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मैदानी गांवों की सच्ची दास्तान बताती आवश्यक किताब ‘आफत में गांव’
पत्रकारिता की भाषा और शैली में जो सुस्पष्टता वाकई में होनी चाहिए, वह इन रिपोर्ट्स को पढ़कर लगा, जो बात कही गई है, वह आंखन-देखी हों, कहीं किसी कागज में लिखी हुई बात नहीं। कागजों में लिखी हुई बात यानि प्रेस विज्ञप्तियों में काट-छांट करके खबरें लिखी जा सकती हैं,रिपोर्ट्स नहीं। रिपोर्ट और खबरों में यही बेसिक अंतर है। 'आफत में गांव' में प्रकाशित ग्राउंड रिपोर्ट्स इन बातों को साबित करती है।
टैगोर और मेरी एक ख्वाहिश (डायरी 9 मई, 2022)
कुछ खबरें अलग होती हैं। सामान्य तौर पर राजनीतिक खबरें ऐसी नहीं होती हैं आदमी की नींद खराब हो जाय। और मैं तो राजनीतिक...
अंबेडकरवादी विचार तो फैला है लेकिन दलितों का कोई बड़ा लीडर नहीं है
तीसरा और अंतिम भाग
क्या आप बामसेफ जैसे सामाजिक संगठनों या कर्मचारी यूनियनों से भी जुड़े? यदि हाँ, तो वहाँ आपकी क्या-क्या गतिविधियां थीं?...
पिछले पाँच साल में एक भी ठाकुर की हत्या हुई हो तो बता दीजिए?
उत्तर प्रदेश चुनाव में तरह तरह के नैरेटिव बन और बिगड़ रहे हैं और इसी के साथ जीत हार के दावे भी हवा में...
सीमा आज़ाद की किताब को लाडली मीडिया सम्मान
अगोरा प्रकाशन से प्रकाशित सीमा आज़ाद की किताब औरत का सफर : जेल से जेल तक को लाडली मीडिया सम्मान से सम्मानित किया गया।...

