Saturday, March 14, 2026
Saturday, March 14, 2026




Basic Horizontal Scrolling



पूर्वांचल का चेहरा - पूर्वांचल की आवाज़

होमसामाजिक न्याय

सामाजिक न्याय

यूजीसी एक्ट के खिलाफ क्यों अपनी कुंठा और विद्वेष लहरा रहे हैं भारतीय सवर्ण?

यदि यह जानने का प्रयास हो कि मानव जाति के हजारों साल के इतिहास में इस धरती पर ऐसा कौन सा समाज मौजूद रहा है ,जिसमें अपने ही धर्म के बहुसंख्य लोगों को आथिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक शक्ति के सभी स्रोतों में रत्ती भर भी हिस्सेदार बनाने की मानसिकता नहीं रही है बल्कि इसके उलट जब-जब राज्य द्वारा बहुसंख्य वंचितों को कुछ अधिकार देने का प्रयास हुआ, तब-तब उस समाज ने देश को एक रणभूमि में तब्दील कर दिया हो तब इसका एकमात्र जवाब है कि वह ब्राह्मण-क्षत्रिय- वैश्यों से युक्त भारत का सवर्ण समाज होगा! लाख प्रयास के बावजूद ऐसे किसी अन्य समाज का नाम नहीं ढूँढा जा सकता, जिसकी सवर्णों जैसी अपने ही सहधर्मियों को अधिकार- शून्य देखने की तीव्र चाह हो। जाने-माने एक्टिविस्ट लेखक और बहुजन डायवर्सिटी मिशन के अध्यक्ष एच एल दुसाध इस लेख में कहते हैं कि ‘यह समाज शुद्रातिशूद्रों के रूप में विद्यमान देश की 85 प्रतिशत आबादी के अधिकारों के इतना खिलाफ रहा कि उसे बहुसंख्य आबादी को अच्छा नाम रखने, शिक्षा पाने एवं मोक्ष के लिए आध्यात्मानुशीलन का अधिकार देना भी कभी गंवारा नहीं रहा। दुनिया के इतिहास में सबसे क्रूर माने जाने वाले एटिला द हूण, चंगेज खां जैसे शासकों ने पराधीन बनाये गए लोगों को अच्छा नाम रखने, शिक्षा ग्रहण करने एवं दुःख मोचन के लिए देवालयों में जाकर अपने भगवानों से प्रार्थना करने से कभी नहीं रोका। ऐसी बर्बरता का परिचय समग्र इतिहास में सिर्फ सवर्णों ने दिया।’

नांदेड़ : राजनीति और शासन जाति की सड़ांध से प्रेमियों को नहीं बचा सकते

इस कहानी का सबसे बुरा हिस्सा यह है कि सक्षम और आंचल के रिश्ते के बारे में परिवार में सभी जानते थे और उन्होंने उनके रिश्ते को स्वीकार करने का नाटक किया, लेकिन यह परिवार की एक चाल थी और आखिरी दिन उन्होंने सक्षम की हत्या कर दी। बात यहीं खत्म नहीं हुई, आंचल ने अपना विरोध दिखाया और सक्षम की लाश से शादी कर ली। 'सिंदूर' लगाया और मांग की कि उसके माता-पिता और भाइयों को फांसी दी जाए।

आरएसएस के संविधान विरोध पर गूगल का नज़रिया

यह सच है कि 26 नवम्बर, 1949 को संविधान राष्ट्र को सौंपे जाने के दिन से ही आरएसएस इसका विरोधी रहा है। हालांकि तमाम लोगों की भांति मुझे भी मालूम था कि डॉ. आंबेडकर द्वारा तैयार भारतीय संविधान मनुस्मृति पर आधारित न होने के कारण ही संघ इसका विरोधी रहा है, लेकिन यह लेख शुरू करने से पहले यह जानने का कौतूहल हुआ कि गूगल इस पर क्या राय देता है? मैंने गूगल से सवाल किया कि संघ भारतीय संविधान का क्यों विरोधी रहा है, तो जो जवाब मिला, वह वही था जो हम जानते हैं। आइये जानते हैं गूगल का जवाब-

बहुजनों के लिए बहुत बुरा साबित हुआ है यह अक्तूबर

आज 2025 का अक्तूबर का आखिरी दिन है। यह माह कई कारणों से बहुजनों के लिए दु:स्वप्न बना रहा। इसी माह की दो तारीख को 1925 में स्थापित आरएसएस ने सौ साल पूरे होने का जश्न मनाया। इसी माह में छः तारीख को देश के राजनीति की दिशा तय करने वाले बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई। लेकिन संघ के सौ साल पूरे होने व बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा के अतिरिक्त जिस एक अन्य कारण से इस बार का अक्टूबर दु:स्वप्न बना, वह है संघ के सौ साल पूरा होने के बाद से उत्तर प्रदेश सहित भाजपा शासित मध्य प्रदेश, हरियाणा में  दलित–बहुजनों के खिलाफ शुरू हुआ अपमान, भेदभाव और उत्पीड़न से लेकर आत्महत्या की घटनाओं का सिलसिला, जो अब तक थमने का नाम नहीं ले रहा है। अक्तूबर 2025 के आकलन का यह मौलिक तरीका निस्संदेह एक महत्वपूर्ण पद्धति है।

जस्टिस गवई को ‘भीमटा’ की गाली सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक सरोकारों के सिमटते जाने का संकेत है

भारत की सड़ी हुई राजनीति और मनुवादी मानसिकता का असली चेहरा तब सामने आता है जब दलित समाज से आया व्यक्ति सत्ता, न्याय या प्रतिष्ठा की ऊँचाई पर पहुँच देश का मुख्य न्यायाधीश बनता हैऔर मनुवादी उसे सहज स्वीकार नहीं करते। इधर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई को सोशल मीडिया पर 'भीमटा' कहकर अपमानित किया गया। यह केवल एक गाली नहीं है। यह उस आंबेडकरवादी विचारधारा पर हमला है जिसने मनुवाद की नींव हिलाई थी। यह संविधान और लोकतंत्र को नीचा दिखाने की कोशिश है।

क्रीमीलेयर मामला : बहुजन भागीदारी के खिलाफ एक और ब्राह्मणवादी षड्यंत्र

एससी-एसटी समुदाय के आरक्षण में क्रीमीलेयर लागू करने के फैसले से सरकारी नौकरियों में आरक्षण व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त करने की साजिश भाजपा ने की है। सुप्रीम कोर्ट के कंधे पर बंदूक रखकर भाजपा ने यह गोली चलाई है। प्राचीनकाल से ब्राह्मणवादी व्यवस्था समाज पर हावी है, जिसे डॉ. आंबेडकर के प्रयासों के बाद पूना पैक्ट से आधुनिक मानवतावादी आरक्षण की शुरुआत हुई, जो संविधान का हिस्सा बनी। लेकिन एक अगस्त को आए फैसले का, इस वर्ग ने विरोध करते हुए 21 अगस्त को भारत बंद की घोषणा की है 

स्वार्थ की राजनीति ने हमेशा जाति जनगणना को रोककर आरक्षण मुद्दे पर पेंच फंसा सामाजिक न्याय की धज्जियां उड़ाईं

इधर कुछ वर्षों से लगातार जाति जनगणना की बात उठाई जा रही है। हमारे देश में इसका कराया जाना जरूरी है क्योंकि आरक्षण का प्रावधान बहुत वर्ष पहले लागू किया गया था। अब जबकि देश की जनसंख्या में वृद्धि हुई है, ऐसे समय में इस कराते हुए जातियों के नए प्रतिशत के हिसाब से आरक्षण दिया जाना होगा। जिससे सामाजिक और आर्थिक स्थिति में समानता आए और सभी सममानपूर्वक जीवन के हकदार हों सकें।

दलितों के वर्गीकरण से पहले संविधान और सफाईकर्मियों की समझ जरूरी है – डॉ. रत्नेश कातुलकर

सुप्रीम कोर्ट ने अभी हाल ही में अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण में वर्गीकरण और इसमें क्रीमी लेयर लगाने का सुझाव दिया है। यह ऐसा फैसला है, जिसका कुछ लोग स्वागत कर रहे हैं तो काफी लोग विरोध भी। यह मामला दलितों के भीतर सफाई के काम व अन्य अस्वच्छ माने जाने वाले कामों में संलग्न जातियों का है, जिनके बारे में आम लोगों को सीमित जानकारी है। वे मान्यताओं के आधार पर जानकारी रखते हैं। यह अज्ञानता न सिर्फ सामान्य लोगों में ही नहीं बल्कि प्रख्यात चिंतक योगेंद्र यादव तक में नज़र आई। जिन्होंने इस निर्णय पर अपने आलेख और इंटरव्यू से सबका ध्यान आकर्षित किया है। इस समस्या की वास्तविकता को जानने के लिये हमने सफाईकर्मी जाति समूह पर अध्ययन करने वाले समाज वैज्ञानिक डॉ. रत्नेश कातुलकर से विस्तार जानना चाहा है। जिन्होंने उत्तर भारत के हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, बिहार, झारखण्ड, मध्य प्रदेश और छ्त्तीसगढ़ राज्यों के सफाईकर्मी समुदाय का एक लम्बे समय तक अध्ययन किया है। इस पर उन्होंने अपनी किताब ‘ऑउटकास्ट्स ऑन मार्जिन्स: एक्स्क्लुज़न एंड डिस्क्रिमिनेशन ऑफ स्केवेंजिंग कम्युनिटिस’ लिखी है। पेश है इस मामले में डॉ. सुरेश अहिरवार की डॉ. रत्नेश कातुलकर से बातचीत 

विश्व आदिवासी दिवस : धरती पर मासूमियत को जिंदा रखने का संघर्ष

विश्व के सभी आदिवासियों में जागरूकता फैलाने के साथ उनके अधिकारों के संरक्षण के लिए हर वर्ष 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है। संयुक्त रासत्र महासभा ने 1994 को पहली बार अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी वर्ष घोषित किया था। विकास के नाम पर हमने आदिवासियों के लिए मापदंड तय कर दिए हैं। यदि वे अपनी मौलिकता, अद्वितीयता और अस्मिता खोकर ब्राह्मणवादी व्यवस्था की पोषक धर्म परंपरा को स्वीकार कर लें तो हम उन्हें देश की धार्मिक-सांस्कृतिक मुख्य धारा का अंग मान लेंगे। यदि वे सहर्ष अपना जल-जंगल-जमीन त्यागकर स्वामी से सेवक बन जाएं तो हम अपनी कल्याणकारी योजनाओं द्वारा उनका उद्धार करेंगे। यह लेख राजू पांडे द्वारा लिखित है, जिसे 9 अगस्त 2022 को gaonkelog.com में छापा था। आज यह लेख पुन: प्रकाशित किया जा रहा है।

क्रीमीलेयर मामला : पूरी भागीदारी मिली नहीं, उपजाति बंटवारे से वह भी छीन लेने की जुगत

कोर्ट राजनैतिक प्रभाव में आकर या दबाव के चलते ऐसे निर्णय ले रही है जो लगातार संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है। आरक्षण को लेकर जो निर्णय अभी लिया गया है, उसमें  कोर्ट ने  बिना किसी डाटा के सबसे पहले ओबीसी में क्रीमीलेयर खोजा, फिर इडब्ल्यूएस की अवधारणा को लाया और बिना किसी सर्वेक्षण के ईडब्ल्यूएस  के नाम पर अपरकास्ट को 10 फीसदी आरक्षण दिया। मतलब 15 फीसदी वाले समुदाय को लगभग 70 फीसदी आरक्षण देकर संविधान की सामाजिक न्याय की अवधारणा को ध्वस्त कर दिया गया। पढ़िए, आरक्षण पर आए फैसले की पड़ताल करता मनीष शर्मा का यह लेख-

जेल में बंद विचाराधीन कैदियों की रिहाई कैसे होगी?

देश की कानून व्यवस्था पर सवाल उठना जरूरी है। वर्ष 2021 के अंत तक देश की जेल में अब तक लगभग साढ़े पाँच लाख कैदी बंद हैं, जिनमें से 77.1 प्रतिशत विचाराधीन कैदी थे और 22.2 प्रतिशत कैदियों को ही दोषी घोषित किया गया था। इन विचाराधीन कैदियों को बिना किसी सबूत और तहकीकात के पुलिस ने जेल में डाल दिया। जबकि जेलों में जो दोषी हैं, उन्हें ही रखने की इजाजत है। सवाल यह उठता है कि विचाराधीन कैदियों की जेल में बीत रही ज़िंदगी के लिए कौन जिम्मेदार है?
Bollywood Lifestyle and Entertainment