मुस्तफा हुसैन ‘मुश्फिक’ की गीत-यात्रा

डॉ. बलदेव

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कनखी कनखी तकी चुनरिया फूटी रस की 

कहां बदरिया 

गरल पात्र भर गये सुधा में हम भी भींगे वर्षा में । भींगों भाई कौन रोक सकता है, आपको अब तो आप घर – द्वार संगी साथी सकल संसार यहां तक देह – प्राण से भी उन्मुक्त हो चुके हो .. भींगो खूब भींगो, इस वर्षा में … जब भी मन को यकीन दिलाओ कि भाई मुस्तफा अब नहीं है , कि कंधे पर कोई हाथ रख देता है और बगल में भींचकर कानों में गुनगुना जाता है-

बांध रही पग बूंद पैंजनी , दृश्य – दृश्य हो गए बैंजनी 

खेत गा रहे गीत सुधा के हम भी भींगेंगे वर्षा में । पिछले चार दशकों से श्रोताओं के मन को अपनी गीत माधुरी में डुबोने वाले इस फक्कडाना अंदाज वाले शायर मुश्फिक ने गरीबों की रेखा का लगभग स्पर्श करते हुए जीवन के जितने कडवे घूंट पीये , सभी को गीत सुधा में ढाल दिया है और जब बादलों का ऐसा मौसम आता है शत – सहस्त्र छिद्रों से रस की गागर फूट पडती है … और भींगने को होता है । आकाश में उठने वाले बादल उनके गीतों की केन्द्रीय बिम्ब है। उतप्त धरती, मुर्छित जड़ चेतन में प्राण फूंकने वाले बादलों का आव्हान गीतकार के शब्दों में उल्लेखनीय है –

अम्बर के श्याम सजल, घिरते उड़ते बादल

धरती का ताप हरो, मन्द – मन्द मत बिखरो    

सन्तापित जीवन के शब्द हुए कातर · 

रुखे उद्यानों में भोर नहीं रे बर्बर 

आंखों में गंगाजल लेकर बैठी पायल 

चिन्ता की धरती को धीरज देने उतरो। 

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बादल के प्रतीक के बहाने कवि ने यहां जो संवेदना व्यक्त की है , वह अत्यंत सटीक है । वर्षा गीत में मुश्फिक ने संयोग पक्ष का रसात्मक चित्रण किया है-

बूंद – बूंद सरगम है, सावनी फुहार के     

उद्वेलित होते हम यह छटा निहार के 

भीगा था तन केवल मन गीला हो गया

गीतों का मौसम फिर दर्दीला हो गया 

हरे-हरे पात कंपे छ़ेड से बयार के 

मुस्तफा हुसैन ने मांसल चित्रांकन में भी संयम का बडा सुंदर परिचय दिया है। उनके कहने का ढंग बिलकुल अलहदा है । कुछ और पंक्तियां देखिए :-

अंग अंग लग रहा जैसे दोहरी उसांस हो

हर क्षण लगता जैसे कोई आसपास हो 

यूं ही कुछ रीते पल जीत गये हार के 

गर्जन तर्जन करने वाले बादलों से डरे कुचले शोषितजनों के प्रति मुस्तफा के दिल में बड़ा दर्द है। उन्होने एक बरसात के बहाने आज के तथाकथित नेताओं पर व्यंग्य करते हुए इस दर्द का इजहार किया है –

कहां न जाने ज्योति बुझाई तुम गरजे अधियारी छाई,  बड़े वेग से अब आए हो, दुर्दिन के आहट के बादल

मुस्तफा भाई ने अकाल शीर्षक अपनी एक छत्तीसगढी रचना में भी यहां के हालात के जो चित्र खींचे हैं आज भी ताजे हैं-

अउंटै हावै तरिया नरवा डोंगरीपार सुखागे 

सावन भादों के महीना मा कुधरा उड़ियागे

मन्से घास जनाउर जैसन खा के थेमिन प्रान 

धान के कटोरा ला रे कौन हर मारिस बान

ललागे जॉगर नागर तरसगे जोड़ी जावर 

नोहर होगे पनियर पसिया भूखन होइन किसान

प्रकृति सौंदर्य चित्रण में कवि मुस्तफा हुसैन ने स्थानीय रंग ध्वनियाँ, गति और प्रकाश का सुन्दर बिम्बांकन किया है –

रत्नगर्भा इस धरा को टोहते बादल 

ये पहाड़ों पर झुके से सोहते बादल 

दूर मीलों तक प्रकृति की मांग पर सिंदूर पौरुष ने भरा है 

ज्ञान, मिहनत और कौशल का अचंभित माजरा है

ये मछेरों से तटों पर जोहते बादल

इस दृश्य का फिल्मांकन गीतकार ने काफी ऊंचाई से किया है .. बालको के कारखाने के लिए डोलोमाइट पुटका पहाड से उडन ट्रालियों में ढोए जाते हैं … तब दूर तलक सफेदी की एक रेखा खींच जाती है, कवि ने देखिए इस बिम्ब निर्माण से किस कदर अपनी कवि प्रतिभा का उपयोग किया है –

पर्वतों के भाल पर उन्मत्त बहती एक चांदी की नदी है दूर टीले से जिस लकडहारा हां, यही आकाशगंगा से बही है

श्रम के सहयोग से प्रकृति मनोहारा हो जाती है , विज्ञान समर्थित श्रम का एक अनूठा चित्र देखिए-

स्वेद माटी का गुलाबीपन कहां से छानते विज्ञान युग के और कांधों पर उठाये जा रहे रोज ये इंसान युग के वर्तमान के लिए कवि ने विज्ञान की सर्जन शक्ति को वरदान के रूप में स्वीकार किया है, जो कि उसके प्रगतिशील विचारों का परिचायक है।

वर्षा ऋतु जैसे ही गीतकार ने शरद ऋतु के भी सुघड गीत लिखे हैं… वर्षा के बाद बादलों के काजल धुल गये हैं, चतुर्दिक उजियारा है, चांदनी बरस रही है, पूर्णिमा का चांद आसमान पर है …

गगन की आंख की पुतली धुला काजल हुई उजली 

नयन के कोर से सपने बरसते चांदनी जैसे

जिसे हम पूर्णिमा कहते 

जब चांद खिलखिलाया पूनो भरा गगन में, मुस्तफा हुसेन की दूसरी बिम्बधर्मी रचना है जिसमें बिलकुल नये रूपाकारों के दर्शन होते हैं, कुछ पंक्तियां दृष्टव्य है-

चंचल चपल चांदनी चुम्बक हुई नयन में 

जब चांद खिलखिलाया पूनो भरा गगन में 

दर्पण हुई है सरिता मुख बिंब हम निहारे 

जो टिमटिमा रहे थे ओझल है वे सितारे

दूनी निखर गयी है, पृथ्वी इस आचमन में 

जब चांद खिलखिलाया पूनो भरा गगन में

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मुस्तफा हुसैन मुश्फिक ने अन्य ऋतुओं के श्री प्राणवान चित्र उकेरे हैं, लेकिन फाल्गुनी गीत छत्तीसगढ़ी में अपने चित्रण की विविधता के कारण ढेर श्रृंगारिक रचनाओं के बीच नितांत अकेला ही है-

जुरे हावै एके संग सबे बन पाखी 

एक रंग रंगे हावै सम्बे मन – माखी

कि डोंहरू होइस छतमार, सारंगी कस बाजै कछार कोन रंग देबो तोला निपोरी कि देह तोर खिल खिल जाय। मुस्तफा हुसैन मुश्फिक ने कुछ भजननुमा गीतों का भी प्रयोग किया है, जिनमें उनका -जनवादी स्वर मुखर हुआ है । वर्तमान में यर्थाथवादी चित्रण में कवि ने इतिहास और पुराण के पात्रों से प्रतीक का काम लिया है। इन प्रतीकों के माध्यम से जो पर्दे के पीछे घट रहा है , उसे कवि ने सटीक शब्दों में उजागर किया है .. कुछ पंक्तियों काबिले गौर है –

जीवन तो जंजाली रे मन मंद मंदिरा की प्याली रे मन राग द्वेष के व्यवहारों में चिन्ता के कारागारों में लिप्साओं के मिले  उद्धरण हर चेहरा है जाली रे मन

सूत्र वाक्यों में भी कहने के आदी मुस्तफा हुसैन आज हमारे लिए उदाहरण हो चुके हैं । दो पंक्तियां ही यहां पर्याप्त है –

तृण गर्वीला हुआ कि टूटा, लोहे ने लोहे को पीट

मेरे गीत सदा बन – वासी जैसे भजननुमा दूसरे गीत में भी मुस्तफा ने इतिहास और पुराण के पात्रों का प्रतीक बतौर इस्तेमाल किया गया है, जो कि आज के अंतर्विरोधों को प्रकट करने में सक्षम है। आज आदमी का आदमी से विश्वास उठ चुका है जो कल के आदर्श थे, वे ही मात्र लिप्साओं से लिपटे हुए हैं-

सीता जैसी रही भावना लक्ष्मण जैसे हाथ 

क्लान्त सुदामा की दिनचर्या कृष्ण नहीं हैं साथ   

दुर्योधन के मामा शकुनि का घेरा है

मेरे गीत सदा बनवासी राम चित्तेरा है 

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मुट्ठी भर लोगों के हाथों में समूचा राष्ट्र है, सारी सुविधाएं सरकारी योजनाएं इन्हीं की तिजोरियों में कैद है। इस देश में रोटी, कपड़ा, मकान जैसी बुनियादी चीजों के लिए सामान्यजन को कठिन संघर्ष करना पड़ रहा है। इसके बावजूद वह असहाय इतना कि सफल नहीं हो पाता।-

सांझ ओढना रात बिछौना दिन बनजारे सा

प्रतिबिम्बों पर खेद भर गया पारे पारे सा 

जहाँ दीवार कोइ भी वहीं चित्तेरा है।

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इस विकासशील देश में प्रतिगामी शक्तियां ज्यादा ताकतवर हैं, जो समाज के तथाकथित रक्षक हैं और आम आदमी जिन पर गर्व करता है, अपने को कुर्बान करता है, वे समय आने पर भूमिगत हो जाते हैं। अपनी सुरक्षा अपने हित साधन के लिए वे प्रतिगामी शक्तियों से समझौत्ता करने से भी नहीं चूकते, उनके द्वारा सामान्य जन के लिए किये गये हर भलाई के कार्य मात्र विज्ञापन है। गीतकार के शब्दों में-

हुई विभीषण की लंका अब राम नहीं आते   

सूर्पणखा की बात टालते लक्ष्मण  सकुचाते

गीतकार मुस्तफा हुसैन बहुत हद तक मार्क्सवादी रहे हैं। उनकी आवाज में इसलिए जनवादी चेतना का कड़कपन है। सामाजिक विद्रूपताओं, राजनीतिक षड़यंत्रों, धार्मिक पाखंडी, आर्थिक विषमताओं और अन्य राष्ट्र विरोधी पापाचारों की शिनाख्त करती ये कविताएं काफी धारदार है। आज समाज की इस ठस व्यवस्था को तोड़ने की जरूरत है। तभी उसकी पूरजोर ताकत चुनौतियों का सामना कर पायेगी। मुस्तफा हुसैन जी की इस तकलीफ ओर संकल्पों को उनके इस इंकलाबी गीत में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है –

हां, तुम्हीं को नमन हां तुम्हीं को नमन 

हर जवां दोस्तों पर जवां हर वतन 

हां तुम्हीं को नमन हां तुम्हीं को नमन

ये तवारीख कुछ सनसनीखेज है

चिंतनीय कर्णधारों हां तुम्ही कुछ करो

इस विषम आसरों के लिए मर मिटो 

निर्वसन आज भी हैं कई तन- बदन 

मुस्तफा हुसैन के (जन चेतना में गहरे असर डालने वाले ) ये बिम्ब सत्ता पक्ष के चरित्र को बेनकाब करने के लिए भी धारदार हैं-

संविधानी सुभीतों में जो जी रहे 

मौन साधे हुए सबके मुंह सी रहे

वे न बदले न बदले न बदले कभी

देखती आ रही ये पहाड़ी नदी 

बीहड़ों सभ्यता के अबोधे नयन 

यहां रचनाकार ने भक्ति, आस्था, रीति रिवाज जैसे भोथरे शब्दों को एक प्रकार से अस्वीकार कर दिया है, क्योंकि आदमी आदमी से हिलमिल नहीं पाता, जिंदगी की किरणें छटपटा रही हैं। इस ठस व्यवस्था से लोग पूरी तरह उब चुके हैं।

भक्ति के रास्ते सब घिनौने हुए 

आस्था के शिखर कितने बौने हुए 

रात वाली कोई बात भाती नहीं 

उत्सवों की घड़ी भी सुहाती नहीं 

बीतती इस सदी के मेरे  बंधुजन 

हां, तुम्हीं को नमन हां, तुम्ही को नमन 

इस इंकलाबी गीत में जो वेदना और आक्रोश छुपा हुआ है, वह दूसरी आज़ादी के समय खुशियों में तब्दील हो जाता है, किन्तु चेहरा बदलने वालों पर कवि की चुभती नजर भारी है –

इक इंकलाब आया है दोहरे हुए हैं लोग 

कोहरे बढ़ा-बढ़ाकर सुनहरे हुए हैं लोग

मुस्तफा हुसैन ने अपनी साठ पैंसठ वर्ष की उमर तक काफी संघर्ष किया था लेकिन वे कभी हताश नहीं हुए … अकेले होते हुए भी उन्होंने सुविधाओं के लिए अपना जमीर नहीं बेचा और न ही विघ्न संतोषियों से जिन्होंने कदम दर कदम पर उनकी राह में कांटे बिछाए पर उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। वे बुराइयों से आजीवन लड़ते रहे। मुस्तफा हुसैन छोटे बड़े सभी के मित्र थे, सभी के शुभचिंतक थे … उनके बिना हर साहित्यिक आयोजन अधूरा अधूरा सा लगता है। वे सचे इंसान थे, लोकतंत्र की बहाली पर उन्हें विश्वास था –

फिर तो लगी चहकने चिड़ियाँ, लगा गूंजने भोर 

शोर – शोर में शोर खो गया, शोर शोर में चोर 

भिगो दिया फिर ओस बूंद ने हरी हरी दूबों को 

हवा उड़ाकर कहां ले गयी कल के मंसूबों को 

सूरज फिर से जन जीवन में अलख जगाता है

कालचक्र का पहिला दिन दिन आगे बढ़ता जाता है

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इन गीतों की सबसे बड़ी विशेषता सम्प्रेषणीयता और गेयता है। मुस्तफा हुसैन की आवाज में खराश थी, जो उन्हें उनके वालिद बडकू मियां से विरासत में मिली थी। साहित्य की दुनिया में मुस्तफा हुसैन कभी आत्म केंद्रित नहीं रहे। वे खुले खुले खुशनुमा दिल इंसान थे। सामाजिकता उनमें ऐसी कि ईद क्या , दीवाली क्या , सबमें समान शिरकत करते थे। इस इंकलाबी शायर की एक ओर दुनिया है, गजलों की। उन्हें सलाम करते हुए मैं हमारे समय के युवा गीत हस्ताक्षर जयप्रकाश मानस को ढेर सारी बधाइयां देना चाहूंगा जिन्होंने उनकी रचनाओं की फिक्र मेरी शायरी शीर्षक से सुरुचिपूर्ण प्रकाशन किया है, जिसका उन्हें भरपूर इनाम मिल चुका है, लेकिन खेद है हम उत्सवधर्मी लोग उनके गीतों का एक संकलन भी नहीं निकाल सके।

स्व. डॉ. बलदेव साव रायगढ़ में रहते थे। ( यह लेख उनकी किताब रायगढ़ का वैभव से लिया गया है)

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