे। स्कूल में कुछ शिक्षक निचली जातियों के बच्चों द्वारा छुआ हुआ कुछ भी नहीं खाते थे। मुझे याद है, 1959 में स्कूल में जातिगत पूर्वाग्रह के खिलाफ दो महीने की हड़ताल का आयोजन किया था। मैं अपने गाँव का पहला व्यक्ति था जिसने डिग्री स्तर तक शिक्षा प्राप्त की। यह पूरे परिवार के लिए गर्व की बात थी। वे मेरे विदेश जाने के विचार से बहुत खुश नहीं थे लेकिन अनिच्छा से मेरा समर्थन करने के लिए तैयार हो गए। जब मैं ब्रिटेन जाने की तैयारी कर रहा था, मेरे माता-पिता ने पड़ोस के गांव की एक लड़की राम पियारी के साथ मेरी शादी का आयोजन किया। मैं यूके आया था 1963 में आगे की शिक्षा के लिए। यहां इंग्लैंड पहुंचने के बाद मुझे आगे की शिक्षा की अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने अथवा भारत में अपने परिवार का सहयोग करने के लिए पैसे कमाने के बीच में से एक बहुत मुश्किल चुनाव करना था और मैंने दूसरा विकल्प चुना।

बिशन दास बैंस की पत्नी रामपियारी बैंस

यूके में आपके आगमन की यात्रा भी एक दिलचस्प यात्रा है। क्या आप बता सकते हैं कि आप उस स्थान पर कैसे पहुँचे जहाँ आपको रहना था?
घर से इंग्लैंड तक का मेरा सफर बहुत दिलचस्प रहा। परिवार, दोस्तों और रिश्तेदारों को पीछे छोड़ना आसान नहीं था। यह जानते हुए कि आप उन्हें एक अनिश्चित समय के लिए देख नहीं पाएंगे। यह पहली बार था कि मैंने इतनी दूर की यात्रा की। खासतौर से हवाई जहाज़ से। घर से नई दिल्ली, मुंबई और हीथ्रो तक की पूरी यात्रा मेरे जीवन का सबसे भयावह अनुभव थी। मैं लगभग 5 बजे हीथ्रो हवाई अड्डे पर पहुँचा और सभी आव्रजन और कस्टम जाँच से गुजरने के बाद हवाई अड्डे की इमारत से बाहर आया और किसी ऐसे व्यक्ति की उत्सुकता से तलाश करने लगा जिसे मैं जानता हूँ या जो मुझे लेने आया था। मुझे कोई दिखा नहीं तो मैं यह सोचकर बहुत निराश हुआ और डर गया कि अब कहाँ जाऊँ? मैंने अपनी जेबों को टटोलना शुरू किया और आखिरकार मुझे एक दूर के रिश्तेदार का पता मिला, जिससे मैं कभी मिला नहीं था। वह वॉल्वर हैम्प्टन में रह रहा था। मुझे नहीं पता था कि यह जगह कितनी दूर है? मेरे जैसे भोले नए आने वाले लोगों के लिए कई अनधिकृत टैक्सी ड्राइवर हमेशा दौड़ते रहते थे। उनमें से एक ने मुझे अपने साथ ले जाने के लिए बहुत जल्दी मचाई और मुझसे पूछा कि क्या मुझे टैक्सी चाहिए? जब मैंने उससे पूछा कि वॉल्वर हैम्प्टन का किराया कितना होगा तब उसने जवाब दिया, किराए की चिंता मत करो। फिर जल्दी से मुझे टैक्सी में बैठने को कहा। उसने और पाँच लोगों को बिठाया और हम सभी छः को अपनी कार में बिठाकर गाड़ी चलाने लगा। भगवान जाने वह हमें कहाँ ले जाने वाला था। काफी अंधेरा था, ठंड थी और बारिश हो रही थी, शायद ही किसी को बाहर कुछ दिखाई दे रहा था। वह हमें अलग-अलग कस्बों और शहरों में ले गया और एक-एक करके अलग-अलग जगहों पर छोड़ देता। मुझे उसने सबसे आखिर में वॉल्वरहैम्प्टन छोड़ा तब रात्रि के लगभग साढ़े नौ बज चुके थे। टैक्सी ड्राइवर ने लेस्ली रोड वॉल्वरहैम्प्टन में एक मंद रोशनी वाले सीढ़ीदार घर का दरवाजा खटखटाया। एक छोटी गोल-मटोल महिला ने अनिच्छा से आधा दरवाजा खोला और निराशा में बाहर झाँका। टैक्सी वाले ने कहा, मैडम आपके पास भारत से मेहमान आए हैं। वह चौंक गई, उसने अपने सामने खड़े एक आदमी को देखा और कहा- ‘क्या’? ‘एक आगंतुक भारत से आपका रिश्तेदार। टैक्सी वाले ने जवाब दिया। घर की महिला भ्रमित और असहज लग रही थी। मैंने टैक्सी का दरवाज़ा खोला और अपने कंधे के बैग को एक तरफ लटकाए कार से बाहर आया। मैंने कहा- ‘नमस्ते भाभी जी।’ उसने मुझे अभी भी भ्रमित और अवाक होकर देखा। मैंने घर में घुसने की थोड़ी हिम्मत की और टैक्सी वाला मेरा सूटकेस घर के अंदर ले गया। शुरू में यह किसी अजनबी के घर में जबरदस्ती घुसने से कम नहीं लगा।

कुछ वित्तीय सहायता रिपब्लिक पार्टी की पंजाब शाखा को भेजी। फिर वहाँ से आगे बढ़ते हुए हमने ग्रेट ब्रिटेन में भी रिपब्लिकन पार्टी की एक शाखा बनाने का फैसला किया और पूरे इंग्लैंड में अपनी सदस्यता बढ़ा दी। मैंने कई वर्षों तक समूह के संयोजक, सचिव और अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। उन दिनों कंप्यूटर, आईटी, टेलीफोन लाइन और टाइपराइटर नहीं थे। मैं बैठकों और मीटिंग्स के लिए हाथ से लिखित दर्जनों नोटिस भेजता था और लेबर पार्टी कार्यालयों में पत्रक साइक्लोस्टाइल करवाता था। समूह का मुख्य उद्देश्य रिपब्लिकन पार्टी और भारत में बाबा साहब के मिशन के लिए काम करने वाले लोगों को कुछ वित्तीय और नैतिक समर्थन प्रदान करना था।

बाबा साहब की विचारधारा का हिस्सा बनने के लिए आपको किस बात ने प्रेरित किया? क्या आप इसे छात्र जीवन से शामिल हो गए या इधर आपका झुकाव कैरियर के दौरान हुआ? आपने उल्लेख किया कि आप यूके में रिपब्लिकन पार्टी का हिस्सा थे। दलितों के साथ होनेवाले भेदभाव का आपने कई बार विरोध किया था। आप इससे सक्रिय रूप से जुड़े और इस चरण के दौरान आपकी गतिविधियाँ क्या थीं?

मैं छात्रसंघ में हमेशा सक्रिय रहा। साठ के दशक की शुरुआत में, इंग्लैंड में बहुत सीमित एशियायी मीडिया था। एक भारतीय किराने की दुकान थी जो साप्ताहिक ब्लिट्ज बेचती थी। मेरे एक मित्र के पास भारत से डाक द्वारा भीम पत्रिका आती थी। मुझे दोनों पेपर पढ़ने का बहुत शौक था। अखिल भारतीय रिपब्लिकन पार्टी ने 1964 में भारत के दबे-कुचले लोगों के साथ होनेवाले अत्याचारों के खिलाफ एक आंदोलन शुरू किया और उनके जीवन स्तर के उत्थान के लिए मांगों का एक चार्टर प्रस्तुत किया। आंदोलन के दौरान देश भर में 250,000 से अधिक लोगों को जेलों में बंद कर दिया गया और पुलिस की बर्बरता के कारण 13 लोग शहीद हो गए।

भारत में होनेवाला यह आंदोलन मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। मैंने कुछ दोस्तों से बात की, बैठकें आयोजित कीं। कुछ संग्रह किया और कुछ वित्तीय सहायता रिपब्लिक पार्टी की पंजाब शाखा को भेजी। फिर वहाँ से आगे बढ़ते हुए हमने ग्रेट ब्रिटेन में भी रिपब्लिकन पार्टी की एक शाखा बनाने का फैसला किया और पूरे इंग्लैंड में अपनी सदस्यता बढ़ा दी। मैंने कई वर्षों तक समूह के संयोजक, सचिव और अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। उन दिनों कंप्यूटर, आईटी, टेलीफोन लाइन और टाइपराइटर नहीं थे। मैं बैठकों और मीटिंग्स के लिए हाथ से लिखित दर्जनों नोटिस भेजता था और लेबर पार्टी कार्यालयों में पत्रक साइक्लोस्टाइल करवाता था। समूह का मुख्य उद्देश्य रिपब्लिकन पार्टी और भारत में बाबा साहब के मिशन के लिए काम करने वाले लोगों को कुछ वित्तीय और नैतिक समर्थन प्रदान करना था। समूह ने साठ के दशक के दौरान बहुत जमीनी काम किया, विभिन्न कस्बों और शहरों में बैठकें आयोजित कीं। सदस्यता अभियान चलाया, सार्वजनिक सभाओं का आयोजन किया, और भारत में असमानता और जातिगत पूर्वाग्रह के खिलाफ लंदन में विरोध मार्च निकाला।

रिपब्लिकन या भारत केंद्रित समूहों या पार्टियों को छोड़ने के आपके क्या कारण थे? वैचारिक मतभेद थे या आप कुछ और?
साठ के दशक के दूसरे भाग के दौरान ऑल इंडिया रिपब्लिक पार्टी में अंदरूनी कलह के गंभीर परिणाम हुए, जिसने बाबा साहब के मिशन की जड़ों को कमजोर कर दिया। पार्टी बुरी तरह बिखर गई और नेतृत्व ने डूबते जहाज को छोड़ दिया। नतीजतन, आरपीआई में घुसपैठ ने रिपब्लिकन ग्रुप ऑफ जीबी जैसे सहयोगी संगठनों को बुरी तरह प्रदूषित कर दिया। बाद में समूह की गतिविधियां धीरे-धीरे कमजोर हो गईं और उन्हें छोड़ना पड़ा।

बिशन दास बैंस और विद्या भूषण रावत

यह जानना दिलचस्प है कि आप बाद में राजनीति में आए और वह भी लेबर पार्टी में। क्या आपके लेबर पार्टी में शामिल होने में कुछ खास था? यह कब हुआ ?

यूके आने के कुछ ही समय के भीतर मैं रविदास धर्मक सभा, एंटी नाज़ी लीग और कम्युनिटी रिलेशंस काउंसिल और निश्चित रूप से ग्रेट ब्रिटेन के रिपब्लिकन ग्रुप के साथ सक्रिय हो गया। मैं लेबर पार्टी के स्थानीय नेताओं सहित कई लोगों से मिलता रहा, जिन्होंने मुझे पार्टी में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया। ऐतिहासिक रूप से लेबर पार्टी दूसरे विश्वयुद्ध के बाद शुरू हुए ट्रेड यूनियन आंदोलन से अस्तित्व में आई। दूसरी बात यह थी कि लेबर पार्टी की सरकार ने भारत को स्वतंत्रता दी थी। लेबर पार्टी की समाजवादी नीतियों के साथ समानता, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय पर आधारित बाबा साहब के मिशन के बीच बहुत अधिक वैचारिक मतभेद नहीं थे। स्थानीय लेबर पार्टी के नेताओं ने मुझे 1968 में पार्टी में शामिल होने के लिए राजी किया और अंततः मुझे 1973 में स्थानीय चुनाव लड़ने के लिए कहा। 1975 में, पार्टी ने मुझे तथाकथित सुरक्षित लेबर सीट से उपचुनाव लड़ने के लिए चुना, जिसे मैंने बहुत आसान बहुमत से जीत लिया था।

भारतीय जाति और धार्मिक पूर्वाग्रह के अलावा मुझे स्थानीय प्रतिद्वंद्वियों में एक ब्रिटिश नेशनल पार्टी (दूर दक्षिणपंथी संगठन) और थोड़े कम नस्लीय अन्य दो दलोन से मुक़ाबला करना था। अंत में पाकिस्तानी समुदाय के साथ कुछ स्वदेशी और अन्य लोगों के ठोस समर्थन के साथ मैं भारी बहुमत के साथ सीट जीतने में सफल रहा।

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आपको ब्रिटेन में किस तरह के नस्लीय और जातिवादी भेदभाव का सामना करना पड़ा।

साठ और सत्तर के दशक के दौरान नस्लीय पूर्वाग्रह और रंगभेद अपने चरम पर थे जिसके कारण ब्रिटिश समाज काले और गोरों के बीच विभाजित हो गया था। ऐसे कई पब और क्लब थे जो काले ग्राहकों को बाहर अपने यहाँ नहीं आने देते थे । उनकी खिड़कियों पर यह नोटिस देखना असामान्य नहीं था कि, ‘अश्वेतों और एशियायी लोगों को यहाँ आने की अनुमति नहीं है।’ मैंने शुरुआती दिनों में इस तरह की स्थिति का सामना किया था। इतना ही नहीं, नवागंतुकों को शहर के अंदरूनी इलाकों में गंदगी में रहने के लिए मजबूर किया गया था। उन्हें गंदे, धूल भरे और गर्म कार्यस्थलों पर काम करने के लिए मजबूर किया गया था जो कोई नहीं करना चाहता। मैं इन परिस्थितियों में अपवाद नहीं था और काम पर नस्लीय पूर्वाग्रह का शिकार था।

लेबर पार्टी ने आपको वॉल्वरहैम्प्टन के मेयर के लिए नामांकित करने का निर्णय कैसे लिया? अन्य दावेदार कौन थे? क्या आपको किसी नस्लीय पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ा?

1979 का चुनाव इंग्लैंड में मेरे राजनीतिक जीवन के इतिहास की सबसे यादगार घटना थी। साठ और सत्तर के दशक में इंडियन वर्कर्स एसोसिएशन एक बहुत मजबूत राष्ट्रीय संगठन था। इसमें मुख्य रूप से पंजाबी जाट सिखों का नेतृत्व और वर्चस्व था।उनके लिए इस तथ्य को पचा पाना और इस तथ्य से समझौता करना बेहद मुश्किल था कि निचली जाति का व्यक्ति परिषद का निर्वाचित सदस्य हो सकता है। इसके बाद, जातिगत पूर्वाग्रह और धार्मिक घृणा की गंदी भारतीय राजनीति ने परिषद के एक निर्वाचित सदस्य के रूप में मेरी स्थिति को कमजोर करने के लिए अपना सिर उठाया। उन्होंने लेबर पार्टी द्वारा मेरा चुनाव निरस्त कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी और मुझे अपनी ही जाति के एक व्यक्ति से बदल दिया। अपने इन प्रयासों के असफल हो जाने के बाद, उन्होंने मेरे खिलाफ सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति इंडियन वर्कर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष को मैदान में उतारा। चुनाव के दौरान उन्होंने मेरा नाम खराब करने और मेरी सार्वजनिक प्रतिष्ठा को बदनाम करने के लिए एक बदनाम अभियान शुरू किया। उनके पास पूरे दिन मेरे निर्वाचन क्षेत्र की सड़कों पर घूमने वाले, वहाँ के निवासियों को परेशान करने, डराने, साहित्य छापने और वितरित करने वाले कार्यकर्ताओं की एक फौज थी। एक अभियान के रूप में यह सबसे कठिन चुनावों में से एक था क्योंकि मुझे कई भेदभाव और पूर्वाग्रहों को दूर करना था। भारतीय जाति और धार्मिक पूर्वाग्रह के अलावा मुझे स्थानीय प्रतिद्वंद्वियों में एक ब्रिटिश नेशनल पार्टी (दूर दक्षिणपंथी संगठन) और थोड़े कम नस्लीय अन्य दो दलोन से मुक़ाबला करना था। अंत में पाकिस्तानी समुदाय के साथ कुछ स्वदेशी और अन्य लोगों के ठोस समर्थन के साथ मैं भारी बहुमत के साथ सीट जीतने में सफल रहा।

क्रमशः

विद्याभूषण रावत प्रखर सामाजिक चिंतक और कार्यकर्ता हैं। उन्होंने भारत के सबसे वंचित और बहिष्कृत सामाजिक समूहों के मानवीय और संवैधानिक अधिकारों पर अनवरत काम किया है।

2 Comments
  1. nand Mahesha says

    विसन दास बैंस जी को बहुत-बहुत बधाई. आपने उनके संघर्षों को बहुत सुंदर ढंग से उकेरा और प्रस्तुत किया. विदेश में अम्बेडकरवादी विचार धारा के व्यक्ति का चुना जाना गौरव की बात है. पाकिस्तानी समुदाय के लोगों का समर्थन मिलना प्रशंसनीय है. साथ ही खेद भी है कि अपने ही लोग विदेश में भी भारतीय जातिवादी मानसिकता से ग्रसित हैं.

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